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धारावाहिक उपन्यास : जंकामंका गैंग : हिंदी का पहला आतंकवादी

गताध्याय से आगे...

चार 

यह सच तो यह कि जंकामंका युग से पहले हिंदी विभाग का डंका बजता था। रामकाव्य, जायसी, भारतीय उपन्यास आदि पर केंद्रित शानदार राष्ट्रीय संगोष्ठियाँ यादगार थीं। हर बार मशहूर सिंह का उद्घाटन वक्तव्य और वक्तव्य की अदा याद रह जाती थी। अध्यक्षता बदली, तो बहुत कुछ बदल गया। पहले देश के नामचीन आलोचकों-कवियों, कथाकारों, नाटकारों, नाट्यालोचकों, रंगकर्मियों की उपस्थिति से हिंदी विभाग का मान बढ़ता था। कई बड़े नाटकों का मंचन हिंदी विभाग की मैडम नंदिनी अवस्थी ने संभव किया था। ‘ध्रुवस्वामिनी’ का मंचन तो देश भर में हुआ था। एक समय था जब, हिंदी विभाग में आचार्य अपने अनुशासन में महत्त्वपूर्ण काम करने के लिए जाने जाते थे। बाद में जंकामंका शास्त्री के कुर्सी पर बैठने के बाद विभाग की ग़ैर-अकादमिक अदाएँ काफ़ी प्रसिद्ध हुईं। इस बीच जंकामंका शास्त्री ने सोचा कि उनके हाथ में भी एक पत्रिका होनी चाहिए। हिंदी विभाग के अध्यक्ष हैं, धोती पहनते हैं, तो महावीर प्रसाद द्विवेदी होना तो बनता है। बल्ली और हौदा, जंकामंका शास्त्री को लेकर तीक्ष्णकंटक धाम पहुँच गए। बाबा से पत्रिका का नाम रखने के लिए कहा, तो पहले तो बाबा ने कहा, “बच्चा ई सब हमारा काम नहीं है, तू खुदै कुछ रख ले।”

जंकामंका शास्त्री को विश्वास था कि बाबा कोई अनूठा नाम देंगे या जो भी नाम देगे; उससे पत्रिका तो प्रसिद्ध होगी ही, उन्हें उनके अपने समय में साहित्य का युग-प्रवर्तक होते देर नहीं लगेगी। बाबा ने आख़िर भक्तों की श्रद्धा देखकर नाम पर विचार करना शुरू किया। कोई ज्योति उनकी आँखों में चमकी, सहसा उनके मुख से निकला, “पवित्र गोबर।” 

जंकामंका, बल्ली और हौदा, सबके चेहरे खिल गए, बाबा को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और उस दिन वह अपने ललाट पर भभूत की जगह पवित्र गोबर लगाकर लौटे। आश्चर्य की बात यह कि पहला अंक अज्ञेय पर विशेषांक के रूप में निकालते ही तहलका मच गया। बल्ली और हौदा तो यहाँ तक कहते फिरते थे कि जंकामंका जी ने मार्क्सवाद और मार्क्सवादियों के मुँह पर पवित्र गोबर पोत दिया है। हँसमुख वाजपेयी से जंकामंका शास्त्री की निकटता में इस अंक की बड़ी भूमिका थी। इस तरह जंकामंका अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए ‘पवित्र गोबर’ के रथ पर सवार होकर देश भर में यात्रा करने लगे। कोई हिंदी विभाग ऐसा नहीं था, जहाँ ‘पवित्र गोबर’ न पहुँचती रही हो। जंकामंका साहित्य के रथ पर सवार हुए, तो उनके गण बल्ली और हौदा विश्वविद्यालय की राजनीति के रथ पर सवार हुए। इस बीच बल्ली और हौदा ने साहित्य की पढ़ाई-लिखाई छोड़कर विश्वविद्यालय के नियम, परिनियम ओर अध्यादेशों की जमकर पढ़ाई की। बल्ली ने तो सब कंठस्थ कर लिया था। विधि विभाग के प्रोफ़ेसरों को बल्ली सर की इस प्रतिभा से ईर्ष्या होती थी, जानना उन्हें चाहिए था; लेकिन नहीं जानते थे, विश्वविद्यालय के एक्ट के बारे में बल्ली सर से पूछते थे। एक्ट, स्टेच्यूट, आर्डिनेंस बल्ली इतना अधिक जानते थे कि एक बार यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बने तो फिर कभी अध्यक्ष की कुर्सी से उतरे ही नहीं। फिर तो विश्वविद्यालय में सबने मान लिया कि विश्वविद्यालय की और उनकी भलाई बल्ली सर के हाथों में है। वे बल्ली सर की जितनी इज़्ज़त करते थे, उससे ज़्यादा डरने लगे थे कि बल्ली सर कहीं कोई नुक़सान न करा दें। इसलिए उनकी और अधिक इज़्ज़त करने लगे थे। कोई ऐसा दिन नहीं होता था, जिस दिन बल्ली सर और हौदा सर कुलपति से मिलने के लिए न जाएँ या न जा पाएँ तो कुलपति उन्हें किसी सलाह-मशविरे के लिए न बुलाएँ। जंकामंका शास्त्री के साहित्य में अभी इतने अच्छे दिन नहीं आए थे, जितने विश्वविद्यालय में बल्ली सर के आ चुके थे। विभाग में उनसे मिलने वाले दूसरे विभागों के पुरुष और महिला प्रोफ़ेसरों का ताँता लगा रहता था। पुरुष प्रोफ़ेसर हों या महिला, सबने बल्ली सर को विश्वविद्यालय के लोकतंत्र का देवता मान लिया था। उन्होंने सबको प्रभावित किया था, लेकिन महिला प्रोफ़ेसरों ने बल्ली सर को कम प्रभावित नहीं किया था, उनके दिल-दिमाग़ पर अपनी छाप से पूरा छाप दिया था। कैंपस में कोई महिला प्रोफ़ेसर आवाज़ दे दे, तो रिक्शे से कूद जाते थे। जब गाड़ी ख़रीद ली, तो पैर और हाथ दोनों से ब्रेक लगा देते थे। बल्ली सर की इस तीव्रता को देखकर विभाग की मल्लिका मणि मंजुला मिश्र जल जाती थीं कि कहीं-कहीं जलने का दाग़ पड़ जाता था, चूँकि वे बहुत गोरी थीं, इसलिए कोई भी दाग़ हो, कहीं भी हो, छिप नहीं पाता था। मल्लिका जितना कर सकती थीं, उससे भी ज़्यादा बल्ली सर को प्रभावित करने की चेष्टा करती रहती थीं। असल में उनके शौहर किसी दवा कंपनी में मेडिकल रिप्रजेंटेअिव थे, लेकिन आजकल पूरे पूर्वांचल को देखना पड़ता था, कभी बनारस में रात बिताई तो कभी आज़मगढ़ में तो कभी किसी और शहर में। मल्लिका मणि मंजुला मिश्र को अकेले रहना पड़ता था। वह चाहती थीं कि प्रोफ़ेसर कॉलोनी में आवास मिल जाए। आवास न भी लेना रहा होता, तो भी विश्वविद्यालय के सबसे ताक़तवर बल्ली सर के प्रति उनका विशेष आकर्षण था। बल्ली सर तो जानते ही जानते थे। विभाग में भी किसी से छिपा नहीं था। विभाग में मल्लिका उदय सर से जूनियर थीं, लेकिन बल्ली सर मल्लिका मणि मंजुला को हमेशा अनुभव कराते थे कि वह उदय सर के ऊपर हैं। किसी अध्यक्ष की मजाल नहीं थी कि बल्ली सर की बात को काट दे। उसकी अध्यक्षता ख़तरे में पड़ जाती। बल्ली सर को अपनी साहित्येतर शक्तियों की वजह से अंहकार इतना हो गया था कि उनके माथे से ही नहीं, शरीर के हर अंग से चूता दिखता था। ऐसे में बल्ली सर सभी जगह केंद्र में रहना चाहते थे। कोई भी आयोजन हो, उन्हें मंच पर जगह और अख़बारों में उनकी फ़ोटो चाहिए ही चाहिए थी। दैनिक रोज़ाना का एक संपादक, उनकी छींक को भी चार कॉलम देने के लिए तैयार रहता था। असल में वह अख़बार में बनिये की नौकरी से ऊब चुका था और कभी निकाला जा सकता था, इसलिए विश्वविद्यालय के किसी भी विभाग में प्रोफ़ेसर होना चाहता था। उदय के एक आलोचक दोस्त कमलकांत त्रिपाठी, जो एक बड़ी सरकारी नौकरी में थे, अपनी विश्वविख्यात साहित्यिक महत्त्वाकांक्षाओं की वजह से हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर होना चाहते थे। कह सकते हें कि उनका साहित्यिक प्राण प्रोफ़ेसरी में अटका हुआ था, इसके लिए वह किसी के भी साहित्यिक प्राण ले सकते थे। बल्ली सर के संकेत पर किसी भी लेखक का नाम अपने प्राइवेट ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ से मिटा सकते थे। उसे अदृश्य बना सकते थे। ऐेसी दुर्बल आकांक्षाओं से पीड़ित मनुष्यों के लिए बल्ली सर अकादमिक जगत के देवता थे। चूँकि हौदा सर बल्ली सर के साथ दिन-रात होते थे, साथ ही सोते थे, साथ ही जागते थे, दिशा-मैदान वग़ैरा हर काम साथ करते थे, इसलिए उनका महत्व उपदेवता के रूप में था। 

