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पत्र : कल्पना शास्त्री के लिए : मुझसे नहीं होगा समीक्षा का काम

स्वस्ति श्री सर्वोपमायोग्य कल्पना शास्त्री जी,

यहाँ से मनीष का राम-राम। चकित होऊ नका; मैं भी जानता हूँ कि चिट्ठी-पत्री की परंपरा तो अब बहुत पुरानी हो चुकी है। सो भी, मैं आपको चिट्ठी लिखने बैठ गया। आपके द्वारा अनूदित किताब पढ़ी। जैसा आपने मुझसे वादा लिया था कि पढ़ने के बाद पुस्तक पर अपने विचार ज़रूर लिख भेजना। आपने यह इक़रार सभी से किया था और पुस्तक पर पता (नंबर) लिख छोड़ा था। सो, यह चिट्ठी लिख रहा हूँ। आगे बढ़ने से पहले यह किताब कहाँ और कैसे मिली, इसकी कहानी भी लिखे देता हूँ। कारण, मेरे यहाँ का नया हरकारा बड़े उद्दंड क़िस्म का है। बीते जेठ उसे एक चिट्ठी ले जाने को दी। उसमें एक कहानी थी, एक पत्रिका को पहुँचनी थी। कथा का अंत कुछ सूझ नहीं रहा था, तो उसे बिना अंत के ही पाठकों की समझ पर छोड़ छपने को भेजी थी। किन्तु, यह मुझसे दो दिनों बाद मिलता है और वचन लेकर कि मैं उसके ख़िलाफ़ शिकायत नहीं करूँगा, पूछता है—“भईया, कहानी कै अन्ति कइसे भवा?”

मैंने पूछा, “तुमने मेरी चिट्ठी पढ़ी?”

पान से मुख परिपूरित होते हुए भी चार दाँत दिखाकर मुस्कुराते हुए बोला, “भईया, परसौं बड़ी धूप रही। जायसी बाबा भी ‘जेठ जरै जग चलै लुवारा, उठहि बवंडर परहिं अँगारा’ कहि गए हैं। हमहूँ रस्ता मा थकि गए रहे। पहलवान बाबा पै रुकि गए। दुपहरी तेज़ रही, सो आगे बढ़ै कै हिम्मत न करिस। कुछु करै का रहा नाही तौ बैठ के आपकै चिट्ठी ही पढ़ै लागेन। फिरि काव रहा, मगन होइके पूरी चिट्ठी निपटाइ के तौ उठेन। जबि अन्ति आवा तौ मन उखड़ि गवा। आगे काव भवा? यही बाति पेट मा दुई दिनि से गुड़गुड़ करत रही। रहि न गवा तौ आजि आपिसे पूछि बैठेन।”

मैंने कुछ बता करके उससे पीछा छुड़ाया और शिकायत भी नहीं की। समयांतर उसके प्रश्नों में बढ़ोत्तरी होने लगी। अब तो उसे देखते ही मुस्कुरा देता हूँ। और, उस यक्ष के बारे में सोचता हूँ, जिसने मेघ को दूत बनाकर अपनी तन्वी श्यामा प्रिया को संदेशा भेजा था। कालिदास नामक एक व्यक्ति ने उसके संदेशे को पूरी दुनिया को पढ़ सुनाया। सोचता हूँ, यह हरकारा ज़रूर वही यक्ष होगा, जो अब पूरी दुनिया के प्रेमी-प्रेमिकाओं के संदेशे पढ़ता, मुस्कुराता घूमता है। यदि कभी इससे कहूँ कि एक कालिदास नाम का व्यक्ति भी तुम्हारी तरह ही था, दूसरों के संदेशे पढ़ता था, तो यह भलमानुष कह बैठेगा कि, “कालिदास तौ ग़लत किहिन हैं। अबि बताओ भला! दुई तोता-मैना के पेरेम पत्तर पढ़ै का चाही! मानि लेहेन पढ़ै तौ पढ़ै, मगर सकल संसार के आगे तौ बाँचै का न चाही न! अबि देखौ, रामधन की मेहरुआ अपने पति से पैसा का कहे है, छगनुआ वाली तौ अपने पति से दुई हरेर दुई लाल साड़ी मंगाये है, रामकलियवा तौ अपने भतार का अइसन-अइसन बात लिखत है कि पढ़ै वाला शरमाय जाय! अबि कहौ भईया, ई सबि बाति हम केहु से कहित है, नाहीं न! तौ! कालिदास तौ गड़बड़ हरकारा रहले। वैसे भईया, काव बताई, इ लाइन ही ऐसी हवै की यहमा सबके भरती कै लेत हैं।”

