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अलविदा हिंदू!

व्यक्ति जब पीछे मुड़कर अपनी ज़िंदगी को देखता है, तो बहुत-सी चीज़ें धुँधली दिखाई देने लगती हैं। जहाँ से चले थे और जहाँ आकर ठहरे हैं, उनके बीच की दूरी ही उस धुँधलाहट का कारण बनती है।

कब 2023 से 2026 हुआ? ‘मुझे नहीं पता चला’—ऐसा झूठ नहीं लिख सकता। देखते-देखते तीन साल बीत गए। सत्रह साल की उम्र में यहाँ आए थे, अब इक्कीस के होने वाले हैं। समय अपनी गति से चलता रहा, दुनिया अपने ढंग से चलती रही और हम अपने ढंग से चलते रहे। हालाँकि ‘अपने ढंग’ से कहना थोड़ा ग़लत होगा। अगर हम—यानी हम युवा—वाक़ई अपने ढंग से जी और निर्णय ले पाते, तो शायद यह देश कुछ और बेहतर होता। जो लोग आज बूढ़े या अधेड़ हैं, वे भी कभी हमारी ही तरह युवा थे। वे अपने मन का जीवन नहीं जी पाए, इसलिए हमें भी अपने जैसा बनाना चाहते हैं। शायद यही कुंठा आगे चलकर हममें भी आ जाएगी और हम भी अगली पीढ़ी को अपने जैसा बनाना चाहेंगे। (उनका दोष भी पूरी तरह नहीं है; हमारी शिक्षा-व्यवस्था ही कुछ ऐसी है।)

दिल्ली का पहला सबक़

जब कोई लड़का या लड़की किसी छोटे-से गाँव से निकलकर सीधे देश की राजधानी पहुँचता है, तो इस बात की बहुत संभावना रहती है कि उसे Cultural Shock लगेगा। साथ ही उसे घर की अहमियत भी समझ में आती है। घर से ज़रूरियात की चीज़ें साथ भेज दी जाती हैं। पैसे भी लगभग सरकारी मुलाज़िम की तनख़्वाह की तरह समय पर खाते में आ जाते हैं।

सरकारी मुलाज़िम तो नहीं हैं, लेकिन सरकारी मुलाज़िम बनने का सपना लेकर आते हैं।

कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं, जिनके घर से सिर्फ़ दुआ आती है। पढ़ाई का खर्च उन्हें ख़ुद कमाकर उठाना पड़ता है।

दिल्ली में तीन साल बीत गए। देश के नंबर एक कॉलेज में पढ़ते हुए यह समझ आया कि दुनिया एक साथ छोटी भी है और बहुत बड़ी भी। करने के लिए बहुत कुछ है, चाहने के लिए उससे भी ज़्यादा। लेकिन सब कुछ एक साथ नहीं किया जा सकता। हाँ, मगर चाहा ज़रूर जा सकता है। और धैर्य के साथ एक-एक करके बहुत कुछ हासिल भी किया जा सकता है, लेकिन सब कुछ एक साथ पाने की कोशिश में अक्सर कुछ भी हाथ नहीं आता।

छूटते हुए ठिकाने

आगे बढ़ने में कुछ न कुछ पीछे छूट ही जाता है। पहले घर छूटा, फिर खेत-खलिहान, फिर स्कूल और अब कॉलेज भी छूट रहा है।

फ़ेयरवेल हो चुका है। एग्जाम चल रहे हैं। कुछ चीज़ें हमेशा चलती रहें, तो अच्छा लगता है। जैसे अभी कोई पूछ ले—“कॉलेज ख़त्म हो गया?”, तो फटाक से जवाब निकलता है, “अभी तो एग्जाम चल रहे हैं।” शायद यह जवाब ख़ुद को दिलासा देने का भी एक तरीक़ा है।

हिसाब-किताब का दिन

फ़ेयरवेल के बाद सोशल मीडिया पर जैसे फ़ोटोज़ की बाढ़ आ जाती है। सबकी तस्वीरें देखते हुए भीतर कुछ टूटता-सा महसूस होता है। जिन लोगों के साथ रोज़ बैठते थे, हँसते थे, बहस करते थे, अब ज़िंदगी सबकी राहें बदल देगी।

