पॉपुलर फ़िक्शन की बिसात क्या!
कुशाग्र मिश्र
31 अक्तूबर 2026
उन्वान एक छलावा है। छलावा इसलिए कि मुसन्निफ़ यदि शीर्षक की मुराद पूरी करके खिसक ले, तो लेखन मोनोटोनस जान पड़ता है। उस शेर की तरह, जो कहते-सुनते बखत तो सुंदर प्रतीत होता है, किंतु म'आनी-आफ़रीनी से अछूता रह जाता है। यानी उन्वान पढ़कर पाठक का फ़र्स्ट इम्प्रेशन या विचार जो भी बने-पड़े, गद्य के ख़त्म होते-होते एक अच्छे शेर की मानिंद उससे इतर भी तमाम पहलुओं की दुनिया खुल जानी चाहिए, जिसके “भीतर एक मस्तिष्क हो, उसके भीतर भी एक और कक्ष और कक्ष के भीतर एक गुप्त प्रकोष्ठ।”
ख़ैर, यह सब महज़ पाठक को लुभाने का चोचला भी हो सकता है, जिससे वह इस छलावे में आकर अंत तक बना रहे। तो अब असल बात पर आते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि किसी भी विषय पर बात करने से पहले हमें उस विषय तक आहिस्ता-आहिस्ता पहुँचना चाहिए। मसलन, विशेष से सामान्य की ओर बढ़ना या दूसरे शब्दों में, particular instances से general proposition तक पहुँचना, जिसे आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन में फ़्रांसिस बेकन ने व्यवस्थित रूप देने का प्रयास किया। पर यहाँ मामला इतना सीधा नहीं है। वक्रोक्ति का सहारा आवश्यक जान पड़ता है। हमें शुरू तो विषय से इतर ही करना है, मगर स्थापित कुछ नहीं करना; बस बात से बात पैदा करते चले जाना है और जहाँ भी पहुँचना होगा, वही हमारे शीर्षक के जवाब में उपजी बहुलता होगी।
शुरू से शुरू करते हैं। सन् 2020। कोरोना संक्रमण अपने चरम पर था। अभी हाल ही में इंटरमीडिएट पास करके स्कूल से मुक्ति मिली थी। और करने को वही सब था, जो सामान्यतः हर कोई करता है। ‘सामान्यतः’ में वह सब कुछ आ जाएगा, जो छिछले से छिछला और सतही से सतही सोचा और किया जा सकता है। निचले विचारों में जीना, पितृसत्तात्मकता या विषमलैंगिकता के जंजाल में पलना तथा जाति के कैंसर में स्नान करना इत्यादि संस्कार। कुल मिलाकर जीवन में वही घिसी-पिटी बातें थीं और उन बातों में जीते हुए हम ज़िंदगी करते थे। ‘हम’ इसलिए भी कि यह मसअला वैयक्तिक होते हुए भी वैयक्तिक नहीं है। हमारा इंडिविजुअल सेल्फ़ उसी ‘हम’ से निर्मित होता है, जहाँ हम अपना ‘मैं’ बसाते हैं। हमारी आस-पास की दुनिया, हमारा समाज उस बूचड़खाने सरीखा है, जहाँ अगला नंबर आपका, यानी किसी इंडिविजुअल का है, जिसकी गर्दन चाक होने वाली है। समस्या यह है कि उस बेचारे इंडिविजुअल पशु को यही नहीं पता कि वह जिससे गले मिलने को आतुर है, वह निर्मम कसाई का लबादा ओढ़े हुए है। और ऐसे ही देखते-देखते एक व्यक्ति की हत्या हो जाती है, जिसकी ख़बर उस कुर्सी पर बैठे मनुज को ज़र्रा बराबर नहीं होती, जो खींचकर मांसभक्षण अथवा नरभक्षण कर रहा होता है। बाहर-बाहर सब ख़ुशहाल प्रतीत होता रहता है और भीतर मारा जाता है एक निर्दोष प्राणी। और इसे मैं मुक्तिबोध की भाषा में कह देता हूँ, “ऐसी ट्रेजेडी है नीच।”
मगर इससे बचने का कुछ उपाय भी तो होगा? “ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं” वाली बात से मैं कहीं हद तक सहमत हूँ, मगर कसाई-समाज से बच निकलने का उपाय अवश्य है। (बच निकलने का अर्थ क़त’अन यह नहीं कि वहाँ सकारात्मकता ही होगी।) किंतु यह बच निकलना किस चिड़िया का नाम है? क्या समाज से भौतिक रूप से पलायन करना बच निकलना है? नहीं। क्योंकि समाज का शैतान हमारे बाहर ही नहीं, बल्कि भीतर भी डेरा डाले रहता है। हमारे समस्त सोच-विचार से लेकर इच्छाओं तक, भय से लेकर निर्णयों तक, सब तरफ़ इसका भूत विराजमान रहता है। ऐसी परिस्थिति में भीड़ की गंध से मुक्त होना भर पर्याप्त नहीं। भीतर के क्षेत्र में ऐसा कक्ष निर्मित करना होगा, जहाँ हम अपने ‘मैं’पन में बाहर से अंधे हो सकें। और तब जाकर कहीं बड़ी मुश्किल से होगा चमन में दीदा-वर पैदा! यानी घोर सामूहिक-पुंज में सॉलिट्यूड का नख़त! मॉन्टेन के शब्दों में : We must reserve a backshop, wholly our own and entirely free, wherein to settle our true liberty, our principal solitude and retreat. And in this we must for the most part entertain ourselves with ourselves, and so privately that no exotic knowledge or communication be admitted there.