इतना सुनने के बाद कोई भी व्यक्ति हाँ में हाँ मिलाने के सिवा कुछ बोल नहीं पाएगा। ख़ैर, मैं पुस्तक की कथा को कहता हूँ। यह गत माह आषाढ़ के प्रारंभ में ही ‘गांधी कैंप’ का तीसरा दिन है। गांधी कैंप से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट लिखने का वादा कर चुका हूँ, समय मिलते ही लिखूँगा। ध्यान हो तो, आप किताबों के एक गट्ठर के साथ आई। आज डॉ. राजीव रंजन गिरी और सोपान जोशी का व्याख्यान होना था। हुआ। उसके बाद संचालन कर रही तिना ने कहा, यह पुस्तक है गांधी पर, उन्हीं लोगों को मिलेगी जिन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया है। फ़्री में! वह भी पुस्तक! तिस पर भी गांधी पर! सबसे अच्छा प्रदर्शन मेरा ही था, यही सोचकर आगे बढ़कर पुस्तक उठा ली। अब आप उठीं। आपने सब लोगों से पुस्तक वापस रखवाई। आपने अपने पैसे से ये पुस्तकें ख़रीदी थीं, तो आपकी चिंता भी जायज़ रही कि बच्चे किताबें केवल लें ही नहीं, बल्कि पढ़ें भी। जो फ़्री में पुस्तक लेगा, उसे एक माह; जो कुछ पैसे देकर ले रहा है, उसे दो माह के भीतर पढ़कर आपको जवाब लिखना था। अब, मैं इन दोनों खाँचों में फ़िट न हुआ। सो, मैंने कैंप के अपने रूममेट और सीनियर अंतर्यामी महाराणा भईया से पुस्तक ख़रीदवाकर ख़ुद को गिफ़्ट दिलवाई। 


अब, मेरे जूनियर कहाँ पीछे हटने वाले थे! सो, सुपर सीनियर अंतर्यामी भईया ने ही कुछ किताबें और ख़रीदीं। अब मैं इस बंधन से आज़ाद था कि मुझे तय समय-सीमा के भीतर पुस्तक पढ़कर आपको जवाब लिखना है। हालाँकि, आपसे बातचीत में मैंने वादा किया था कि पुस्तक पढ़ने के बाद इस पर समीक्षा ज़रूर लिखूँगा। कारण भी था, इसको हिंदी में प्रकाशित हुए चार साल होने को थे और इस पुस्तक पर हिंदी में कहीं कोई विस्तृत समीक्षा न मिली मुझे। सो, बिना पढ़े ही पढ़ने के बाद समीक्षा लिखने का मन बना चुका था।


