(एडम स्मिथ और कार्ल मार्क्स लंदन के एक पुल पर मिलते हैं)
देवता का अभिशाप आदम को
काम करेगा तू माथे का पसीना बहाकर'
और एडम स्मिथ ने मज़दूरी का यही अर्थ निकाला। — मार्क्स
एडम, ईडन वाला नहीं, पर वो, था स्मिथ जिसका उपनाम
और लंबी दाढ़ी वाले वृद्ध कार्ल
कभी मिले लंदन के एक पुल पर।
वे ट्यूटन के यहूदी ख़ुद को सँभाले थे
सुस्त सेक्सन के सहारे
पर इसने दिया छोड़ उसे और नक़ली वो ट्यूटन
जा गिरे बर्फ़ीले टेम्स के पानी में
वह नदी थी प्रसिद्ध उन अप्सराओं के लिए
जो गाया करती थीं कभी पानी के किनारों पर।
तभी उठा वहाँ से स्तुति का एक कोरस
जिसका हर गाना बिकता था एक शिलिंग की दर पर
बोले एडम, हर चीज़ की एक क़ीमत होती है”
उसी समय कार्ल डूबे इतिहास की नदी में
जो गंदली थी और मामूली जीवों से भरी थी।
उन डूबते हुए क्षणों में देवता निकल आए
गोदी में बिठाया और बोले,
अरे कार्ल, भुगता तू यह सब
क्योंकि मेरे कहे का तूने विपरीत दिखाया
पर मैं हूँ दयावान, मन का बड़ा उदार
अपने बटुए से दो कौड़ी गर तू मुझे सौंप दे
बदले में तुझे दूँगा बेहतरीन से बादल
जो एडम के बादलों के आसपास ही होंगे,
वो एडम शिलिंग वाला, ना कि वो एडम ईडन वाला।
सुनकर यह गरज उठे देवता,
ठीक कहा, ठीक कहा, बिजली कडकी बोल में।
कैसे कोई भूले यह हर चीज़ की क़ीमत है
चाहे वह क्यों न हो आसमानी परिवेष में,
और पूछ लो यह सच्चाई एडम से आज तुम
एडम वो ईडन वाला या एडम वो शिलिंग वाला।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 119)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
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