मैं लाता हूँ नभ जल कन, पीते जिनको तृषित सुमन!
समुद निर्झरों से भर-भर!
दुपहर-स्वप्न-निरत पल्लव, ले हल्का साया नीरव!
धर देता उनके ऊपर!
मेरे पर से झर-झर आतीं, तुहिन बूँद जिनसे जग जातीं!
मृदु कलियाँ उनमें से हर तब
हिल डुल कर, थपकी पा सोती, छाती पर धरती माँ होती,
सूर्य चतुर्दिक नर्तित वह जब!
उपल-अस्त्र के विकट प्रहार, रोक तुरत, फिर कर में धार!
हरित धरा को इनसे श्वेत किया करता!
फिर मुझसे यह तुरत द्रवित, घुल जल में होते वर्षित!
जब प्रवेश करता गर्जन में हँस पड़ता!
(2)
मुझसे ही हिम छन-छनकर, गिरता पर्वत-शिखरों पर,
जिनके दीर्घ चीड़ के तरु होते कंपित!
इन पर मैं पूरी निशिभर, इन्हें श्वेत सिरहाना कर,
झंझा की बाहों में हो जाता निद्रित!
राजित मेरे स्तूपों पर—जो मेरे आकाशी घर
विद्युत मेरी पथ दर्शक!
किसी गुहा में युद्ध निरत-बंदी तड़ित-घोष अविरत,
रह-रह कर करता रव घर्षक!
प्रेतनीर पर होकर मोहित, भटका करता नीलिम लोहित,
सागर की गहराई पर,
झरनों पर, चट्टानों पर, औ' पर्वत के शिखरों पर!
झीलों पर, मैदानों पर!
गिरि, नद, के नीचे जाता—जहाँ-जहाँ वह सपनाता,
आत्मा, प्रिया, संग है पर!
इतने में, मैं शीतरहित होता पी नीली नभस्मिति,
तब बह-बह जाता वर्षा में घुल-घुल कर!
(3)
वह सूर्योदय रक्तारुण, धूमकेतु से लिए भयन,
और ज्वलित अपने पंखों को फैलाकर,
मेरा अंश गगन पर तिरता—उसके पीछे कुदान भरता,
जब कि भोर तारिका चमकती मृत्त होकर!
जैसे किसी पहाड़ी पर—की नोकीली चोटी पर,
जो हिलता-झुलता रहता भूकंपन में।
ज्यों हो कोई गरुड़ ज्वलित, छन भर को ही हो राजित,
अपने कनकवर्णमय पर की आभा में,
जब अरुणास्त श्वास ले ले,नीचे जले उदधितल से,
प्रेम और विश्राम-सुगंधों को पीता
और वसन तब संध्या का—पिघले सोने के रंग का—
नभ की गहराई के ऊपर से गिरता
तब मैं अनिल नीड़ ही पर, हरता थकन समेटे पर
शांत कि ज्यों ध्यानस्थ कबूतर!
(4)
अर्धचक्रवत युवति विमल, भरे हुए ज्यों अनल धवल,
चंद्र जिसे सब कहते हैं प्राणी नश्वर,
सरक रही वह झिलमिल कर, मेरे मख़मल के तल पर,
बिखरी है निशीथ के अनिलों से सत्वर।
जहाँ-जहाँ पड़ती उसकी—ताल अलक्षित पगतल की
सुन सकते सुर ही केवल,
जिससे मेरी पतली छत-का बाना होता है क्षत,
उसके पीछे रही झाँकतीं नीहारें झिलमिल,
उन्हें देखता मैं हँसते, ज्यों उड़ते हों भँवराते
स्वर्ण भ्रंग के दल नभ में
मैं करता अपना विस्तृत—जर्जर शिविर-वायु-निर्मित
जब तक, शांत जलाशय सरिता सागर में,—
जो लगते उच्चस्थल से—गिरी पट्टियाँ ज्यों मुझसे,
बसते उडुगन चंद्र नहीं उनके मन में!
(5)
बँधा करता हूँ सूरज का सिंहासन—ज्वलित-वृत्त का मैं लेकर के शुभ्र-वसन,
मुक्तावलि से चंद्रासन रखता सजधज।
ज्वालामुख धूमिल हो जाते—तिरते नखत भीत थर्राते,
जब पवमान झकोर उड़ाते मेरा ध्वज!
खाड़ी से मैं खाड़ी पर-सेतु सदृश आकृति धरकर,
उफनाते ही अम्बुधि पर
हो रवि-किरनों का शोषक द्रुत, लटका मैं बनता उसकी छत
जिसके खंबे होते हैं यह शैल-शिखर!
वह जय-अर्ध-चक्र-होकर, जिसमें बढ़ता मैं लेकर,
अपने झंझावत, अनल और हिम के कन,
जकड़े वीर प्रभंजन के—बाँधे नीचे आसन के
इंद्र धनुष है लक्ष बरन!
ऊपर इसके रंग कोमल—करते निर्मित वृत्त अनल
जबकि धरित्री गीली नीचे करती रही हास्य वितरन!
(6)
मैं हूँ दुहिता प्रिय, कोमल, हैं माँ-बाप मृत्तिका, जल,
पोषक है यह नीलाम्बर!
छिद्रों से सागर तट के—जाता हूँ मैं बेखटके,
मैं परिवर्तनशील, किंतु हूँ अविनश्वर!
क्योंकि बाद में वर्षा के, रहते नहीं बिंदु जल के,
सूनापन छा जाता है नभ-आँगन पर!
और पवन रवि की किरणों के—उन्नत उदर कणों से अपने,
निर्मित करते हैं समीर का नील शिखर!
मैं हँसता मन में लखकर, अपना यह स्मारक नभ पर,
फिर मैं वर्षा गुम्फों से आता बाहर
आते शिशु, ज्यों जननि-कोख से-प्रेत निकलते ज्यों समाधि से,
उठता मैं इनको खंडित करता सत्वर।
- पुस्तक : शेली (पृष्ठ 17)
- संपादक : यतेन्द्र कुमार
- रचनाकार : पर्सी बिश शेली
- प्रकाशन : भारत प्रकाशन मंदिर, अलीगढ़
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