बिंदुघाटी 2.0 : ‘देख अपने लीडरों को शोक मत कर... देश ये लीडर नहीं’
अखिलेश सिंह
02 अगस्त 2026
• ‘बिंदुघाटीकार’ बहुत-सी बातों के समाधान के लिए पुराने कवियों, शास्त्र-रचयिताओं और विचारकों के पास लौटता है। ये लोग और इनकी रचनाएँ अपने-अपने समय और उसके प्रसंगों से गहरे संबद्ध हैं। फिर भी इनकी कालजयिता का रहस्य यही है कि इतिहास की लंबी यात्रा में यह रचनाशीलता और वैचारिकता बार-बार नए संदर्भों के साथ हमारे सामने उपस्थित हो जाती है। हर युग अपने प्रश्नों के साथ इन्हें फिर से पढ़ता है और इनमें अपने समय के अर्थ खोज लेता है। आगे के बिंदुओं में समकालीन संदर्भों में ऐसी ही कुछ प्रतिध्वनियों और संभावनाओं पर विचार करेंगे...
• महात्मा गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ में स्वराज की एक अनूठी कुंजी दी है। वह सरकार और व्यक्ति के बीच संबंध की बात समझाते हैं : “सरकार यह नहीं कहती कि तुम्हें अमुक कार्य करना ही है, बल्कि वह कहती है कि तुम ऐसा नहीं करोगे तो हम तुम्हें दंडित करेंगे। हम इतने पतित या भ्रमित हो गए हैं कि क़ानून के पालन को ही हमने अपना धर्म और परम कर्त्तव्य मान लिया है! अगर मनुष्य केवल यह समझ ले कि अन्यायपूर्ण क़ानूनों को मानना कायराना है तो कोई भी तानाशाही उसे अपना ग़ुलाम नहीं बना पाएगी... और यही स्वशासन की कुंजी है।”
महात्मा गांधी के उक्त कथन को अति आदर्शमूलक कहते हुए भी क्या कोई इसे नकार सकता है? क्या इस आदर्श को हमेशा ध्यान में नहीं रखना चाहिए? इस बात का सत्व हमें समझना होगा। यह बात हमें अराजक होने को नहीं कह रही है, बल्कि सरकार को अधिक जवाबदेह बनाकर एक बेहतर राज-व्यवस्था बनाए रखने को कह रही हैं। इसके अनुसार स्वराज और प्रतिरोध पर्याय बन जाते हैं। देश के लोग ही किसी क़ानून के अंतिम ऑडिटर हैं, क्योंकि वही उससे शासित-प्रशासित होते हैं। क़ानूनों की माँग अथवा रद्दीकरण जनता की इच्छा पर होता है।
• शासक को सिर्फ़ अपने मन की बात नहीं करनी चाहिए या फिर उसे अपना मन इतना बड़ा करना चाहिए कि जन-मन ही उसका मन हो जाए। उसे सिर्फ़ अपनी दृष्टि से निर्धारित बातों को जनता का सुख नहीं मानना चाहिए। जनता के सुख के विविध पहलू होते हैं, शासक को उन सब पर ध्यान देना चाहिए। विविधता के सम्मान से ही उसे वैसी दृष्टि मिलेगी। चुनावी एजेंडे पर मत हासिल करके सिर्फ़ उसे ही लागू करने में समग्र जनता का सुख नहीं होता। समग्रता का ध्यान रख पाने से ही शासक गालियों, शापों और पापों से बच सकता है। ‘अर्थशास्त्र’ के पहले अधिकरण में कहा भी गया है : “प्रजा सुखे सुखं राज्ञ: प्रजानाम तु हिते हितं...” अर्थात् : प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है, प्रजा के हित में ही उसे अपना हित दिखना चाहिए। जो स्वयं को प्रिय लगे उसमें राजा का हित नहीं है, उसका हित तो प्रजा को जो प्रिय लगे उसमें है।
• अपने मंत्रियों को भी उचित दंड देना और गड़बड़ी करने पर उनका उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था में बेहद ज़रूरी है। ऐसा न होने पर न तो व्यवस्था रहती है और न ही लोगों में व्यवस्था के प्रति सम्मान।
ऋषि कामंदक ‘महाभारत’ में कहते हैं : “जब राजा दुष्टों और दुराचारियों को क़ाबू में रखकर शासन नहीं करता तो उसकी प्रजा ऐसी उद्विग्न हो जाया करती है, जैसे उसे अपने घर में सर्प के साथ रहना पड़ रहा हो।” [दुराचारान यद राजा प्रदुष्टान न नियच्छति...]
