एली! एली! लमा अज़ावतनि?
eli! eli! lama azavatani?
सिल्विए स्त्राहीमीर क्राञ्चैविच
Silvije Strahimir Kranjcevic
एली! एली! लमा अज़ावतनि?
eli! eli! lama azavatani?
Silvije Strahimir Kranjcevic
सिल्विए स्त्राहीमीर क्राञ्चैविच
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एली! एली! लमा अज़ावतनि?
(ईश्वर! ईश्वर! क्यों छोड़ गया मुझको?)13
4गोलगथ25 पर दिवंगत हुआ—किसके लिए?
यह बलिदान हुआ देर से या समय से पहले?
गोलगथ पर मर गया, संसार जानता है,
उस आदि बलिदान का फल अभी न आया है।
रक्त भी बहुत बहा, हृदय भी रुक गया,
जो फिर कभी भी उस तरह धड़क न पाया।
सदियाँ भी आदि व्यतीत हुईं, विकराल और तिमिरमय,
सूख गया रक्त, सूखा और भी भ्रष्ट हुआ।
इतिहास टहल गया लज्जास्पद वस्त्रों में,
नभ के निकट जितने उतने हम दूर उससे।
गोलगथ पर बूढ़ा वृक्ष टूट गया,
चुराई गईं उसकी कीलें—पहले तो यही घटा!
मानवजाति, भाईचारे और स्वतंत्रता के नाम पर
निरीश्वरता से आरंभ किया नृत्य रक्तमय
मंडली चीख़ रही थी मदिरा के वीभत्स उन्माद में :
हत्या करते हैं हम, ईश्वर, सब तेरे लिए—बचा ले!
गोलगथ पर मृत है, हवा का झोंका रहस्यमय,
चरचरा रहा : एली! एली! लमा अजाक्तनि?
अतीत के लहू के निकट, शुष्क वृक्ष के नीचे,
लाखों कलपते : हे न्याय! हे अन्न!
ठीक है, मिटा दिया था दासत्व, सर्कस और तरक्ष,
और ले गये थे मानव समाज को ईसाई रंगभूमि पर!
वहाँ दमकते कक्षों में, वैभव और यश में,
पुष्पहार और भारी सिर पर धर्मगुरु की टोपी में।
घेर लिए थे आपने, आपके गोरे महानुभावों ने,
विश्व के मंच पर सभी आसन पहली पंक्ति के!
क्षोभ और दरिद्रता के खेल में देखते हैं,
जहाँ मानवजाति पीड़ित उसकी भाँति वृक्ष तले गिरती है।
ओ तिमिरमय बंदीगृह, जहाँ कितने रुदन खो जाते,
जब लोग ऐसे हैं : या मर जा या मार दे!
विवस्त्र बालाएँ, भरे पेट न्यायाधीश के समक्ष,
ओह, लाज होती उनके, यदि पेट न होता!
शर्म, दरिद्रता, अनादर और धोखा,
उसाँसें और झूठ, कितने आँसू दहकते।
और इस कुंड के बीच, जहाँ विषाक्त कीट विचर रहे,
उन्नत हुआ वृक्ष और उस पर ख्रीस्त उदित हो रहे।
देखो, कहाँ न है मानव को कटु होते ये तमस्वी दिन,
रोता है : एली! एली! लमा अज़ावृतनि?
व्यर्थ ही अहंमन्य गुंबद, संगमरमर देवालय का,
घंटिका, वाद्य और स्वर्णमय पादुका!
व्यर्थ ही लोबान, बहुसंख्य वेदियाँ उद्धत,
व्यर्थ ही स्फटिका दमकती पगड़ी पर, किरीट पर!
आह, गोलगथ वीरान है, हवा का झोंका वहाँ रहस्यमय
मात्र चरचरा रहा : एली! एली! लमा अज़ावतनि?
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 7)
- रचनाकार : सिल्विए स्त्राहीमीर क्राञ्चैविच
- प्रकाशन : ज़ाग्रेब, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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