पिछले तीन दिनों से यह पुस्तक थोड़ी-थोड़ी पढ़ रहा हूँ। आज, श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह पुस्तक समाप्त हुई। इसे आपने बड़े उत्साहपूर्वक भेंट की थी। पढ़ने के बाद समझ में आया कि वह उत्साह लाज़िमी था। पुस्तक समाप्त होने के पश्चात् लगभग दो पहर तक सोचता-विचारता रहा हूँ। उधेड़बुन करता रहा। अब इस निर्णय पर पहुँचा कि अभी इस पुस्तक पर और गांधी के संबंध में लेखनी नहीं चला पाऊँगा। आपको एक बात और लिखे देता हूँ। लिखनी चाहिए या नहीं, नहीं जानता, पर लिखे देता हूँ। यह मेरे साथ दूसरी बार है कि गांधी पर कुछ लिखने से ख़ुद को पीछे खींच ले रहा हूँ। गत वर्ष मेरे प्रोफ़ेसर मुझसे बात करते हुए पूछ बैठे कि गांधी पर कितनी पुस्तकें पढ़े हो? मैंने उन्हें कुछ किताबें गिनवाईं। फिर उन्होंने कुछ किताबों को सुझाया और उनमें से एक पुस्तक पर समीक्षा लिखने को कहा। मैंने वह किताब पढ़ी, फिर गांधी की लिखी कुछ किताबें पढ़ीं। कुछ पढ़ी किताबों को दोबारा पलटा। आख़िर में, उनसे जाकर यही बात कही कि गांधी के संबंध में लेखनी चला पाऊँ, अभी इतनी सामर्थ्य नहीं है। 

दरअस्ल, मुझे सबसे मुश्किल काम पुस्तक समीक्षा का ही लगता है। तिस पर भी, गांधी पर लिखी गई पुस्तक की समीक्षा तो और भी मुश्किल। पुस्तक समीक्षक को लेखक द्वारा अपनाए गए सभी स्रोतों के पास तक जाना होता है। लेखक ने कौन से तर्क, तथ्य का इस्तेमाल किया है और किस संदर्भ में कर रहा है, आलोचक समझता-देखता है। कुछ छूटी बातें कहता है, तो कुछ दोहराता है, तो कुछ अपनी ओर से जोड़ता है। ऊपर से यह मराठी पुस्तक का अनुवाद है, तो आलोचक मराठी मूल पुस्तक को भी देखेगा ही, यह मेरी समझ है। यह सब करने के लिए मुझे तो कम से कम एक से दो साल तक बैठकर गांधी पर और उनके द्वारा लिखी पुस्तकों को ही पढ़ना पड़ेगा। मराठी भाषा से भी कुछ माह रूबरू होना पड़ेगा। अभी तो जीवन के संघर्षों से जूझ रहा हूँ, अगले कुछ साल में भी मैं इतना समय दे पाऊँ, यह मुश्किल लग रहा है। हाँ, गांधी से दूर नहीं हूँ, न रहूँगा। बाक़ी, जैसे गांधी को गीता माता की याद आती, तो उसे पढ़ने बैठ जाते, वैसे मुझे जब गांधी याद आएँगे या उन पर होते हमले दिखेंगे, तो पढ़ने बैठ जाऊँगा। और एक बैरिस्टर का लिपिक कह लो, दुभाषिया कह लो या जो भी कहो, उन हमलों के जवाब में पढ़ने की सामर्थ्य अनुसार गांधी के शब्दों को पढ़ दिया करूँगा। हालाँकि, आपसे वादा किया था कि इस पर समीक्षा लिखूँगा। सो, वह वादा है कि लिखूँगा। बस, समय-सीमा तय नहीं कर पाऊँगा।

चिट्ठी के अंत में पुस्तक का नाम दिए दे रहा हूँ, कारण, आपको बताने की ज़रूरत तो नहीं ही होगी। यह नाशुक्रा चिट्ठी पढ़ने के बाद सब कुछ भूल जाएगा, लेकिन यह पूछना याद रखेगा कि, “भईया, किताब कै नाव काव रहा?” सो, लिखे दे रहा हूँ।
गांधी क्यों नहीं मरते! (मूल मराठी कृति ‘गांधी का मरत नाही’ का हिंदी अनुवाद)
लेखक : चंद्रकांत वानखेड़े, अनुवाद : कल्पना शास्त्री

इस आशा के साथ कि आप अच्छी और स्वस्थ होंगी, मैं अपनी पत्री समाप्त करता हूँ। थोड़े लिखे को बहुत जानना।

आपका प्यारा,
मनीष
श्रावण मास शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, संवत् २०८३ विक्रमी।

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