‘कल्पना’ जैसा भोजपुरी में होना अब कल्पना ही है
पंकज प्रखर
21 जून 2026
वह इक्कीसवीं सदी की शुरुआत थी और वह बहुत उदास होकर गा रही थी—घरे छुट्टी लेके अउरी कुछ दिन रही ए बलम जी... और ठीक उसी वक़्त सैलून में बैठे लड़के यह तय कर रहे थे कि उन्हें बंबई नहीं, राजकोट भागकर जाना है। अनाम प्रेमियों के नाम फ़िल्मी गीतों से अपनी डायरियाँ भरती लड़कियाँ, बोर्ड की परीक्षाओं से बेख़बर स्वेटर पर गुलाब उगा रही थीं। वे चिट्ठियाँ छिपाने की जतन में, सरसों के समय में किसी शाहरुख़ के इंतिज़ार में सूखने लगी थीं। यह वक़्त था जब खैनी और नूर का गुल मुँह में दबाए लड़के, नदी में कूद जाते और मॉचो मान लिए जाते। उन दिनों स्टार से डायमंड बनता हुआ कोई गुड्डू रंगीला, हमारे आस्वाद को बिगाड़ रहा था। यह उस समय की बात है—जब पॉवर स्टार जैसी बेमतलब की बातों से लोगों को कोई मतलब नहीं था।
हमारे पास सिनेमा के नाम पर दूरदर्शन नहीं था, रविवार की आठबजिया रंगोली नहीं थी। रेडियो पर हमारे बाप-दादाओं का क़ब्ज़ा था। हमारे पास आवाज़ की दुनिया, लगभग नहीं के बराबर थी। ऐसे में संगीत हमें पान की दुकानों और सैलून में मिलता था, जहाँ पानवाले अदबदा के माधुरी पर और सैलून वाले अजय देवगन पर मेहरबान थे। उनके ही पोस्टरों से गुमटियाँ रंगीन होती थीं। गाहे-बगाहे, शादी-ब्याह में बैटरी से चलने वाले एम्पलिफ़ायर और चोंगे ही, हम तक प्रसिद्ध चलताऊ गाने पहुँचाया करते थे।
वह जीवन का पहला प्रसंग था; जब हम अपनी भाषा, कथ्य और शिल्प के पार—कुछ हो जाने का हुनर तलाश रहे थे। हमारे होंठों के ऊपर अभी-अभी रेख निकल रही थी। जवानी अपने आने के शोर में थी। ऐसे में हमारी जवान रातों के बीच, एक आवाज़ आकर हम पर पछुआ की तरह गिरती थी और हमारी छाती में गड़ने लगती थी।
बहुत जवान और ढंग से इंटरनेट उपलब्ध होने पर; कल्पना से ठीक तरह से परिचय तब हुआ, जब वह एक गाने में अपने नायक से चारपाई का ज़ोर चुभने की शिकायत कर रही थी। उससे डबल बेड पलंग के लिए मनुहार कर रही थी। दिन भर के बर्तन-चौका की थकन से हारी हुई स्त्रियों की बात, वह बहुत ऊँचे स्वर से कह देना चाहती थी। यह मनुहार हमें पसंद आने लगी थी। हम कल्पना को और सुनने की चाह करने लगे थे। अगली बार जब वह दिखी, तब मिलने आने वाले प्रेमी को राह बताने में मशग़ूल थी : दबे पाँव अईहs नज़रिया बचा के...
इसके ठीक बाद ही, एक गाने में वह नई झुलनी की छाँव में बालम को दुपहरी बिताने का आमंत्रण दे रही थी और यह सब कुछ हमारी जवान रातों के बीच घट रहा था।
पहली बार एक सस्ती और लोकप्रिय फ़िल्मी धुन की नक़्ल में—ना हमसे भंगिया पिसाई ए गनेस के पापा, हम नईहर जात बानी... गाते हुए उसकी आवाज़ जब दाख़िल हुई—चलताऊ भाषा में अगर इसे कहें, तो वह इससे रातों-रात स्टार बन गई। उसकी आवाज़ घर-घर में पसर गई। बहुत तीखी लगने वाली इस आवाज़ में ‘भाँग’ और ‘गनेस के पापा’ को हम अपनी बोली में इंजॉय कर उठे। सिलबट्टा पर मसाला पीसती औरतों को एक समवेत स्वर मिल गया था। महादेव को सीधे गनेस पुकारना उन्हें भी अच्छा लग रहा था। वह इसे अपनी परंपरा में देख रहे थे और उस वक़्त तक हम कल्पना के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे।
तब कल्पना हमारे मोहल्ले की ही आवाज़ का एक बोल्ड-वर्जन लगती थी; जिसे हम इंजॉय तो करना चाहते थे, लेकिन वर्जित होने की शर्त के साथ। गवनवाँ लेई जा राजा जी—एक शदीद इंतिज़ार की आवाज़ थी, जिसे वह बेलौस कहे दे रही थी।
भोजपुरी में आवाज़ की दुनिया; जब अपने लोकगीतों को डीजे और आर्केस्ट्रा पर चढ़ाने पर आमादा थी, उस समय कल्पना की आवाज़ एक नए क़िस्म का महोत्सव रच रही थी। उस फूहड़ होने के अंतहीन मुक़ाबले—जो कि अब तक चला आ रहा है—में कल्पना ने भी एक से एक फूहड़ गीत गाए और वह आर्केस्ट्रा में छा गई। नाच में बग़ैर उसकी आवाज़ के शामियाने का आयतन भरता ही नहीं था। उसके स्टेज-शो में मार होने लगती थी। उस समय तक वह बंबई में अपने गीतों की रिकॉर्डिंग में अस्त-व्यस्त; इन सबसे अपरिचित, बेख़बर थी। बाद के दिनों में स्टेज-शो में उसने पहली बार जाना कि वह भोजपुरियों के रोज़मर्रा की आवाज़ बन गई थी। स्टार बन गई थी। यह उस समय की बात है, जब सारे भोजपुरिया सिंगर भीतर हिरिस भरने का काम कर रहे थे।
हम धीरे-धीरे जवान हुए और हमने पगडंडियों से विदा ली। हमारी नियति में तब विदा लेना ही बचा रह गया था। लेकिन बावग भरे मौसम में पगडंडियों से विदा लेते हुए, एक आख़िरी कसक हममें बची रही कि कोई तो हमें रोक ले। एक धीमी-सी तमन्ना उठती हमारे दिल में कि कोई तो आवाज़ हो कि हम पलट के देखें, सोचें कि छुट्टी लेकर घर कुछ और दिन भी रहा जा सकता है। ऐसे में हमें कल्पना फिर याद आने लगती—घरे छुट्टी लेके अउरी कुछ दिन...
एक उम्र में आकर हमारी दुनिया बदल गई। साल बदल गया। धुन बदल गई। नाइंटीज़ हमें उबाऊ लगने लगा। सेवेंटीज़, सिक्सटीज़ से होते हुए, शास्त्रीय संगीत की दुनिया में हमने अपना ठौर ढूँढ़ लिया। लेकिन हम यहाँ से जब भी छूटते, गाँव के सीवान में घुसते हुए लगता कि कल्पना हमसे न छूटी। हम जब भी अपने जवान हुए दिनों की स्मृति में लौटते, हमें कल्पना हर जगह मिल जाती। इस बीच कल्पना के एक से एक गाने आ गए। एलबम से लेकर पार्श्वगायन तक, हर जगह वह छाई हुई थी।
दरअस्ल, कल्पना हमारी स्मृति में छनकती उस आवाज़ की तरह हैं, जहाँ नए-नए जवान हुओं दिनों की प्रेमोचित बेकली—अपने-अपने मानी तलाशती थी। प्रेमी को पुकारती हुई एक बेलौस आवाज़, नवोढ़ा कनिया के विरह-रातों की आर्त गुहार या छन से मुस्कराती हुई कोई मनुहार...
मई-जून की रातों में छत पर लेटे; दूर से ही कल्पना को सुनते हुए, उन दिनों ‘पीपर पात सरिस...’ मन डोल जाता था। डेहरी से छर्रऽ से छिंटाते हुए अनाज जैसी कल्पना की आवाज़, मन में बिखर जाती थी। वज़नदार ट्रांजिस्टर, तीन सेलिया रेडियो और वॉकमैन के बरअक्स एंप्लिफ़ायर और चोंगा-दिनों में वह कल्पना की आवाज़ ही थी, जो दूर खरिहानी में ओसौनी के दिनों में हवा के साथ हिलते हुए पहुँच जाती थी।
कल्पना ने जिस दौर में गाना शुरू किया, वह कैसेट्स का दौर था। उसके बाद सी.डी, डी.वी.डी, मेमोरी कार्ड और यूट्यूब, फिर स्पॉटिफ़ाई का दौर आ गया। लेकिन कल्पना हर जगह मौजूद रही। बहुत दिनों तक हम कल्पना को इस तरह ही देखते थे/रहे कि कल्पना फूहड़ गाने वाली एक आवाज़ है। जो आस्था हमें कल्पना की आवाज़ की ओर ले जाती, हम वहीं से विरक्त हो जाते। लेकिन क्या भोजपुरी में कल्पना सिर्फ़ एक फूहड़ सिंगर का नाम है!