[हमें अपने भीतर एक ऐसा निजी कक्ष बचाकर रखना चाहिए, जो पूरी तरह हमारा अपना हो और सर्वथा स्वायत्त, जहाँ हम अपनी सच्ची स्वतंत्रता, अपना प्रधान एकांत और अपनी शरण स्थापित कर सकें। और इसमें हमें अधिकतर ख़ुद के संग ही रमना होगा, और वह भी इतने निजी रूप से कि किसी भी पराए ज्ञान या संसर्ग को वहाँ प्रवेश की अनुमति न हो।]
एकांत का कक्ष निर्मित करने से क्या होता है? तो इसका सीधा उत्तर है—कुंभ के भरे-पूरे मेले में अपने माँ-बाप से हमेशा-हमेशा के लिए बिछड़ जाना, जब कच्ची उम्र में वे आपके लिए समस्त संसार होते हैं। या किसी मरते हुए मरीज़ को आईसीयू में बेरहमी से बाँध देना, जहाँ आस-पास कोई मौजूद न हो। यह तैयारी है स्वायत्तता के वृहत् मैदान के निर्माण की। परंतु इसकी भी घोर क़ीमत अदा करनी पड़ती है, जिसके प्रसाद से विलादत होती है उस अवस्था की, जिसे ‘व्यग्रता’ या ‘बेचैनी’ कह देना कहीं हद तक कीर्केगार्द के ‘एंग्स्ट’ (Angst) या ‘एंज़ाइटी’ (Anxiety) के क़रीब पहुँचना होगा। उन्हीं के शब्दों में कहें तो : Anxiety is the dizziness of freedom.
[व्यग्रता स्वतंत्रता की घुमेर है।]
जब मनुष्य समाज की बैसाखियाँ फेंककर अपने एकांत के उस बीहड़ कक्ष में अकेला खड़ा होता है, तो उसका सामना किसी बाह्य जगत् की शैतानी चेतना से नहीं, वरन अपनी निरंकुश स्वायत्तता से होता है। यह उस खाई के मुहाने पर खड़े होने जैसा है, जहाँ नीचे अनंत शून्यता है और छलाँग लगाने या पीछे हटने का इंतिख़ाब सिर्फ़ और सिर्फ़ उसका अपना है। यही वह घुमेर है, जहाँ सुरक्षा का कोई पूर्वनिर्मित ढाँचा शेष नहीं रह जाता और आत्मा अपने पूरे नग्न यथार्थ के संग थरथरा उठती है। और ठीक इसी मोड़ पर, जब मनुष्य उस व्यग्रता से घबराकर भागने के बजाय उस घोर एकांत को साध लेता है, उसके खोखलेपन में जीने-मरने का आदी हो जाता है और उसकी नीरसता में साँस लेने लगता है, तब उसके भीतर अस्तित्व का सबसे निर्णायक क्षण घटित होने की संभावना जन्म लेती है। और वह है ‘चुनाव का क्षण’, जो संजीदा उत्तरदायित्वों के बोध से घिरा होता है।
भीड़ के बीच रहते हुए हम जिसे चुनाव और कर्म कहते हैं, वह महज़ मुग़ालता है। वहाँ हम चुनते नहीं, बल्कि पहले से तयशुदा साँचे में केवल सहमति की मुहर लगाते हैं और नाबीना होकर हाथ-पाँव चलाते हुए एक रोज़ मर जाते हैं। ऐसे में स्वायत्तता भ्रम मात्र है। किंतु इस मुखौटे को ओढ़कर ज़िंदगी भर बचे रहना मुमकिन नहीं है। कीर्केगार्द कहते हैं : Are you not aware that there comes a midnight hour when everyone must unmask; do you believe that life will always allow itself to be trifled with; do you believe that one can sneak away just before midnight in order to avoid it?
[क्या तुम नहीं जानते कि मध्यरात्रि की एक ऐसी घड़ी आती है, जब हर किसी को अपना मुखौटा उतारना ही पड़ता है? क्या तुम्हें लगता है कि जीवन सदा स्वयं को यूँ उपहास का विषय बनने देगा? क्या तुम्हें लगता है कि कोई उस घड़ी से ठीक पहले चुपचाप निकलकर उससे बच सकता है?]
वह मध्यरात्रि की घड़ी दरअस्ल उसी एकांत का बीहड़ कक्ष है। वहाँ से खिसक निकलने का कोई प्रच्छन्न रास्ता शेष नहीं रह जाता। उस मुहाने पर खड़े होकर मनुष्य को या तो अपनी अनंत शून्यता के भीतरी तल में छलाँग लगाने का चुनाव करना होता है या अनंत काल के लिए एक भीरु मुखौटा बनकर रह जाना होता है, जहाँ वह व्यग्र तो है, किंतु स्वयं से दूर।
यह सब बताने-कहने का मक़सद महज़ उस बात को जोड़ना था कि कैसे सॉलिट्यूड वह प्रथम चरण है, जहाँ से अनंत संभावनाएँ जन्म लेने के लिए बाँहें फैलाए खड़ी रहती हैं। वैसे ही, जैसे मुझे आज से लगभग साढ़े पाँच बरस पूर्व खड़ी मिली थीं, जब मैंने दुनिया में दुनिया से विलग होकर दुनिया को देखना शुरू किया था। जो आत्म के उद्विकास और विस्तार का प्रारंभ था। और उसकी शुरुआत होती है एकदम निचले पायदान से, जिसका इन सब से सीधा तौर पर कोई लेना-देना हो, ऐसा ज़रूरी नहीं। उसी को मैं कहता हूँ पॉपुलर फ़िक्शन की दुनिया, जो ख़ुद में नव-चेतना के आविर्भाव की प्रथम सीढ़ी है या हो सकती है।
शीर्षक का दूसरा हिस्सा, ‘बिसात क्या’, वाले प्रश्न पर उतरता है और यदि आप मुझसे इसका उत्तर पूछेंगे, तो ‘बहुत’ या ‘थोड़ी’ के बाइनरी से मुक्त होकर ही इसका जवाब देना एक सुलझा हुआ उत्तर कहलाएगा, भले ही पाठक वर्ग से हज़ारों गालियाँ क्यों न खानी पड़ें। यह कुछ ऐसी बात है कि कोई नवोदित पाठक इधर-उधर से चार नाम सुनकर आपसे प्रश्न करे कि क्या काफ़्का अथवा पेसोआ को पढ़ा जाना चाहिए, तो इसका जवाब उसके पॉइंट ऑफ़ व्यू से बिल्कुल ही दूसरा होगा। और यदि वह आपकी समझ से बिल्कुल ही नौसिखिया हुआ, जिसे अभी साहित्य का अक्षर-ज्ञान भी नहीं, तब आपको उसे बिल्कुल शून्य से वर्णमाला पढ़ानी और थमानी होगी, जिससे उसमें वाक्य तथा वाक्य-विन्यास के प्रति ललक जाग सके। अन्यथा “अजीर्णे भोजनं विषम्” वाली स्थिति पैदा होने की भी पूरी संभावना है और प्रायः यही होता भी है। यही होता ही आया है।
उद्विकास का सिद्धांत यहाँ भी लागू हो, ऐसा ज़रूरी नहीं। इसे त्रासदी कह लें, अन्यथा कुछ और। मूर्ति-साधना अथवा सगुण-भक्ति से कितने ही लोग “अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” वाली स्थिति तक पहुँच पाते हैं? किंतु इसका यह अर्थ क़तई नहीं कि सगुण की उपासना को अर्थहीन बताकर सीधे ब्रह्म-चर्चा ही आरंभ कर दी जाए। पतंजलि के अष्टांग योग का पहला अंग है यम और अंतिम समाधि। यहाँ भी यह अर्थ नहीं लिया जाएगा कि यम का ही त्याग कर दिया जाए और समाधि का स्वांग रचा जाए।
और यदि अमुक व्यक्ति इतना ही ख़ुश-बख़्त (या बद-बख़्त?!) साबित हुआ और दैवीयता उस पर नाच उठी कि उसका प्रथम चरण आगे का द्वार खोल दे और खोलता ही चला जाए, कि उद्विकास की अनंत सुरम्य (या कि सुरमई?) किरणें फूट ही पड़ें, तो फिर आगे क्या और कैसे होगा, इस प्रश्न का उत्तर बस इतना ही रह जाता है :
“रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमाँ
हो रहेगा कुछ न कुछ, घबराएँ क्या।”
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