ईदगाह की सरज़मीं : प्रेमचंद और गोरखपुर
इक़बाल अशरफ़ सिमनानी
31 जुलाई 2026
जब कभी ईद आती है या ईद का ज़िक्र छिड़ता है, एक कहानी और उसके किरदार अपने-आप ज़ेहन में उतर आते हैं—प्रेमचंद की ‘ईदगाह’, हामिद और दादी अमीना। हामिद का चिमटा, उसकी क़ुर्बानी और दादी के प्रति उसका बेपनाह प्रेम। यह कहानी हिंदी साहित्य की लगभग हर पाठ्यपुस्तक में शामिल रही है और शायद ही कोई ऐसा हो जिसे हिंदी-उर्दू से मोहब्बत हो और उसने यह कहानी न पढ़ी हो।
पर क्या आप जानते हैं कि प्रेमचंद ने यह मशहूर कहानी कहाँ लिखी थी और इसे लिखने की प्रेरणा उन्हें कहाँ से मिली? इसका जवाब जानने के लिए पहले हमें प्रेमचंद और गोरखपुर के रिश्ते को समझना होगा। यह रिश्ता जितना गहरा है, उतना ही कम जाना-पहचाना भी।
पहला आगमन
आम तौर पर लोग यही जानते हैं कि प्रेमचंद ने अपनी ज़िंदगी के पाँच साल गोरखपुर में बतौर अध्यापक बिताए, लेकिन यह उनका गोरखपुर से पहला परिचय नहीं था।
बात साल 1892 की है। प्रेमचंद के पिता अजायब लाल डाक विभाग में कार्यरत थे और उनका तबादला अक्सर होता रहता था। उसी वर्ष वह तबादला पाकर गोरखपुर आए। उनके साथ प्रेमचंद और उनकी सौतेली माँ भी गोरखपुर आए। प्रेमचंद तब तक लमही में अपनी दादी के पास रहते थे, लेकिन इस बार वह पिता के साथ गोरखपुर आ गए। उस समय उनकी उम्र महज़ बारह साल थी और वह अभी उपन्यास-सम्राट नहीं, बल्कि धनपत राय थे।
शहर नया था, घर नया था। पिता काम के बोझ तले दबे रहते थे और बेटे के लिए वक़्त नहीं निकाल पाते थे। माँ का देहांत पहले ही हो चुका था और सौतेली माँ से भी उन्हें ममता नसीब न हुई। इसलिए प्रेमचंद का ज़्यादातर समय घर से बाहर, शहर की गलियों में गुज़रता। बाले मियाँ के मैदान में पतंग उड़ाना उनका प्रिय शग़ल था। सौतेली माँ के कड़वे व्यवहार की झलक आगे चलकर उनकी कई कहानियों में भी दिखाई देती है।
शहर के रेती चौराहे पर एक उर्दू बाज़ार हुआ करता था, जहाँ हिंदी-उर्दू की कई किताबों की दुकानें थीं। यहीं एक दुकानदार से उनकी दोस्ती हुई, जो उन्हें मुफ़्त में किताबें पढ़ने देता था। कुछ लोगों का कहना है कि प्रेमचंद वहाँ काम भी किया करते थे। बहरहाल, उसी दुकानदार की बदौलत उन्होंने अनेक उपन्यास पढ़ डाले। एक तंबाकू विक्रेता की दुकान पर वह रोज़ फ़ारसी की मशहूर दास्तान ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ सुनने जाया करते थे।
रावत पाठशाला और मिशन स्कूल से उन्होंने आठवीं तक की पढ़ाई यहीं पूरी की। मिशन स्कूल में उन्होंने अँग्रेज़ी सीखी और जॉर्ज रेनॉल्ड्स की आठ जिल्दों वाली रहस्यकथा ‘द मिस्ट्रीज़ ऑफ़ द कोर्ट ऑफ़ लंदन’ भी पढ़ डाली।
गोरखपुर प्रेमचंद की ज़िंदगी में इसलिए भी अहम है क्योंकि उनके साहित्यिक सफ़र की शुरुआत यहीं से हुई। उन्होंने अपनी पहली रचना भी यहीं लिखी। वह एक हास्य-नाटिका थी, जिसका नायक एक निचली जाति की लड़की से प्रेम करने लगता है और अंततः दुर्गति को प्राप्त होता है। दरअस्ल, यह रचना प्रेमचंद ने अपने एक रिश्ते के मामा पर व्यंग्य के रूप में लिखी थी, जो उन्हें फ़िक्शन पढ़ने और खेलने-कूदने पर डाँटा करते थे। बदला लेने का यह भी एक निराला तरीक़ा था।
साल 1896 में पिता का तबादला गोरखपुर से जमनिया हो गया और प्रेमचंद गोरखपुर छोड़कर आगे बढ़ गए। उन्हें कहाँ मालूम था कि एक दिन वह दोबारा इसी धरती पर लौटेंगे। यूँ गोरखपुर का पहला अध्याय यहीं समाप्त हुआ।
दूसरा अध्याय : अनगिनत कहानियों का दौर
1916 से पहले प्रेमचंद कई शहरों में तैनात रह चुके थे—बहराइच, प्रतापगढ़, कानपुर आदि। साल 1916 में पदोन्नति पाकर वह असिस्टेंट मास्टर बने और उनका तबादला गोरखपुर के नॉर्मल हाई स्कूल में हुआ।
इस बार गोरखपुर उनके लिए अजनबी नहीं था। यहाँ का बचपन अब भी कहीं भीतर ज़िंदा था। शायद इसीलिए, जब वह यहाँ लौटे, तो इस शहर ने उन्हें अपने सबसे गहरे और सबसे समृद्ध साहित्यिक दौर के लिए तैयार कर दिया।
नॉर्मल स्कूल के पास बेतियाहाता मोहल्ले में उन्होंने एक निकेतन (मकान) किराए पर लिया, जहाँ वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहने लगे। इसी मकान के ठीक पीछे गोरखपुर की सबसे बड़ी दरगाह—हज़रत मुबारक ख़ाँ शहीद रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह—स्थित थी और उसके ठीक बग़ल में वह ईदगाह, जिसका मंज़र आगे चलकर उनके ज़ेहन में हमेशा के लिए बस गया।
कहा जाता है कि प्रेमचंद रोज़ अपने मकान से निकलकर दरगाह के पास जा बैठते थे। एक ईद के दिन वह यहीं आए और घंटों तक ईदगाह का मंज़र देखते रहे। हज़ारों लोगों की भीड़, ऊँचे-ऊँचे झूले, रौनक़ से भरा बाज़ार, बच्चों की शरारतें और बड़ों का गले मिलना—सब कुछ जैसे उनकी आँखों में क़ैद हो गया। कई लोगों का मानना है कि हामिद कोई काल्पनिक किरदार नहीं था, बल्कि उसी दिन देखा गया एक हक़ीक़ी बच्चा था, जिसमें प्रेमचंद ने अपनी कल्पना के रंग भर दिए। यह कहानी उन्होंने गोरखपुर छोड़ने के बरसों बाद लिखी, लेकिन इसकी प्रेरणा यहीं की ईदगाह से मिली। ‘ईदगाह’ पहली बार साल 1933 में ‘चाँद’ पत्रिका में प्रकाशित हुई और जल्द ही मशहूर हो गई।
ईदगाह के घटनाक्रम के अलावा गोरखपुर में प्रेमचंद के साथ और क्या-क्या हुआ, यह भी जान लें।
यहीं उनकी दोस्ती पुस्तक-विक्रेता बुद्धि लाल से हुई। वह प्रेमचंद को उपन्यास पढ़ने के लिए देते थे और बदले में प्रेमचंद स्कूल में उनकी परीक्षा-सहायक पुस्तकें छात्रों को बेच दिया करते थे। यह एक अजीब, मगर दोस्ताना सौदा था। इसी दौर में उन्होंने नौकरी और लेखन के साथ-साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राइवेट छात्र के तौर पर बी.ए. की डिग्री हासिल की।
इसी गोरखपुर की सरज़मीं पर उनकी मुलाक़ात उर्दू के लोकप्रिय शायर फ़िराक़ गोरखपुरी से भी हुई।
गोरखपुर ने उन्हें सुख भी दिया और दुख भी। जिस दिन वह तबादला पाकर यहाँ पहुँचे, उसी दिन बेटे श्रीपतराय का जन्म हुआ। लेकिन इसी शहर में चेचक के कारण उनके एक पुत्र की मृत्यु भी हो गई। आगे चलकर उनके बेटे अमृतराय, जिनका जन्म बनारस में हुआ था, ने ‘क़लम का सिपाही’ लिखी, जिसे प्रेमचंद की सबसे प्रामाणिक जीवनी माना जाता है।
गोरखपुर में रची गई अन्य कृतियाँ
प्रेमचंद गोरखपुर में लगभग पाँच वर्ष रहे—अगस्त 1916 से फ़रवरी 1921 तक। यही वह दौर था, जब उन्होंने अपनी रचनाओं के बल पर हिंदी साहित्य में अपनी जगह मज़बूती से स्थापित कर ली।
यहीं रहते हुए उन्होंने अपना पहला बड़ा उपन्यास ‘सेवासदन’ लिखा। यह उपन्यास पहले उर्दू में ‘बाज़ार-ए-हुस्न’ के नाम से प्रकाशित हुआ था और बाद में साल 1919 में हिंदी में ‘सेवासदन’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। यह एक असंतुष्ट गृहिणी की कहानी है, जो परिस्थितिवश वेश्या बन जाती है और अंततः एक अनाथालय का संचालन करती है। इसे प्रेमचंद का पहला महत्त्वपूर्ण हिंदी उपन्यास माना जाता है।
‘ईदगाह’ के अलावा भी कई प्रसिद्ध कहानियाँ इसी दौर में लिखी गईं या उन्हें यहीं से प्रेरणा मिली। ‘नमक का दरोग़ा’ ऐसी ही एक कहानी है, जिसमें एक ईमानदार नमक-निरीक्षक रिश्वत के आगे झुकने से इनकार कर देता है। लोकप्रिय मान्यता है कि बेतियाहाता स्थित उनके मकान से कुछ ही दूरी पर बहने वाली राप्ती नदी—जो गोरखपुर की मुख्य नदी है—के किनारे स्थित राजघाट पर बैठकर उन्हें इस कहानी की प्रेरणा मिली।
इसके अलावा इस दौर की प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं :
• सप्त सरोज (जून 1917)—उनका पहला हिंदी कहानी-संग्रह, जो गोरखपुर-प्रवास के दौरान प्रकाशित हुआ।
• पंच परमेश्वर (1916)—दोस्ती, न्याय और पंचायत पर आधारित यह कहानी गोरखपुर दौर की शुरुआती और सबसे चर्चित हिंदी कहानियों में गिनी जाती है।
• प्रेम पचीसी (1920)—पच्चीस कहानियों का यह संग्रह भी इसी दौर की देन है।
गोरखपुर से विदाई
8 फ़रवरी 1921 को महात्मा गांधी असहयोग आंदोलन के सिलसिले में गोरखपुर आए और मशहूर बाले मियाँ के मैदान में अपना ऐतिहासिक भाषण दिया। लगभग एक से ढाई लाख लोगों की भीड़ उन्हें सुनने पहुँची थी। प्रेमचंद भी उनमें शामिल थे। जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन के समर्थन में सरकारी नौकरियाँ छोड़ने का आह्वान किया, तो प्रेमचंद उनकी इस बात से गहरे प्रभावित हुए।
घर लौटकर उन्होंने पत्नी और बच्चों के साथ विचार-विमर्श किया और कुछ ही दिनों बाद सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया। इसके बाद उन्होंने गोरखपुर को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। यूँ गोरखपुर से उनका रिश्ता एक नए मोड़ पर आकर समाप्त हुआ।
गोरखपुर ने कैसे सहेजीं ये यादें?
प्रेमचंद के जाने के बाद बेतियाहाता वाला वह मकान धीरे-धीरे जर्जर होता गया। एक समय बिल्डरों की नज़र उस पर पड़ी और वहाँ शॉपिंग मॉल बनाने की योजनाएँ भी बनने लगीं।
साल 1987 में मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के कार्यकाल में उस परिसर को ‘मुंशी प्रेमचंद पार्क’ के रूप में विकसित किया गया और वहाँ प्रेमचंद की आदमक़द प्रतिमा स्थापित की गई।
बाद में गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने ‘प्रेमचंद साहित्य एवं शोध संस्थान’ की स्थापना की। वर्षों के प्रयास के बाद बेतियाहाता वाला वही मकान संस्थान को सौंप दिया गया। मरम्मत के दौरान पत्नी शिवरानी देवी द्वारा बनवाई गई प्रेमचंद की एक छोटी प्रतिमा मिली, जिसे साल 2014 में पार्क के मुख्य द्वार पर स्थापित किया गया।
आज इस संस्थान में एक समृद्ध पुस्तकालय है और ‘कर्मभूमि’ नामक पत्रिका नियमित रूप से प्रकाशित होती है। गोरखपुर की आधिकारिक वेबसाइट भी आज गर्व से लिखती है—“Gorakhpur has been the birthplace of Firaq Gorakhpuri, workplace of writer Munshi Premchand, and mystic poet Kabir Das.”
अंत में
गोरखपुर एक ऐसा शहर है, जिसने प्रेमचंद को दो बार पाया और दोनों बार उन्हें कुछ अमूल्य दिया।
पहली बार—एक बच्चे को, जिसने यहीं पहली बार क़लम उठाई।
दूसरी बार—एक लेखक को, जिसने यहीं अपनी सबसे गहरी और कालजयी रचनाओं की कल्पना की, उन्हें आकार दिया और हिंदी साहित्य को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।
उस ईदगाह में आज भी ईद की नमाज़ अदा की जाती है। मेला लगता है, बाज़ार सजता है और बच्चे-बूढ़े, सब वहाँ उमड़ पड़ते हैं। मुझे लगता है कि इसी दिलफ़रेब मंज़र को कहीं दूर से प्रेमचंद अब भी देखते होंगे, मुस्कुराते होंगे—किसी हामिद की तलाश में, किसी अमीना की खोज में।
ख़त्म-शुद।
एक गोरखपुरिया के क़लम से।
•••
प्रेमचंद पर अन्य बेला यहाँ पढ़िए : अपने-अपने झोले : अपने-अपने प्रेमचंद | मास्टर की अरथी नहीं थी, आशिक़ का जनाज़ा था
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट