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हत्यावादी जूनून के चक्रव्यूह में फँसा ‘कैनेडी’

वर्ष 2021 में देश के सबसे अमीर लोगों में से एक के घर के सामने एक गाड़ी पाई गई थी, जिसमें विस्फोटक सामग्री पाए जाने की ख़बर थी। उस घटना के बाद संबंधित राज्य के सत्ता समीकरणों में बहुतेरे बदलाव देखे गए थे। इसी घटना को आधार बनाकर हिंदी सिनेमा के चंद विश्वसनीय नामों में शुमार अनुराग कश्यप ने ‘कैनेडी’ नामक फ़िल्म बनाई है। इस फ़िल्म को देखने की महत्वपूर्ण वजह इसका साहसिक विषय चयन है। जिस समय में बेसिर-पैर की फ़िल्में बन रही हैं उस दौर में अनुराग कश्यप ‘कैनेडी’ बनाते हैं, जो कोरोना की महामारी के समय सत्ताधीशों के अपराध की कलई खोलती फ़िल्म है। फ़िल्म की कथा—हत्यारों, लूट-पाट करने वालों, अपहरण, वसूली आदि में लगे एक समूह की है जो अतीत में पुलिस अधिकारी रहे हैं। आधुनिक सत्ता-तंत्र के जंतर को समझने के लिए यह फ़िल्म आवश्यक है लेकिन बड़ी फ़िल्म होने की संभावना से चूक जाती है।

मुख्य किरदार ‘कैनेडी’ उर्फ़ ‘उदय शेट्टी’ हत्यावाद का हरकारा है। हत्यावादी जूनून में वह इस तरह ग़ाफ़िल है कि पहले हत्याएँ करता है और जब उन मृतकों की स्मृतियाँ कैनेडी की राह रोकती हैं, तब वह अपनी कल्पनाओं (मृतकों की अशरीरी उपस्थिति) पर गोली दाग़ देता है। क्या कोई अपराधबोध से बरी हो सकता है? क्या कैनेडी जैसे आपराधिक और विकृत मानसिकता के शिकार लोगों को अपराधबोध घेरता भी है? अनुराग कश्यप की नई फ़िल्म ‘कैनेडी’ ने अगर इस प्रश्न का जवाब दिया होता तो शायद हिंदी सिनेमा में युगीन हस्तक्षेप वाली फ़िल्म का उदाहरण बनती, लेकिन ऐसा नहीं हो पाता। ऐसे प्रश्नों से टकराने में गुरेज़ करने के कारण यह फ़िल्म कुछ अच्छे दृश्यों का कोलाज और नए क़िस्म के संगीत की फ़िल्म होकर रह जाती है।

कैनेडी के बेहतरीन दृश्यों में एक दृश्य है, जब कैनेडी उस आवाज़ को गोली मारता है जो गाहे-ब-गाहे उसे आगाह करती रहती है। यह चंदन की आवाज़ है। चंदन नाम के किरदार की हत्या वह पहले ही कर चुका होता है। उसका चेहरा निद्राहीन कैनेडी की आँखों के सामने नाचता रहता है। क्लाईमेक्स से ठीक पहले कैनेडी झूठे अपराधबोध से बरी होता है और उस कल्पना को गोली मार देता है। अगर नृशंस हत्या को मशीनी स्वरूप में स्वीकार किया जाए तब यह दृश्य मुनासिब लगेगा कि लोग अपने ख़यालों पर, अपनी कल्पनाओं पर, अपने भय पर गोलियाँ बरसा रहे हैं, किंतु हत्या का मशीनी स्वरुप कम से कम अभी तो अस्वीकार्य है। मनुष्य की चेतना ने अभी इतनी दग़ाबाज़ी नहीं की है, जिसमें मनुष्य कल्पनाओं की हत्या को जायज़ ठहराते फिरें। इसलिए रचना के स्तर पर बढ़िया दृश्य होते हुए भी यह एक खोखला दृश्य है। यह खोखलापन समूची फ़िल्म पर तारी है।

अनुराग कश्यप की फ़िल्मों में स्थितियाँ अब दुहराव पाने लगी हैं। ‘रमन राघव’ में विकी कौशल अभिनीत किरदार अनिद्रा का रोगी था और इस फ़िल्म में मुख्य किरदार ‘कैनेडी’ भी अनिद्रा का दोषी है। कैनेडी की अनिद्रा दरअस्ल मुंबई की उस ख्याति का रूपक है, जिसमें कहा जाता है कि वह शहर कभी नहीं सोता। हमेशा नींद से बाहर रहना ख्याति का विषय नहीं होता है। यह रोग है और इसे रोग की तरह ही पहचानना चाहिए। अनिद्रा के शिकार जन या शहर अपना आप भूल जाते हैं।

अनुराग कश्यप का ‘शक्ति’ पर यक़ीन करने का सिद्धांत है, जिसमें वह हमेशा अपराधियों में नायक ढूँढ़ते हैं, जैसे इस फ़िल्म के भीतर एक पुलिसवाले में नायकत्व ढूँढ़ा है। उसने भी इस फ़िल्म को बेहतरीन से अच्छी मात्र की श्रेणी में ला खड़ा किया है। एक वास्तविक घटना के इर्द-गिर्द कहानी के रखने के बावजूद जो फ़ेरबदल घटनाओं में किए हैं, वह भ्रामक और ग़ैरज़रूरी लगते हैं । वास्तविक घटनाओं पर फ़िल्मों को आधारित करते हुए कितनी छूट लेनी चाहिए, यह अलग बहस का विषय हो सकता है लेकिन ख़ास तथ्यों से छेड़-छाड़ नामुनासिब लगता है। जब वह घटना घटी थी, तब उस शहर के कमिश्नर और फ़िल्म में कमिश्नर के नाम-धर्म का फ़र्क़ बड़ा ही भ्रामक है। सच्ची घटना में पुलिस कमिश्नर बहुसंख्यक वर्ग से था, जबकि फ़िल्म में कमिश्नर को अल्पसंख्यक वर्ग से दिखाया गया है। आज का समय अगर ध्रुवीकृत न होता तब शायद इस बदलाव पर ध्यान नहीं जाता। अनुराग कश्यप भली भाँति आधुनिक समय की गति से परिचित हैं। वह उन चंद हस्तियों में हैं, जिन पर इस ध्रुवीकृत समय का प्रभाव पड़ा है।

अनुराग कश्यप इस साहसिक कथा के प्रति गंभीरता दिखाने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी फ़िल्मकारिता इन दिनों उस कुम्हार कलाकार की तरह हो गई है, जो भीतर पैठकर घड़ा बनाता है और जब घड़े की गर्दन बना लेता है, तब पाता है कि उसने अपने बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा है। पुलिस-व्यवस्था में नायकत्व ढूँढ़ने का उनका प्रयास इसी समझदारी का नतीजा लगता है।

कैनेडी फ़िल्म के मुख्य किरदारों में एक पुलिस कमिश्नर है, जिसमें अपने पद को हासिल करने के लिए 200 करोड़ रुपयों की रिश्वत दी है और वह धन भी उसने मासिक ब्याज़ पर उठाया है! रिश्वत देकर कमिश्नर नैतिकता और न्याय की किसी भी अवधारणा से विमुक्त हो चुका है। उसने अपराध के कारण बर्ख़ास्त और निलंबित पुलिसवालों की ऐसी टुकड़ी तैयार की है, जो पूरे शहर में उगाही, अपहरण और हत्याओं को अंजाम देते हैं। यह अपराध करते हुए वे सारे के सारे पुलिस से अपराधी बने लोग अपराधबोध की भावना से पूरी तरह मुक्त हैं। इनके ही बीच में कैनेडी है, जो पुलिसवाला रहा है और जिसके ज़मीर को जगाकर अनुराग कश्यप व्यवस्था में यक़ीन को जिलाना चाहते हैं। यह साम्य दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन रोहित शेट्टी भी यही करते रहे हैं। ‘सिंघम’, ‘सिंबा’, ‘सूर्यवंशी’ इत्यादि फ़िल्मों में पुलिस का नायकत्व और कैनेडी के भीतर का नायक एक सरीखे ही हैं। इस बिंदु पर दोनों एक विचार के लगते हैं। ज़ाहिर-सी बात है कि ट्रीटमेंट दोनों के अलग-विलग हैं।

व्यवस्था उनके प्रति कम हिंसक नहीं होती, जो उसके अंग होते हैं। कैनेडी का अपराध जब तक कमिश्नर की बनाई व्यवस्था के लिए है, तब तक कैनेडी कमिश्नर रशीद ख़ान के ख़ास सिपाहियों में शामिल है, लेकिन जब वह अपने प्रतिशोध के लिए जंग छेड़ता है तो वह व्यवस्था उसके ख़िलाफ़ हो जाती है। कमिश्नर की बनाई यह व्यवस्था अत्यंत निर्मम है। जिस प्रकार से पुलिस कमिश्नर चार्ली के प्रेमी को धमकाता है और उसकी हत्या कराता है, वह दृश्य आधुनिक व्यवस्था की दबंगई को समझने के लिए रुल-बुक की तरह है।

फ़िल्म की गति तेज़ है। सैद्धांतिक पहलुओं को दरकिनार करें तब राहत का एक पल नहीं है। अगर एक-एक दृश्य को अलग-अलग करके देखा जाए तो लगभग प्रत्येक दृश्य अर्थपूर्ण हैं। सलीम के भतीजे अकबर को गोली मारने और उससे पहले अकबर का अपनी प्रेमिका से संवाद का दृश्य झकझोर देता है। प्रेम के गहनतम पलों में प्रेमिका की कामनाएँ इन्हीं प्रश्नों से उठती गिरती हैं कि ‘पिछले झगड़े में ग़लती तुम्हारी थी न’, ‘मुझे मॉल ले चलोगे न’। अकबर को नहीं पता कि मृत्यु क़रीब आकर उसका इंतज़ार कर रही है, इसलिए हर प्रश्न के जवाब में अपने प्रेमातुर और व्याकुल संसार के रचयिता की तरह हामी भरता जाता है।

व्यवस्था के स्वरुप में परिवार की आलोचना अनुराग के पसंदीदा विषयों में एक है। ‘अगली’ फ़िल्म का दृश्य याद आता है, जिसमें माँ अपनी बेटी की फिरौती की रक़म दुगुनी कर लेती है ताकि अपने पिता से दुगुनी रक़म ले और आधी ही रक़म अपराधियों को सौंपे, आधी वह ख़ुद रख ले। ‘कैनेडी’ में अनुराग ने परिवार की आलोचना को नया आयाम दिया है। वे परिवार को इस तरह दिखाते हैं कि यहाँ जो ताक़तवर है, उसी का बोलबाला है।  ईमानदार विधायक के परिवार की हत्या का दृश्य रोंगटे खड़े करने वाला है। हत्यारा ‘कैनेडी’ जब विधायक की हत्या कर रहा होता है, तब विधायक का नाकारा और दिग्भ्रमित बेटा दृश्य में उपस्थित हो जाता है। वह अपने पिता द्वारा बाइक ख़रीदने के लिए पैसे न दिए जाने से इस हद तक नाराज़ है कि हत्यारे को हत्या जारी रखने का इशारा करता है। वह प्रफुल्लित मन से घर के भीतर जाता है और अपने पिता की हो रही हत्या की आड़ में अपनी माँ की हत्या कर देता है। बेटे के मन की तहों में घृणा और नफ़रत की पराकाष्ठा यह है कि जब बाहर से आया हत्यारा उस घटिया बेटे को माँ की हत्या करते हुए देखता है, तब वह बेटा हत्यारे को दिलासा देता है और इशारे से कहता है कि जाओ, मैं इन सारी हत्याओं की ज़िम्मेदारी लूँगा।

कैनेडी के परिवार को लेकर निर्देशक स्पष्ट नहीं है कि वह क्या दर्शाना चाहता है? वह हद दर्जे के अपराधों के कारण बर्ख़ास्त पुलिसवाले में ही नायकत्व ढूँढ़ता रहता है इसलिए उसके परिवार को लेकर भी अनुराग कठोर नज़रिया नहीं रख पाते। यह लोकप्रिय चलन वाले सिनेमा का ढंग है कि नायकों का परिवार भी नायक की तरह ही नैतिकताओं के दायरे में सिमटा रहता है।

राहुल भट्ट के साथ अनुराग कश्यप की केमिस्ट्री चल निकली है। ‘अगली’ और ‘दोबारा’ के बाद यह तीसरी फ़िल्म है, जिसमें दोनों ने साथ काम किया है। राहुल ने किरदार को बख़ूबी निभाया है। शुरुआती दृश्य में हरे सेब का छिलका उतारते हुए और पार्श्व में बजते संगीत की धमक के बीच राहुल भट्ट को देखकर लगता है कि हिंदी सिनेमा के परिदृश्य में एक सच्चे नायक का अवतरण हुआ है, लेकिन अंत तक वह इस स्वरुप का निर्वहन नहीं कर पाते। पुलिस कमिश्नर का किरदार छोड़कर सब जंचे हैं। पुलिस कमिश्नर का किरदार निभाने वाला अभिनेता ‘मोहित तकलकर’ अत्यंत मासूम दिखता है। उसके मुँह से गालियाँ बचकानी लगती हैं।

अनुराग अपनी फ़िल्मों में प्रयोगधर्मी संगीत का इस्तेमाल करते हैं। बहुत पहले उन्होंने बाधा समझने वाले भारतीय फ़िल्मों के संगीत को शक्ति का निमित्त बताया था। इस फ़िल्म में आमिर अज़ीज़ के गए कई गीत हैं। इन्हें ‘सब याद रखा जाएगा’ और ‘ये जामिया की लड़कियाँ’ से जानती थी और इस फ़िल्म में उनके गीत उन पुराने गीतों से भी बेहतर बन पड़े हैं।

फ़िल्म देखते हुए मैं बार-बार समझना चाहती थी कि मुख्य पात्र का बदला हुआ नाम कैनेडी ही क्यों है? कैनेडी नाम से अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनेडी का भान होता है। फ़िल्म ख़त्म करने के बाद जब फ़ुर्सत में इस प्रश्न का उत्तर इंटरनेट पर ढूँढ़ना चाहा तब जो हासिल हुआ वह सिर्फ़ नाम के लिए ही नहीं पूरी फ़िल्म की तर्क-पद्धति से मिलता जुलता लगा। यह फ़िल्म अनुराग ने दक्षिण के प्रसिद्ध सितारे ‘विक्रम’ को ध्यान में रख कर लिखी थी। विक्रम उनका स्क्रीन नाम है और उनका वास्तविक नाम कैनेडी जॉन विक्टर है। अंततोगत्वा विक्रम इस फ़िल्म के लिए तैयार नहीं हुए और राहुल भट्ट के साथ मिलकर अनुराग ने यह फ़िल्म बनाई, लेकिन नाम कैनेडी ही रहने दिया। फ़िल्म में राहुल भट्ट के किरदार का रूप विन्यास विक्रम से मिलता-जुलता है। इसका अर्थ यह हुआ कि उदय शेट्टी के मृत्यु की घोषणा के बाद कोई भी नाम देकर उसकी पहचान छुपाई जा सकती थी, लेकिन कैनेडी रखने से जो दुविधा पैदा होती है, वैसी दुविधा पूरी फ़िल्म में हावी है। यह दुविधा इस बात से संबंधित है कि उदय शेट्टी को कैनेडी कहकर पुकारना किसी प्रतीक की तरह है, लेकिन वास्तव में वहाँ प्रतीक जैसा कुछ नहीं। बेइंतिहाँ ख़ून-खराबे, अतिवाद से हत्यावाद का रास्ता लेते हुए अनुराग चूक जाते हैं और फ़िल्म मील का पत्थर होने की राह से भटकते हुए मात्र अच्छी होकर रह जाती है।

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