अभिलाषा
abhilasha
उसके होंठों पर धूप आकर बैठ गई
जहाँ मैं अपने सारे दु:ख रखकर आया था
दुनिया के इस कस्सेपन में
पानी के घूँट जैसे थे उसके होंठ
और मैं जन्मों का प्यासा
मेरे भीतर किसी कोने में अँधेरा पड़ा हुआ था
उसके छूते ही ब्रह्मांड के सारे तारे
वहाँ आकर जगमगाने लगते थे
उसी रौशनी में बरसों बाद एक फूल खिला
और मेरा विलाप उसकी गंध में मिलकर उड़ गया
बुद्ध-से शांत उसके होंठों पर
चाँदनी देर तक बरसती रही
ओस के बोसे जमते रहे
और मेरे भीतर का
एक-एक क़तरा पिघलता रहा
मैं समाप्त-सा बैठा हूँ उसके समक्ष
यह मैं किस संसार में हूँ?
जहाँ देवता साक्षी हैं मेरे समर्पण के
उसके होंठ हिले
तब जन्मा प्रकाश
दर्पण जैसी उसकी हँसी में
झलका जीवन
मेरी देह पर तैरता रहा एक स्पर्श
मेरे होंठों पर भी जन्म लेने लगे बोसे
मैंने देखा स्वयं को
पुनः जीवित होते हुए
- रचनाकार : कुंजकिरण
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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