कोई उदय से बल्ली के देवत्व के बारे में पूछता तो, उदय साफ़-साफ कहता था, “वह तो हिंदी का पहला आतंकवादी है।” वह यह भी कहता, “आतंकवादी कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसका गैंग चाहे जितना बड़ा हो, उसके भीतर भी डर होता है, किसी न किसी से वह भी डरता है।” 

बल्ली हिंदी की दुनिया में जंकामंका शास्त्री की फ़ौज का सेनापति होने के बावजूद उदय से डरता था। उसकी कविता से जितना डरता था, उससे अधिक उसकी मौजूदगी से। शायद इसलिए कि उदय उससे नहीं डरता था। उदय उससे इसलिए नहीं डरता था, क्योंकि उसने पहला काम यह किया था कि  अपने गुरुओं से डरना छोड़ दिया था। इसलिए किसी से भी डरना छोड़ दिया था। इस निडरता की उसने बड़ी क़ीमत चुकाई थी। विद्यार्थी जीवन में चुपके से अपने भीतर बनी गुरुओं की आदर्श-छवि और हिंदी के इस नक़ली स्वर्ग की एक-एक ईंट पर गुरु-प्रहार किया था। हालाँकि यह सब करने के लिए वह हिंदी विभाग में नहीं आया था।

उदय ने तो हिंदी विभाग में सर के रूप में आने की कभी कल्पना नहीं की थी। विद्यार्थी के रूप में आया था और डिग्री लेकर चला भी गया था। हिंदी विभाग में सर के रूप में आना, उसके लिए जितना विस्मयकारी था, उससे अधिक जंकामंका गैंग के लिए। ज्वाइनिंग के बाद से ही बल्ली और हौदा ने उसे अपना पालतू पशु-पक्षी बनाने की ज़बरदस्त कोशिश शुरू कर दी थी। उनका सोचना था कि जब वह कहें अतू-अतू तो दौड़़कर उनके पास आ जाए, जिधर इशारा करें, भौंकना शुरू कर दे; मना करें तो चुप हो जाए। असल में वह ग़ज़ब के बल्ली और हौदा थे। रिमोट कंट्रोल जैसी कोई चीज़ अभी आई नहीं थी और वह चाहते थे कि उदय का रिमोट कंट्रोल उनके हाथ में रहे। जैसे वह सभी प्राध्यापकों को चलाते थे, उदय को भी चलाएँ। गुरुओं तक की पूँछ उन दोनों के हाथ में थी। फिर भला वे दोनों, उदय को छुट्टा साँड की तरह कैसे रहने दे सकते थे। बल्ली और हौदा, दोनों के लच्छन क्या, हरमज़दगी देख-देखकर कबीर दुखी होते थे। बीच-बीच में मगहर से गंज गोबरहवा आ जाते थे। यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग के गेट पर माथा पकड़कर खड़े हो जाते थे, गाने लगते थे : “संतो, घर में झगरा भारी...” थोड़े समय में ही हिंदी विभाग को लेकर उदय को जो भ्रम था, टूट गया था। जिन गुरुओं को देवता समझता था। वे बल्ली और हौदा के सामने, उन दोनों के संयुक्त शिष्य की तरह आचरण करते थे। वे कहते थे, बैठ जाइए, तो बैठ जाते थे, खड़े होने को कहते, तो खड़े हो जाते और तब तक खड़े रहते थे, जब तक बल्ली और हौदा में से कोई बैठने के लिए नहीं कहता था। कभी-कभी तो वे कहना भूल जाते थे, तो गुरूजी लोग पूरा दिन खड़े-खड़े गुज़ार देते थे। धोती वाले त्रिपाठी जी तो बैठकर पेशाब करने की आदत के विपरीत, उस दिन पूरे दिन जितनी बार करना होता था, खड़े-खड़े पेशाब करते थे। नंदिनी मैडम ने भी बल्ली और हौदा को पढ़ाया था, इसलिए जानती थीं कि ये हिंदी के गधे हैं। कोई भाव नहीं देती थीं। मल्लिका भी उनकी छात्रा थी, उसे भी डाँटतीं थीं, क्यों उन सबसे डरती हो। उदय की तरह क्यों नहीं रहती हो। देखती नहीं, कितना स्वाभिमानी है। नंदिनी मैडम की सीख का कोई असर मल्लिका पर नहीं था। लोग कहते थे कि मल्लिका मैडम जिस किताब को पढ़कर आयीं थीं, उसे शुरुआती दिनों में बल्ली सर ने किसी कोने में ले जाकर फाड़ दिया था। उसके बाद से उन्हें सिर्फ़ बल्ली सर की बातें और सीख अच्छी लगती थीं। मल्लिका अपने पति से कभी-कभी नंदिनी मैडम के बारे में कहती थीं, “बुढ़िया मुझे भड़काती रहती है। मैं कोई बेवक़ूफ़ी नहीं करूँगी। मुझे उदय नहीं बनना है। उदय को विभाग में कोई नहीं पूछता है। रिफ़्रेशर कोर्स में ही उसे एक दिन के लिए भी व्याख्यान का मौक़ा नहीं मिला, मुझे तो तीन मिला है। मैं उस पगली बुढ़िया के कहने पर यह सब छोड़ तो नहीं सकती।”

प्रोफ़ेसर दुर्गा प्रसाद पांडेय उर्फ़ प्रोफ़ेसर हाथी पांडे हों या प्रोफ़ेसर चंद्रिका प्रसाद पांडेय उर्फ़ प्रोफ़ेसर साथी पांडे, प्रोफ़ेसर सुतुही प्रसाद सिंह उर्फ़ प्रोफ़ेसर कीट हों या प्रोफ़सर रामफेर त्रिपाठी उर्फ़ प्रोफ़सर पतंग हों या विभाग के दूसरे प्रोफ़ेसर, कोई भी, उन दोनों से पंगा नहीं लेना चाहता था, बल्कि कहना चाहिए कि वे सब, बल्कि सब के सब, उन दोनों के लिए बाक़ायदा काम करते थे। उन दोनों के एजेंडे में पहला काम उदय सर को गुप्त कवि बनाना था, कवि के रूप में कोई उदय को, देश-दुनिया तो छोड़िए, गंज गोबरहवा ज़िले में भी जानने न पाए। बावजूद इसके कि उदय ने सर बनने के कई साल पहले से कविता को स्थगित कर दिया था। जबकि पंत जी के, वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान, फ़ॉर्मूले के आधार पर कविता लिखने के लिए उसके पास पर्याप्त अवसर था। चूँकि उदय अवसरवादी नहीं था, इसलिए पिछले पाँच-सात सालों में पंत का फ़ॉर्मूला फ़ेल हो गया था, उसने कवि होने के लिए नियत वियोगी होने की मात्रा से अधिक वियोगी होने के बावजूद कोई कविता नहीं लिखी थी। शायद वियोग ने ही उसके हाथों में हथकड़ियाँ डाल दी थीं। शायद विरह के ताप से उसके क़लम की स्याही सूख गई थी। शायद उसके हाथों में जुंबिश नहीं रह गई थी। शायद उसका मन  बदल गया था। शायद यह कविता की दुनिया से कुछ समय के लिए स्वेच्छापूर्वक निर्वासन था। उसके पास ठोस वजह थी। किसी से कभी कुछ कहा ही नहीं कि उसके साथ हुआ क्या था। मैं जानता था और झंकार को पता था। बीदास को भी पता था। फिर किसी और को मालूम होने का सवाल ही नहीं था। उसे भी नहीं पता था, जिसकी वजह से उसने कविता लिखना छोड़ दिया था। कहना चाहिए वह मन कहीं और किसी और के साथ चला गया था, जिससे कविताएँ लिखता था। सर बनने के कोई पाँच साल बाद तक उसने कोई कविता लिखी ही नही। कविता तो उसके एमए फ़ाइनल के अंतिम दिनों के आस-पास ही उससे रूठ गई थी। 

जैसे-जैसे फ़ाइनल एग्जाम के दिन बीत रहे थे, उदय के भीतर कोई ख़ालीपन भरता जा रहा था। गुलमोहर के लाल-पीले फूल भी उसे हरा नहीं कर पा रहे थे। एक परचा देकर आता और हास्टल के कमरे में फिर से बंद हो जाता। उसे एमए के परचों की कोई चिंता नहीं थी। टॉप नहीं कर पाया तो भी फ़र्स्ट क्लास आ जाएगा। उसे सबसे ज़्यादा चिंता यह शहर छोड़कर जाने की थी। अगले दिन आख़िरी परचा था। उसे लगता था, उसकी बहुत प्यारी चीज़ें, कभी भी उससे छूट जाएँगी। उसे अपने साथ होने वाली इस असह्य दुर्घटना का आभास हो गया था। उसकी सबसे प्यारी चीज़ जीवन से निकलकर ऐसी जगह चली जाएगी, जहाँ पहुँचकर भी वह उसे वापस ला नहीं पाएगा। दूरी तो पार कर लेगा, ट्रेन से कुंजलगढ़ स्टेट पहुँच जाएगा, ट्रेन छूट जाएगी, तो बस से पहुँच जाएगा, बस छूट जाएगी, तो साइकिल से पहुँच जाएगा, साइकिल ने भी उसके भाग्य की तरह उसका साथ नहीं दिया, तो पैदल पहुँच जाएगा, पैरों ने भी उसे धोखा दिया तो? नहीं-नहीं ये पैर मेरे हैं, बुरे से बुरे वक़्त में भी मेरे साथ होंगे, मुझे कुंजलगढ़ स्टेट के भारी-भरकम गेट तक ज़रूर पहुँचा देंगे। दरबान ने गेट के अंदर नहीं जाने दिया तो क्या करेगा? स्टेट की ऊँची-ऊँची दीवारों को फाँद कैसे पाएगा, उसके ये पैर छोटे हैं, उसकी हैसियत छोटी है, स्टेट की ऊँची-ऊँची, चौड़ी दीवारों की एक ईंट के बराबर भी तो नहीं है, वह! उदय की आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे। कमरे की दीवार से सिर टिकाकर रोए जा रहा था। 

