धारावाहिक उपन्यास : जंकामंका गैंग : हिंदी की दुनिया के सबसे पतित, निष्ठुर, क्रूर राक्षस
गणेश पाण्डेय
07 जुलाई 2026
गताध्याय से आगे...
दो
गंज गोबरहवा के दो पैर, दो आँखें, दो हाथ, दो दिल हैं, एक इस तरफ़ धड़कता है, दूसरा उस तरफ़। असल में जमुआर पुल के एक तरफ़ पुराना गंज गोबरहवा है, बहुत से भी बहुत पहले से गोबरहवा में गल्ला मंडी लगती थी, रात भर बैलगाड़ियों पर लदकर चावल और गेहूँ की खेप आती थी, बैलगाड़ियों के पहिए की चूँ-चूँ और बैलों के गले में पड़ी हुई घंटियों की टुन-टुन से पैदा संगीत गोबरहवा के कानों में बजता रहता था। यह संगीत गल्लामंडी की पहचान थी। इस गल्लामंडी को, बल्कि इस अंचल को बाहर दूर-दूर तक कालानमक चावल की दिल-फ़रेब ख़ुशबू के लिए ख़ासतौर से जाना जाता था। महाराजा शुद्धोधन के समय से ही, शायद उनके भी पहले से, यह अंचल धान की उन्नत क़िस्म की खेती के लिए जाना जाता था। कभी उदय से उसकी कविता ‘कालानमक’ सुनिए। आत्मा जुड़ा जाएगी। जहाँ गल्लामंडी है, उससे सटा हुआ एक मैदान हुआ करता था जिसमें हफ़्ते में एक दिन साप्ताहिक बाज़ार भी लगता था, जिसमें रोज़मर्रा के इस्तेमाल की सभी चीज़ें आसानी से मिल जाती थीं। बैल-गाय-भैंस से लेकर बकरी, मुर्ग़ा, कबूतर, तोता तक का बाज़़ार लगता था। कपड़ा-रेडीमेड कपड़ा से लेकर इत्र-फुलेल, रंगबिरंगी चूड़ियाँ-टिकुली और क्रीम-पाउडर और ताज़ा सब्ज़ी और खड़ा मसाला, नमक-तेल, बच्चों के लिए खिलौने और बड़ों के मनोरंजन लिए सस्ती और सचित्र पुस्तकें और आयुर्वेदिक दवाएँ। बैलगाड़ी-युग के बाद मोटरों बौर मोटर साइकिलों के युग में गंज गोबरहवा में बड़ी-बड़ी दुकानें खुल गई थीं। पैसा होना चाहिए, न हो तो बैंकों से क़र्ज़ लेकर कार, ट्रैक्टर वग़ैरा कुछ भी ख़रीद लो। दूसरी ओर नया गंज गोबरहवा है। इसी नए गंज गोबरहवा में, गंज गोबरहवा यूनिवर्सिटी का विशाल परिसर है।
ढाई हज़ार साल से और पहले की बात है। इस अंचल में तीक्ष्णकंटक बाबा से बहुत से बहुत और उनसे भी बहुत पहले बड़े ज्ञानी, मनुष्य मन को खोलने और उसकी सर्जरी करने वाले पृथ्वी के सबसे बड़े आध्यात्मिक शल्य-चिकित्सक हुए हैं, ये कोई और नहीं, अपने पड़दादा के पड़दादा के शुद्धोदन काका के बेटे, जगत-प्रसिद्ध बाबा बुद्ध बाबा थे। दुनिया जानती है, बुद्ध बाबा के आर्विभाव और उनकी आध्यात्मिक यात्रा को। जहाँ-जहाँ मनुष्य रहते थे, बुद्ध जाने जाते थे, लेकिन इस अंचल के लोग बुद्ध बाबा के बारे में सबसे कम जानते हैं। आज कोई उनकी बात नहीं करता है। वे तो नई-नई आध्यात्मिक शक्तियों वाले नए ज़माने के बाबाओं के चमत्कारों और ख़ासतौर से व्यावहारिक चमत्कारों को जानते हैं और उनके प्रभाव में रहते हैं। कह सकते हैं, आँख मुदक्का और दिमाग़ उलट्टा भक्ति का ज़़माना है। किसी की भैंस तीन दिनों से नहीं मिल पा रही है, तो काँटा बाबा की एक फूँक से उसी के घर के पिछवाड़े अकेलवा आम के पेड़ के नीचे सुस्ताते हुए उसका मिल जाना, रामफेर का पेट चार दिनों से फूला था, मर रहा था, बाबा के धीरे से फूँकते ही, धड़-धड़ा-धड़ उत्तम पाद पादता हुआ भागा, बाबा के छूते ही बुख़ार उतर जाना, सात साल से बच्चा नहीं हो रहा था, सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देने से बच्चा हो जाना। क्या पढ़े-लिखे, क्या अनपढ़, कोई बुद्ध को और उनकी शिक्षाओं को इसलिए नहीं पूछता था कि उनके पास आज के बाबाओं की तरह न तो चमत्कार है, न उनसे किसी प्रकार से कोई स्वार्थ सधता है। आज किसी को बुद्ध का ज्ञान नहीं चाहिए। यहीं बुद्ध को बुद्धू कहा गया, उनका मज़ाक़ उड़ाया गया। यह इस मिट्टी का दुर्भाग्य नहीं, तो फिर और क्या है कि दुबारा न बुद्ध पैदा हुए, न बुद्ध को प्रेम और उनकी सीख की क़द्र करने वाले लोग आए। इस अंचल में जो भी आए, काँटा बाबा के भक्त आए और बाद में उनके उत्तराधिकारी चिन्मय बाबा के भक्त आए। फिर भी ज्ञान की जगह भक्ति के लिए इस उर्वर भूमि में खर-पतवार की तरह कुछ ज्ञानपिपासु भी ग़लती से पैदा हो गये, पैदा क्या हुए, फाट पड़े और तीक्ष्णकंटक बाबा के दरबार में अपनी योजनाओं का पुलिंदा लेकर पहुँच गए। लाभ बताए । बाबा ने कितना कुछ समझा और कितना नहीं समझा, ये तो वही बता सकते थे, अलबत्ता लाभ को ख़ूब समझा। बाबा नई चीज़ों के विरोधी नहीं थे। भक्त घुटनों तक धोती पहनकर आए, चाहे अँग्रेज़ों की तरह टाई लगाकर, पतलून पहनकर। तीक्ष्णकंटक बाबा ने इस अंचल की उन्नति और पढ़े-लिखे भक्तों की फ़ौज खड़ी करने के लिए स्कूलों को खोलने और उनके समुचित प्रबंध के लिए अनुमति दी। मठ की ओर से जगह-जगह स्कूल खोले जाने लगे। बात यूनिवर्सिटी खोलने तक आ गई, बहुत पैसा लगता, सो बाबा ने सीधे सरकार को बोल दिया और इस तरह आनन-फानन में मुख्यमंत्री ने बाबा को प्रसन्न करने के लिए यूनिवर्सिटी खोल दी। तीक्ष्णकंटक बाबा बहुत दयालु थे, जो उनके दरबार में हाज़िर हुआ, यूनिवर्सिटी में लेक्चरर, रीडर, प्रोफ़ेसर हुआ। वाइसचांसलर तक बचपन मे बाबा की गायें चराने वाले हुए। आगे चलकर बाबा के मठ से आई पर्चियों से कुछ सचमुच के विद्यानुरागी आचार्य भी विश्वविद्यालय के कई विभागों में आए। उनमें से एक प्रोफ़ेसर रामचंद्र शुक्ल तृतीय जब आचार्य हुए तो, उन्होंने भी बाबा के मठ से आई पर्चियों के आधार पर ही आचार्यों की नियुक्तियाँ कराईं। यह सब करना ही करना था। रामचंद्र शुक्ल तृतीय भी, असली देसी घी के आचार्य तो थे नहीं, उनके गुरुओं ने भी उन्हें अच्छी तरह और अपनी तरह डालडा में अच्छी तरह तलकर छाना था। हिंदी विभाग के कई विद्यार्थी तो उन्हें आज तक डालडा सर कहकर याद करते हैं। चयन समिति की पिछली बैठक में प्रोफ़ेसर रामचंद्र शुक्ल तृतीय उर्फ़ डालडा सर ने चयन समिति की आधा चलती और आधा बैठी हुई बैठक में गाँव से बाबा की पर्ची वाइस चांसलर दशरथ प्रसाद तिवारी की ओर बढ़ाते हुए कहा कि बाबा के मठ से एक और पर्ची अभी-अभी आई है और झट से धोती हटाकर जाँघिए की जेब में हाथ डाला और उस पर्ची को भी निकालकर वीसी को पकड़ा दिया। बेचारे जितने भी एक्सपर्ट थे—जिनमें एक महिला भी थीं—डालडा सर के धोती हटाते ही जाँघों तक उनके लंबे-लंबे भालू जैसे बाल देखकर, सबने आँखें मूँद लीं। फिर जो किया वीसी और डालडा सर ने किया। विश्वविद्यालय की नियुक्तियों में अब सिर्फ़ बाबा का ही चमत्कार नहीं रह गया, कुछ विभागों के दूसरे अध्यक्षों ने भी डालडा सर की देखादेखी बाबा के नाम पर चमत्कार करना शुरू कर दिया था। कुछ चमत्कार तो आगे चलकर अपने आप हुए। उन्हीं अपने आप हुए चमत्कारों में एक नियुक्ति उदय शंकर शुक्ल की थी। हिंदी विभाग के पर्ची आचार्यों, बोले तो जो पर्ची से आचार्य हुए