मुझे सबसे ज़्यादा अच्छा तस्वीरों के साथ लिखे गए शब्द पढ़कर लगता है। सब अपने तरीक़े से अपनी कहानी और अनुभव लिखते हैं। यह पढ़ना बहुत रोमांचक होता है।

ऐसे ही मेरे एक सहपाठी आदित्यनाथ, जो राहुल सांकृत्यायन की धरती से आते हैं, उन्होंने अपने स्टेटस पर कुछ लिखा था। वह मुझे बहुत प्रभावशाली लगा : 

बाज़ार से लौटते ही हम यह देखते हैं कि वह सारा सामान हम ले आए या नहीं, जो सोचकर निकले थे। कहीं कुछ छूट तो नहीं गया? किसी सस्ते सामान की क़ीमत अधिक तो नहीं दे दी? और एक वक़्त यह भी ख़याल आता है कि कहीं कम क़ीमत में कोई क़ीमती सामान तो नहीं मिल गया, किसी ने ठगा तो नहीं!...

ज़िंदगी भी एक बाज़ार है। वक़्त और भावनाएँ ख़र्च करके हमने क्या ख़रीदा, इसका हिसाब-किताब आख़िर में लगाते हैं। आज हिसाब-किताब का दिन था और यह सोचकर मैं ख़ुश हूँ कि मैंने किसी को ठगा नहीं! मैंने हर दुकानदार को उसके सामान की सही क़ीमत दी। जो अनुभवी है, वह इसलिए है क्योंकि वह अच्छा हिसाब-किताब लगाता है। कभी-कभी सोचता हूँ कि बिना हिसाब-किताब के जीना कितना अलग होता। कुछ तो अलग होता, अगर ज़िंदगी बाज़ार और जीवन व्यापार न होता।

डर के आगे उम्मीद है

दिल्ली आकर कॉलेज जीवन जी पाना नसीब की बात है। न जाने कितने बच्चे होंगे जो दिल्ली आना चाहते होंगे, जिन्होंने प्रवेश परीक्षा भी पास की होगी, लेकिन परिस्थितियाँ उनके साथ नहीं रही होंगी।

हम हिंदू कॉलेज में पढ़ पाए, यह हमारी अनुकूल परिस्थितियों का नतीजा है।

हालाँकि अब सार्वजनिक कॉलेजों की फ़ीस लगातार निजी कॉलेजों की तरह बढ़ रही है। दिल्ली जैसे शहरों में रहने का ख़र्च भी दिन-ब-दिन महँगा होता जा रहा है। ऊपर से बेरोज़गारी का डर युवाओं को भीतर-ही-भीतर खाए जा रहा है।

मेरे कुछ दोस्त दिल्ली छोड़कर गाँव लौट रहे हैं। मैं देखता हूँ कि हम जैसे लड़के, जिन्होंने ग्रेजुएशन कंप्लीट कर ली है या करने वाले हैं, उनके भीतर एक अनकहा डर घर करने लगा है—अगर कुछ नहीं कर पाए, तो घर जाकर क्या मुँह दिखाएँगे? जिन उम्मीदों के साथ घरवालों ने यहाँ भेजा था, अगर उन उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए, तो लौटेंगे कैसे? (उन्हें अपनी काबिलियत पर शक नहीं है, लेकिन बार-बार होने वाले पेपर लीक उन्हें हताश कर देते हैं।)

Hinduite होने का अर्थ

हिंदू कॉलेज में पढ़ने-पढ़ानेवालों के बीच एक पंक्ति अक्सर सुनने को मिलती है—Once a Hinduite, always a Hinduite.

ख़ैर, हिंदू कॉलेज से निकलकर हम इम्तियाज़ अली या गौतम गंभीर जैसी बड़ी हस्तियाँ भले नहीं बन पाएँगे तो भी कोई बात नहीं। लेकिन हिंदू कॉलेज ने इतना विश्वास ज़रूर दिया है कि जो भी करेंगे, अच्छा करेंगे। अपने हित में करेंगे, समाज के हित में करेंगे और देश के हित में करेंगे।

सलाम, हिंदू! अलविदा, हिंदू!

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