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दोस्तों को कभी न भेजी गई एक चिट्ठी

क़रीब-क़रीब सात बजे शाम का समय रहा होगा। मैं यूँ ही फ़ोन हाथ में लिए घर की छत पर बैठा था। अचानक से फ़ोन बजा, वीडियो कॉल वह भी। ‘स्कूल फ़्रेंड’ के नाम से एक व्हाट्सएप्प ग्रुप। मैंने कॉल रिसीव किया तो देखा, कई सालों से जिनसे न मिलना हुआ और न ही बात हुई, लगभग वे सारे दोस्त इकट्ठे थे। बातें वही, जो आज से अट्ठारह साल पहले हम किया करते थे। मसलन ‘वह देखो फ़लाँ का लड़का’, ‘क्या हाल है भाई, ज़िंदा है!’ आदि-आदि। पहले तो सबको देख के अचंभित हुआ। दुआ-सलाम हुआ, हाल-समाचार लिया और कुछ देर बात हुई। फिर मैं सोचने लगा—मैं वहीं अट्ठारह साल पीछे चला गया। फिर मन में आया कि ये तो आज भी वही बालकपन में हैं। मैंने दुबारा फ़ोन मिलाया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला—शायद सब अपने काम में व्यस्त थे। तो सोचा कि एक चिट्ठी लिखूँ। यह पत्र उन्हीं दोस्तों और उस समय के नाम है—वह समय जो ‘चिट्ठी-पत्री’ का था, जहाँ रिश्तों की डोर काग़ज़ के टुकड़ों और स्याही से बँधी होती थी।

दोस्तो,

कितने साल बीत गए हमें अलग-अलग दुनिया में होते हुए और हम सब अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए, लेकिन उन दिनों की याद और हमारी बेवक़ूफ़ियाँ—आज भी हमें ज़िंदा किए हुए है। वैसे तो हम सब व्यस्त हैं अपने-अपने काम में, लेकिन फिर भी दुनिया में कितना भी आगे बढ़ जाओ, वह पुराना पागलपन और हमारी यारी कभी पुरानी नहीं होती। आज बहुत दिनों बाद तुम सब को वीडियो कॉल पर देखा। तुम्हारी बातों ने पुरानी यादें फिर से ताज़ा कर दी।

स्कूल और गाँव की दोस्ती में बीता समय और उस बीते वक़्त को याद करते हुए जिया हुए पल—ज़िंदगी के सबसे अनमोल क्षण होते हैं। उन दिनों जो संबंध बने, वह ज़रूरत और दिखावे के नहीं थे; उसमें पहाड़ों जैसी ही सादगी और शुद्धता थी। शाम को ढलते सूरज के साथ गाँव के नुक्कड़ पर की गई ना जाने कितनी बातें अब भी स्मृति में कौंधती हैं।

पहाड़ में स्कूल जाना हमारे लिए सिर्फ़ पढ़ने-लिखने के लिए जाना नहीं था, बल्कि वह हमारे लिए हर रोज़ का एक एडवेंचर होता था। मीलों दूर पैदल चलकर स्कूल जाना, चढ़ाई चढ़ते हुए थकना—हम इसमें अभ्यस्त थे, यह हमारे रोज़ का काम था। स्कूली दिनों का जीवन अब नहीं रहा, दोस्त दुनिया के अलग-अलग कोनों में चले गए, लेकिन पीछे लौटने पर उनके साथ बिताए वही दिन आज भी सबसे सुंदर मालूम होते हैं।

वे कोमल स्मृतियाँ, पहाड़ों का सरल जीवन और सच्ची दोस्ती—आज की भाग-दौड़ में अपनी इस पहचान की ओर लौटने का बहुत मन करता है। हम पहाड़ी के रहवासी हैं और हमारा दिल हमेशा ऊँचे-बर्फ़ीले पहाड़ों की ठंडी हवाओं और कल-कल के स्वर के साथ आगे बढ़ती नदियों के लिए धड़कता है। शहर की अंधी रोशनी में जब भी थककर आँखें बंद होती है, तो मन सीधे देवभूमि की उन ख़ूबसूरत वादियों में पहुँच जाता है, जहाँ मेरा बचपन बीता था।

मेरे यारो, हमारे बेफ़िक्र बचपन के दिनों के बारे में क्या कहूँ और क्या न कहूँ!

‘रोला-गधेरूँ धारा-पंदेरूँ कुँ ठंडूँ मिट्ठू पाणी’ में क्या ठंडक थी। वार-त्योहारों जैसे होली, दीवाली, फुलसगरांद (फूलदेई) में सभी के घरों में जाकर उत्सव मनाना—वाह, वे भी क्या दिन थे! फुलसगरांद में हम गाँव के हर घर की देहरी (चौखट) पर फूल बिखेरते थे और ‘फूल देई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार’ गाकर घर की ख़ुशहाली की कामना करते थे। तुम सबको याद होगा कि बदले में दादी-ताई-चाची हमें गुड़, चावल और पैसे देती थीं। घी संक्रांति या दीवाली (इगास) बड़े धूमधाम से मनाते थे। घरों को सजाते थे, विशेष पकवान बनाते थे और भैलो (चीड़ की लकड़ी की मशाल) जलाकर भैलो नृत्य करते थे।