थे, प्रतिभा से नहीं, ने वीसी के कान में फूँक दिया कि डालडा सर ने एक अभ्यर्थी से पैसा लिया है। फिर क्या था, डालडा सर विभागाध्यक्ष होने के नाते जो नाम सुझाएँ, उनसे वीसी सहमत नहीं होते थे और वीसी जिस अभ्यर्थी का नाम लें, उससे डालडा सर सहमत नहीं होते थे। सो हुआ यह कि पद कई थे, सब पर एनएफ़एस लिखा जाना था, पर एक्सपर्ट्स का कहना था कि वे इतनी दूर से यहाँ झख मारने के लिए नहीं आए हैं, हालाँकि अब ज़्यादातर एक्सपर्ट झख मारने के लिए ही चयन समिति की बैठकों में जाते हैं, चयन समिति के वरिष्ठ और जितने वरिष्ठ थे उतने की कृशकाय आचार्य अंगद मिश्र ने अपनी बाईं टाँग अड़ा दी, कहा—इंटरव्यू और मेरिट के आधार पर कम से कम एक का तो चयन करें, हम यहाँ से हराम का टीए-डीए लेकर नहीं जाएँगे। सो इस तरह हिंदी विभाग में पहली हलाल की नियुक्ति उदय शंकर शुक्ल के रूप में हुई। उदय किसी का प्रिय नहीं था। उस पर किसी की कृपा नहीं थी। इसलिए हिंदी विभाग के जितने भी कृपाचार्य थे, उन्हें वह फूटी आँख से भी नहीं भाता था।
उदय सर को पछतावा होता कि काश, अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर हिंदी के इस काँजी-हाउस में नहीं आए होते, जहाँ हिंदी की सेवा करने वाले नहीं, मेवा खाने वाले धूर्त रहते हैं। वह कितनी उम्मीद से इंटरव्यू में गया था कि हिंदी के पुरखों की छाँव में बैठने का सुयोग मिलेगा, सुख मिलेगा। विभाग में सभी देवता गुरुओं का सान्निध्य प्राप्त होगा। आँखों में एक उम्मीद थी, एक चमक थी। हालाँकि वीसी के बँगले के लंबे गलियारे में उम्मीदतोड़ उमस पसरी हुई थी, ऊपर बिजली के पंखे चल कम रहे थे, हाथ पंखों को चिढ़ा अधिक रहे थे। अथ्यर्थी लड़के और लड़कियाँ, बेंत की आरामदेह कुर्सियों पर असहज होकर बैठे थे, सोच रहे थे यह कुर्सी ही गोया प्राध्यापक की कुर्सी है और थोड़ी ही देर में उनसे दूर न हो जाए। ग़ज़ब का मंज़र था। बस समझ लीजिए कि जितनी उम्मीद थी, उससे अधिक नाउम्मीदी। अभ्यर्थियों में से कोई सिर पर मँडराती मक्खी उड़ा रहा था, कोई हाथ पर चढ़ आई चींटी को मसल रहा था, कोई देह में कहीं भी खुजलाने लग रहा था। एक लड़की अपने गाल पर बैठे मच्छर को ज़ोर से मारना चाहती थी, लेकिन कुछ सोचकर हाथ पीछे खींचा और हलके से तर्जनी से उसे हटा दिया। उदय को आज भी वे सारे चेहरे याद हैं, जो एमए में उसके सहपाठी थे और इंटरव्यू के वक़्त एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे कि जान से मार दूँगा, यहाँ क्यों आया है! सबके चेहरों पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, उदय के पास एक सरकारी नौकरी थी, इसलिए वह बहुत परेशान नहीं था, बस हिंदी के लिए कुछ कर गुज़रना ही उसका मक़सद था। जिला सूचना अधिकारी होने के बावजूद कमलाकांत त्रिपाठी भी आया हुआ था, उसके सिर पर प्रोफ़ेसर बनने का भूत सवार था, वह बहुत चकर-पकर कर रहा था और बक्सा भर पत्रिकाएँ लेकर आया था, जिसमें उसकी लिखी हुई पुस्तक-समीक्षाएँ छपी हुई थीं, वह मशहूर सिंह की तरह आलोचक बनना चाहता था। उसके बाद लतिका सिंह बैठी हुई थी, उसकी शादी के बाद ही उसके पति के साथ बड़ी दुर्घटना हो गई थी, सबसे चुप वही थी। उदय के मन में आया कि काश, यह नौकरी उसे मिल जाती, उदय अकेला होता और वह होती, तो शायद उदय अब तक इंटरव्यू छोड़कर चला भी गया होता, लेकिन उदय जानता था कि और कोई भी उसके लिए इंटरव्यू छोड़कर नहीं जाएगा। कमलाकांत तो साला इतना बड़ा हरामी था कि ललिता ही नहीं, किसी की भी लाश पर पैर रखकर प्राध्यापक बनने के लिए तैयार था, जबकि उसके पास राज्य सरकार की एक अच्छी नौकरी थी। असल में उसे मशहूर सिंह बनकर रुक नहीं जाना था, बल्कि उसका मुख्य उद्देश्य तो रामचंद्र शुक्ल का ताऊ बनना था और वह उसके लिए किसी का भी ख़ून कर सकता था। बहरहाल बिना किसी ख़ून-ख़राबे के हिंदी विभाग में कुछ सपने और कुछ उम्मीद लिए उदय आया था, लेकिन हुआ सब उलटा-पुलटा।
यूनिवर्सिटी की सुंदरता की प्रशंसा करूँ या उसके किरदार की या उसकी ज्ञान-परंपरा या उसकी उपलब्धियों की, कह सकते हैं कि शुरू से ही पूर्वी उत्तर प्रदेश में उसकी इतनी धाक रही है कि बिहार के पश्चिमी हिस्से और नेपाल की तराई से भी लड़के और लड़कियाँ उसके आकर्षण में खिंचे चले आते थे और आज भी चले आते हैं। जैसे पंछी सरहदों को फलाँगते हुए विश्वविद्यालय के ख़ूबसूरत दरख़्तों की फुनगियों पर आकर बैठ जाते हैं और उनकी चहचहाहट से यूनिवर्सिटी का कोना-कोना गुलज़ार हो जाता है। गुलमोहर, अमलतास, हरसिंगार, पलाश वग़ैरा तमाम फूलदार दरख़्तों के फूलों से यूनिवर्सिटी के गाल सुर्ख़ हो जाते थे, हो जाते हैं। आज भी लगता है, जैसे पीले फूलों के लेप से यूनिवर्सिटी के गालों पर, सगुन की हल्दी पोत दी गई हो।
इसी यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में चालीस साल पहले, मेरे प्यारे दोस्त उदय और विद्यार्थियों के बहुत प्यारे उदय सर की नियुक्ति हुई थी। कहें कि उदय उन्हीं विद्यार्थियों के लिए आसमान से हिंदी की स्वाति नक्षत्र की एक बूँद की तरह टप से टपक पड़ा था, लेकिन यह विद्यार्थियों का नहीं, हिंदी विभाग का दुर्भाग्य था कि पहले दिन से ही हिंदी के दो ऊदबिलाव या बागड़बिल्ले या भेड़िये या सियार, कुछ भी कह लो, हौदा सर और बल्ली सर बनकर अपनी काँख में दबोचने के लिए उदय सर के दाएँ और बाएँ लग गए थे। एक अद्धा ऊदबिलाव तो पीछे से फ़ोटो खींचने के काम में लग गया था। दरअस्ल, ये सब इस हिंदी विभाग के श्रेष्ठ रत्न थे, और भी इसी तरह के अनेक रत्न थे, लेकिन वे सब डरावनी शक़्लों वाले नहीं, बल्कि हद से ज़्यादा डरी हुई शक़्लों वाले थे, जिन्हें रत्न नहीं, हिंदी के उपरत्न कहना अधिक उपयुक्त होगा। इन उपरत्नों में कोई हाथी सर के नाम से जाना जाता था, तो कोई साथी सर के नाम से। किसी को विद्यार्थी लंपट सर के नाम से जानते थे, तो किसी को होहो सर के नाम से। असल में होहो सर बिना बात के भी हो-हो करके हँसने लगते थे। कोई कीट सर तो कोई पतंग सर के नाम से प्रसिद्ध था। असल में शुरू-शुरू में हिंदी के सभी विद्यार्थी, प्रायः कल्पनाशील, नवोन्मेषशाली प्रतिभा वाले होते थे। वे गुरुओं को उनके गुणों के आधार पर सबसे अच्छा नाम देते थे। यह तो बाद में हिंदी विभाग के रत्नों और उपरत्नों की संगत में, बल्कि उनके जड़ व्याख्यानों से मतिमंद होते चले जाते थे। कुछ ही विद्यार्थी होते थे, जो ख़ुद को रत्नों और उपरत्नों के दुष्प्रभाव से ख़ुद को बचा पाते थे। शायद इसलिए भी उदय सर की कक्षा में हिंदी का सच्चा रंग उन पर भी थोड़ा-बहुत चढ़ जाता था। उदय सर अपने बच्चों को आतंकित नहीं करते थे, प्यार