देखना चाहता हूँ शरीर काले मनुष्य का एनाटॉमी के पाँचवे
पृष्ठ पर,
अवरोधक,
उसका हृदय,
बहुमूल्य रक्त
संयुक्त शिराओं के रक्तप्रवाह में बंद होता,
हाथ जिन्होंने सलीब उठाया
और तीन बार उसके नीचे गिरे,
नेत्र जिन्होंने दक्षिण की भयभीत अनल देखी,
उँगलियाँ जिन्होंने लाशें गिनीं और मुट्ठियाँ जिन्होंने ज़ंजीरें
तोड़ीं,
गुर्दे जिन्होंने रक्त का मूत्र बहाया डिक्सीलैंड के शर्मनाक
स्तंभ पर,
फेफड़े जिन्होंने श्वास ली बारूद के धुएँ की और जलाई गई
झोंपड़ियों की कालोंच की,
गर्दन जो लटकाई गई ओक-वृक्षों पर
जिसके कारण दबाए हुए
धरती की दहकती दरारों में
आधे झुके काले झंडों की तरह
विमूढ़ता के त्यौहार पर,
कानों के परदे गोलियों से फटे हुए,
अंग कटे हुए,
बलात्कृत
और सलीब पर टँगे हुए
रास्तों के चौराहों पर जाते हैं जो
निराशा की सभी चारों दिशाओं को।
देखना चाहता हूँ शरीर काले मनुष्य का,
काला शरीर
जिस पर हंटर का लंगर छोड़ गया है अपनी गंध की मुहर,
पाँचवें या सत्रहवें या एक ही बात है चाहे किसी भी पृष्ठ पर
एनाटॉमी के,
कि कह सकूँ : यही मेरा भी शरीर है
एक-सा ही स्वर मृत्यु की घड़ी में,
एक-सा ही अपमानित प्रेम में,
रुदन जिसे झकझोरता चिंतित और नग्न
अपने उदर में,
रोना, सुबकना समान ही उन्नत और अशक्त
जैसी कि विद्रोही नाड़ी की कँपकँपी दंडित पशु के गले में,
विवेक का काला चेहरा रंग में छपा हुआ, काग़ज़ पर
सबसे अच्छे पर जो प्राप्य है
कि देख सकूँ उस तिरस्कृत और थूके हुए मस्तक को,
कि नाप सकूं शरीर की गरमाई, पीड़ा की गहराई को,
घृणा और प्रेम की शक्ति को
और वह सब जो नापा नहीं जा सकता
तोला नहीं जा सकता,
घेरा नहीं जा सकता,
और वह सब जो हमें अलग करता और हमें मिलाता है
एक जन-भ्रातृ संगठन में,
कि समझ सकूँ,
कि जान सकूँ,
कि अंततः समझ सकूँ
कि क्यों मेरा नेत्र, मेरा रक्त,
मेरा चमड़ा पाला-पोसा हुआ काँच के घर में इलैक्ट्रोडों
और गणन यंत्रों के बीच,
कंक्रीट के स्तंभों और रासायनिक खादों के बीच
उसकी त्वचा से अधिक मूल्यवान है।
जो धूप से उर्वरित है।
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 127)
- संपादक : श्यौराजसिंह जैन
- रचनाकार : ज़्वोनीमीर गोलोब
- प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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