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एक चरखा

ek charkha

अनुवाद : दिविक रमेश

किम ओक

किम ओक

एक चरखा

किम ओक

और अधिककिम ओक

    एक चरखा

    काटता है चक्कर

    कराहों में।

    कल या आज, एक जैसे

    मैं काटता हूँ चक्कर, मौन में।

    काटती है चक्कर चिंताओं में

    मनुष्य की ज़िंदगी।

    एक चरखा काटता है चक्कर कराहों में

    धागे उधड़ते हैं एक उलझे हुए लच्छे से

    और उलझ जाती है यह सपनों की दुनिया।

    एक चरखा

    काटता है चक्कर कराहों में।

    अब लपेटेगा मेरा राजकुमार

    धागे चरखी पर

    और फिर चीख़ेगा मेरी बाँहों में

    अपने उलझे हुए लच्छे पर।

    एक चरखा

    काटता है चक्कर कराहों में।

    ओह : सुलझ जाए मेरे राजकुमार का उलझा हुआ लच्छा!

    ओह : कैसे सुलझाऊँ उसके उलझे हुए लच्छे को!

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूखी नदी पर ख़ाली नाव (पृष्ठ 194)
    • संपादक : वंशी माहेश्वरी
    • रचनाकार : किम ओक
    • प्रकाशन : संभावना प्रकाशन
    • संस्करण : 2020

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