मुझे कहने दीजिए कि भोजपुरी की बातचीत; बहुत हद तक हँसी-मज़ाक़ भी, लगभग विवाहेतर संबंधों की कल्पना से संचालित-रोमांचित होता रहा है। देवर-भाभी और जीजा-साली का मज़ाक़ कब विद्रूप हो उठता है, इसकी तस्दीक़ आपको अभी के, बिल्कुल अभी के गानों में मिल जाएगी। बहुत हद तक भोजपुरी गाने इससे दूर नहीं रहे हैं, स्वयं कल्पना भी इससे अछूती नहीं रहीं।
ग़ैर-भोजपुरीभाषी होने और औसत-अवसर-साहचर्य-व्यवहार ने उनसे कुछ सतही, फूहड़ गीत ज़रूर संभव करवा दिए, लेकिन कल्पना ऐसी नहीं थी। वह भोजपुरी ठीक से नहीं जानती थी, लेकिन फिर भी हमारे बीच की लगती थी। पुरबियों के पलायन, उनके दुःख, उनके उत्सव—उनकी आवाज़ बन गई थी।
तब हम यह नहीं जानते थे कि कुछ औसत, फूहड़ गीतों से इतर, कल्पना का जीवन अलग है और संगीत भी। हम यह भी नहीं जानते थे कि असम, गुवाहाटी के बारपेटा में जन्मी कल्पना; अपने लोकगायक पिता से कामरूपिया और गोलपोरिया लोकगीत सीखकर, हमारी आवाज़ की दुनिया में दाख़िल हुई है। अँग्रेज़ी साहित्य में स्नातक; भातखंडे से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में संगीत विशारद हुई कल्पना भोजपुरी न जानते हुए भी हमारी बात को गा रही है—हम यह भी नहीं जानते थे। लेकिन हम उसकी आवाज़ को जानते थे, जिसको सुनते ही मन डाँवाडोल हो जाता था। इसकी पुख़्तगी चालीस पार कर चुके किसी भी पुरबिहा से की जा सकती है, जो अभी भी बात-बात पर यह कहते हुए मिल जाएँगे—‘जा रे ज़माना...’
ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान को उस्ताद और भूपेन हाजरिका को अपनी प्रेरणा बताने वाली कल्पना, अपने फूहड़ गीतों को लेकर लगभग हर बार कन्नी काटने के मूड में ही नज़र आई हैं। इस श्लीलता-अश्लीलता के संबंध पर पूछने पर वह बताती हैं, “बेशक शुरुआती काम बुरा था, लेकिन मैं हर काम को करके नए के बारे में सोचती हूँ। मैं पिछली बातों को जोड़कर ख़ुद को विक्टिम नहीं बनाना चाहती।”
कल्पना ग़ैर-भोजपुरीभाषी है। उसे करियर में पाँव जमाना था। उस वक़्त भोजपुरी की वही डिमांड थी। वो बाहरी है...—जैसे तमाम की-वर्ड्स, उनके बारे में तैरते हुए दिखाई दे जाते हैं। यह हो भी सकता है और नहीं भी। इन पंक्तियों का लेखक यहाँ किसी भी तरह का फ़ैसला सुनाने जैसे वाक्यों से बचना चाह रहा है।
लेकिन गत कुछ वर्ष पहले कल्पना को लेकर जिस तरह का विवाद हुआ और उन्हें सिरे से नकार देने के मूड में भोजपुरी उन्नयन मंच के अग्रदूत जिस तरह आतुर थे—वह कल्पना की प्रतिभा के साथ न्याय नहीं है। इन तमाम विवादों के बावजूद भी, कल्पना उस दौर से लेकर अब तक अलग दीखती रही हैं। इसे अतिशयोक्ति न माना जाए तो यह कहा जा सकता है कि ‘कल्पना’ जैसा भोजपुरी में होना भी अब लगभग कल्पना ही है।
एक साक्षात्कार में कल्पना यह पूछने पर कि “आप एक प्रसिद्ध भोजपुरी गायक के रूप में जानी जाती हैं। आपने असमिया भाषा के बजाय भोजपुरी भाषा को क्यों चुना?” वह कह रही थीं : “सच तो यह है कि मैंने भोजपुरी को कभी नहीं चुना, बल्कि इसके उलट भोजपुरी ने मुझे चुना। भौगोलिक रूप से मैं पूर्वोत्तर भारत के असम से हूँ। एक असमिया महिला होने के नाते; अलग पीढ़ी से होने के कारण, मुझे अच्छा लगता है कि भोजपुरी मेरे लिए मेरे कम्फ़र्ट-ज़ोन से बाहर निकली। मेरा उत्तर प्रदेश या बिहार की मिट्टी से कोई संबंध नहीं है। आमतौर पर जब कोई किसी क्षेत्र में पहचान बनाता है तो वह किसी न किसी तरह से अपने विषय से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा होता है। लेकिन मेरा मामला अलग है। यहाँ मुझे ऐसा लगता है कि मुझे लीक से हटकर सोचने और दूसरों की संस्कृति, रीति-रिवाजों और जीवन-शैली को सही ढंग से समझने के लिए चुना गया है।”
कल्पना अपने बाद के दिनों में भोजपुरी एल्बम और पार्श्वगायन से बहुत हद तक दूर हो गईं। बहुत दिनों बाद उन्होंने स्टेज पर यह कहकर गाने से मना कर दिया कि वह फूहड़ गीतों को नहीं गाएँगी। उन दिनों वह भिखारी ठाकुर को लेकर अपने एल्बम ‘The Legacy of Bhikhari Thakur’ पर काम कर रही थीं। इसके बाद भी वह काफ़ी विवाद और विरोध के घेरे में रहीं। तीस अलग-अलग भाषा-बोलियों में गाने वाली कल्पना—अगर मैं यहाँ ग़लत नहीं हूँ—तो पुरबी गाने वाली संभवत: पहली महिला भी हैं। पूरबी जिसके लिए कहा गया कि यह कलेजे से गाई जाती है। इस क्रम में भरत शर्मा के बाद, बहुत से स्वर-साधकों ने उस कलेजे तक पहुँचना चाहा; लेकिन वह कल्पना ही रही हैं, जिसके यहाँ पूरबी संभव होती रही है—उस मरहले पर, जहाँ होनी चाहिए। कल्पना की आवाज़ सीधे तार सप्तक से शुरू होती और—‘सुनs परदेशी बालम...’—यहाँ पर आकर कलेजे पर हिलोर मारने लगती।
कल्पना को अगर समग्रता में देखें तो कल्पना होली, छठ, पुरबी, चैती, बिरहा, कजरी, सोहर, भिखारी ठाकुर, महेंद्र मिसिर और भोजपुरी फ़िल्मों में पार्श्वगायन से लेकर, हिंदी फ़िल्मों के पार्श्वगायन, रियल्टी शो तक हर जगह दीख जाएँगी।
भोजपुरी आज जब भाषा-अपव्यय के कार्य-व्यापार में अवकलित हो चुकी है। नृत्य और संगीत की जगह; देह की भोगवादी योजना का मूर्त स्वरूप, संगीत को विद्रूपता में तब्दील कर रहा है। ऐसे में एक पत्र-छाँव की तलाश जहाँ भी की जा सकती है; उनमें कल्पना भी हैं जिनके यहाँ बाक़ायदा सुस्ताया जा सकता है।
कहना न होगा कि भोजपुरी में लंबे समय तक सशक्त पार्श्वगायन में कल्पना का रंग भरपूर रहा है। भिखारी ठाकुर के ‘राधे-श्याम-बहार’ रासलीला को कल्पना ने जिस तरह गाया है, यह भी उसी तरह है कि अब शायद कोई इस स्तर को छू भी न सकेगा। कल्पना के बरअक्स इतनी सशक्त आवाज़, अब तक के आए आधुनिक गायकों में नहीं दिखती। विरह के गीतों में उनकी स्वर-साधना अपने उदात्त स्वरूप में रही है। लेकिन इधर भोजपुरी के पास अपने पुराने दिनों को उँगली पर गिनने का समय रह गया है मात्र।
रचनाकार जैसे नए का अभिज्ञान करता है, पाठकों-श्रोताओं का भी वैसे ही यह कार्य बनता है कि वे नए और बेहतर का अभिज्ञान करें। लेकिन यह कहना भी ज़रूरी जान पड़ता है कि ग़ैर-भोजपुरीभाषी जन भोजपुरी-लोक में प्रवेश करते ही फूहड़ता से टकरा जाते हैं और अपनी राय बना लेते हैं या काम का मसाला निकाल लेते हैं। इसके ज़िम्मेदार बहुत हद तक भोजपुरीभाषी ही हैं, जिनके डिमांड पर सप्लाई हो रही, पसर रही और लहलहा रही फूहड़ता—अब ग्लोबल हो रही है।
कल्पना के गाए बहुतेरे गानों के बारे में बात करना यहाँ मुमकिन नहीं है, लेकिन झनझनाती साँझ का दृश्य अगर आपको हुलकारता हो; तो आप महसूस करेंगे कि कल्पना की आवाज़ ऐसे ही उतरती है, जैसा कि एक गाने में वह ख़ुद कहती हैं―‘उतरल किरिनिया साँझ के, निमिया से धीरे-धीरे...’
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~ कल्पना पटवारी के गाए कुछ प्रतिनिधि गीत यहाँ सुन सकते हैं : क ल्प ना
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