सुबह की पाली में लोक साहित्य का परचा था। उसकी आँखें लाल होती जा रही थीं। रात में बिजली ने भी उसके साथ धोखा किया था। मोमबत्ती की रोशनी में नोट्स याद करता रहा। सुबह आँखें पूरी लाल थीं। परीक्षा भवन में उसे देखते ही राजकुमारी घबड़ा गई थीं, तुम्हारी आँखों को क्या हुआ है? कल तो ठीक थीं। एक ही रात में इन्हें क्या हो गया है? इतनी लाल क्यों हो गई हैं? राजकुमारी ने उसका हाथ पकड़ा, वाशरूम में खींचकर ले गईं, बेसिन पर उसकी आँखें धुलवाईं, उदय अपनी आस्तीन से आँखों को पोंछने जा रहा था कि राजकुमारी ने रोक कर अपने सफ़ेद दुपट्टे से उसकी आँखों को पोंछा, मुँह पोंछा, आँखों के पास होंठों को ले जाकर फूँका, जैसे राजकुमारी कोई मंत्र पढ़ रही हों। राजकुमारी किसी जादूगरनी की तरह आगे-आगे और वह मंत्रमुग्ध पीछे-पीछे कमरे में पहुँचा। राजकुमारी की सीट पहली पंक्ति में पहली थी। उसकी दूसरी पंक्ति की दूसरी। बीच-बीच में राजकुमारी को देख लिया करता था। राजकुमारी भी पलटकर उसकी आँखों को देख लिया करती थीं। लाली कम हुई या नहीं। परचे में पूछे गए सवालों के जवाब, उनके पास थे, लिख दिए गए, लेकिन उन्हें पता था कि प्रेम में पूछे जाने वाले कठिन प्रश्नों के उत्तर उनके पास नहीं थे। फिर भी घंटा बजते ही कॉपी, सर को देकर दोनों साथ ही निकले। राजकुमारी उसे बाय कहती हुई अपनी एम्बेसडर की तरफ़ चलीं, कुछ याद आया, पलटकर बोलीं, शाम को संगीत-संध्या में ज़रूर आना, इंतिज़ार करूँगी। मंत्रमुग्ध उदय ने सिर्फ़ सिर हिलाया और भारी मन से हास्टल की ओर मुड़ गया। रास्ते में उसका मन फूट-फूटकर रोने को कर रहा था। रास्ते में वह अकेला था भी और नहीं भी था, हॉस्टल के और भी लड़के चल रहे थे। अपने कमरे पर पहुँचते ही बिस्तर पर धड़ाम से गिरा था। सुबह कमरे से कुछ खाकर नहीं निकला था। कुछ खाने की इच्छा भी नहीं रह गई थी। आँखों में तकलीफ़ हो रही थी चुपचाप सो गया था। 

वह उठा तो शाम होने को थी। होने को क्या थी, उसके लिए तो पहले से हो गई थी। आँखों को धुलने के बाद, आस्तीन से पोछा। ब्रश किया, चाय बनाई, दो बिस्कुट लिए और जल्दी से चाय पी। विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस के मौक़े पर संवाद भवन में संगीत-संध्या थी। चल दिया। संवाद भवन को किसी स्टेट की दुल्हन की तरह सजाया गया था। शहर के गणमान्य नागरिक और आला अफ़सर सब आए हुए थे। राजकुमारी ने संवाद भवन की बालकनी में सबसे पीछे की जगह सभी आयोजनों के निमित्त अपने और उदय के लिए तय कर रखा था। मंच पर हो रही औपचारिकताओं के ठीक पहले उदय पहुँच गया था। किनारे की एक सीट छोड़कर बैठ भी गया था। मंच पर ख़ूब दूधिया रोशनी थी। राजा साहब, वाइस चांसलर, डीएम, एसएसपी वग़ैरा दीप-प्रज्ज्वलन और साहित्य और कला की देवी के चित्रों पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के बाद के बाद पंडित छन्नूलाल को अंगवस्त्र, नारियल, पुष्पगुच्छ के साथ मंच सौंपकर नीचे उतर आए और सामने सोफ़े पर बैठ गए। सफे़द लिबास में राजकुमारी किसी परी-सी आकर उसके पास बैठ गई थीं। उसने धीरे से उदय के कान में कहा था, “पिताजी के साथ आई हूँ। वह आगे बैठे हैं। जानते हैं कि अपनी सहेलियों के पास बैठी हूँ।” 

उदय ने पूछा था, “मैं सहेली हूँ? राजा साहब देखेंगे तो तलवार से एक ग़रीब का शीश, धड़ से अलग कर देगें।” राजकुमारी ने हौले से हँसकर कहा था, “बुद्धू वे तलवार चलाते ही नहीं। बंदूक़, पिस्तौल, रिवॉल्वर, राइफ़ल वग़ैरा चलाते हैं। तलवार बड़े राजा साहब मतलब मेरे दादा जी चलाते थे।” 

उदय ने फिर पूछा था, “तो क्या राजा साहब तलवार से नहीं, रिवॉल्वर से मेरे उस हृदय को छलनी करेंगे, जिसमें पृथ्वी की सबसे सुंदर राजकुमारी वास करती है?”

राजकुमारी ने अपनी उँगलियों  से उसके होंठों को बंद कर दिया था। उदय की आँखें, राजकुमारी की आँखों में डूब गई थीं और उसके कानों में उपशास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र ख़याल, ठुमरी, दादरा और चैती का रस उड़ेलते जा रहे होते थे, “कृष्ण कहते हैं, हे राधिका, तोरे नैना ऽ नैना ऽऽ नैना ऽ रे तोरे नैना तोरे नौना की लागी कटार सजनी ऽ चैन पावे न मनचा हमार सजनी ऽ तुम्हरे बिना मोहे कल नाहीं आवे ऽ रहि-रहि के मोरा जियरा जरावे ऽ कब होंहिहैं मिलनवा हमार सजनी ऽ तोरे नैना की लागी कटार सजनी ऽ”

उदय ने राजकुमारी की हथेली को अपनी हथेली में ले लिया था। उधर छन्नूलाल राग हंसध्वनि में जैसे एक राजकुमारी और एक ग़रीब प्रेमी के प्रेम का भविष्य बाँच रहे थे, “बैरन धर ना जा ऽ ना जा ऽ ना जा मोरे सइयाँ ऽ जो तुम जइहौं सइयाँ तो मैं का करिहौं ऽ गहि पकड़ो मेरी बहियाँ ऽ बैरन घर ना जा ऽ ना जा मोरे सइयाँ ऽ बैरन घर ना जा ऽ”

गायकी का कमाल था कि तबले का झूला था, राजकुमारी उदय के कंधे पर सिर रखकर सो गई थीं। उदय इस सुख की नींद में व्यवधान नहीं डालना चाहता था। एक साधारण स्त्री भी सोते हुए सुंदर लगती है, यह तो राजकुमारी हैं, सुंदर स्त्रियों से भी सुंदर। कार्यक्रम ढलान पर था, लेकिन उदय कैसे जगाए। जो होगा देखा जाएगा। गोली सीने पर लगे या कंधे पर, वह अपनी राजकुमारी के लिए कुछ भी कर सकता था। तब तक पूनम सिंह भागी-भागी आई। राजकुमारी के कंधे पर हाथ रखकर जगाया। कार्यक्रम ख़त्म होने से पहले राजकुमारी को एम्बेस्डर के पास होना था। उदय ने पूछा, “चलँ?” 

राजकुमारी ने कहा, “नहीं...” और पलटकर उदय को देखे बिना पूनम के साथ चल दीं। 

उदय भी निकल आया था। देखा, राजकुमारी संवाद भवन के परिसर में गुलमोहर के पेड़ के नीचे खड़ी सफ़ेद एम्बेस्डर से सटकर राजकुमारी खड़ी थीं और ऊपर गुलमोहर के लाल फूलों का विशाल छाता लगा हुआ था। इस दृश्य को समेट लेने के लिए उदय की दोनों आँखों में जगह कम पड़ रही थी। उसने इस दृश्य को हृदय के विशाल कैनवस पर उतार लिया था और अधिक देर तक वहाँ रुकना उसके लिए संभव नहीं था। वह आख़िरी बार राजकुमारी को नहीं देख सकता था। वह तो चाहता था कि कभी वह आख़िरी बार आए ही नहीं। हर बार आख़िरी बार से पहले हो। धीरे-धीरे वह संवाद भवन के परिसर की तेज़ रोशनी से बाहर हो गया था। अँधेरे में राजकुमारी उसे देख नहीं पा रही थीं। 

उदय अक्सर स्टाफ़-रूम के बग़ल में विभाग के बरामदे में बैठकर लॉन के फूलों को देखता है। पत्तियों को देखता है। डंठल को देखता है। हरी घास को देखता है। उस पर से आती-जाती लड़कियों के पैरों को देखता है। ख़ुद से कहता है, उड़ो मेरे बच्चो, उड़ लो, जी लो ज़िंदगी, जैसे ही यहाँ से निकलोगे, वक़्त तुम्हारे पंख कतर देगा। सोने के पिंजरे में चाहे मजबूरियों की कोठरी में डाल देगा, ज़िम्मेदारियों की पायल तुम्हारे इन पैरों में पहना देगा। घनानंद को भूल जाओगी, कविता की क्लास भूल जाओगी। कहानियों की क्लास भूल जाओगी। उदय सर को भूल जाओगी, निराला की स्पेशल क्लास भूल जाओगी। करवा का व्रत पढाते हुए उदय सर की कही हुई यह बात याद रखोगी, मुझे लगता है कि मेरी दो नहीं, इतनी सारी बेटियाँ हैं। लड़कों को देखकर यह कहना कि लड़के बहुत बदमाश होते हैं। करवा का व्रत कहानी पढ़ना ही नहीं, जीवन में याद रखना ज़रूरी है। दाम्पत्य कैसे एक-दूसरे के लिए ज़िम्मेदारी का नाम है, प्रेम का नाम है। विवाह का मतलब दासता हरगिज़ नहीं है।  किसी दूसरी क्लास में उदय सर जीवन का पाठ पढ़ा रहे होते, जीवन में एक बात हमेशा याद रखना कि यह एक संयोग है कि मैं प्रोफ़ेसर हूँ, कोई मज़दूर भी हो सकता था, रिक्शा चला रहा होता। तुम लोग भी ऐसे सोचोगे तो आने वाली पीढ़ियों में अच्छे संस्कार डालोगे। यह दुनिया जितनी अच्छी दिखती है, उतनी अच्छी है नहीं! यह तुममें फ़र्क़ पैदा करेगी और तुम्हें फ़र्क़ करना सिखाएगी। यह तुम्हें इंसान होना नहीं सिखाएगी, हिंदू-मुसलमान होना सिखाएगी। सबसे प्रेम करना नहीं सिखाएगी। उदय बच्चों की दुनिया में खोया हुआ था कि मल्लिका मणि मंजुला मिश्र आ गईं और दूसरी कुर्सी खींचकर उस पर बैठ गईं; तब तक क्लास से निकलकर असीम सर, लाल सर, हौदा सर और बल्ली सर भी आ गए। हौदा सर ने बैठते ही उदय सर से कहा, “महिला बिल्डिंग से बीए थर्ड इयर की लड़कियाँ आई थीं, बता रही थीं कि आज सुबह नौ बजे की पाश्चात्य काव्यशास्त्र की कक्षा नहीं चली।” उदय ने हौदा सर की बात को हवा में उड़ा दिया, “हौदा सर, आपको पाश्चात्य काव्यशास्त्र पर एक अच्छी किताब लिख देनी चाहिए, बेचारी लड़कियाँ कितनी परेशान हैं।” असीम सर समझ गए कि उदय हौदा को छेड़ रहा है। उन्होंने कहा, “अरे भाई कोई वजह होगी; एक क्लास छूट जाए तो बाक़ी क्लास भी छोड़ देना, बेवक़ूफ़ी है।” उदय को पता है। तब तक बल्ली सर की जीभ में ख़ुजली शुरू हो गई, आँख मिचमिचाने लगे, होंठों ने फड़फड़ाना शुरू कर दिया, बोलने के लिए उचकने लगे थे, आख़िर बोले भी, “हौदा सर टाइम टेबल बनाते हैं, इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी है।” उदय ने पूछा, “फिर विभागाध्यक्ष की क्या ज़िम्मेदारी हैं, विभागाध्यक्ष का काम उन्हीं को करने देना चाहिए, टाइम टेबल बनाने का मतलब विभागाध्यक्ष हो जाना नहीं है। हर किसी को चौधरी नहीं बनना चाहिए।” तब तक असीम सर और लाल सर बात का विषय बदलने के लिए कबीर पर आई नई किताब की चर्चा करने लगे। बीच में असीम सर उदय से पूछने लगे, “अरे भाई, तुम्हारा पहला कविता-संग्रह कब आ रहा है, विभाग में आए आठ-नौ साल हो गए?” मल्लिका मणि मंजुला ने जैसे ही, “हाँ अब...” कहा, बल्ली सर ने उन्हें घूरा और उन्होंने बचे हुए शब्द “आना चाहिए” को रोक लिया। उदय ने असीम सर को देखते हुए कहा, कुछ कविताएँ तो हैं, कुछ मिल नहीं रही हैं। देखता हूँ, ढूँढ़ता हूँ। अक्सर अच्छी चीज़ें जल्दी खो जाती है। पहले की प्रेम कविताओं की डायरी मिल नहीं रही है। पता करता हूँ।  

