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कहाँ अन्हरिया के

kahan anhariya ke

मिथिलेश ‘गहमरी’

मिथिलेश ‘गहमरी’

कहाँ अन्हरिया के

मिथिलेश ‘गहमरी’

और अधिकमिथिलेश ‘गहमरी’

    कहाँ अन्हरिया के राह निकलल

    सुरूज अपने सियाह निकलल

    बहुत सँइत के हिया में रखलीं

    तबो दरद लुरछुताह निकलल

    जवन किरिन से बिहान होइत

    उहे किरिन जरतुआह निकलल

    लिहाज, इज्जत, सनेह, सनमत

    ई, दौर में सब तबाह निकलल

    नदी जे तड़पत रहे पियासे

    'रिपोट' में अथाह निकलल।

    नया जमाना के आदमी हऽ

    चिहाईं जनि, जो बिखाह निकलल

    भइल शराफत के घर तलाशी

    कदम-कदम पर गुनाह निकलल

    गजल कइसन कि सुनिके 'मिथिलेश'

    ना आह निकलल, ना वाह निकलल

    स्रोत :
    • पुस्तक : केकरा से माँगीं अँजोर (पृष्ठ 44)
    • रचनाकार : मिथिलेश ‘गहमरी’
    • प्रकाशन : सत्यांश उपक्रम (प्रा.) लिमिटेड, बलिया
    • संस्करण : 2019

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