कहानी : स्वस्थित
तरुण
04 जून 2026
Every word is like an unnecessary stain on silence and nothingness.
~ Samuel Beckett
एक लगातार अशांत रह रही आत्मा विचित्र भाषाऍं सीख लेती हैं।
~ स्वदेश दीपक
किचन में नंगे खड़े हो कर कॉफ़ी बनाते वक़्त अपनी सिगरेट को मुँह में लगाए माचिस ढूँढ़ते हुए उसकी नज़र खिड़की से बाहर दिख रहे मीठे सूरज की रोशनी में सूख रहे पहाड़ के घरनुमा कपड़ों पर पड़ती है। वह सिगरेट मुँह में लगाए ही आईने के सामने पहुँचता है। अपने शरीर के तमाम अंगों को ध्यान से देखते और कुछ को छूते हुए जब वह ऊपर चेहरे पर पहुँचता है तो ठिठक जाता है। अपलक काफ़ी देर देखते हुए जब आईना धुँधलाने और अँधियाने की बीच की स्थिति में होता है; वह छट-पट, यहाँ-वहाँ, तेज़-तेज़, आगे-पीछे चलने लगता है। सिगरेट मुँह में लगाए हुए वह फिर से माचिस ढूँढ़ रहा है।
सींक को माचिस किनारे फेर कर वह मुँह के पास लाता है; चेहरे पर रोशनी एक क्षण को बिखरती है, फिर धुएँ में परिवर्तित हो कर उड़ जाती है।
पीछे गा रहे माइल्स डेविस के वॉल्यूम को ज़रा और बढ़ा कर वह झूमते हुए अपने पेट को देखता है। “नहीं, आज नहीं” आज बाहर जाना पड़ेगा। पूरी शर्ट लाल हो जाएगी; बेल्ट भी चुभेगी बेवजह, नहीं आज नहीं। यह कह कर नए कटे नाख़ूनों से वह अपना पेट नोचने-छीलने लगता है। कुछ क्षण बाद अलसाया ख़ून सात-आठ रेखाओं में बहते हुए बाहर आता है। पेट से नीचे की तरफ़ जा कर अड़ जाता है, इकट्ठा हो कर टपकने लगता है। उसे आराम मिलता है—पुराना घाव अभी ठीक नहीं हुआ, ज़ाहिर है कुछ और दिन काम आएगा।
कुर्सी पर बैठते हुए उसे अचानक बचपन में देखा एक सपना याद आता है, जिसमें उसने अपनी चचेरी बहन को प्लेट में एक लाश को डाल कर मज़े से खाते हुए देखा था। सुबह उठ कर उसने अपने आस-पास लाश जैसी गंध भी सूँघी थी, जूते जैसी बदबू। वह डर गया था।
नहीं... वह नहीं डरता। और आगे सोचने से बचते हुए सिग्मंड फ़्रायड के सिद्धांत के बजाय वह यह सोचने लगता है कि उसे आजकल पुरानी और इतनी पुरानी स्मृतियाँ क्यों आ रही हैं!
