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मेरी पहली जेल-यात्रा-2

यहाँ से आगे...

रात भर यही सोच कर नींद लगी कि कल नहीं जाऊँगी, जाना ठीक नहीं, क्या पता कल और ख़राब न बीते। सिर का दर्द अगर कल भी बना रहा तो अगले कई रोज़ तक यही डेरा लगा रहेगा इसका, ऑफ़िस अपना पढ़ना-लिखना सब मुसीबत में पड़ सकता है तो अच्छा यही है कि कल जेल नहीं जाना। बॉस ख़ुद सँभाल लेंगे या किसी को बुला लेंगे।

सुबह उठी तो बदन बेहतर था, कहीं कोई दर्द नहीं था न थकान। शीशे में ख़ुद से नज़र मिलाई, आत्मा ने कुछ इशारा किया बस मैं नाश्ता-टिफ़िन लगाकर ऑफ़िस चल दी। बॉस से पूछा, “आज कितने बजे चलना है जेल?” उन्होंने कहा, “बस नाश्ता करके चलते हैं। वहाँ खाना-वाना हो भी या नहीं तो अच्छे से पैक हो कर चलते हैं। आज सबसे बात करके तय कर लेंगे कि ट्रेनिंग में क्या-क्या सब्जेक्ट होंगे हमारे।” मैंने कहा, “ठीक है।” फिर उन्होंने पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, हमारा करना क्या फ़ायदेमंद होगा?” मैंने पूछा, “किसके लिए? आपको सरकारी प्रोजेक्ट मिला है, प्रोजेक्ट पूरा करना एक फ़ायदा है, वो भी इस तरह का लीक से हटकर काम करना अपने आप में अलग तरह का ज़ेहनी फ़ायदा है। क़ैदी बच्चे तो हमारी शक्ल देखकर बात करके ही इतने ख़ुश थे, एक तरह की ऊब होती है उनके रोज़मर्रा के जीवन में, वो कम होगी तो कुछ न करके भी आप उनका फ़ायदा करेंगे, ऐसा मुझे लगता है।” बॉस को सही लगा और वह नाश्ता करने ऊपर अपने घर चले गए। कुछ देर में नीचे आ कर हम लोग निकल गए।

आज थोड़ा जल्दी पहुँच रही थी तो मुझे कल से काफ़ी बेहतर लग रहा था कि ऐसा सवाल पूछूँगी, ये बात करेंगे, ऐसा कहेंगे तो क्या कहेंगे बच्चे। आज शक्लें देखकर सिपाही ने स्याह बुलंद दरवाज़ा खोल दिया, अगले पड़ाव पर भी चेकिंग के बाद पहुँचकर हम जेल के अंदर दाख़िल हो गए। थोड़ा आगे जाकर रसोई में वही लड़का कुछ बना रहा था, हमें देखकर आया, नमस्कार किया और चाय का पूछा। सिपाही ने कहा, “हाँ, साहब के कमरे में लेकर आ जाओ। कुछ नाश्ता हो तो वो भी लेते आना।”

जेलर साहब के कमरे की सफ़ाई चल रही थी। जेलर साहब कहीं बाहर थे। “शायद राउंड पर गए हैं या किसी क़ैदी से बातचीत करने गए हैं...” सिपाही ने बताया। “कल एक लड़का दीवार से कूदकर भागने के चक्कर में नीचे गिरा और पैर की हड्डी तुड़वा बैठा, साला मर ही जाता, बच गया! उसके घरवालों को भी इत्तिला करनी है, अस्पताल और ऊपर वालों का सवाल-जवाब अलग। सभी पर गाज गिरती है। हरामी पहले भी दो बार भागने की कोशिश कर चुका है, मर ही जाए तो हर बार की मच-मच से आराम मिले। गिरता है, पकड़ा जाता है, पिटता है, ठीक होकर फिर भागने का प्लान बनाने लग जाता है। अपने आपको जेम्स बॉण्ड का बाप समझता है साला! उसके और उस जैसों के चक्कर में दीवार कुछ फ़ुट और ऊपर करवाई है, कँटीले तार लगवाए हैं, लेकिन वो मरदूद हरामी मरके ही मानेगा लगता है।”

हमने पूछा, “वो भगौड़ा क़ैदी अभी कहाँ है?”

“अभी थोड़ी देर पहले ही वापस आया है।”

मेरा उत्साह फिर सर्फ़ के झाग की मानिंद बैठने लगा। और क्या-क्या होगा? हमारी लिए चाय बिस्कुट आ गए। थोड़ी देर इंतिज़ार करने के बाद सिपाही ने कहा कि चाय ठंडी हो कर ख़राब हो जाएगी आप लोग पी लें। साहब को अभी आने में समय लगेगा, आप लोग तब तक यहीं बैठकर अपनी तैयारी कर लें, काग़ज़ वग़ैरा पढ़ लें। सोच लें क्या-क्या करना है और क्या-क्या नहीं। “इन साले क़ैदियों को ज़्यादा मुँह मत लगाइएगा। बहुत चूना-हल्दी लगाने में माहिर होते हैं ये साले, हवा में ही उड़ने लगेंगे आपके साथ तो। आप चले जाएँगे, परेशान साले हमें करेंगे, क्यों सरजू?”

सरजू कुछ नहीं बोला। मैंने उसका चेहरा देखा—मिली-जुली सी छाया थी या मुझे क़ैदी के चेहरे पढ़ने का अनुभव था नहीं, वो चेहरा मुझे उलझाकर चला गया। कुछ देर बाद सरजू फिर लौटा चाय के बर्तन लेने। मैंने पूछा, “सरजू, तुम्हें क्या करना पसंद है? ड्राइंग? सिंगिंग? एक्टिंग या क्या?”

उसने बोला, “मुझे तो मैडम घर पर रहना पसंद है। माँ-बहन कभी-कभी गाँव से आ जाती हैं, खाना लेकर उनका मुँह देख लेता हूँ, उनके हाथ का खाना खा लेता हूँ, बस वही पसंद है और लगता नहीं अब कभी घर जा पाऊँगा।” वो उदास हो गया—जैसे कोई भी नौजवान लड़का उदास-दुखी हो सकता था, ये वही हाव-भाव था।

मैंने पूछा, “तुमने किया क्या था जो कभी घर नहीं जा पाओगे?”

उसने मुझे गहराई से देखा, लग रहा था अब बस रो पड़ेगा। जल्दी में उसने बर्तन उठाए और चलने लगा, फिर अचानक लौटा, नज़रें झुकाकर बोला, “मैडम आप मानोगी नहीं, मैंने सही में कुछ भी नहीं किया...” और तेज़-तेज़ क़दमों से बाहर निकल गया।

मैंने सिपाही से पूछा, “किस अपराध में सरजू यहाँ बंद है?”

एक अन्य सिपाही ने बताया, “मैडम, सच ये है कि हम जानते हैं अस्सी फ़ीसदी से ज़्यादा क़ैदी बेचारे हैं, ग़रीब और अनपढ़ घरों से हैं। उन्होंने कोई अपराध नहीं किया, लेकिन कैसे साबित करेंगे? या केस फँसा हुआ है तो बस रह रहे हैं यहाँ, कई सालों से कई सालों तक।”

मैंने तपाक से पूछा, “अस्सी फ़ीसदी से ज़्यादा? लेकिन क़ानून तो... एक भी सही आदमी ग़लत अपराध में क़ैद नहीं होता!”

सिपाही ने कहा, “मैडम, वो फ़िल्मों का असर है, सच कुछ और ही होता है। ख़ैर, जेलर साहब मैदान में ही पहुँच गए हैं, आपसे क़ैदियों के साथ वहीं मिलेंगे, आप लोग मेरे पीछे आएँ।”

बॉस अपनी काग़ज़ी कार्यवाही रोकते हुए खड़े होकर चलने लगे और सिपाही से बोले कि सरजू से कहना चाय बहुत अच्छी बनाई थी उसने।

मैं पीछे चलते हुए सोचती रही—तक़रीबन अस्सी फ़ीसदी, अस्सी फ़ीसदी, अस्सी फ़ीसदी... उफ़्! ऐसे कैसे होता है ये सब?

सामने मैदान में सब क़तार में बैठे हुए थे कल की ही तरह। सामने तीन कुर्सियाँ थीं, मैं कल की तरह ही सबसे पहली वाली पर कुर्सी पर बैठ गई। मेरी ओर से पहली सफ़ में वही तीन लड़के बैठे हुए थे। मैंने नाम पूछा, हाल-चाल पूछने की कोशिश की... लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं। मैंने पूछा, “आप लोग क्या करना पसंद करते हैं? कौन-सा खेल खेलते हैं?” तीनों की ही उम्र काफ़ी कम थी। “घर से कोई मिलने आता है? कहाँ रहते हो?” कोई जवाब नहीं आया।

जेलर साहब ने टोकते हुए कहा कि आप इस तरफ़ से बात करना शुरू करें। सवाल-जवाब, पसंद-खेल यहाँ से लें पहले।

मैंने कहा, “क्यों? ये कुछ क्यों नहीं बोलते?” मुझे लगा छोटे हैं तो कहीं इनके साथ कुछ ग़लत तो नहीं करते, इनके साथ मार-पीट होती होगी? या यौन-शोषण? ऐसे चुप्पा क्यों हैं ये तीनों ही? कोई इनसे बात नहीं करता? ये अजीब-से लगते हैं, चेहरे पर बूढ़ों जैसा अवसाद। आख़िर वजह क्या है?

इतने में सरजू आकर बीच वाली सफ़ में सबसे आगे बैठने वाले को पीछे सरकाकर, सामने आकर बैठ गया। बॉस ने उससे मुख़ातिब होकर कहा, “सरजू, चाय तो तुम्हारे जैसी पूरे फ़रीदाबाद में कोई नहीं बनाता, भाई क़सम से!” वो मुस्कुरा दिया और चेहरा घुटनों के बीच में रख लिया। फिर जेलर साहब ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, “सरजू, सही में यार चाय तो तुम्हारी ख़तरनाक ही होती है और सर, खाना भी ये लड़का बहुत बढ़िया बनाता है। आज सरजू सर-मैडम को बढ़िया दाल-चावल-सब्जी खिला कर भेजना।” सिपाही बोला, “साहब, इसके जैसी चटनी तो पूरे भारत में कोई नहीं बनाता।” जेलर साहब बोले, “हाँ भाई, सरजू की बनाई चटनी तो मेरी बीवी ख़ास कहकर मँगवाती है।”

अभी सरजू फिर से शरमाकर मुँह घुटने में डालता, मैंने पूछा, “क्यों बंद हो जेल में? क्या किया था?”

उसने मुझे फिर गहराई से देखा और मुँह नीचे करके धीमे से ऐसे बोला कि कुछ समझ नहीं आया। मैंने जेलर साहब को देखा, उन्होंने दहाड़ते हुए कहा, “ये सिखाया है तुम लोगों को, ऐसे जवाब देंगे सामने वाले को?”

सरजू एकदम द्रुत गति से सीधा खड़ा हुआ, हाथ पीछे बाँधे और धाराप्रवाह बोलने लगा, “मैं रेहराने गाम का हूँ। बहुत दिन बाद बाबा ने कुछ पैसे दिए थे, फ़सल कटाई पर मेहनत की थी, उसी के बेचकर बाबा लौटे, पचास का लोट देखकर सोचा आज कोल्ड डिरिंक पूँगा। गाम में कहीं पीता तो यार-दोस्त पीने नहीं देते, एक-आध घूँट हाथ लगती। सोचा गाम के बाहर रोड पर जा कर पूँगा तो मज़ा ही आ जाएगा। रोड पर आकर जैसे कोल्ड डिरिंक पीने लगा, पीछे से एक पुराना दोस्त सकूटर पर आया, बोला—सरजू, चलेगा सकूटर पर? आज तुझे हवा की सैर करवाऊँगा। मैं कसम से इससे पहले कभी सकूटर पर नहीं बैठा था, सोचने लगा कि सकूटर पर बैठ कर कोल्ड डिरिंक पीना, इससे और अच्छा क्या ही हो सकता है! मैं सकूटर पर बैठ गया। उसने मेन हाईवे पर दौड़ा दी। मैंने आराम से अभी दो घूँट पिए ही थे कि नाकाबंदी में हमारी सकूटर पुलिस वालों ने रोक दी और हमें उतार कर वहीं सड़क पर बिठा दिया। मैंने अपने दोस्त से पूछा कि क्या मामला है? उसने कहा—पता नहीं यार, शायद इन्हें हमारी औक़ात नहीं लग रही कि हम सकूटर के मालिक हो सकते हैं, इसीलिए रोक लिया होगा। तू परेशान मत हो। पुलिस वाले पता नहीं आपस में क्या बोले, मुझे और मेरे दोस्त को थाने में बंद कर दिया। जब मेरे बाबा थाने आए तो पुलिस वालों ने उन्हें बताया कि सकूटर चोरी करके भाग रहे थे, हमने धर दबोचा। वाहन चोरी का सरगना है इन दोनों में से एक, अब बड़ी जेल जाएँगे, कोई नहीं बचा सकता। मेरे बाबा ने हमें ये बताया। मैंने अपने दोस्त हल्लन से जब पूछा तो वह बोला—यार, इतने साल से ये काम करता आ रहा हूँ, कभी नहीं पकड़ा गया। आज पता नहीं तुझ मनहूस के साथ ये पनौती मेरे साथ हुई, तुझे बैठाना ही नहीं चाहिए था। इतने में हल्लन के घरवाले आए, क्या साँठ-गाँठ की, उसे वहाँ से उसके घरवाले साथ ले गए। मैं वहाँ से यहाँ आकर सजा काट रहा हूँ। मैं और मेरे घरवाले ग़रीब लोग हैं, बहनों की शादी के बाद से ऐसे खप गए कि आज तक मुझे निकाल नहीं पाए। छोटा भाई जब कमाने लायक होगा तो शायद मेरे लिए कुछ कर पाए, तब तक मुझे यहीं गुजारा करना है। छोटा भाई जल्दी बड़ा हो जाए, यही उम्मीद करता रहता हूँ। फिर मैं काश घर लौट पाऊँ... या फिर शायद नहीं।” और वो बैठ गया।

सिपाही बोला, “बहुत सीधा और बढ़िया लड़का है सरजू। इसके हरामी दोस्त हल्लन ने सारा इलजाम इसके सर डाल दिया कि ये सकूटर चोरी करके भाग रहा था, रास्ते में इसने हल्लन को लिफ़्ट दी और उसने बयान दिया कि सालों से यही गाड़ियाँ चोरी करके बेच रहा है। इसके केस के लिए न वकील आता है, न इसके घर से अब कोई आता है। इसकी माँ को देखकर दिल डोलता है, दो साल में एकदम कमजोर और काली हो गई उसकी देह। अंदर की जलन से आदमी कैसे जलता है, इसकी माँ को दो साल में देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। एक-दो एनजीओ वालों से मैंने खुद इसकी दरख्वास्त लगवाई है, देखें कब कोई चमत्कार-सा हो जाए तो ये छूट जाए। मैं तो प्रार्थना करता हूँ कि बच्चा अपने घर जा लगे...”