“पूर्वांचल के विद्यार्थियों की पढ़ाई-लिखाई का स्तर सामान्य से भी कम है। जब हम जेएनयू, डीयू वग़ैरा के विद्यार्थियों सामने गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को रखते हैं, तो बहुत निराश होते हैं। जेएनयू में देश भर से प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का चुनाव करके, उन्हें प्रवेश दिया जाता है। दूसरी वजह उनके पास मशहूर सिंह जैसे दो-चार आचार्यों का होना हैं। जेएनयू का स्तर और जीजीयू का स्तर एक नहीं है। इसलिए हमें पूर्वांचल का पाठ्यक्रम बनाते समय जेएनयू की नक़ल करने से बचना चाहिए। पूर्वांचल के विद्यार्थियों के पास किसी साधारण कविता या कहानी में प्रवेश करने का ज्ञान नहीं है, तो फिर वह निराला,  प्रसाद, अज्ञेय, मुक्तिबोध वग़ैरा की कविताओं को कैसे खोलेगा। यहाँ तक कि लोक में बसे कबीर और तुलसी की कविताओं के मर्म तक पहुँचने की कला उसके पास नहीं है। साहित्य के अध्ययन का मुख्य प्रयोजन रचना को खोलने की विधि सीखना है। उसे यह सीखने का अवसर नहीं मिलता है, तो वह विश्वद्यिालय के आचार्यों से रटने की विद्या सीखता है। कुछ रट लेता है और परीक्षा पास कर लेता है। यह विश्वविद्यालय के लिए यह अच्छी बात नहीं है। हमारा काम पाठ्यक्रम रटाना नहीं, समझाना है; उनके स्तर को ऊँचा उठाना है। यह आसान काम नहीं है। हमें अपने पाठ्यक्रम को पिछड़े हुए अंचल के पिछड़े हुए विद्यार्थियों के अनुकूल बनाना चाहिए। उनसे छलाँग लगाने की उम्मीद करना नासमझी है, हमें उनके पैर को पकड़कर समझ की सीढ़ी पर रखना है। सबसे पहले ऐसी कविताएँ चुनिए, जो सहज हों, आप उसका अर्थ खोलें, तो विद्यार्थियों को समझने में सुविधा हो। बीए की कक्षा में महान् और उपमहान् कवियों की जगह, महान् और कम महान् कवियों की सहज कविताएँ चुनिए, जो स्तरीय भी हों और जिन्हें खोलना भी आसान हों। जेएनयू के पाठ्यक्रम की नक़ल इसलिए भी न करें, वहाँ मशहूर सिंह और उनकी टीम है; यहाँ हमारी सीमाएँ क्या हैं, ध्यान देना चाहिए। पूर्वांचल के प्रोफ़ेसर को आत्मालोचन करना चाहिए। जानना चाहिए कि किस विषय में हमारी सचमुच की विशेषज्ञता है? बीए, एमए की बात छोड़िए, प्राध्यापकों के लिए आयोजित पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों को हम अगंभीर बना देते हैं। सोचना चाहिए कि क्या मैं सभी विषयों पर एक जैसा व्याख्यान दे सकता हूँ? लेकिन यहाँ लोग देते हैं। भाषाविज्ञान का आदमी मुक्तिबोध पर भाषण देने लगता है और भक्तिकाल का आदमी नई कविता पर। एक भी आलोचनात्मक लेख नहीं और भाषण आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना पर, इससे बुरा उदाहरण और क्या हो सकता है? देश भर के विश्वविद्यालयों मे यह अहंकार फैला हुआ है। तमाम उदाहरण हैं। जब हम ख़ुद तैयार नहीं हैं, तो पूर्वांचल के बच्चों को जेएनयू के बच्चों की तरह कैसे बनाएँगे? फिर बाहर वालों की नक़ल क्यों? पूर्वांचल का लड़का स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श पर शोध करके क्या योगदान देगा? जैसे  कुछेक पत्रिकाओं के संपादक अपने संपादकीय में ज़ोर-शोर से ध्यान तो खींचते, लेकिन उन विषयों पर अविस्मरणीय रचनाएँ नहीं दे पाते हैं।। यही काम हमें नहीं करना चाहिए। किसी भी विधा को समृद्ध करने का काम करना बहुत ईमानदारी और गंभीरता का काम हैं । उपन्यास हो या कविता, कृतियाँ छात्रों की पहुँच से बहुत दूर न हो। विधा में रुचि पैदा करने वाली कृतियाँ पढ़ाई जाएँ। कृतियों के चुनाव में पहली शर्त पठनीयता है। कथाभाषा हो या काव्यभाषा, दोनों की आत्मा पठनीयता है। रचना की भाषा कृति को लिखने का माध्यम ही नहीं, उसे पाठक तक ले जाने का ज़रिया भी है। आसान कविताओं और उपन्यासों के चुनाव का मतलब यह नहीं कि प्रेमचंद की जगह जंकामंका शास्त्री जी की या असीम सर की या मेरी रचनाएँ पढ़ाने लगें। पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए मार्क्सवाद और ग़ैर- मार्क्सवाद का मोटा चश्मा लगाने वाले आचार्यों की सम्मतियों पर ही नहीं, अधिक कल्पनाशील आचार्यों की सम्मतियों पर भी ध्यान देने से इस अंचल के विद्यार्थियों का भला होगा। यह तर्क बचकाना है कि नीचे से पढ़कर नहीं आते हैं। विश्वविद्यालय से जिस स्तर का विद्यार्थी आप निकालेंगे, वही तो नीचे की कक्षाओं मे पढ़ाने जाएँगे। आशय यह कि हम अब भी नहीं चेतेंगे, तो इस अंचल में साहित्य की बिजली हमेशा के लिए गुल हो जाएगी।”

उदय जानता था कि उसकी बातों से पाठ्यक्रम-समिति के सदस्यों के कान पर जूँ भी नहीं रेंगेगी, उन्होंने जो पहले से तय कर रखा होगा, करेंगे वही, हुआ भी वही। जंकामंका शास्त्री ने पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए उपसमिति के सदस्यों के रूप में प्रोफ़ेसर असीम मिश्र, हौदा सर, बल्ली सर, हाथी सर और साथी सर का नाम प्रस्तावित किया। सबने “ठीक है” कहा और इस अंचल के विद्यार्थियों का भविष्य एक बार फिर गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय के आचार्यों ने हमेशा की तरह ऐसे उज्ज्वल करने का काम किया। पाठ्यक्रम-समिति के बीस सदस्यों के एकमत होने की वजह कुछ मामलों में भय और जड़ता दोनों थी, तो कुछ मामलों में केवल भय। किसी को अपने बेटे का भविष्य बनाना था, किसी को बेटी का, किसी को भाई का, क्यों कोई पूर्वांचल के बच्चों के भविष्य के लिए जंकामंका गैंग से बैर मोल ले? उदय पर उनकी कायरता से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उसका काम कहना था, बिना डरे कहता था। अलबत्ता उसे दुख इस बात का होता था कि साहित्य का काम मनुष्य को भयमुक्त करना है और यहाँ आचार्य ख़ुद ही भयभीत हैं। 

हिंदी विभाग तो हिंदी विभाग, शहर के सारे लेखक भी, बल्ली सर को अक्सर और कभी-कभी हौदा सर के लिए अपना मंच सौंप देते थे। वे जो चाहें बन जाएँ। जब चाहें अध्यक्ष बन जाएँ, जब चाहें मुख्य अतिथि। हद यह नहीं, बल्कि यह कि वे अलेखक थे और शहर का हिंदी जगत उनसे भयभीत था। उदय ने ही सबसे पहले बल्ली को देखकर, हिंदी आलोचना में अलेखक पद ईजाद किया था, बाद में पूरा देश अलेखक पद का इस्तेमाल करने लगा। असल में प्रोफ़ेसर जंकामंका शास्त्री और उनकी  पत्रिका ‘पवित्र गोबर’ का इतना प्रभाव था कि पूरा शहर इससे भी आगे जाकर जंकामंका शास्त्री के घरेलू सहायक धुरहुआ को लेखक मानकर आयोजनों में आमंत्रित करने लगा था। धुरहुआ जाता भी था और यह देखकर चकित भी होता था कि बल्ली सर अध्यक्षता कर रहे हैं और जंकामंका सर मुख्य अतिथि हैं। कभी-कभी उसका नीचे का बाल सुलग जाता था कि साला हो क्या रहा है कि असीम सर और लाल सर नीचे सुनने वालों में बैठे हुए हैं और बल्ली सर ऊपर मंच पर जंकामंका सर के बग़ल में हैं। धुरहुआ को यह बात बुरी लगती थी। एक दिन जंकामंका सर की मालिश कर रहा था, पूछ बैठा, “मालिक असीम सर और बीबी लाल सर लेखक नहीं हैं क्या? इन लोगों ने तो बल्ली सर को पढ़ाया है। ई बल्ली सर कब से लेखक हो गए?” जंकामंका सर की पूरी देह सुलग गई, ज़ोर से उसे डाँटा, “भाग साले यहाँ से, भाग...” धुरहुआ चला गया, लेकिन उसका दुख ज्यों का त्यों बना हुआ था। एक दिन मुझसे पान की दुकान पर मिल गया और बहुत ग़ुस्से में था, बोला, “संटी सर, ई लोग हिंदी साहित्य की गाँड़ मार रहे हैं, संटी सर आप लोग कुछ करते क्यों नहीं?” धुरहुआ का ग़ुस्सा जितनी ज़ोर का था और आवाज़ उतनी ही बुलंद थी। किसी ने सुन लिया और बल्ली सर तक बात पहुँच गई। बल्ली सर ने तय कर लिया, अब तो धुरहुआ को मजा चखाना है। ख़ुद ही जंकामंका सर की पूरी देह में मालिश करने लगे थे। बाज़ार से सामान भी ला देते थे। धुरहुआ को लगने लगा था कि एक दिन उसकी नौकरी चली जाएगी और उसे अपने गाँव लौट जाना पड़ेगा, लेकिन मलिकिन पर उसे भरोसा था कि ऊ ज़रूर ध्यान देंगी। धुरहुआ जो लेखक नहीं था, लेकिन हिंदी का बुरा नहीं चाहता था... जबकि इस शहर के डरे हुए लेखक लोग बल्ली सर को ही जंकामंका सर के उत्तराधिकारी के रूप स्वीकार कर चुके थे। हिंदी की इससे बड़ी तौहीन और क्या होगी कि उसके एक लेखक का साहित्यिक उत्तराधिकारी किसी अलेखक को समझा जाए। इस शहर के लेखकों में कोई क्लर्क था, कोई प्रमोट होकर हेड क्लर्क या बहुत हुआ तो इंस्पेक्टर हो गया था। इसलिए वे अपनी हीनग्रंथि से मुक्त नहीं हो पाते थे। साहित्य में भी क्लर्क ही बने रहते थे। ये तो कुछ लेखक संगठन वाले थे, जिन्होंने संगठन में पद देकर, इनकी महत्त्वाकांक्षाओं को बढ़ा दिया था। साहित्य में ये क्लर्क से अधिकारी होना चाहते थे, कुछ तो ख़ुद को समझते भी थे। उदय बताता था कि कहने को तो पूर्वांचल के बड़े कवि देवेंद्र कुमार क्लर्क थे, लेकिन साहित्य के इस अंचल के क्लर्कों और अधिकारियों के बाप थे। ये जंकामंका शास्त्री वग़ैरा उनके रोएँ के बराबर भी कवि नहीं थे। देवेंद्र कुमार कविता में ही नहीं, जीवन में भी बड़े थे। बीदास ने तो बताया था कि उन्होंने जाति के आधार पर प्रमोशन तक लेने से इनकार कर दिया था। झंकार को देवेंद्र कुमार के नवगीत बहुत अच्छे लगते थे। उनकी कविताओं का भी मुरीद था। झंकार दहाड़कर कहता था कि कवि का ऐसा नैतिक विवेक और चरित्र, उनकी पीढ़ी में और किसी साले के पास नहीं है। ख़ुद ही देख लो। जंकामंका का नाम लेने वाले किस तरह के लोग रहेंगे, हौदा और बल्ली और उनके उनसे भी बड़े मूढ़ शिष्य। दूसरी तरफ़ देख लो। देवेंद्र कुमार का नाम लेने के लिए एक अकेला उदय ही काफ़ी है। देवेंद्र कुमार ने अट्ठावन साल की उम्र में जो कर दिया, जंकामंका एक सौ अट्ठावन साल की उम्र में उसका शतांश भी नहीं कर सकते थे। सच तो यह कि एक औसत कवि हज़ार साल की उम्र पाकर भी कुछ नहीं कर सकता। 

पूर्वांचल औसत कवियों का स्वर्ग था और है। जिसे देखिए कविता की दुनिया मे अमर होने से कम कुछ होना ही नहीं चाहता है। वह एक ग्राम कविता से एक किलोग्राम यश चाहता है। कविता की सेवा नहीं करना चाहता है, सिर्फ़ मेवा खाना चाहता है। उसके लिए कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता है। साहित्य अकादेमी और दूसरी संस्थाओं में कविता पढ़ लेना ही उसके लिए कवि होने की गारंटी है। झंकार जब रौ में होता है, तो किसी को भी नहीं बख़्शता है। वह कहता है कि किसी का लिहाज़ करेंगे तो साहित्य का सच नहीं कह पाएँगे। कमलकांत त्रिपाठी का कॉलर पकड़ लेता है और कहता है, “देखो कमलकांत, याद रखना! जंकामंका और हँसमुख जैसे कवियों की प्रशंसा करते रहने में ख़त्म हो जाओगे।” असल में झंकार जूनियर हाईस्कुल और हाईस्कूल में कई बार उसका कॉलर पकड़ चुका है। झंकार गाँव जाते हुए उससे जब भी मिलता है, कहता है, “पीएन श्रीवास्तव मत बनो, कमलकांत। उदय की तरह कुछ लिखो। उदय ने तो एक लेख से ही तहलका मचा दिया था, तुमने पैंसठ पार करने के बाद अब तक क्या किया है!” कमलकांत हँसकर उसके ग़ुस्से के बादल को उड़ा देना चाहता था, लेकिन झंकार बेईमान लेखकों की बखिया उधेउ़कर रख देता था। झंकार मुझसे कहता, “संटी! तुम कभी कुछ लिखना, तो कमलाकांत की तरह चूतियापे की कोई चीज़ मत लिखना। डायरेक्ट ‘हिन्दी साहित्य का प्राइवेट इतिहास’ लिखना।” असल में झंकार को लगता है कि यह काम सिर्फ़ दो लोग ही कर सकते हैं, एक तो उदय और दूसरा मैं। 