सहसा एक और स्मृति की दुनिया में प्रवेशित वह देखता है कि वह कार में आगे की सीट पर बैठा है और कहीं शादी में परिवारादि के साथ जा रहा है। उसके जूते में किसी जानवर की टट्टी लगी है। उसे इसका पता चला, किंतु तब तक उसे आदेश दिया जा चुका है कि गाड़ी में बैठे। न कह पाने की विकलता लिए वह एक भैया की गोद में बैठ जाता है। उनके जूतों के ऊपर अपने जूते रख कर।
अगला दृश्य उसे याद आता है, जब भैया उसे गालियाँ दे रहे हैं। निर्बाध घंटे भर में सर्वजनसमभाव से सभी गालियाँ जिनमें समस्त परिवार का उल्लेख मिल जाए उसे मिलती रहीं। वह मन में दोहराता रहा, “भैया मेरा अच्छा ही सोचते हैं। भैया मेरा अच्छा ही सोचते हैं।”
वह कुर्सी से उठ कर खिड़की की तरफ़ जाता है। खिड़की खुली है, मगर नीचे कोई नहीं (ऐसा उसे लगता है) मुँह में सिगरेट फँसाए उस नंगे आदमी को यदि कोई बाहर से देखे तो निश्चित ही उसे खिड़की के लार्ज कैनवस पर उकेरा गया किसी पारंगत पेंटर का न्यूड पोर्ट्रेट समझने की भूल कर सकता है।
“ओह, अमृता शेरगिल”—चिल्ला कर वह अपने फ़ोन की तरफ़ बढ़ता है। ठिठक जाता है। फ़ोन स्विच-ऑफ़ है। सर्च करने के लिए चालू करना होगा। चालू करने से फ़ोन आने लगेंगे और उसे बात करनी पड़ेगी। वह बात नहीं कर सकता। मुँह खोलेगा भी तो बस लार निकलेगी आवाज़ नहीं। उसके शब्द किसी अतल कुएँ की ठंडी अँधिराई पानी जैसी चुप्पी में दम तोड़ रहे हैं। बेआवाज़। गले में जैसे ‘काँटे’ लग गए हों।
“आइडिया” कह कर वह किचन की ओर बढ़ता है। काँटे वाली चम्मच ले कर गले पर ज़ोर से पाँच-छह प्रहार करता है। ख़ून नहीं आता, पर आराम मिलता है। एक स्मृति उसके अवचेतन के कमरे से निकल कर अब के वक़्त के जालीदार गेट को खोलती हुई अंदर आती है। उसे याद आता है : वह तीन-चार साल का रहा होगा। एक भैया थे जो घर के बग़ल में रहते थे। एक रात जब वह अपने कमरे में टीवी देख रहा था और बाक़ी लोग घर पर नहीं थे। “यहाँ बैठो” उस आदमी ने कहा था।
नहीं यह नहीं सोचना यू इडियट! वह सोचना छोड़ते हुए गद्दे पर लोट जाता है। पेट का ख़ून थक्के में परिवर्तित होने लगा है। लेकिन कितनी देर...
वह फिर किसी शशोपंज में उठता है और खिड़की के सामने खड़ा हो जाता है और अनुभूति से नहीं, बल्कि आदत से पहाड़ को देख कर “वाह!” कह देता है। वह पहाड़ देखने में असमर्थ है। वह कुछ भी देखने में सक्षम नहीं। उसकी दृष्टि उसकी पुतलियों पर बरसों से सूखते किसी चिथड़े की भाँति टँगी हुई है। आँखें बाहर नहीं देख पातीं। वह कुछ महसूस नहीं कर पाता। उसकी इंद्रियाँ जाम हो गई हैं। संवेदनशीलता पर एनेस्थीसिया का इंजेक्शन लगा दिया गया है। वह मानसिक अपंग है। वह कुछ भी देखने में असमर्थ, कुछ भी महसूस करने में असमर्थ है।
एक स्मृति गेटक्रैश कर दौड़ने लगती है। उसकी कज़िन उसे याद आती है, फिर उनकी उम्र से दोगुना उनका प्रेमी। वह स्वीकार नहीं कर सका था, किंतु जब उन्होंने ‘प्रेम’ को समझाया, तब उस दिन भी उसने अनुभूति से नहीं; बल्कि आदत से हाँ किया और अपनी बहन के हिस्से का अथाह प्यार थोड़ा उनके प्रेमी पर भी फेंक दिया।
किंतु उसे तो कभी प्रेमादि महसूस ही नहीं हुआ। तो क्या वाक़ई? क्या वह अभी तक सब आदत से करता आया है, अनुभूति से कुछ भी नहीं?
प्रेम पर संशय है, किंतु शारीरिक दर्द से ज़रूर वह संतुष्ट होता रहा है। उसके अनुसार उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उसे सबने प्रेम दिया। परिवार, प्रेमिकाएँ, दोस्त, अजनबी। इतना प्रेम जितने में एक सामान्य आदमी संतुष्टि से फूल कर फटने की कगार पर आ जाए। किंतु वह कभी उसे अनुभव ही नहीं कर सका। फ़किंग ट्रैजिडी, डैम इट!
“सुनो ना, तुम मुझे काट लोगी प्लीज़। थोड़ा ज़ोर से...”
एक आह को अपनी मुट्ठियों में भींचे जब वह संतोषित साँस छोड़ता तो उसके जिस्म के जहाँ-तहाँ के दाग़ थोड़े और बैंगनी हो जाते।
वह अपनी सोती हुई प्रेमिका का सुंदरतम चेहरा बड़े दुलार से देखता। आँखों की तिरछी बनावट पर खिलखिलाता। हाथ फेरता। हँसता। प्रफुल्लित हो कर चूम लेता और उसके कान में कहता, “डार्लिंग, आई लव यू सो मच...” वह अधनींद में हल्का हँस कर हवादार आवाज़ में कह देती, “लव यू टू डार्लिंग, सो जाओ।” वह दूसरी तरफ़ करवट ले कर फिर सोचने लगता। नहीं, ऐसा नहीं है। उसने प्रेम के सबसे इंद्रधनुषी दिनों को अनुभव किया है। प्रेम पर कोई भी संशय नहीं। उसने हर रंग के प्रेम को जिया है और इसे प्रमाणित करने के लिए वह कोई भी उदाहरण नहीं देना चाहता।
वह सिगरेट की तलब से उठता है और देखता है कि सिगरेट ख़त्म हो गई हैं। बाहर जाना होगा। कौन जाए? दुकान के आदमी को हाल-चाल बताने का मन और भाषा दोनों नहीं।
“यार मैं ‘मैं’ से शुरू होने वाले प्रत्येक वाक्य में आग लगा देना चाहता हूँ।” उसने कहा था।
“यह वाक्य भी ‘मैं’ से शुरू हो रहा है...” उसकी दोस्त हँसी थी।
“शिट भई, मगर ये कितना हिंसक विचार है ना?”
“आत्महिंसा!” दोस्त ने एक परिचित स्वर में कहा था।
जाना तो होगा। दरवाज़ा लगाया गया। अपनी सबसे कम्फ़र्टेबल पर्सनेलिटी को ताले में जिन्न की भाँति बंद करके वह चलने को हुआ कि दौड़ कर फिर अंदर आ गया। कपड़े तो पहने ही नहीं। क्यों न ऐसे ही जाया जाए? हाहा! फिर कभी...
एक छद्म वेष धर के वह निकला। रास्ते पर चलते हुए अगल-बग़ल के ऊँचे रास्तों के पीछे पंक्ति में दूर तक लगे पहाड़ जो सिगरेट पी कर गोल बादलों की शक्ल में छल्ले बना रहे थे। बग़ल से गुज़री एक स्कूटी ने उसकी एक और स्मृति को खोल दिया... उसे अपने शहर की एक नाबालिग़ बच्ची ‘क्रांति’ याद आई जो अपने से दस साल बड़े एक नशेड़ी, कामुक, लुच्चे और मिसोजिनिस्ट व्यक्ति के साथ भाग कर दिल्ली चली गई थी। यह तब की बात है, जब उसके पेट में दो महीने का बच्चा था। वह तीन साल दिल्ली में किस हाल में रही, सोचने पर वह सिहर उठा। पता चला था कि उसका पति उसके शरीर का इस्तेमाल करके पैसे कमाता और नशे करता था। ऐसा वह तीन साल तक करता रहा। फिर एक दिन उसे मार कर या शायद बेच कर वह यह कहते हुए वापस अपने शहर लौट आया, “बदचलन थी, भाग गई।”