• पुलिस हो या अन्य कोई कर्मचारी, उसके द्वारा जनता पर किए गए अत्याचार का बुरा परिणाम शासक और उसकी व्यवस्था को भोगना पड़ता है। पुलिस, मंत्री, अन्य कर्मचारी व्यवस्था के ही अंग हैं और उनका अच्छा या बुरा व्यवहार व्यवस्था के मुखिया का ही व्यवहार है। ‘शांतिपर्व’ में महाभारतकार के अनुसार : “जब बहुत से राज्य-कर्मचारी देश में अन्यायपूर्ण बर्ताव करने लगते हैं तो वह महान् पाप राजा को ही लगता है।”
• लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासक को ट्रोलोत्पत्ति का कारण नहीं बनना चाहिए। उसे मूढ़ता का प्रचार नहीं करना चाहिए और सही अर्थों में कमज़ोरों का रक्षक होना चाहिए। उन्हें सबल बनाना चाहिए। दबे-कुचले लोगों का और अधिक दबे-कुचले होते जाना स्वयं शासक की सेहत के लिए अच्छा नहीं होता। उसे विषम स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, इतिहास गवाह है कि ऐसे शासकों के जीवन को भी ख़तरा रहा आया है।
महाभारतकार कहते हैं : “यदि हताहत और तिरस्कृत होने वाला दुर्बल व्यक्ति राजा को अपने रक्षक के रूप में नहीं पाता, तो दैव का दिया हुआ दंड राजा को मार डालता है।”
• लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासक का धर्म है—लोकतांत्रिक आदर्शों का ईमानदारी से पालन। अपने देश में स्वतंत्रता-समानता-बंधुता और सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक न्याय को सुनिश्चित करना ही लोकतांत्रिक शासक का धर्म है। भ्रष्टाचार को न रोक पाना, पारदर्शिता को न सुनिश्चित करना ही लोकतंत्र में शासक के लिए अधर्म है। इससे जनता के अधिकारों का नाश होता है और तकलीफ़ें बढ़ती हैं। सतत कष्ट सह रही जनता उसके निवारण के लिए शासक को भी तकलीफ़ दे सकती है।
‘शांतिपर्व’ में ऋषि वामदेव राजा वसुमना से कहते हैं : “जो राजा दुष्ट एवं पापिष्ठ मंत्रियों की सहायता से धर्म को हानि पहुँचाता है, वह सब लोगों के लिए वध्य हो जाता है और अपने परिवार समेत संकट में पड़ जाता है...” यानी प्रजा उसकी हत्या भी कर सकती है।
• किंग लियर चिरकुट फ़ैसले करता था और झूठे अभिमान में अकड़ा रहता था। यहाँ तक कि इसी अभिमान के चलते वह अपनी सबसे ईमानदार बेटी कॉर्डेलिया को बेदख़ल कर देता है। उसकी इस सनक पर उसका बेहद वफ़ादार केंट ऑफ़ अर्ल ने उससे कहता है : “किल दाई फिजिशियन एंड द फ़ी बेस्टो अपॉन द फ़ाउल डिजीज़...” अर्थात् : अपने चिकित्सक को मार दो और इस तरह बची हुई फ़ीस को अपनी बीमारी बढ़ाने में ही लगा दो।
किंग लियर तो सोलहवीं सदी में लिखे गए नाटक में पागल होकर अंततः मर गया। सनक भरे निर्णय और अतिचापलूसपसंद होना—उसके दो दुर्गुण थे। आज के लोकतांत्रिक प्रहसनों में उसका भूत अमेरिका से लेकर भारत तक के कई शासकों में देखा जा सकता है। संभवतः इन्हें चेताने वाले सच्चे वफ़ादार भी इनके पास नहीं हैं। इस मामले में ये अधिक अभागे हैं। क्या इनके अंत अधिक बुरे होंगे!