शादी-ब्याह में बिना बुलाए पूरे गाँव का खाना बनाने और परोसने में जुट जाना ही असली भाईचारा था। यहाँ शहरों में ऐसा कुछ नहीं करने को मिलता है। वहाँ हमने कभी महसूस नहीं किया कि कोई नौकर है या कोई मालिक, पूरा गाँव हमारा घर था। गाँव की बारात जाने की मासूम ज़िद और वह सब करने की होड़ कि ‘मैं सबसे ज़्यादा मेहनत करूँगा, ताकि बारात जाने वाली बस में बैठने का मौक़ा मिले।’ उस बारात में जाने की ख़ुशी के आगे दिनभर की थकान कुछ भी नहीं लगती थी। तुम्हें याद होगा वो मेला, जिसका इंतज़ार हम साल भर करते थे। साल में एक बार लगने वाले इस कौथिग (मेले) का इंतज़ार और उसी दिन नए कपड़े पहनने की ख़ुशी—आज के दौर में यह ढूँढ़े नहीं मिलती, ऑनलाइन दौर में तुरत नए कपड़े ख़रीदे जाते हैं, पर वह उत्साह ग़ायब है।

हमारे पहाड़ों की पहचान (सीढ़ीनुमा खेत) सुबह से शाम तक उन सीढ़ीनुमा खेतों में पसीना बहाना और रात को जंगली जानवरों से फ़सल बचाने के लिए ‘मचान’ पर बैठकर रखवाली (चौकीदारी) करना है। ये काम पूरे गाँव की साझी ज़िम्मेदारी होती थी। इतने सालों में पलायन बढ़ा है। बदलते दौर ने हमारे गाँव को भी बदल दिया है। हम जब किशोर थे तो गाँव में ही रहने के सपने देखते थे। लेकिन आज के युवा—रोज़गार, शिक्षा और सुख-सुविधाओं की तलाश में पहाड़ों से पलायन कर रहे हैं। यह ग़लत न हो, लेकिन इसने हमारे पहाड़ों को सूना कर दिया है, हमारी परंपराओं को ठेस पहुँचाई है। गाँव के गाँव ख़ाली हो रहे हैं, जब लोग ही नहीं रहे—तो वह सामूहिक चूल्हा, वह शादियों की रौनक और वह खेतों की रखवाली भी धीरे-धीरे ख़त्म हो गई है।

आजकल गाँवों में शादियाँ भी कम हो रही है। लोग शहर आकर वहाँ के ‘मैरिज हॉल’ में शादियाँ करने लगे हैं, जहाँ कैटरिंग वाले खाना परोसते हैं। वह अपनत्व और वह मेहनत अब कहीं पीछे छूट गई है। दोस्तो, हमने आधुनिकता की दौड़ में बहुत कुछ पा लिया है, लेकिन जो खोया है, वह दुर्लभ है।

कैसे बताऊँ कि कितना कुछ याद आता है, जब-जब कुछ देर के लिए पीछे मुड़कर देखता हूँ—स्कूल से आने के बाद, धारा पंदेरा से पानी लाना। आड़ू और माल्टा के बाग़ों में वक़्त बिताना और पेड़ों पर चढ़कर फल तोड़ना। बरसात और धुँध, बादलों का वादियों में उतरना और बारिश के मौसम में भीगते हुए स्कूल जाना। ग्रामीण जीवन, अपनी संस्कृति, कम साधनों में ख़ुश रहना, दूर-दराज़ की जगहों तक पैदल चलकर जाना और मेहनत करना। दादा-दादी, लोक-कथाएँ और त्योहारों पर पारंपरिक गीत-संगीत का आनंद, खेतों की पगडंडियों पर दौड़ लगाना, जेठ (ज्येष्ठ) के महीने का प्रचंड ताप और तीख़ी धूप में रोला की ढाँडियो (नदियों) में नहाना, अलग-अलग बाख्लियों (पहाड़ों में दूर-दूर घर होते हैं तो उन्हें बाख्लियाँ कहा जाता है) से अलग-अलग टीम बनाकर लड़ना-झगड़ना, जंगलों से काफल और हिसालू (पहाड़ी फल) तोड़ना, बुरांश के फूलों को तोड़ते हुए पेड़ों और पहाड़ों के बीच छुपन-छुपाई खेलना। घने पहाड़ों की वह सुबह जब चीड़ और देवदार के जंगलों से होकर आने वाली ठंडी हवाएँ सीधे रूह को छू जाती थीं। पत्थरों के बीच से कल-कल करती बहती नदियाँ का साफ़-ठंड़ा पानी, जंगलों की ख़ामोशी जिसमें एक अजीब-सा सुकून होता था, सब कुछ बहुत याद आता है।

दोस्तो, सच वो भी क्या दिन थे! जब ख़ुद के इंतिहान की तैयारी हो या न हो, लेकिन दोस्त को प्रेम कहानी में पास कराने के लिए हम सब अपनी जान लगा देते थे। हमउम्र लड़कियों की क्लास ख़त्म होने का इंतज़ार करना और दोस्तों के प्रेम पत्रों को सही ठिकाने पर पहुँचाना, हमारे लिए मिशन इम्पॉसिबल से कम नहीं था। वीडियो कॉल में तुम सब एक-दूसरे जिस तरह से स्कूल के दिनों वाले नाम से पुकार रहे थे—ये सब सुनकर लगा ही नहीं कि उस ज़िंदगी को बीते हुए बीस साल हो गए हैं, लगा जैसे अभी कल ही तो मिले थे। कल ही तो स्कूल से लौटते हुए, नदी में सब नहाकर घर गए थे।

दोस्तो, इस ज़माने को छोड़ो, काम-धाम छोड़ो, सारे पुराने यार एक साथ बैठते हैं, ख़ूब सारी बातें करते हैं। ज़िंदगी रहेगी, नहीं रहेगी; हम रहेंगे, नहीं रहेंगे—यादें हमेशा रहेंगी।

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