असल में मैं अभी हौदा और बल्ली के कारनामों में फँसा हुआ था। वे और वे सब जो कर रहे थे, वह तो कर ही रहे थे, बार-बार मेरी क़लम की नोंक पर आकर बैठ जा रहे थे, इनको डर भी नहीं लग रहा था कि नोंक तो नोंक है, भारी वज़न पड़ने पर टूट भी सकती है और कोई गुदाज़ चीज़ हो तो उसमें धँस भी सकती है। वैसे भी मैं अपनी क़लम को गंदा नहीं करना चाहता था। वे किसी भी चीज़ पर कुछ भी कर सकते थे। पूरा शहर इनसे त्रस्त था, पर कोई इनसे पंगा लेने को तैयार नहीं था। सब इनके सामने नतशीश थे और जंकामंका सर के कंधे पर बैठकर ये अपने गुरुओं पर ही नहीं, शहर के सभी लेखकों के सिर पर मूत रहे थे और क्या गुरु और क्या शहर के लेखक, सब वाह-वाह कर रहे थे। इस बात से धुरहुआ बेहद ख़फ़ा था। वह चाहता था कि संटी सर, उदय सर, झंकार सर कुछ करें। मुझे और झंकार को सर कहने की वजह यह नहीं थी कि हम लोग सर थे, हम लोग तो सर थे ही नहीं; बल्कि धुरहुआ मानता था कि हौदा-फौदा, बल्ली-सल्ली, जितने भी सर थे, सब फ़र्ज़ी थे। असीम सर और लाल सर को भी, इन दोनों से बेहतर होने के बावजूद जंकामंका सर के गैंग का मेंबर मानता था। धुरहुआ को मैं हिंदी साहित्य की जनता का प्रतिनिधि मानता था; जिसे अपनी भाषा, अपने साहित्य, अपने कबीर, सूर, तुलसी आदि पुरखों पर बहुत अभिमान था। वह मुझसे कहता था कि अपने ‘हिंदी साहित्य के प्राइवेट इतिहास’ में भ्रष्ट लेखकों का चूतड़—कबीर की तरह जलते हुए चैले से दाग़ दीजिएगा। मैं सोचता कि सचमुच ‘हिंदी साहित्य का प्राइवेट इतिहास’ लिखना हुआ तो उसे आचार्य शुक्ल को नहीं, जंकामंका शास्त्री के घरेलू सहायक आचार्य धुरहू प्रसाद उर्फ़ धुरहुआ जी को समर्पित करूँगा। एक मैं हूँ जो सिर्फ़ काम की चीज़ लिखना चाहता है; दूसरी ओर इस शहर के लेखक, लेखक बने रहने के लिए कुछ भी लिखते रहना चाहते हैं। यक़ीन कीजिए, आगे चलकर कहीं सचमुच का ‘हिंदी साहित्य का प्राइवेट इतिहास’ लिख दिया, तो उसके बाद मेरे पास लिखने के लिए बचेगा क्या? कुछ नहीं। वैसे भी मैं बाहर का आदमी था, अपने समय के मुर्दा हिंदी विभाग के चूतियापे में फँसना नहीं चाहता था, उदय तो देश भर के हिंदी विभागों को हिंदी की प्रतिभाओं का फाँसीघर और हिंदी का क़ब्रिस्तान वग़ैरा कहता था, मैं तो बहरहाल बाहर का आदमी था ही, लेकिन इतना भी बाहर का आदमी नहीं था; हिंदी का आदमी तो था, इसलिए जितना मेरे हाथ में और क़लम में था, करता था। फिर भी मेरी सीमा थी, मैं हिंदी का हीरो नहीं था, वह तो उदय था। मैं तो सिर्फ़ उदय का सहचर था। उसका पीर-बावर्ची-भिस्ती-खर था। उसकी लड़ाई में, उसे रसद और हथियार वग़ैरा पहुँचाने वाला, हिंदी का एक मामूली कारकुन। 

मैं हिंदी विभाग का सदस्य नहीं था; इसलिए बोर्ड ऑफ़ स्टडीज का मेंबर तो नहीं हो सकता था, लेकिन बरामदे में बैठकर उदय की दहाड़ सुन सकता था—यहाँ के प्राध्यापक तीन-तीन पर्चे में परीक्षक होंगे, हौदा सर का बेटा छह पर्चे में एग्जामिनर बनाया गया है और स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों के प्राध्यापक सिर्फ़ एक में रहेंगे? ऐसा क्यों? बाप भी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और बेटा भी, कितना पैसा चाहिए? पाँच-पाँच हज़ार रुपये में पढ़ाने वाले ये सेल्फ़ फ़ाइनेंस के प्राध्यापक भूखों मरें? उनके बीवी-बच्चों के बारे में आप इसलिए नहीं सोचेंगे, क्योंकि उनके बाप बोर्ड ऑफ़ स्टडीज़ के मेंबर नहीं हैं। वे सब भी हमारे विद्यार्थी ही हैं जो शादीशुदा हैं, जिनके दो-दो बच्चे हैं। तीन-तीन परीक्षकत्व उन्हें मिल जाए तो क्या बुरा है? उनकी कुछ मदद हो जाएगी। बल्ली के अलावा कोई उदय के सामने खड़ा नहीं होता था। बल्ली ही खड़ा हुआ, बोला, उदय जी जिन प्राध्यापकों की आप वकालत कर रहे हैं, वे हमारी तरह स्थायी प्राध्यापक नहीं है। आज कॉलेज में हैं, कल नहीं रहेंगे। उदय को ग़ुस्से में लाने के लिए इतना काफ़ी था। बोला, “जब उन कॉलेजों की व्यवस्था आप जैसी नहीं है, सरकार से सहायता नहीं मिलती है, हायर एजुकेशन कमीशन उनके प्राध्यापकों की नियुक्ति नहीं करता है, तो आप इन प्राध्यापकों को पढ़ाने क्यों देते हैं, इनके सलेक्शन में हम ही तो जाते हैं। इनके महाविद्यालय से फ़ीस की अच्छी-ख़ासी रक़म विश्वविद्यालय को मिलती है, आप लोगों का वेतन सरकार से मिलने वाली सालाना दस करोड़ के अनुदान से नहीं हो जाता है, सेल्फ़ फ़ाइनेंस कालेजों के फ़ीस के पैसे से आपकी रोज़ी-रोटी चलती है और आप उन्हीं कॉलेजों के अध्यापकों को भूखा रखना चाहते है। उनके बच्चों को छोटी-छोटी ख़ुशियों से वंचित करना चाहते है। आप लोग हिंदी के लुटेरे हैं। मैं नोट ऑफ़ डिसेंट लगाता हूँ, एकेडमिक काउंसिल के सामने रखूँगा। ग़ुस्से में तमतमाया हुआ चेहरा लिए उदय बाहर आ गया था। मुझसे कहा, “चलो संटी और मैं उसके साथ चला आया था।” मैंने कहा, “तुम ग़ुस्से में हो, चाबी लाओ, गाड़ी मैं चलाता हूँ।”

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जारी...

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