• “मुखिआ मुखु सो चाहिए खान पान कहूँ एक।
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित विवेक।।”
— अयोध्याकांड, रामचरितमानस
राजधर्म के बारे में समझाते हुए भरत से राम कहते हैं : “मुखिया को मुख के समान होना चाहिए जो खाने के लिए तो अकेला होते हुए भी [यानी अकेले श्रम करते हुए भी] सभी अंगों के विवेकपूर्ण पालन-पोषण में सहायक बनता है।
मुखिया को चाहिए कि वह लोगों की तकलीफ़ों को समझे। किसी को वंचित न रहने दे। भ्रष्टाचार ही शासन-व्यवस्था में कुपोषण का सबसे बड़ा कारण है, वह उसे दूर करे। वह हरेक अंग यानी बिल्कुल अंतिम जन को लेकर भी संवेदनशील रहे। मुखिया को ऐसा मुख नहीं होना चाहिए कि वह बोलता ही रहे, बोलता ही रहे, बोलता ही रहे... मुख का काम बोलने से अधिक समस्त अंगों के पोषण में सहायक बनने का है।
• ‘नीतिशतकम्’ में भर्तृहरि कहते हैं कि दुष्ट मंत्री के होने से राजा का विनाश हो जाता है : “दौर्मंत्र्या न्नृपतिर्विनश्यति...”
भर्तृहरि से शिक्षा लेते हुए आज भी शासक को चाहिए कि वह ऐसे दुष्ट मंत्रियों को मंत्रिमंडल से निकालने में देर न करे जो अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करने सक्षम नहीं हैं। ऐसा मंत्री उसकी अलोकप्रियता का कारण बनता है। उसे जनता की नज़र में पतित और अहंकारी साबित करवाता है। शासक को समझना चाहिए कि उसकी सत्ता जनता से होती है, मंत्री से नहीं।
• शासन कोई भी करे, व्यवस्था कैसी भी हो; बस उसमें दो बातें होनी ज़रूरी हैं :
1. सबकी बुनियादी ज़रूरतें बराबर पूरी हों।
2. उसमें छोटे-बड़े का भेद न हो यानी जातिभेद और वर्ग-विभाजन न हो... मनुष्य को मनुष्य समझा जाए।
क्या ये बातें असंभव लगती हैं? अगर ये असंभव हैं तो एक पूर्ण लोकतांत्रिक सरकार भी असंभव है। व्यवस्था को लोकतांत्रिक कहे जाने अधिकार तभी है, जब वह इस दिशा पूरी ईमानदारी से चल रही हो। संत रैदास का यही राज्यादर्श है :
“ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिलै सबन को अन्न।
छोट बड़ो सभ सम बसै रैदास रहे प्रसन्न।।”
• महाभारतकार ने तो कई स्थितियों में अधिक सख़्त रवैया अपनाते हुए राजा के ख़िलाफ़ बेहद भीषण बातें लिख दी हैं, जैसे कि प्रजा की हिंसक कार्रवाई... लेकिन बिंदुघाटीकार गांधी के प्रशिक्षण से गुज़रे देश में कई पीढ़ियों बाद आया, इसीलिए वह अपने समय के बुरे से बुरे शासक के ख़िलाफ़ भी हिंसक कार्रवाई को उचित नहीं मानता। उसकी मुराद तो इतनी भर है कि लोग विवेकसम्मत ढंग से सामूहिक विरोध-अभिव्यक्ति करें और शासन को जवाबदेह बनाएँ, न बने तो हटा दें। इसीलिए शासक को चाहिए कि वह अव्वल तो अच्छा शासक बने, लेकिन अगर आदत या संस्कारों से मजबूर होकर वह ऐसा न कर पाए तो लोगों की इस विवेकसम्मत एकजुटता से डरे। आख़िर लोगों से ही संविधान है, शासन है, शासक है।
• इस स्तंभ में शासक-क़ानून-जनता के संबंधों पर बात करने की प्रेरणा हाल ही में सफल हुए कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से मिली, इस संदर्भ में कुछ अन्य पहलुओं पर बात करना भी ज़रूरी है... कॉकरोच आंदोलन के आख़िरी हफ्ते में विजुअल-विश्व और उसके रील-राज्य में एक बड़ी परिघटना सामने आई। इस दौरान इस देश के प्रभु-पेशेवरों, जैसे : एक्टर्स, क्रिकेटर्स, प्रवाचकों, नेताओं, फ़ूड-ब्लॉगरों से संबंधित रीलें मेरी आँखों में नहीं घुसीं! ऐसा लगा कि जैसे इनके चपेट में पड़कर मिली अचेत-हँसोड़ी नामक बीमारी से मैं सचमुच मुक्त हो गया हूँ। देश में आमजन भी कुछ हैं। फ़ूडी, लेज़ी, बिंज, न्यूट्रीशन, लर्निंग जैसे शब्द कान में नहीं पड़े। देश की जवानी में बाँकपन देखकर कई दिनों तक क्रिंज-फ़ीलिंग नहीं आई। लेकिन यह एक हफ़्ते का जादूलोक अब मिट चुका है और अचानक से योगा और खाने की रीलें स्क्रीन से निकलकर फिर मेरे अस्तित्व के सभी कोनों तक पहुँचने लगी हैं।
• सीजेपी आंदोलन में केंद्रीयता और लक्ष्य की स्पष्टता के बावजूद नेता होने की जो टिपिकल हीरोइक अपरिहार्यता है, वह टूटती नज़र आ रही है। जेन-ज़ी अपने स्वाभिमान को लेकर बेहद संजीदा है, वह रोज़ मिनट-दर-मिनट सेलिब्रिटीज़ को बनते और मिटते हुए देखती है; अतः उसके लिए बड़ी छवियाँ, बहुत बड़ी नहीं हैं। इसे उसने अपनी अनूठी अभिव्यक्तियों से पिछले दिनों साबित भी किया है।
संभव है कि अगले कुछ सालों तक भारत में ऑनलाइन दबाव-समूह महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करें। सीजेपी के द्वारा घोषित वेबसाइट अगर इस आंदोलन के संदर्भ में सफलतापूर्वक काम कर गई तो यह भविष्य में अन्य समस्याओं के लिए एक जन-संचालित, जन-आधारित इंटरफ़ेस साबित होगी; क्योंकि क़ानूनी-फंदा ही वह पड़ाव है, जहाँ आम-जन जाकर टूट जाते हैं और इसलिए भी वे कोई आवाज़ उठाने से डरते हैं।
• सारे आंदोलन सत्व रखते हों, यह ज़रूरी नहीं है; लेकिन उनके सत्व की पड़ताल भी उन्हें सुन-देख-समझकर, समय लेकर ही हो सकती है। एक सच्चे आंदोलन की पहचान इससे भी हो सकती है कि उससे जुड़े लोग आपस में कैसा व्यवहार कर रहे हैं! अगर वे एक दूसरे के प्रति सहयोग, करुणा और त्याग की भावना से भरे हैं तो समझिए कि उस आंदोलन की शुरुआत में ही मानवता की पहली सौंदर्यरेखा खींची जा चुकी है। यही बात कॉकरोच पार्टी द्वारा आहूत आंदोलन के मामले में पुरज़ोर तरीक़े से नज़र आई; जिसे अफ़वाहबाज़ यूट्यूबर कभी नहीं समझेंगे, भले ही वे प्रगतिशील और इतिहास-लेखक होने दम-ख़म भरते हों।
• रामधारी सिंह दिनकर का बहुउद्धृत वाक्य : “जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध...” सोशल मीडियाई समय की फ़ोमोजनित व्यग्रता को औचित्य देते हुए, लोगों से बेसिर-पैर की प्रतिक्रियाएँ भी दिलवाता रहा है। कॉकरोच आंदोलन को लेकर तमाम स्वयंभू फ़ेसबुकिये मग़्ज़मार अपनी-अपनी ज्ञान-पोटलियाँ खोलते रहे हैं और बग़ैर साक्ष्य की क़यासबाज़ियाँ करते रहे हैं। ये तटस्थ भी रह लेते तो ऐसा कोई अपराध नहीं हो जाता, बस कुछ फ़ॉलोवर्स बढ़ाने से चूक जाते।
दाँते ने ‘डिवाइन कॉमेडी’ के प्रथम भाग ‘इन्फ़र्नो’ में कहा है : “तटस्थ—वे लोग हैं जिन्होंने जीवन में कोई पक्ष नहीं चुना, न ही अच्छाई और न ही बुराई। उन्होंने किसी भी सिद्धांत या उद्देश्य के प्रति कभी प्रतिबद्धता नहीं दिखाई, इसीलिए उन्हें इतना तुच्छ और घृणित माना गया कि न स्वर्ग में उन्हें जगह मिलती है और न नरक में।”
इस वाक्य को बाद में डैन ब्राउन ने सरलीकृत कर दिया, जिन्हें पढ़कर पश्चिम के नेता लोग प्रेरणाएँ लेते और देते रहे हैं । डैन ब्राउन के सरलीकरणों की पैदाइशों से भरे बौद्धिक समय में कुछ ऐसे ही पैदाइशी लोग इस आंदोलन में जिस ख़ेमे के लोगों के बीच थोड़ी-सी सम्मतियों के लिए जगह बनाना चाहते हैं; उनका यशोगान करते रहते हैं, उनसे ही यह आंदोलन जीवित और संचालित बता देते हैं। इसी तरह वे अपने लिए कम से कम नरक या स्वर्ग में कोई मंच या एक सीट पा लेने का जुगाड़ कर ले रहे हैं।
• एक बड़ी परिघटना का उपसंहार बहुत दारुण्य और दैन्य से भरा हुआ होता है। ‘महाभारत’ का उत्तरकाल ही देखिए। जैसे पंचायत-चुनावों में एक आदमी के बीमार होने पर उसे अस्पताल ले जाने के लिए सात-आठ लोग तैयार खड़े मिलते हैं, वही हाल इस समय आंदोलन के हिस्सेदारों का है। वे पीड़ितों और छात्रों के लिए चाँद के भी पार चले जाने की रोज़ाना क़वायद में हैं। दूसरी तरफ़, जिनके बरअक्स आंदोलन था उन्होंने अपने तमाम भूतों—आईटीसेल, बाबाओं-उपदेशकों और सत्तामुखी न्यूज़ एंकरों को बुरी तरह सक्रिय कर दिया है। ये सभी मिलकर बिल्कुल नई पीढ़ी को अनुशासन और दंड का पाठ पढ़ा रहे हैं।
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इस स्तंभ का शीर्षक शमशेर बहादुर सिंह की कविता-पंक्तियों [देख अपने लीडरों को / शोक मत कर। / देश ये लीडर नहीं।] से निर्मित है। अन्य बिंदुघाटी : 2.0 यहाँ पढ़िए : लौट आया हूँ, कोई कुछ भी कह सकता है | मुझे पता है कि इस पोस्ट में आपकी दिलचस्पी है | बहुत फूँक-फूँककर सिर्फ़ साँप चलते हैं | शिक्षा मंत्री चला जाएगा, शिक्षा रह जाएगी
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बेला पॉपुलर
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