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शनिवारेर चिट्ठी : मुझे मुआफ़ करना प्रिय!

मुझे मुआफ़ करना प्रिय!

इतना भर कह देने से क्या होता है कि मन इस पूरे हफ़्ते खिन्न रहा। यह कहने से कि चीज़ें देखता-सुनता रहा और आँखें भीगती रहीं। कभी निराशा से तो कभी बिजली की तरह कौंध आती आशा से। यह कहने से कि आक्रोश इतना कि अपशब्द फूटे जाते थे। उमस थी, हवा नहीं चल रही थी। दिल्ली की सड़कों पर जो है, वह दिल्ली तक ही सीमित नहीं है। देश के दूसरे शहर भी जैसे एक ही वाक्य को अलग-अलग लहजों में बोल रहे हैं। छात्र, युवा, नारे, माँग, पुलिस, लाठी, हमला, प्रतिरोध, साहस, पीढ़ी, एटिट्यूड—सारी चीज़ें एक-दूसरे से संबद्ध-असंबद्ध एक ही दृश्य का हिस्सा बनी हुई। मैं देखता रहा, खोता रहा। वह वीडियो! भूल जाता यदि भूलना स्मृति का नहीं, मेरे चरित्र का गुण होता। एक पुलिस अधिकारी द्वारा एक छात्रा के विरुद्ध यौन-हमले की वह भंगिमा! मुझे नहीं मालूम कि मैं किस बात से अधिक विचलित था। हिंसा से, सत्ता पक्ष की निर्लज्जता से या अपनी निष्क्रियता से। मैंने अपने बारे में हमेशा यह कल्पना की थी कि किसी निर्णायक क्षण में मैं एक सड़क पर खड़ा मिलूँगा। मेरा कायर टूटता तो मैं कुछ सक्रिय होता। मैं कविताओं के बीच रहा, पर रहा ऐसे जैसे कोई युद्ध के समय तहख़ाने में उतर जाए। यह अनुताप, ओह!   

अभी भी इस कमरे में उमस है। लेकिन अब मुझे यक़ीन नहीं कि यह केवल मौसम की है। मुझे मुआफ़ करना प्रिय मंज, मैं इस शनिवार तुम्हें कोई चिट्ठी न भेज सकूँगा...

शेष फिर...

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