Font by Mehr Nastaliq Web

अवधारि बेसल छी

avdhari besal chhi

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

अवधारि बेसल छी

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

और अधिकसुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

    लगैए मन ने कनियो काल जीवन हारि बैसल छी,

    अपन उद्यान अपने हाथसँ हम जारि बैसल छी

    कतेको साङहे लतरल लता आकाश चूमै छल,

    कि खौलल पानि फूलक बेरमे हम ढारि बैसल छी

    कतेको यत्नसँ पोसने छलहुँ हम मधुरतम सपना,

    अपन अभिलाष छोर लहासकेँ हम गाड़ि बैसल छी

    बसाबी घर लगाबी आगि से जिनगी ने थिक जिनगी,

    अपन संहार पर हम दीप लाखो बारि बैसल छी

    छँटैए लोक बड़ उपदेश, संयत करी अपना केँ,

    जँ मरबे अछि चरम गति रहओ हम अवधारि बैसल छी

    सुखक वादा जे हमर छल से एखनो कायम अछि ओहिना,

    प्रियक मुँहमे लगाबऽ ऊक आगि पजारि बैसल छी

    स्रोत :
    • पुस्तक : गजल ओ गीत
    • रचनाकार : शेखर प्रकाशन, पटना
    • प्रकाशन : सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
    • संस्करण : 1991

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY