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कबले सहब

kable sahb

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    कबले सहब राजा जी के तूँ मनमानी

    हल्ला बोलऽ चलके उनका राजमहल पर

    जग होई उजियार, दिवाली होई घर-घर

    इहे राज बा खुश हाखे के रउवा जानीं।

    पढ़ले-लिखले कुछ ना होला, कहले ज्ञानी

    बात लबेदा के सब माने, काँपे थर-थर

    सतवंती के बात माने बोलस टर-टर

    जबले निकले तेल, बइठ के पेरीं घानी।

    कुरसी-टेबुल खूब चलाई रउवो जा के

    लोकतंत्र के बड़ा महातम बा जन-जन में

    जनता ससुरी जाय भाँड़ में भूँजा फाँके

    रउवा फेंकीं जूता-चप्पल बइठ सदन में

    जीये के बा, असहीं, देखीं रो के, गा के

    चाहे रउवा खुद के ढालीं एही चलन में।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आपन गाँव भेंटाते नइखे (पृष्ठ 20)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2012

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