करते थे। दूसरे आचार्य विद्यार्थियों को फूटी आँख से भी नहीं भाते थे। वे भय पैदा करते थे। बारबार जीरो नंबर देने और फ़ेल कर दिए जाने की धमकी देते थे, छात्राओं को हिंसक दृष्टि से देखते थे, लार टपकाते थे, शुरू में सिर पर, बाद में कंधे पर हाथ रख देते थे, बड़ा वाला आधा ऊदबिलाव और आधा बागड़ बिल्ला, जिसे सब हौदा सर कहते थे, विशेष अध्ययन की कक्षा में आस-पास बैठी छात्राओं की जाँघ पर भारी-भरकम हाथ रख देता था। हौदा और बल्ली, दोनों आधा ऊदबिलाव और आधा बागड़बिल्ला, हिंदी विभाग के मनुष्येतर प्राणी थे, दूर-दूर तक कोमलता, छात्रवत्सलता, सहृदयता जैसे मानवीय गुण उनमें नहीं दिखते थे। हौदा सर का हौदा नाम उनके भारी-भरकम चूतड़ की वजह से उतना नहीं, जितना उनके नाम हृदयनाथ त्रिपाठी की वजह से और कुछ न कुछ हरदम भकोसते रहने की वजह से पड़ा था। दूसरे की धज ही विचित्र थी, जिस ओर देखता था, किसी को पता नहीं चलता था कि उस ओर देख रहा है, उसकी आँख हमेशा ग़लत दिशा बताती। आचार्य बलभद्र पाठक सर उर्फ़ बल्ली सर, मैडम मल्लिका मणि मंजुला के गोरे-गोरे गाल देखते हैं और सब समझते हैं कि वह स्टाफ़-रूम की छत देख रहे हैं, चाय की केतली देख रहे हैं। मैडम वह नहीं समझती हैं, जो सब समझते हैं। मैडम पूछती हैं कि बल्ली सर शाल अच्छी लग रही हो तो भाभी जी के लिए दूसरी मँगवा दूँ? बल्ली सर, जिसे छात्र और छात्राएँ ऐंचाताना सर भी कहते थे, कहते- अरे नहीं-नहीं मल्लिका जी आप पर बहुत जँच रही है, पूछिए मत! मल्लिका मैडम समझ जातीं कि बल्ली सर का ध्यान शाल के नीचे-ऊपर कहाँ लगा हुआ है।
दरअस्ल, उदय सर को हमेशा, हौदा सर और बल्ली सर, हिंदी विभाग के ही नहीं, हिंदी की दुनिया के सबसे पतित, निष्ठुर, क्रूर राक्षस लगते थे। उदय ने माता सरस्वती को जब भी याद किया, माता ने बताया कि वत्स तुम्हारी नानी जिस जमुआर के राक्षसों की बात करती थीं, ये सब वही हैं, वही हैं। उसी कुल से हैं। कभी वेश बदलकर लेक्चरर बन जाते हैं, कभी रीडर, कभी प्रोफ़ेसर, कभी वाइस चांसलर। ये कभी स्त्री, कभी किन्नर, कभी नर, कभी मनुष्येतर प्राणी और कभी-कभी तो जड़ पदार्थ का रूप धर लेते थे। वीसी और विभागाध्यक्ष के हाथ की क़लम और आँख का चश्मा बन जाना तो इनका बाएँ हाथ का काम था। ये उससे भी आगे थे। अरे भाई ये, बाथरूम में वीसी और हेड का रोयेंदार बहुत मुलायम तौलिया बन जाते थे। स्नानोपरांत तौलिये से उनकी पूरी देह पोंछने लगते थे। ये हिंदी के प्राध्यापक थे, क्या नहीं कर सकते थे। ख़ाली पीरियड में यूनिवर्सिटी के बग़ल से गुज़रने वाली नेशनल हाईवे पर पुलिस का भेस धरकर, ट्रकों से बीस-बीस रुपया वसूलने लगते थे। इनका लगाव पैसे से था, बस दिखाते थे कि हिंदी साहित्य इनकी प्रतिभा से चल रहा है, इनके पांडित्य से फल-फूल रहा है। हिंदी की दुनिया इन्हीं से आबाद है। दूसरे इनके बारे में क्या सोचते थे, इससे इन्हें कोई मतलब नहीं था। ये सिर्फ़ और सिर्फ़ यह सोचते थे कि हिंदी की दुनिया ऐसे ही इनकी मुट्ठी में रहे, विश्वविद्यालय ऐसे ही इनकी मुट्ठी में हमेशा चलता रहे, इतने अच्छे दिन इनकी मुट्ठी में ऐसे ही सदा के लिए ठहर जाएँ। असल में इनकी मुट्ठी ही सारी बुराई की जड़ थी। ये सबका सब कुछ अपनी मुट्ठी में रखना चाहते थे। बल्ली और हौदा तो अपने गुरुओं को भी अपनी मुट्ठी में रखते थे, ये अपने नए-नए ईजाद किए गए ख़ास वशीकरण मंत्र से किसी को भी अपने वश में कर सकते थे। ये बस उदय सर को अपनी मुट्ठी में रखना नहीं चाहते थे या रखना तो चाहते थे, लेकिन रख नहीं पाते थे। कुछ विषय बहुत महत्त्वपूर्ण और मौलिक शोध की माँग करते थे और हिंदी की दुनिया में ये कोई काम मौलिक और महत्त्वपूर्ण होने नहीं दे सकते थे। ये अपने समय के साहित्य और हिंदी की दुनिया में अपने जैसा सब कुछ चाहते थे। इसीलिए ये उदय सर को नहीं चाहते थे, उदय सर को कोई और चाहे, यह भी ये नहीं चाहते थे।
उदय ने अपने जिन गुरुओं को देवता समझा, वे भी प्रोफ़ेसर हौदा और प्रोफ़ेसर बल्ली वग़ैरा के बाप थे। कक्षा में, माइक के सामने, मंच पर जितने विद्वान्, चरित्रवान्, नैतिक और साधु लगते थे, हिंदी विभाग में काम करते हुए उदय उन्हें एक नंबर के दुष्ट, षड्यंत्रकारी और रक्तपिपासु के रूप में पाता था। उदय सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा देकर बड़े उदात्त मन से बहुत पवित्र भाव से हिंदी के इस मंदिर में आया था। अपने विद्यार्थी जीवन के हिंदी के इस पवित्र मंदिर को विभाग में आते ही बमपुलिस के रूप में पाकर उसे बहुत गहरा धक्का लगा था। उसके लिए सब कुछ बहुत अप्रत्याशित था। विद्या का वह पवित्र मंदिर अब एक भुतहा खंडहर लगता था, जिसमें सारे प्रोफ़ेसर हड्डियों के ढाँचे की तरह इधर-उधर चलते-फिरते, उठते-बैठते, कक्षा में जाते और कक्षा से निकलते, हँसते-बोलते, लड़ते-झगड़ते दिखते थे। ये आचार्य जिस आचार्य को अपने जैसा न पाकर आदमी के रूप में पाते थे, उस पर एक साथ टूट पड़ते थे। आदमी है—आदमी है कहकर उसकी निंदा करते थे, प्रतिवाद करने पर जूता निकाल लेते थे, लाठी निकाल लेते थे, षड्यंत्र करने लगते थे। हिंदी के इस जन-विहीन बियाबान में उदय को अपने और अपने जैसे लोगों के वुजूद के लिए अपने हिस्से का रण लड़ना ही था। उसके पास पीछे जाने का रास्ता नहीं था और भागना उसके स्वभाव में नहीं था, उसे अपने ढंग से यहाँ जीना था, अपना काम करना था। हिंदी विभाग की इस तीन मंज़िला इमारत में नीचे विभागाध्यक्ष का कक्ष था, प्राघ्यापक कक्ष था, प्रसाधन कक्ष था, कार्यालय था और प्राध्यापकों के लिए कक्ष थे। गाँव के मकान की तरह बीच में बड़ा-सा आँगन था, जिसमें विद्यार्थी समय-समय पर कोई न कोई कार्यक्रम करते रहते थे। पश्चिमी हिस्से के छोटे-छोटे कक्षों में उदय को बीच का एक कक्ष आवंटित किया गया था। अगल-बग़ल के कक्ष में वही हृदयनाथ त्रिपाठी उर्फ़ हौदा सर और बलभद्र पाठक उर्फ बल्ली सर, काँख में उसे दबोचने के लिए अतिविकल रहते थे। कभी-कभी तो वे उदय सर को देखकर काँख उठा भी देते थे, जहाँ काँख के लंबे-लंबे बाल कपड़े के नीचे से झाँकते थे और बदबू तो ख़ैर हर समय छोड़ते ही छोड़ते थे। उदय तो खीझकर कमरे से बाहर खुली हवा में निकल जाता था। बाहर हिंदी विभाग की कँटीले तारों की बाउंड्री के भीतर नक़ली अशोक के तमाम पेड़ लगे थे, कभी-कभी संदेह होता कि क्या हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ऐसे प्राध्यापकों को अशोक के इन निफूले पेड़ों में देखा होगा, कभी लगता कि कँटीले तारों में इनकी आत्मा का वास है। जो भी हो। प्राध्यापक कक्ष में इन ऊदबिलावों की कुर्सी लंबी-सी मेज़ के उस पार होती थी और राहत की बात यह कि उसके ठीक बग़ल में उन सबकी अत्यंत प्रिय प्रोफ़ेसर मल्लिका मणि मंजुला मिश्र बैठती थीं, भले मल्लिका मैडम उन ऊदबिलावों के डर से उदय सर को कभी हल्का-सा भी मुड़कर नहीं देखतीं थीं, फिर भी अपने इत्र की ख़ुशबू को चाह कर भी उदय सर को छूने से रोक नहीं पाती थीं। शायद यह कमाल उस ख़ुशबू का होता था कि उदय, हौदा सर और बल्ली सर तथा उनके गैंग के अन्य आचार्यों की बदबू के बीच चाय की चुस्कियाँ ले पाता था।
चाय कहते ही जिस चीज़ का बोध सबसे पहले होता था, वह मल्लिका मणि मंजुला मिश्र की उँगलियाँ थीं। उँगलियाँ ख़ूबसूरत चीनी मिट्टी के कप के नन्हे हैंडिल में फँसी हुईं जितनी सुंदर बल्ली सर को लगतीं थीं, उससे भी अधिक सुंदर थीं। भ्रम होता था कि चाय का रंग साँचा है या मल्लिका की उँगलियों का। मल्लिका प्राध्यापक कक्ष से सटे छोटे से कक्ष में अपने हाथों से चाय बनाने के लिए तब घुसती थीं, जिस दिन बल्ली सर मल्ल्किा के हाथ की चाय पीने के लिए हड़ताल करके बैठ जाते थे कि आज तो मल्लिका जी के हाथ की चाय पिएँगे, नहीं तो नहीं पिएँगे। मल्लिका भी क्या करतीं, सोचतीं कि बेचारे बल्ली सर मर-मरा गए तो, ब्रह्महत्या का पाप बैठे-बिठाए लग जाएगा, यह भूल जातीं कि बल्ली सर इस तरह तो बदनाम कर देंगे, वह उठतीं, साड़ी का पल्लू ठीक करतीं और मंथर-मंथर गति से उस छोटी-सी चायशाला की दहलीज़ पार करतीं, गोया ससुराल की दहलीज पार कर रही हों। बल्ली सर इस तरह के दृश्य को अपनी आँखों में एक-दो मिनट के लिए तो स्थिर कर ही लेते थे। बल्ली सर जानते थे कि वह मल्लिका मैडम के लिए कभी-कभी असहज स्थिति पैदा कर देते हैं। बल्ली सर तो चायशाला की तंग जगह में मल्लिका मैडम से सटकर पकती हुई चाय को देखना चाहते थे, किस तरह मैडम मल्लिका का पूरा वुजूद उस क्षण उसी में समा जाता है। उनका रंग, उनकी सुंदरता, उनकी सुगंध, उनका बहुत कुछ, जो-जो बल्ली सर को बहुत अच्छा लगता था। बल्ली सर सोचते कि वह तो ऐसी चाय पीते हैं, जिसे ख़ुदा भी नहीं जानता। जबकि ख़ुदा से पहले बंदे ही सब जान जाते थे और ख़ुदा तक इस अधेड़ प्रेमकथा को पहुँचा देते थे। सब जानते थे कि बल्ली सर हिंदी के मजनूँ हैं और मल्लिका मैडम लैला। एमए के बच्चे पिछले बैच से जो कुछ उत्तराधिकार में पाते थे, उनमें बल्ली सर और मल्लिका मैम की कहानियाँ होती थीं। असल में मल्लिका मैडम के वैदुष्य और आचार्य की गरिमा से नीचे आकर न चाहते हुए भी नए ज़माने की लैला बन जाने की मजबूरी थी। मैडम के पतिदेव मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव थे। कभी-कभी रात में घर आने में देर हो जाती थी। रात में कहीं रुक जाना पड़ता था। मैडम को अकेले रहने में समस्या हो जाती थी, उन्होने विश्वविद्यालय परिसर में स्थित रीडर्स कालोनी के आवास के लिए अप्लाई कर रखा था और उसे पाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार थीं। उनके लिए अच्छी बात यह थी कि बल्ली सर शिक्षक संघ के अध्यक्ष की हैसियत से आवास आवंटन समिति में थे और उस समिति में पत्ता उनके चाहने से ही हिलता था और मल्लिका मैडम चाहती थीं कि बल्ली सर ऐसा चाहें। पत्ता हिले। जल्द हिले। बल्ली सर चाहने भी लगे थे, बहुत चाहने लगे थे, आवास आवंटन समिति की बैठक ही नहीं हो रही थी और मैडम मल्लिका लैला बने जा रही थीं, बने जा रही थीं। उदय को पता था कि बल्ली इतनी आसानी से किसी के हाथ नहीं आ जाता है। स्त्रियों के मामले में तो बिल्कुल नहीं। मैडम मल्लिका लैला बनते-बनते लैला की अम्मा भी बन जाएँ, तो भी बल्ली अपनी शर्तों पर ही किसी के लिए कुछ करता था। उदय को पता था कि बल्ली किस मिट्टी का बना हुआ है। दरअस्ल, वो मिट्टी से बना ही नहीं था। गंज गोबरहवा के गोबर से बना था। उसकी रग-रग में हरामज़दगी भरी हुई थी।
शायद मल्लिका जानतीं थीं कि वह सिर्फ़ उनकी चाय पर फ़िदा है, शायद वह यह नहीं जानती थीं कि उनके हाथ से चाय का कप पकड़ते-पकड़ते उनकी उँगलियाँ पकड़ेगा, फिर कलाई और इस तरह उन्हें रीडर्स कॉलोनी के उस आवास को दिखाने ले जाएगा, जो उन्हें चाहिए ही चाहिए। कुछ भी हो जाए, चाहिए। उदय ने जब मुझे बताया तो मैं विश्वास नहीं कर सका कि किसी विदुषी महिला को किसी दुश्चरित्र की मंशा को भाँपने में कोई मुश्किल भी हो सकती है। कौतूहलवश मैं दो-चार बार उदय के स्टाफ़ रूम में भी गया। मैंने वहाँ लल्लू के हाथ की चाय भी पी। लल्लू तो बहुत अच्छी चाय बनाता था। बल्ली किसी और फ़िराक़ में था। लंबा हाथ मारना चाहता था। ऊपर-ऊपर से देखने में यह आवास आवंटन का मामला लगता था, लेकिन असल में मामला सिर्फ़ आवास आवंटन का नहीं था।
भले मैंने उदय के साथ एमए आधा किया, लेकिन उसके साथ रहा पूरा। शुरू से। खेलना-कूदना, पढ़ना-लिखना, खाना-पीना, जमुआर के पुल पर साथ-साथ विचरण करना, सब साथ-साथ। उदय की माँ मेरे लिए माँ थीं और बाबूजी मेरे लिए बाबूजी। हम सिर्फ़ मित्र होते तो कब को और मित्रों की तरह अलग हो गए होते। हमारे समय में दोस्ती हो और कोई मतलब न हो, ऐसा हो नहीं सकता। चट से टूट जाती हैं, दोस्तियाँ। एक बार मैं उदय के साथ रेलवे स्टेशन और पुलिस लाइन के बीच सड़क के किनारे एक वटवृक्ष के नीचे बैठकर मनुष्यों के भाग्य का विचार करने वाले पं. तोताराम शास्त्री जी के पास गया था। उदय ने नौकरी के लिए पूछा, तो मैंने उसके हाथ में दोस्ती की लकीर देखने के लिए कहा। शास्त्री जी ने जितनी शीघ्रता से उसकी हथेली को अपनी हथेली में लिया, उतनी ही शीघ्रता से उसे छोड़ दिया और गहरी साँस छोड़ते हुए कहा, “बच्चा, इसके हाथ में तो मित्रता की रेखा ही नहीं। कुछ बालसखा को छोड़ दें तो इसे विद्या की दुनिया जितने भी मित्र मिलेंगे, कुछ समय साथ रहेंगे, फिर घात करेंगे और विश्वास का संबंध टूट जाएगा।” आज भी पंडिज्जी की कही हुई बात पत्थर की लकीर लगती है।
मैं तो अक्सर उदय के साथ उसके घर में भी रहा हूँ और विश्वविद्यालय में भी। स्टाफ़ रूम हो, सेमिनार रूम हो, क्लास रूम हो, उदय का कमरा हो, बाहर कैफ़ेटेरिया हो, ऑडिटोरियम हो; सब जगह उदय के साथ जाता था। सब देखता था। सबको देखता था। अकादमिक दुनिया में उदय के उदय और उसकी कंटकाकीर्ण यात्रा को बहुत नज़दीक से देखा है। एक-एक दर्द, एक-एक चोटें, सब उदय के साथ-साथ महसूस करता रहा हूँ। मुझे पता ही नहीं, मेरे और उसके बीच यह कैसा प्रगाढ़ विश्वास का संबंध है। मैं उसका दोस्त-फोस्त नहीं हूँ, दोस्ती हमारे समय का सबसे बदनाम शब्द है। मैं उसकी आत्मा का सहचर हूँ। उसके हर अँधेरे और उजाले में उसके साथ रहा हूँ।
यह सच है कि उस बुद्ध अंचल में फिर कोई और बुद्ध की तरह नहीं जाना गया और न जाना जाएगा। आचार्य रामचंद्र शुक्ल भी हिंदी में जितना जाने गए, सो जाने गए। हिंदी से बाहर लोक में तो बिलकुल नहीं। अपने जवार में बहुत कम से भी बहुत कम जाने गए। शीतल प्रसाद सुकुल ने भी अपने बच्चे का नाम रामचंद्र शुक्ल के नाम पर इसलिए नहीं रखना चाहा कि वह रामचंद्र शुक्ल को जानते ही नहीं थे, वे जानते थे शुद्धोधन को और उनके लाल सिद्धार्थ को, सो जब उनके घर जुड़वाँ बच्चों ने जन्म लिया, जिसे वे गिनते एक थे, तो उन्होंने उनमें से एक बच्चे का नाम बड़े चाव से उदय शंकर शुक्ल रखा। सिद्धार्थ इसलिए नहीं रखा कि वह नहीं चाहते थे कि उनका बच्चा भी बड़ा होकर घरबार छोड़कर चला जाए और विद्वान् बनकर अपने माँ-बाप और बाल-बच्चों को भूल जाए। शीतल प्रसाद सुकुल ने दूसरे बच्चे का कोई नाम नहीं रखा। इसके पीछे की कहानी दिलचस्प है। असल में उन्होंने और उनकी धर्मपत्नी कलावती देवी ने सिर्फ़ एक बच्चे को पैदा होते देखा, उनका दूसरा जुड़वाँ बच्चा बिना दिखे ही पैदा हो गया था। किसी को ख़बर ही नहीं हुई, सिवाय उदय शंकर शुक्ल के। चूँकि उदय शंकर शुक्ल के चंद क्या आधा सेकंड बाद ही, बोले तो लगभग साथ ही, जुड़वाँ भाई पैदा हुआ था और वे पिछले नौ महीने से गर्भ में एक-एक पल एक-दूसरे के साथ थे। इसलिए दूसरे ने अपने से ठीक पहले पैदा हुए भाई उदय शंकर को बड़े कहा और बड़े ने उसे छोटे कहा। बड़े को सब देखते ओर लाड़ करते, माँ बड़े को एक स्तन से दूध पिलाती, तो छोटे आप से आप दूसरे स्तन से पीने लगते थे। किसी को कभी पता ही नहीं चला कि ये दो भाई हैं, साथ जन्म लिया है। बड़े जो खाते, जो क्रीड़ा करते, जो पढ़ाई-लिखाई करते, जो परीक्षा देते, छोटे सब में शामिल होते, बस सनद पर बड़े के साथ दूसरे का नाम नहीं छपता था। कालांतर में लोगों को तब मालूम हुआ, जब ये दोनों काफ़ी बड़े हो गए। जब उदय शंकर शुक्ल गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में लेक्चरर हुए और प्रचुर मात्रा में कविता-और आलोचना लिखने लगे और दूसरा छाया की तरह दिन-रात उसके साथ रहने लगा। हमें बड़ा होने में बहुत वक़्त लगा। बड़ा होने के बाद भी कोई बड़ा नहीं मानता था। पत्रिकारिता, अकादमिक दुनिया और लोक में मूर्खता एक जैसी प्रचंड थी। लोक तो बुद्ध को भी बुद्धू समझता था, फिर उदय सर किस खेत की मूली थे। उसके लिए बिना खेत की मूली थे। लोक में जो कुछ थे, हौदा सर और बल्ली सर थे। विश्वविद्यालय में भी जो कुछ थे यही दोनों थे और इनका गैंग था।
तीन सौ चौंसठ दिन ज्ञान की पृथ्वी पर नीच योनि में विचरण करने वाले हौदा सर और बल्ली सर का भाग्योदय एक दिन के लिए हो जाता था। शिक्षक दिवस, बनाया ही गया था, बल्ली सर और हौदा सर जैसे शिक्षकों के लिए। बल्ली सर और हौदा सर शहर और अख़बारों के लिए बहुत ख़ास हो जाते थे। मंडलायुक्त, ज़िलाधिकारी, रेलवे के महाप्रबंधक वग़ैरा अपने-अपने परिसर में इन दोनों का सम्मान करते थे; क्योंकि ये अपना सम्मान कराना चाहते थे। शाल और फूल-मालाओं से इन्हें लाद दिया जाता था। कुछ लोग तो हौदा सर के पृष्ठ भाग को भी किसी ट्रक के अगले हिस्से की तरह फूल-मालाओं से सजा देते थे। अख़़बार इनके चित्रों से भर जाते थे। पूर्वांचल में विद्या के प्रतिनिधि यही समझे जाते थे। लोक इन्हें, इनकी कोई चीज़ पढ़े बिना ही अख़बारों में सिर्फ़ इनकी फ़ोटो देखकर, महापंडित समझ लेता था। रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, राहुल सांकृत्यायन जैसी विभूतियाँ हुआ करें पूर्वांचल में पैदा, लेकिन जाने जाते थे, ये दोनों। इन्हें हिंदी विभाग में शिक्षक दिवस मनाना पंसद नहीं था। किसी वाणिज्यकर के कार्यालय में, रेलवे के लोको वर्कशाप में भाषण देना और सम्मानित होना पसंद करते थे। दूसरी ओर उदय सर जैसे शिक्षक हिंदी विभाग में अपने विद्यार्थियों के बीच इस दिन अध्यापक होने के सुख का अनुभव करते थे।
यूनिवर्सिटी के अपने विभाग में शिक्षक दिवस के समारोह के मंच पर प्राध्यापकों की पंक्ति में बैठे हुए उदय सर, एमए के स्पेशल परचे में निराला का विशेष अघ्ययन करने वाली छात्राओं द्वारा भेंट की गई उस ख़ूबसूरत लाल डायरी को देखे जा रहे हैं, देखे जा रहे हैं, कुछ और न देख पा रहे हैं, न सुन पा रहे हैं। उस डायरी को उँगलियों से बार-बार छू रहे हैं। गोया गुलमोहर का दरख़्त छू रहे हों, गुलमोहर के लाल फूल छू रहे हों, वक़्त के काले घने बालों में फँसी रह गई उसकी उँगलियों की तरह गुलमोहर की पत्तियाँ छू रहे हों। उनके ज़ेहन में कब एमए की छात्राओं की जगह उसकी सहपाठिन कुंजलगढ़ की राजकुमारी पद्मिनी प्रियदर्शिनी सिंह आ गईं, हाथों में एमए की पढ़ाई के दिनों में उनके द्वारा उसके जन्मदिन पर सप्रेम भेंट की गई गुलमोहर के लाल-पीले फूलों की छाप वाली डायरी आ गई, उसे पता ही नहीं चला। उदय सर भूल चुके थे कि अब वह एमए के छात्र नहीं, प्राध्यापक हैं। उधर विभागाध्यक्ष गुरु के महात्म्य पर प्रकाश डाल रहे थे, इधर उदय मन के आकाश में किसी फूल के खिलने और हवाओं संग झूमने का दृश्य देख रहे हैं। राजकुमारी पद्मिनी प्रियदर्शिनी उर्फ़ पद्मा पैदल चलती थीं तो लगता था कि ज़मीन पर वह नहीं, युवा गुलमोहर का हूबहू उसी क़द-काठी का कोई दरख़्त हौले-हौले झूमता हुआ चल रहा है। राजकुमारी अपनी अम्बेसडर कार में बैठतीं तो लगता, वही दरख़्त छोटा होकर अपने लाल-पीले फूलों के साथ कार में बैठ गया है। राजकुमारी जाते समय उसे मुड़कर देखतीं तो लगता कि कुछ लाल-पीले फूल उसकी ओर उछाल रही हैं और वह हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ लेना चाहता। यह सब अचानक नहीं हो गया था। राजकुमारी की दी हुई डायरी में सब उसने नोट कर रखा है। मुझे उदय की उस डायरी को देखने, छूने, खोलने और पढ़ने का पूरा अधिकार था; बल्कि एमए की उसकी छात्राओं ने जो लाल डायरी भेंट की थी, उसे भी पढ़ने और उस पर साहित्यिक चर्चा करने का पूरा हक़ था। छात्राओं द्वारा भेंट की गई डायरी को अर्थ देने के लिए उसने अपनी साहित्यिक टिप्पणियों को उसी पर नोट करना शुरू कर दिया था। वह कोई हौदा सर और बल्ली सर तो तो था नहीं कि उस पर दूध का हिसाब लिखता, धोबी का हिसाब लिखता और किराने वग़ैरा का हिसाब लिखता।
“बुरा यह कि मैं कम बुरा हुआ। किसी स्त्री से कुछ न छिपाया। किसी स्त्री का दिल न दुखाया। किसी बच्चे से छल न किया और बच्चों की माँ को छोड़कर, न किसी अन्य स्त्री के पास गया। जिस निष्ठुर से कभी प्रेम किया। उस स्त्री से भी पूछने नहीं गया कि तुमने मेरा दिल क्यों दुखाया। सुंदर से सुंदर चीज़ों में भी कुछ असुंदर क्यों रह जाता है। मेरा हाल तो ज़माने में और बुरा था कि उस वक़्त कहाँ था कमबख़्त मैं, जब बँट रही थी पृथ्वी पर बुराई बेहिसाब।”
यह टीप उदय की गुलमोहर के लाल-नीले फूलों वाली डायरी के शुरू में दर्ज है, उसके पास बुराई बेहिसाब क्या, सिरे से नहीं थी। एक सीधा-सादा जीवन था। जीवन में उसके हिस्से में कुछ भी अधिक नहीं था, बल्कि जो था कम था। प्रेम तो बिल्कुल कम था। था और फिर नहीं था। बिल्कुल उसकी धज की तरह बहुत दुबला-पतला प्रेम था। वज़न भी उसका ख़ास नहीं था। रंग न अधिक चटक था, न बहुत मद्धिम। गेहुँआ। उदय के प्रेम का पाट चौड़ा नहीं था, ललाट ज़रूर चौड़ा था। आँखों में किसी की आँखों जैसी झील की छाया नहीं थी, एक सपाट मैदान था। प्रायः माथे पर असंख्य आड़ी-तिरछी रेखाएँ भरतनाट्यम करती हुईं। आवाज भरी हुई और भारी, जैसे जंग के मुहाने पर खड़ा कोई तोपची कुछ कह रहा हो, पर यह सब उदय नाम के जिस बदनसीब शख़्स के बारे में चंद अच्छे शब्द आप पढ़ रहे हैं, दरअस्ल उसका काम तलवार लेकर मैदान में घोड़े की पीठ पर सवार होकर ख़ून की नदियाँ बहाना नहीं था। वह तो चाक और डस्टर लेकर ब्लैकबोर्ड पर किसी कविता की पंक्ति या कोई शब्द या कोई सूत्र अपने विद्यार्थियों के लिए लिखने और फिर उनसे मुख़ातिब होकर उसका अर्थ करने वाला एक साधारण अध्यापक था। यह अलग बात है कि उसी साधारण व्यक्तित्व में तनिक-सा कुछ नमक की तरह, बस ज़रा-सा आज़ाद तबीयत की तरह कुछ अलग था। पता नहीं क्यों मुझे अक्सर लगा कि यह और कुछ नहीं, बस एक जिद्दी कवि की स्वाधीन आवाज है, जो यूनिवर्सिटी के कला-संकाय में जब-तब गूँजती रहती है। अरे भाई उदय है! उदय! सरकारी नाम उदय शंकर शुक्ल था। सरकारी नाम उसे कहते हैं, जिस नाम से कोई स्कूल में दाख़िला लेता है या नौकरी करता है। जो लोग नौकरी नहीं करते, प्रायः उनका घर का नाम ही सरकारी जैसा हो जाता है। जिसे देखो, उसी नाम से पुकारता है। दोस्तों को यह छूट होती है कि वे सरकारी नाम को कभी-कभी बहुत ज़रूरी होने पर लें और प्रायः बचपन के नाम से पुकारें। उसका बचपन का और उसकी अम्मा और बाबूजी के लिए उनके जीवन के अंतिम क्षण तक उसका पुकार का नाम उदै था। उसकी अम्मा और उसके बाबूजी उसे उदै कहने में तब भी कोई संकोच नहीं करते थे, जब उसका कद पाँच फ़ुट आठ इंच का हो गया था और वह पूर्वांचल के बहुत मशहूर गोबरहवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग का प्राध्यापक हो गया था। उसकी रंगीन और छपेली साड़ियों की शौक़ीन और नित अपने माथे पर लाल रंग की गोल टिकुली लगाए रहने वाली अम्मा, श्वेतवसना और अपने पके हुए बालों की ओट में उसे छुपाकर ममता की चाँदनी में नित नहलाने वाली उसकी बहुत प्यारी बुआ और उसके लिए पृथ्वी की सबसे बड़ी ढाल जैसी छाती वाले बाबूजी ने तो यमराज के सामने भी जीवन-मुक्ति की कामना से उदय शंकर नहीं, उदै ही कहा था।
मैं जब गोबरहवा यूनिवर्सिटी के दक्षिणी भाग में बने हिंदी विभाग के बरामदे में ऊँची आवाज़ में पुकारता, “काहो उदै?” तो स्टूडेंट लोग हैरत में पड़ जाते कि किसे बुला रहा हूँ। वे कभी मुझे और कभी अपने सर उदय शंकर शुक्ल को देखते और देखते रह जाते। उदै मेरी पुकार सुनते ही भागे-भागे मेरे पास आते, मेरा हाथ पकड़कर दूसरी तरफ़ लेकर चल देते। अपने डिपार्टमेंट से कोई सौ या निन्यानबे क़दम के फ़ासले पर पाम के लंबे और हरियर पेड़ों की क़तार जहाँ से शुरू होती थी, वह मुझे वहीं काफ़ी पहले बनी हुई लेकिन बाहर से चमचमाती कैफ़ेटेरिया की पुरानी बिल्डिंग के भीतर लगी हुई कुछ-कुछ पुरानी-धुरानी लाल और सफ़ेद कुर्सियों में से किसी एक पर बलपूर्वक बैठाकर पूछते, “क्या लोगे संटी सुकुल?” मुझे अपने दफ्तर की कैंटीन में बने छोटे-छोटे मेंढ़क के आकार में बने समोसे से उदै की यूनिवर्सिटी की कैफ़ेटेरिया का समोसा बहुत अच्छा लगता था। ख़ूब बड़ा और ढंग से पका हुआ और अपनी महक की याद से मुझे अक्सर खींच लाने वाला समोसा नहीं मिलने पर, चमड़े जैसा चीमड़ पैटीज खाना पड़ता था। मैं जो खाता उदै सुकुल कों झक मारकर वही खाना पड़ता था। कम से कम तब तक जब तक उदै को डायबिटीज ने धर दबोचा नहीं था और उन्हें सख़्ती से आलू खाना मना नहीं कर दिया गया था। उदै के बारे में उनके स्टूडेंट कहते कि सर डिपार्टमेंट में तो आप अपनी नाक पर मक्खी तक नहीं बैठने देते हैं, जब देखो तब एचओडी को दौड़ा लेते हैं; स्टूडेंट के भले के लिए किसी से भी लड़ जाते हैं, लेकिन जब आपके धोती-पाजामा वाले परिचित आकर बरामदे में आवाज़ लगाते हैं, “का हो उदै...” तो उनके पीछे-पीछे चुपचाप चल देते हैं। ये कौन हैं? अपने शिष्यों को उदय बताते, बालसखा हैं। संटी जी, झंकार जी, बीदास जी, मेरे गाँव के हैं, बालसखा हैं। झंकार जी पहले गीत लिखते थे, फिर लिखना ही छोड़ दिया। बीदास कभी-कभार हास्य-व्यंग्य लिखते हैं। किसी दिन उनका कार्यक्रम कराएँगे, लेकिन कभी कराते नहीं थे। असल में विभाग की साहित्य-परिषद का काम जिन प्राध्यापकों के हाथ में था, वे भिन्न रुचियों और असाहित्यक क़िस्म के प्राणी थे, पर एचओडी के बहुत प्रिय लोग थे और इस बात से ख़ासे परेशान रहते थे कि उदय शंकर शुक्ल नाम का यह शख़्स उनकी तरह क्यों नहीं रहता है? कविता-फविता क्यों लिखता है? पत्रिकाओं में छपता क्यों है? दूसरे विश्वविद्यालयों के लोग इसे जानते क्यों जानते हैं? शहर में यह एक लेखक के रूप में क्यों जाना जाता है? हौदा और बल्ली वग़ैरा प्रायः छुपे तौर पर उदय शंकर शुक्ल से समान रूप से नित्य और तीव्र ईर्ष्या करते थे और आगे चलकर उनकी इस सामूहिक ईर्ष्या ने बहुत जल्द एक साथ द्वेष का रूप धर लिया, कहें कि उन्हें द्वेष की ख़तरनाक बीमारी हो गई थी और वे द्वेष की आग में पूरी अकादमिक दुनिया को जलाकर ख़ाक कर देना चाहते थे। नहीं-नहीं ख़ाक तो वे उदय को करना चाहते थे और जब कर नहीं पाते थे, तो कुछ भी ख़ाक कर देने पर उतारू हो जाते थे। उनके ग़ुस्से की असल वजह ही यह थी कि उनकी पीढ़ी में किसी को लेखक बनने की क्या ज़रूरत थी और साला बन ही गया, तो हिंदी विभाग में उसे आने की क्या ज़रूरत थी।
दिल्ली से प्रसिद्ध लेखक हँसमुख वाजपेयी को आना था, रिफ़्रेशर कोर्स का उद्घाटन करने के लिए। हँसमुख जी कवि थे, आलोचक थे, आईएएस थे। देश में नाम था और हिंदी के आयोजनों में उनकी धाक थी। हिंदी विभाग के लोग उन्हें अपने बीच पाकर गद्गद हो जाते थे। कई दिन तक गद्गद रहते थे और उसके बाद धन्य-धन्य कहते नहीं थकते थे। कई रोज़ पहले से ही तैयारियाँ शुरू हो जाती थीं। तय हो जाता था, कौन उन्हें रिसीव करने के लिए रेलवे स्टेशन जाएगा? बल्ली। कौन उनके नाश्ते का प्रबंध देखेगा? बल्ली। कौन उन्हें गेस्ट हाउस से लेकर हिंदी विभाग में आएगा? बल्ली। कौन उन्हें भाषण के बाद लंच स्थल तक ले जाएगा? बल्ली। फिर विश्राम के लिए कौन गेस्टहाउस ले जाएगा? बल्ली। यहाँ तक कि कमोड की देख-रेख और साफ़-सफ़ाई का प्रबंध कौन करेगा, यह भी बल्ली सर के नाम था। बल्ली सर ख़ुद लेखक नहीं थे, लेकिन बाहर से आने वाले लेखकों की सेवा को ही हिंदी साहित्य की सेवा समझते थे और जब बात हिंदी की इस तरह की सेवा की आती थी, तो उस वक़्त उदय को रोक दिया जाता था। उसकी ड्यूटी कहीं और लगा दी जाती थी। पूरी कोशिश की जाती थी कि बाहर का कोई लेखक उसे देख न ले। पूरा विभाग बल्ली सर से डरकर, वे जो-जो करना चाहते, वह-वह करने देता। असल में बल्ली सर एक तो शिक्षक संघ के अध्यक्ष थे और दूसरे हिंदी विभाग के अध्यक्ष और साहित्य के स्थानीय मठाधीश प्रोफ़ेसर त्र्यंबक दत्त शास्त्री उर्फ़ जंकामंका शास्त्री के अत्यंत प्रिय और पट्ट-शिष्य थे। उनके प्रिय से प्रियतर और पट्ट से बिल्कुल पट्ट होने की कई कहानियाँ थीं। कहानियाँ भी ऐसी कि जिसे पहली बताते, उससे भी पहले की कोई कहानी निकल आती; जबकि न बल्ली सर कहानीकार थे, न उनके उस्ताद प्रोफ़ेसर जंकामंका शास्त्री। दरअस्ल, जंकामंका शास्त्री तो ख़ुद को कवि और आलोचक समझते थे, लेकिन विडंबना यह कि समझे जाते थे सिर्फ़ ‘पवित्र गोबर’ नाम की पत्रिका के संपादक के रूप में। उन्हीं जंकामंका सर ने अपने पट्टशिष्य बल्ली को, जो न कहानी लिखते थे, न कविता, न आलोचना, बल्कि अपने ज़माने के नए लिख लोढ़ा-पढ़-पत्थराचार्य टाइप शिष्य थे, पहले हिंदी विभाग में फिर विश्वविद्यालय के पटल पर हिंदी की सबसे लंबी बल्ली के रूप में जिन्हें गाड़ दिया गया था। बल्ली ने भी आगे चलकर बदले में उस बल्ली पर जंकामंका सर का झंडा अनेक प्रकार से फहराया। इस तरह और इससे पहले और इसके बाद भी गुरु-शिष्य ने एक-दूसरे के लिए बदले में अनगिनत प्रीतिकर से भी प्रीतिकर और हैरतअंगेज़ से भी ज़्यादा हैरतअंगेज़ काम किए।
उदय सर को सब पता है। मुझे सब पता है। झंकार को सब पता है। बीदास को सब पता है।
प्रोफ़ेसर जंकामंका शास्त्री के मकान के पास प्रोफ़ेसर श्रीपति उपाध्याय का मकान था और एमए के दिनों में मैं और बीदास, उपाध्याय सर के सबसे ऊपरी हिस्से में एक कमरा किराये पर लेकर रहते थे। उदय और झंकार आते रहते थे। छत पर से एक रात हमने देखा कि चाँदनी रात में जंकामंका सर किसी नोटबुक पर कुछ लिख रहे हैं और बल्ली मोमत्ती दिखा रहे हैं, जबकि मोमबत्ती की वहाँ कोई ज़रूरत नहीं थी। बड़ी हसीन चाँदनी रात थी और जंकामंका शास्त्री कोई प्रेम-कविता लिख रहे थे, चाँद की रोशनी में बड़े मज़े से कविता लिख सकते थे और चाहते तो बिना रोशनी के अंदाज़ से भी लिख सकते थे। बल्ली को मोमबत्ती दिखाने की तो बिल्कुल ही ज़रूरत नहीं थी, वह तो आदत से मजबूर था और इस ज़माने में तो तमाम कविताएँ अंदाज़ से ही लिखी जा रही थीं। असल में बल्ली का स्वभाव बन गया था कि जंकामंका सर जहाँ भी हों, वह जलती हुई या जलने के लिए आतुर मोमबत्ती लिए हाज़िर हो जाता था। यह भी नहीं देखता था कि कहाँ मोमबत्ती दिखाना चाहिए, कहाँ नहीं। गुरु जी संडास में अकेले हों या बेडरूम में गुरुमाता के साथ, बल्ली हर जगह मोमबत्ती लिए हाज़िर हो जाता था। जंकामंका सर प्यार से कहते कि का हो बल्ली विश्राम नहीं करना है क्या, तब जाकर वह अपने कमरे पर जाता था और सुबह होते-होते ही उधर सूरज निकले-निकले, इधर बल्ली, जंकामंका सर की सेवा में हाज़िर हो जाता था। जंकामंका सर अपने इस सबसे बड़े पट्ट-शिष्य की सेवा से अति प्रसन्न थे, लेकिन जंकामंका सर का नौकर धुरहुआ बहुत से बहुत नाराज़ रहता था। बल्ली उसका सब काम ही छीन ले रहे थे। सब्ज़ी भी लाने लगे, दूघ भी लाने लगे, कपड़ा भी फींचने लगे, जंकामंका सर को धूप में तेल-वेल भी लगाने लगे। धुरहू बेचारा बहुत उदास रहने लगा था कि इस बल्लिया के आने से उसकी तो क़िस्मत ही फूट गई, कई बार सोचता कि गाँव वापस लौट जाए। वह जब जाने के लिए कहता, जंकामंका सर उसे रोक लेते। कहते कि अरे धुरहू बल्ली तो अपनी पढ़ाई पूरी करके कहीं और चला जाएगा, लेकिन तुम्हें तो यहीं रहना है, गाँव जाओगे तो हमारी तो जो होगी, होगी ही, तुम्हारी कितनी बदनामी होगी और हर बार बदनामी के डर से धुरहुआ रुक जाता और बल्ली को तो बदनामी का कोई डर ही नहीं था। असल में न बदनामी न फदनामी, उसे और कुछ दिखता ही नहीं था, हिंदी विभाग में प्राध्यापक की कुर्सी के सिवा। वह प्राध्यापक होने के लिए कुछ भी कर सकता था। किसी की भी कुर्सी खा सकता था, उसके लिए धुरहू की कुर्सी क्या चीज़ थी। जो भी हो धुरहुआ बेचारे के लिए यह उसके जीवन का सबसे कड़ा मुक़ाबला चल रहा था। बल्ली ने धुरहू को नहीं गुरुमाता और उनके बच्चों तक को साँसत में डाल दिया था। कोई विद्यार्थी गुरु के जीवन में इतना घुस जाएगा, यह तो रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी नहीं सोचा होगा। तब के प्रिय शिष्य बौर आज के प्रिय शिष्यों में कितना फ़र्क़ आ गया था। एक बल्ली ने अकादमिक दुनिया में कितना तहलका मचा दिया था, उसके आकाश में कितना बड़ा छेद कर दिया था; यह तो बहुत बाद में पता चला, तब जब हिंदी का आसमान भरभराकर ढहने लगा था।
कई दिनों से आचार्य त्र्यंबक दत्त शास्त्री उर्फ़ जंकामंका शास्त्री विभाग नहीं जा रहे थे। विभाग परेशान था। बल्ली ने असीम सर को बताया, असीम सर ने विभाग को। इस तरह पता चल पाया। जंकामंका सर के पेट में भयंकर दर्द हो रहा था। उल्टी हो रही थी। पेट फूल रहा था। कुछ पच नहीं रहा था। आचार्य बहुत परेशान थे। आचार्य से ज़्यादा, उनके प्रिय शिष्य बल्ली परेशान थे। उस समय तक बल्ली पट्टशिष्य हो चुके थे और अब उन्हें हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर जंकामंका सर का उत्तराधिकारी बनने की बहुत जल्दी थी। बहुत जल्दी का मतलब बहुतै जल्दी। दो दिन पहले तो बल्ली जिस जाँघिए को पहनकर कमरे पर खाना बना रहे थे, फ़ुल पैंट की जगह उसे ही पहनकर जंकामंका सर के मकान पर आ गए थे, इतना ही नहीं, नंगे पाँव आ गए थे। उनके सिर पर प्राध्यापकी इस हद तक सवार थी कि उन्हें ध्यान नहीं रहा कि पैंट और चप्पल पहन लें। बल्ली हरदम हड़बड़ाए-हड़बड़ाए रहते थे। ऐसे में जंकामंका सर की बीमारी ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा था। आचार्य को कुछ हो गया तो उनका होगा क्या! बल्ली शिष्य-धर्म की नई परिभाषा गढ़ रहे थे। सिर्फ़ अपने और अपने बारे में सोच रहे थे। यह नहीं सोच रहे थे कि आचार्य को कुछ हो-हवा गया तो गुरुमाता और उनके दोनों बेटों और बेटी का क्या होगा! गुरुमाता आचार्य को लेकर सदर अस्पताल में ले जाकर दिखाने के लिए सोच ही रही थीं कि बल्ली रिक्शा लेकर पहुँच गए। ड्राइंगरूम में दीवान पर मसनद के सहारे अधलेटे आचार्य को कमर में हाथ डालकर बल्ली ने ही उठाया। आचार्यपुत्रों ने भी पिता के कंधे को सहारा दिया, लेकिन सारा भार बल्ली ने अपने ऊपर ले लिया था।
सदर अस्पताल में मेनगेट से घुसते ही बाईं ओर लाल इमारत थी। उसका रंग मद्धिम ज़रूर पड़ गया था, लेकिन अब भी पहले की तरह खड़ी है। जाकर देख सकते हैं। उसी में एक लाइन से डॉक्टरों का केबिन है। आचार्य का रिक्शा उसी के सामने रुका। पीछे-पीछे साइकिल से आचार्यपुत्र भी आ गए थे। पर्ची बनी। सीधे डॉक्टर आर.एन. भारती के पास पहुँचे। डाक्टर भारती आचार्य के पूरे परिवार को जानते थे। देखा, पूछा और जाँच-वाँच हुई। अल्ट्रासाउंड की रिर्पोट देखने के बाद बताया गाल ब्लैडर में पथरी है। कुछ दवाएँ लिखीं और कहा ऑपरेशन करना होगा। बल्ली तो गाल ब्लैडर का नाम ही पहली बार सुन रहा था। उसे लगा कि आचार्य के पेट में पथरी नहीं बम है, जितनी जल्द हो निकालकर बाहर कर देना चाहिए। कहीं सलेक्शन से पहले ही फट-फटा गया तो हाय राम उसका होगा क्या! तय हुआ कि आज वापस लौट जाएँ और कल तैयारी के साथ वापस आएँ। बल्ली आचार्य को छोड़कर सीधा दुर्गामाता के मंदिर पहुँचा और माता के सामने लेट गया। हे माता, मेरे सर को सलेक्शन से पहले ठीक कर दीजिए। मेरा और कोई सहारा नहीं है माँ! यूनिवर्सिटी में मेरे सलेक्शन में आने वाली सभी बाधाएँ दूर कीजिए माँ! पहली सेलरी मिलते ही ग्यारह रुपये का प्रसाद चढ़ाऊँगा।
जो भी हो, जिसकी भी प्रार्थना से हुआ हो, प्रार्थना बल्ली की रही हो या गुरुमाता और उनके बच्चों की, अगले दिन त्र्यंबक दत्त शास्त्री उर्फ़ जगत्-प्रसिद्ध आचार्य जंकामंका शास्त्री का गाल ब्लैडर निकाल दिया गया था। जंकामंका सर का गाल ब्लैडर बुरी हालत में था। उसमें एक बड़ा और अनेक छोटे-छोटे पत्थर थे। उसमें पस भी आ गया था। फटता तो बल्ली के भविष्य के चीथड़े उड़ जाते। इस ऑपरेशन में जितनी बड़ी भूमिका डॉक्टर आर.एन. भारती की थी, उससे कम बल्ली की नहीं थी। ऑपरेशन के थोड़ी देर बाद जंकामंका सर को प्राइवेट वार्ड के कमरा नंबर दो में शिफ़्ट कर दिया गया था और स्ट्रेचर से बेड पर जंकामंका सर को शिफ़्ट करते ही, जंकामंका सर सदर अस्पताल की शरशय्या पर हैं, यह बात मिनटों में पूरे शहर में फैल गई थी। फैलाया किसने था, उसी बल्ली ने। शाम होते-होते शहर के लेखकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों का आना-जाना शुरू हो गया था। अगले दिन यह ख़बर अख़बारों के लोकल पेज पर शरशय्या पर लेटे आचार्य के दो कॉलम में चित्र के साथ, डबल कॉलम की ख़बर थी। जैसे जंकामंका सर के पेट से गाल ब्लैडर नहीं, सचमुच का बम निकाला गया हो। अख़बार पढ़ते ही वाइस चांसलर माधव प्रसाद त्रिपाठी जंकामंका सर को देखने जाने के लिए मचलने लगे थे। हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर सुतुही प्रसाद सिंह उर्फ़ प्रोफ़ेसर कीट और प्रोफ़ेसर सुदामा प्रसाद त्रिपाठी उर्फ़ प्रोफ़ेसर पतंग को बंगले पर साढ़े दस बजे तलब किया गया। आगे-आगे स्कूटर पर कीट-पतंग की जोड़ी, फिर प्रॉक्टर की जीप और उसके पीछे वाइस चांसलर की कार। भारी-भरकम धज और धोती-कुर्ता जैकेट, चंदन-संदन से सुशोभित वाइस चांसलर माधव प्रसाद त्रिपाठी सदर अस्पताल में आकर्षण का केंद्र बन गए थे। आए थे मरीज़ को देखने और लोग उन्हें ही देखने लगे थे। प्रॉक्टर कुछ करते, इससे पहले प्रोफ़ेसर कीट और प्रोफ़ेसर पतंग ने रास्ते से लोगों को किनारे करते हुए वाइस चांसलर को कमरा नंबर दो तक पहुँचाया। बल्ली उस समय आचार्य को कुल्हड़ से चाय पिलाने की असफल, किंतु सफल कोशिश कर थे; सफल इस अर्थ में कि वाइस चांसलर ने कमरे में घुसते ही देख लिया और नज़दीक पहुँचते ही कहा, बहुत योग्य पुत्र हो कि तुम्हें सेवा का अवसर मिला है। बल्ली का दिल बल्लियों उछलने लगा था। फिर भी बल्ली को लगा कि बात साफ़ कर देनी चाहिए, जिससे सलेक्शन के समय कोई भ्रम न पैदा हो, उन्होंने बड़ी विनम्रता से सिर और कंधा वग़ैरा झुकाकर कहा, सर पुत्र नहीं, शिष्य हूँ। वाइस चांसलर ने कहा कि कोई बात नहीं, शिष्य भी पुत्रवत् होता है। वाइस चांसलर ने प्रोफ़ेसर जंकामंका शास्त्री का जंकामंका रूप संवाद भवन में भाषण देते, कार्यपरिषद् की बैठकों में और दूसरी समितियों में तथा विभागाध्यक्ष के प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व करते हुए अपने कार्यालय के कक्ष में देखा था। उन्होंने जंकामंका सर से बड़ा जंकामंका आज तक नहीं देखा था। जंकामंका सर को विश्वविद्यालयों और साहित्य की दुनिया के तंत्र-मंत्र के जानकार, बल्कि तांत्रिक और झाड़-फूँक के विशेषज्ञ और ताम-झाम और महान प्रदर्शनप्रिय व्यक्तित्व के रूप में देखा था। हालाँकि वाइस चांसलर सर को एक बार संदेह भी हुआ कि छोटे-मोटे जंकामंका हैं या सचमुच के जंकामंका हैं, उन्होंने प्रोफ़ेसर कीट और प्रोफ़ेसर पतंग के ज़िम्मे यह काम लगाया भी कि देखकर बताएँ कि जंकामंका सर उतना मूत भी पाते हैं, जितना हिलाते हैं या मूतते कम हैं, हिलाते ज़्यादा हैं। प्रोफ़ेसर कीट और प्रोफ़ेसर पतंग चूँकि जंकामंका सर के कीट और पतंग थे; इसलिए वाइस चांसलर को उन्होंने वही बताया था, जो उन्हें बताना चाहिए था। विश्वविद्यालय और साहित्य में हैरतअंगेज़ कारनामा करने वाले जंकामंका शास्त्री की भारी-भरकम आवाज़ आज सदर अस्पताल के बेड पर लेटी हुई थी। थोड़ी देर रुक कर वाइस चांसलर ने जंकामंका शास्त्री की बिना पानी के सूखे हुए कुएँ जैसी आँखों में झाँकते हुए कहा, अच्छा शास्त्री जी चलता हूँ मीटिंग है, कोई ज़रूरत हो तो फ़ौरन बताइएगा। वाइस चांसलर को गाड़ी तक छोड़ने आए बल्ली का दिल और दिमाग़ आज दोनों बल्लियों उछल रहा था, वह इस समय सदर अस्पताल की सबसे बड़ी बिल्डिंग को कूदकर फलाँग जाना चाह रहे थे। कूद भी जाते; तब तक उनकी छठी इंद्रिय ने कहा, “मूर्ख कहीं फ़ैक्चर वग़ैरा हो गया, हड्डी-पसली टूट-टाट गई तो तेरे सलेक्शन का क्या होगा...” और इस तरह बेचारे बल्ली अपना मन मसोस कर रह गए और सदर अस्पताल की सबसे ऊँची बिल्डिंग फलाँगने का इरादा सलेक्शन तक मुल्तवी कर दिया। बल्ली ने जंकामंका सर के पास पहुँचकर और सबकी नज़रें बचाकर सबसे पहले उस छोटे से पारदर्शी डिब्बे को छूकर प्रणाम किया, जिसमें गाल ब्लैडर रखा हुआ था और जिसने आज बल्ली को वाइस चांसलर की नज़रों में आ जाने का सुनहला अवसर प्रदान किया था। बल्ली ने उसी क्षण जान लिया कि आज का यह दिन उसके साधारण जीवन के असाधारण दिनों में से एक प्रमुख असाधारण दिन होगा।
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