इसी के साथ एक हाथ और उठा। बॉस ने कहा, “बोलो, क्या कहना है?”

चौदह-पंद्रह साल का लड़का बीच से खड़ा हुआ। वह बहुत ही झिझक के साथ खड़ा हुआ—मुँह नीचे की ओर, हाथ सामने की ओर बाँधे हुए, धीमे-धीमे से कुछ बोला। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहना चाह रहा है। जेलर साहब ने कहा, “थोड़ा तेज़ बोलो!” वह फिर कुछ बुदबुदाने लगा। हम सब ने एक-दूसरे का मुँह ताका। जेलर साहब ज़ोर से चिल्लाते हुए बोले, “अबे तेज़ बोल वर्ना बैठ जा!”

वो घबरा कर एकदम धप्प से नीचे बैठ गया।

मैंने अपने बॉस से कहा, “सर, बात तो करने दीजिए इसे, क्या पता क्या कहना चाहता हो!”

बॉस ने कहा, “तुम उठकर यहाँ आओ और अपनी बात करो। जेलर साहब कहने दीजिए, बच्चा ही है, हर बच्चा एक-सा नहीं होता। अबकी समझ नहीं आया तो हम कुछ नहीं कहेंगे, फिर जो आपको ठीक लगे कर लीजिएगा। प्लीज़ इसे अपनी बात यहाँ आकर कहने दें, सर!”

जेलर साहब ने उसे कहा, “इधर आओ और अपनी बात कहो।”

वह लड़का मेरे नज़दीक आकर खड़ा हो गया—झुके कंधे, झुकी आँखें और नंगे पाँव। मैंने पूछा, “चप्पल कहाँ गई?”

मुझे अनसुना करके वह धीमे-धीमे बोलने लगा, “मेरा नाम बब्बन है, उम्र शायद सोलह साल होगी अभी। तीन साल से यहीं हूँ। गाम में चोरी हो रही थी, एक बार मेरे ताऊ के घर में भी ‘चोर-चोर’ आवाज आई। हमारा घर भी उनकी बगल में था, एक छोटी-सी दीवार है बस बीच में। हम सब उनके घर लट्ठ-सब्बल लेकर कूदे तो कूदते ही चोर को सामने ही खड़े देखा। चोर ऐसा मैडम कि हड्डी-मारा, सींग-पछाड़ा! उसके हाथ में एक गठरी थी। मेरे चाचा ने छीनी और मारना शुरू कर दिया। दो मिनट में चोर ढेर, कान-आँख से खूनम-खून! झप्प से गाम वाले इकट्ठे हुए, सबने पूछा किसने मारा? मैं घर का सबसे शैतान बालक था, मैंने सब्बल हाथ में लेकर चिल्लाकर बोला—मैंने मारा चोर को, कल्ले! दो-तीन कस के दिए, उठा ही नहीं उसके बाद! मेरे ताऊ और चाचा ने भी मेरे कंधे पर थपकी देते हुए कहा कि यों ही है अपना शेर बच्चा, चोर को ढेर कर दिया... जबकि सच तो ये था कि मैं तो दीवार के ऊपर ही से बैठे-बैठे चोर को पिटता देख रहा था। उसके गिरने के बाद ही उसे देखने के लिए दीवार से कूदकर चोर के पास आया था।

हमारे घर के सामने एक बाभन का घर है, उसके घर के छोरे-छोरी पढ़े-लिखे थे। कोई-सा एक लोगों के अधिकार की पढ़ाई कर रहा था। वो वहीं भीड़ में था, उसने पुलिस कम्प्लेन्ट की। सुबह पुलिस की गाड़ी आई, सामने वालों से पूछताछ की, चोर की बॉडी को उठवाया। मैं जब तक उठा ये सब हो रहा था। फिर पुलिस मेरे घर आई, मुझे नीचे बुलाया, मुझसे पूछा—तुमने मारा था घन्नू को? मैंने पूछा—कौन घन्नू? पुलिस वाले ने कहा—घन्नू उस चोर का नाम था, कल जो तुम लोगों के घर में घुसा था। मैंने उछलते हुए कहा—हाँ, कल्ले ही मारा, दो-तीन दिए कस के, वहीं गिर के मर गया! पुलिस वाले से फिर से पूछा, मेरे बड़े भाई ने जो मुझसे सिरफ  दस महीने बड़ा है, बोला—हाँ, इसी ने मारा है कल्ले, दो ही मारे थे इसने सब्बल, उसी में मर गया वो, तीसरे में तो मर ही चुका था! ताऊ-चाचा ने कहा—न-न, बच्चे हैं, ऐसे ही कह रहे हैं, इन्होंने नहीं मारा। तुम लोग बच्चों से बात करोगे अब? हमसे पूछो क्या हुआ था। पुलिस वाले ने कहा—तो फिर आपने मारा है इसका मतलब, घर में आपके डेड-बॉडी मिली है, हमारे पास चश्मदीद हैं और बयान भी कि बब्बन ने मारा चोर को। इसे थाने ले कर जा रहे हैं, आप लोग वहीं आ जाइएगा। हम आगे के काम देखें इतने। सारे पलवल में ही गुंडागर्दी ने गदर मचाया हुआ है, या तो कोई चोर है या फिर कोई  किसी हीरो की औलाद! इस महीने ये तीसरी घटना है जहाँ चोर को मार दिया गया है। चोर को पकड़कर थाने में क्यों नहीं पकड़वाते हो? खुद ही पुलिस, खुद ही जज! अब भुगतो, ये लड़का भुगतेगा अब। इस केस की शिकायत काफी ऊपर तक गई है, लेन-देन या पहुँच भी कहीं नहीं पहुँचा सकती। अब ये लड़का सड़ेगा जेल में!

मेरी माँ, बहन और चाचा तो पुलिस के पैर में गिर गए कि छोटा बच्चा है, इसने कुछ नहीं किया। पुलिस वाले ने कहा—डेड-बॉडी के पास ही हथियार भी मिला था, जाँच के लिए भेज दिया है। खून से साबित हो जाएगा कि इसी से हत्या हुई है और जिसकी उँगली के निशान मिल जाएँगे, पता चल जाएगा कि हत्यारा कौन है।

मैं तो सोचकर जमीन पर गिर गया कि सब्बल को सबसे आखीर में मैंने ही उठाया था और घुमा-घुमा के लोगों को दिखाया था कि ऐसे मारा था, ऐसे मारकर गिराया था, फिर वहीं लाश के पास फेंक दिया था। पुलिस वाले ने माँ से कहा—इसे पानी पिलाओ। थोड़ी देर रोवा-राहट के बाद पुलिस वाले मुझे थाने ले गए, फिर अगले दिन से मैं यहाँ पर बंद हूँ। हथियार पर मेरी उँगली के निशान थे, लेकिन सच ये है कि मुझे तो चोर की शक्ल भी नहीं याद, मुझे तो खून से भरी उसकी शक्ल में उसकी आँखें दिखाई दी थीं बस। वो आँखें मुझे कुछ भी बोलने से पहले डराती हैं। आप मेरे घरवालों से मिलकर एक बार मुझसे मिलने के लिए कहो। कोई मुझसे मिलने कभी भी नहीं आता। माँ की शक्ल भूल न जाऊँ... चाचा बहुत याद आते हैं। वो लोग मुझे पहचान ही नहीं पाएँगे, अगर कभी मैं लौटा भी तो। आप मेरे घरवालों से कहो एक बार, मैं टिकरी का रहने वाला हूँ। भंगेड़ी टोला के कुएँ के पास हमारा घर है। भोपा मेरे चाचा का नाम है।”

मैंने पूछा, “तुम्हारे पापा कहाँ हैं?”

बब्बन बोला, “भोपा मेरे चाचा का ही नाम है।”

मैंने कहा, “तुम्हारे पापा का पूछ रही हूँ।”

उसने कहा, “हमारे यहाँ पापा को चाचा ही बोलते हैं। आप लोग उधर जाओ तो कहना एक बार मुझसे आकर मिल लें, बस एक बार सबको देखना है। तीन साल हो गए, घरवालों की शक्ल न भूल जाऊँ। डर लगता है और बड़ा डर कि सब मुझे भूल तो नहीं गए होंगे? इससे तो मैं मर ही जाऊँ, वही अच्छा होगा।”

मैं नज़रें नीचे किए सब सुन रही थी। उसके पैर बुरी तरह काँप रहे थे। हाथों को वो आपस में रगड़-रगड़कर कुछ छीलना चाह रहा था। लग रहा था एकदम फफककर रोएगा, लेकिन अंदर की ओर तेज़ साँस ली, तेज़ी से अपनी जगह पर जाकर बैठ गया।

इतने में एक साथ कई आवाज़ें आईं : मैडम मेरी भी बात सुन लो, हमारी भी कहानी सुनो, सर मुझे भी कुछ कहना है...

सिपाही ने टोकते हुए कहा, “चुप करो! बकैती लगा रखी है सबने। चुप! तुम लोगों का रंड...-रोना सुनने न आए ये लोग! एक हुआँ-हुआँ करके चुप हुआ, दूसरा बोलने लगा। चुप सारे!”

जेलर साहब बीच में कहीं उठकर गए थे, लौट आए और बोले, “आप लोगों का आज का कुछ काम हुआ? हम लोगों को अपने दूसरे काम भी निपटाने हैं। आज का सेशन यहीं ख़त्म करना ठीक रहेगा। आप लोग कल दोपहर में आइएगा। आपको चाय पिलाते हैं, फिर मुझे कुछ ज़रूरी काम करने हैं। आइए आप लोग मेरे साथ।”

मैं उस समय बहुत कुछ कहना और सुनना चाह रही थी लेकिन विपरीत दिशा की ओर क़दम मोड़ कर मैं लोगों के पीछे चलते हुए कब खुले में सड़क पर आ कर गाड़ी में बैठी, याद नहीं।

बॉस ने कहा, “कल आख़िरी दिन है बस हमारे पास यह प्रोजेक्ट पास करवाने के लिए। कल जेलर से साइन करवाना पड़ेगा, वर्ना यह ठंडे बस्ते में चला जाएगा।”

डिप्रेशन, ADHD, चाइल्डहुड डिसऑर्डर—ये नाम मेरे ज़ेहन में ऊपर-नीचे हो रहे थे और मेरे क़दम आगे-पीछे। सामने बैठे बच्चों की आँखों में, चेहरे पर बहुत तरह की नाउम्मीदगी और उम्मीद का आना-जाना मेरी स्मृति में आज तक जस का तस बना हुआ है।

उस पहली सफ़ का रहस्य भी अनसुलझा ही था और मुझे वो तिलिस्म अधिक चमकते स्याहपन से भरा हुआ-सा लग रहा था। ऑफ़िस पहुँचकर उर्दू से हिंदी लिप्यंतरण किया; जो शय रोज़ रोमांच देती थी, आज वही काम तेज़ ऊब से लबरेज़ था। अक़्ल, आत्मा और पोर-पोर जेल के भीतर ही था। घर पहुँचकर मैं ख़ुद बच्चों से सवाल करती, ख़ुद को क़ैदी बनाकर जवाब देती रही और रात बीत गई।

•••

जारी...

अनुराधा शर्मा को और पढ़िए : इहबास में सोलह दिन | डिप्रेशन : नींद क्यूँ रात भर नहीं आती! | मेरी पहली जेल-यात्रा

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