“कहाँ भागे जा रहे हो?” नीलू की आवाज़।
“अरे आप!” (वह ओढ़ा हुआ व्यक्तित्व एक्टिव हुआ।)
“कहाँ चले जनाब?” नीलू ने अतिरिक्त मुंडी हिलाते हुए पूछा।
“अरे बस यार निकला था! सोचा कुछ खाना-वाना खा कर आया जाए और मौसम भी सुंदर था, देखो न पहाड़! इनकी सफ़ेदी तो देखो। इस बार ऊपर साइड जाऊँगा तो थोड़ी बर्फ़ बैग में भरके लेता आऊँगा। जब लाइट जाया करेगी, तब इनकी सफ़ेदी काम करेगी।” हँसते हुए उसने कहा।
“हाँ! हाँ! जब बर्फ़ का पानी साफ़ करना पड़ेगा तब समझ आएगा।” नीलू भी हँसते हुए बोली।
“ओह हाँ यार! ये तो सोचा ही नहीं...” सिर खुजला कर अभिनय का सुंदर उदाहरण पेश करते हुए उसने कहा।
“चलिए जाता हूँ, बड़ी भूख लगी है। एक पराँठा-चाय खा कर अभी आया। यहीं होंगी न आप?” जवाब न सुनने की इच्छा के साथ उसने पूछा।
“हम तो यहीं हैं, आपका पता नहीं चलता!” नीलू ने व्यंग्य और आत्मीयता के मिले-जुले स्वर में कहा।
“अरे बस भूख लगी है, कुछ खा कर लौटता हूँ। फिर पक्का आपसे मिलता हूँ।” यह कह कर उसने हाथ मिलाया।
वह और नीलू और उसे जानने वाला हर व्यक्ति जानता था कि वह अब वापस नहीं आएगा और आएगा भी तो किसी दूसरे रास्ते से।
दुकान से थोड़ी दूर एक ख़ाली हरी जगह में कश खींचते हुए रोड पर एक लड़की को देख कर उसे याद आई अमृता शेरगिल की पेंटिंग ‘सेल्फ़ पोर्ट्रेट एज़ ए ताहिती’ और उसी पेंटिंग से चिपकी एक याद रोड पर घटित होना शुरू हो गई। आठवीं कक्षा का एक जल्दबाज़ी भरा सूखा दिन था, जब उसने एक पागल औरत को नाममात्र का चिथड़ा ओढ़े अपने स्कूल के रास्ते में पड़ा देखा था। उस दिन वह शाम तक उसके बारे में सोचता रहा था। एक दिन पहले उसने जब वह औरत देखी थी, तब वह ठीक कपड़ों से अपना शरीर ढके कचड़ा बीनती हुई उसे दिखी थी। कल वह अलग थी; मसलन उसके बाल थे, वह गंजी नहीं थी और उसका रेप भी नहीं हुआ था।
क्या उसे इससे पहले भी इतनी स्मृतियाँ आती थीं। वह जो इस मुग़ालते में रहता था कि वह ठीक ढंग का वर्तमानजीवी है। उसे न किसी की याद आती है, न पछतावा होता है, न ही इस समूह की कोई अन्य अनुभूति। फिर क्या कारण है कि उसे इतनी स्मृतियाँ आजकल आने लगी हैं। क्या ऐसा हमेशा था?
