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अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-7

छठी कड़ी से आगे...

सात

अरुण कमल ‘कविता की राजनीति’ को उसी रिपोर्टर के निगाह से तौलते और फिर बोलते हैं जिसमें उन्हें फ़ायदा ज़्यादा दिखता है। काफ़ी गंभीरता से दिया गया वक़्तव्य है, जहाँ अपने को स्थापित और नए को ख़ारिज किया गया है—“जो नए कवि हैं यानी जिन्हें नवें दशक का कवि कहा जाता है, उन्होंने संभवतः कोई आलोचनात्मक गद्य नहीं लिखा। उनका लिखा कोई निबंध, टिप्पणी या उद्गार मेरी नज़र से नहीं गुज़रा। इसलिए मुझे कविता के बारे में उनके विचारों की कोई लिखित जानकारी नहीं है। हिंदी में हर थोड़े दिन पर एक ऐसी पीढ़ी आती रही है जो केवल कविता लिखती है, गद्य आदि कुछ भी नहीं। यहाँ तक की उनके प्रिय कवि कौन-कौन हैं, यह भी उन्होंने गोपन रखा है। यह भी विचित्र बात है कि आजकल के अधिकांश कवि लिखकर कोई बात नहीं कहना चाहते हैं। कोई पक्ष नहीं लेते, किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते। उन्हें पढ़ते हुए जो बात सबसे अधिक हमारा ध्यान खींचती है, वह है उनका—अराजनीतिक स्वरूप”। (कथोपकथन, पृष्ठ :160-61)

नवें दशक पर यह टिप्पणी उनकी कविताओं को छोटी करके देखती है। आगे तो उन्होंने कह ही दिया है कि ‘इधर की कविताएँ छोटे-छोटे विषयों और आशयों की कविताएँ हैं।’ लेकिन इस पूरे के केंद्र में ‘मैं’ है अर्थात् अरुण कमल। अरुण कमल के यहाँ मैं बहुत है, हम कम है। यह मैं ख़ुद तो गद्य लिखता नहीं, लिखता भी है तो सभा-सेमिनारों में दिए गए भाषणों को ही चालाकी से गद्य की तरह छपवा लेता है और आलोचक बन जाता है, कोई माने या न माने ख़ुद को ही मान बैठता है और इतनी ही चालाकी से नए को और पुराने को भी कूड़ेदान में फेंक आता है। राजेश जोशी के बहाने अपनी पीढ़ी को स्थापित और पहले की पीढ़ी के कवियों का बिना नाम लिए तेलहंडे में डालने की भाषा देखिए—“पहला काम तो इन कवियों ने यह किया की कविता को निपट वक़्तव्य होने से रोका। कोई बात सीधे-सीधे कह दी जाए, चाहे वह राजनीतिक बात हो या आध्यात्मिक या भावनात्मक, इसके बदले प्रयत्न रहा है कि भाव-दशा को व्यक्त किया जाए, उसे भाव-दशा को प्रस्तुत करने वाली वस्तु-स्थिति को अंकित किया जाए और इसके लिए समतुल्य बिंब की खोज की जाए।” (गोलमेज़, पृष्ठ : 91)

आगे और कहा है—“दूसरी बात यह है कि कविता राजनीति के बाह्य चर्म या केवल ऊपरी भाग को छूकर संतुष्ट न हो जाए, ज़रूरी है कि राजनीति को गहराई से समझा जाए क्योंकि राजनीति जीवन के प्रत्येक अंश को प्रभावित तथा बहुत कुछ निर्मित करने लगी है”। (वहीं)

इस तरह धूमिल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, कुमार विकल और आलोकधन्वा आदि को साइड लाइन किया और अपने चहेते और अपनी कविता को केंद्र में लाया गया। कम गद्य लिखकर मतलब उँगली कटाकर शहीद होने का तमग़ा (आलोचक होने का) भी अपने नाम किया दूसरों को साइड लाइन भी किया।

आगे पढ़िए : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-8

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