यह सभी स्मृतियाँ उसे सहानुभूति की याद दिलाती थीं। वही सहानुभूति जो उसे ख़ुद से भी नहीं थी। यह अलग बात है कि उसके जीवन में ऐसा कोई दुख भी नहीं था, जिस पर उसे वैसी सहानुभूति दी जाती। माँ स्वस्थ थीं, पिता जीवित थे, बहन छोटी थी, प्रेमिका सुंदर और उसे प्रेम देने वाली थी और पैसे भी वह काम करके कमा ही लेता था। लेकिन वह सहानुभूति चाहता था—इन्हें महसूस न कर पाने की अक्षमता के लिए। उसके गले लगो, उसे देखते रहो। फ़ीड हिज़ मदरफ़किंग ईगो। उसकी हर छोटी चीज़ को अच्छा कहो, ताकि वह नकार कर बड़ा दिख पाए। उसे बताओ कि हमशक्लों के इस ज़माने में सिर्फ़ वह ही कितना अलग है और अलग ही नहीं कितना विशेष है। उसे बताओ कि वह कितना बड़ा नार्सिसिस्टिक और सैडिस्ट झबरा कुत्ता है। बस उसके बारे में बात करते रहो। उस कष्टभोग में सुख अनुभव करने वाले स्वपीड़क को भिन्न जानो। ही इज़ ए फ़किंग मैसोकिस्ट। उसे बताओ, ताकि वह तुमसे ऊब जाए और अपने जीवन से तुम्हें घटाने पर उसे कोई अपराधबोध न हो।
एक कुत्ता चलते हुए उसके साथ हो लिया। उसने साथी कुत्ते को देखा और औपचारिकतावश कुछ भी न करते हुए थोड़ी देर बाद सामने दृष्टि घुमा ली। आगे रास्ता देखने लगा। कुत्ता दृश्य से अलग हो गया।
उसे चलते हुए अपनी पीठ पर अचानक ठक्-ठक् सुनाई देती है। वह हड़बड़ी में पीछे मुड़ता है और अपने आकार से दोगुनी बड़ी पैर की दो उँगलियों को देख कर स्वभावतः डर कर भागने लगता है। उसे ताऊजी के ऑपरेशन में कटी उनकी दो उँगलियों का ध्यान हो आता है। वह पीछे मुड़ कर देखता है : वे उँगलियाँ अब भी उसका पीछा कर रही हैं। उनसे मवाद बह रहा है, जैसा शायद उसके ख़ून में भी बहता है। ताऊजी... उसने न जाने कब से उनसे बात नहीं की। वह उनसे कितना प्रेम करता है। उन्हें रोज़ याद करके अपना कर्त्तव्य-सा निभाने का ढोंग करके बैठ जाता है। वहाँ तो ऊब भी नहीं, फिर क्यों?
उँगलियाँ उसके क़रीब आ गई हैं। सोचने ने उसकी गति धीमी कर दी थी। वह और ज़ोर से भागने लगता है। ही इज़ रनिंग लाइक ए मशीन! उसकी चप्पलों की नक़लची ध्वनि पहाड़ की ओर से भी सुनाई दे रही है।
“लोभान...” आँची ने उसका नाम पुकारा।
“अरे क्या हाल हैं?” सहसा एकदम सामान्य हो कर भागना रोकते हुए उसने उत्तर दिया। वह जानता है कि पीछे कोई उँगलियाँ नहीं हैं। नहीं थीं।
“उस दिन भी आप बोले थे, फिर आए नहीं!” आँची ने याद दिलाते हुए कहा।
“अरे शिट यार, माफ़ी दीजिए। अभी तो ज़रा काम से जा रहा हूँ, आप देख ही रही हैं कि भाग रहा हूँ। अगली बार तय रहा... कॉफ़ी मैं ले कर आऊँगा, पक्की बात...” पहले वाक्य को अंतिम के बर्तन में डाल कर उसने पेश किया।
“हाँ! हाँ! आपको कहाँ वक़्त है! आप बड़े लोग...” आँची ने घिसा-पिटा व्यंग्य अपनी भाषा में लाने की कोशिश करते हुए कहा।
“अरे ऐसी बात नहीं है यार, इस कुर्ते का प्रिंट कित्ता सही है ना? क्या नाम होता है इसका, इस प्रिंट का?” उसने बात पलटते हुए कहा।
“ये तो नॉर्मल है। मेरे पास एक दूसरा है, महरून कलर का... जब घर आएँगे, तब दिखाऊँगी।” आँची तारीफ़ से गद्गद होते हुए बोली।
“तय रहा, जल्दी आता हूँ।” उसने हाथ बढ़ा कर आगे के वार्तालाप की संभावना पर टेक लगाते हुए कहा।
आँची मुस्कुराई। उसने हाथ मिलाया और एक औपचारिक ‘बाय’ कह कर वह धीरे-धीरे घर की ओर आने लगा। फूफा की निष्प्राण आँखें उसके दिमाग़ में बजने लगीं। वह उन्हें नज़रअंदाज़़ करते हुए किसी तरह घर आया। दरवाज़ा खोला। ताले से जिन्न को आज़ाद किया। साँकल लगाई। शीशा देखा। पर्दा लगाया। अगल-बग़ल देखा। अलमारी खोल कर देखा। कहीं कुछ नहीं दिखने पर वह बैठा। सिगरेट की डिब्बी खोली। उठा। शीशा सामने रखा। बैठा। सिगरेट निकाली। जलाई। पहले कश के रास्ते बाहर की थकान निकली—चलने की नहीं, उन दो लोगों से बात करने की।
दो दिन की भूख और सिगरेट के मेल-जोल से उसके हाथ और टाँगें शॉट-सर्किट की तरह काँप रही थीं। उसने स्वयं को काँपते हुए शीशे में देखा और वह हँसा और सारे कपड़े उतार कर उचकने लगा और कमरे में सरपट दौड़ता और अपना सिर ज़ोर-ज़ोर से घुमाता और ज़ोर से घुमाता और ज़ोर से घुमाता और गिर पड़ता और हाँफते हुए एक और कश लेता और खाँसता और किसी दैत्य की तरह फिर नाचना शुरू कर देता... बिन संगीत के। उस नंगे व्यक्ति को यदि कोई इस वक़्त ऐसे नाचते देखे तो अज़ीब एब्सर्डिटी से भर जाए। वह ख़ुद को अभी देख पा रहा है। एक मछली के रूप में, जिसके पैरों की जगह टायर लगे हैं। ट्रैक्टर के टायर। वह कबूतर है जिसके पंख उसकी आँखों से निकल कर फड़फड़ा रहे हैं। कबूतर की चीख़ उस पर बरस रही है। वह एक मेंढक है जो पिघल रहा है। वह एक घिनौने पशु की कल्पना करना चाह रहा है, ताकि ख़ुद को किसी टंकी में उतराता हुआ देख पाए। स्मृतियाँ। उसकी आँखें गिर कर उछलती हैं और उसकी पीठ से जा कर चिपक जाती हैं। उसकी आवाज़ में सिर्फ़ ध-ध-ध... है। अधूरापन। उसके हाथ रबड़ जैसे खिंचते जा रहे हैं और वह ख़ुद के ही हाथों से जकड़ता जा रहा है। उसके हाथ उसे लपेट चुके हैं। वह एक सरीसृप में रूपांतरित हो चुका है। वह जैसे अभी गिरेगा और रेंगने लगेगा। वह अपनी टाँग से उठा कर अपने जूते को मुँह तक लाता है। सूँघता है और दे मारता है—अपने खाने के बर्तनों पर। उसके हाथ छूट नहीं रहे। उसका गला दब रहा है। वह अपनी जीभ को मुँह खोल कर चिढ़ाने के लिए निकालता है कि जीभ उड़ने लगती है। जीभ दरवाज़ा खोलती है। वह अपने नंगेपन पर शरमाता है और गेट लगाने को उठता है कि उसकी जीभ उससे पहले निकल कर दरवाज़ा धड़ाम से लगा कर भाग जाती है। वह पुकारे कैसे? उसकी जीभ भाग गई। वह तड़प रहा है। एक स्मृति उसके बग़ल में आ कर बैठती है। उसे देखती है और शांत स्वर में कहती है :
“धिक्कार!”
•••
तरुण की यह पहली कहानी है। वह हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय से परास्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं। उनकी साहित्य की समझ प्रभावशाली है। इंस्टाग्राम पर उन्होंने @littarun नाम से दिलचस्प काम किया है और कर रहे हैं।
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट