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अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-6

पाँचवीं कड़ी से आगे...

छह

कविता में निजी स्पेस का या घर-परिवार का कम होना, लगता है जानबूझकर है या फिर विचारधारा या किसी ख़ास मानसिकता का परिचायक। अरुण कमल के पास एक ख़ास तरह की काव्य-भाषा है जो काफ़ी पगी-पगी और भरी-भरी है। कविता कहने का ढंग भी उनका अपना है। फिर यह परिवार की कम से कम उपस्थिति! प्रेम और ऐंद्रिक बिंबों की कम उपस्थिति? जिस उम्र में प्रेम करना चाहिए उस उम्र में अरुण कमल कुछ और कर रहे थे। एक बार विधानसभा में किसी व्यक्ति ने उनका ‘मुठ मार दिया’ तो उनका उस विचारधारा से मन नहीं मिला आज तक, ठीक उसी तरह जवानी में प्रेम नहीं कर पाए तो प्रेम-कविता नहीं लिख पाए, जबकि अभी भी देह के लिए हरहराता हुआ हरिहर मन कूदता रहता है। कंडोम वाली बात को उसी प्रसंग में देख सकते हैं या साठ की उम्र की यह कविता, जहाँ अरुण कमल कह रहे हैं—“क़ुबूल करता हूँ नि:संकोच / कि मैंने कभी प्रेम नहीं किया” (योगफल, पृष्ठ : 38)

इसलिए प्रेम से अनजान कवि के जवानी के संग्रह ‘अपनी केवल धार’ में प्रेम-कविता नदारद है। विद्रोह भी नदारद है। जवानी-दीवानी के दो चिह्न प्रेम-विद्रोह जवानी के संग्रह में नहीं होना थोड़ा खलता है। और एक बात कि पहले संग्रह में जो एक अनगढ़ता, खुरदरापन, कच्चापन या बतियापन, ‘रॉ-नेस’ रहता है, वह भी नहीं है। एकदम परिपक्व, सुडौल, सुदर्शन, साँचे में ढली हुई कविताएँ हैं वहाँ, ठीक उस कहानी की तरह जहाँ एक राक्षस जन्म के साथ ही अपना भारी हथियार साथ लेकर आता है। आज भी वही परिपक्वता, वही परिवेश, वही भाषा उनके यहाँ वैसे ही है।

वास्तव में पहले काव्य-संग्रह (अपनी केवल धार, 1980) से लेकर अद्यतन काव्य-संग्रह (रंगसाज़ की रसोई, 2024) तक एक चीज़ साफ़ दृष्टिगोचर है कि अरुण कमल लगातार सचेष्ट ढंग से जागरूक कवि हैं अर्थात् हॉबी और साइड-बिजनेस से लबरेज़ जो अंदर के बदले अपने पटनिया परिवेश को पकड़ने के लिए कविता की लुकाठी हाथ में लिए पटने शहर में घूमता-फिरता मिल जाएगा। एकाध कविता को अपवाद-स्वरूप छोड़ दें तो अरुण कमल की कविता पढ़कर पटने के लोगों के स्वभाव, शहर और सबसे ज़्यादा अरुण कमल को समझा जा सकता है।

अरुण कमल की कविताएँ पटने से भेजी जा रही रिपोर्ट की तरह हैं। लगता है कि जैसे कोई व्यक्ति कविता की भाषा में अपने शहर की, अपने आस-पास की काफ़ी सूक्ष्म तरीक़े से अख़बारी रिपोर्ट बना रहा है। बस भाषा कविता की है, इसलिए उनकी कविताओं के पास एक ठंडा आवेग है। ठंडे-ठंडे दृश्य चित्र। राजनीतिक चेतना तो है, लेकिन इतनी चालाकी से और इतनी ठंडी एवं उबासी से भरपूर की पढ़ने में ठीक-ठाक लगता है, पर कुछ करने का मन नहीं होता। वास्तव में अरुण कमल के मानस में यह बैठा है कि “धीरे-धीरे मुझे यह लगता गया कि कवि और कविता वास्तव में कोई परिवर्तन नहीं ला सकते, बल्कि समाज में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। इसलिए यह समझने के बाद अब कविता के स्वर में और उसकी भंगिमा में बल्कि आचरण में भी बड़ा परिवर्तन आया है। हिंदी समाज में वैसे भी कविता की कोई प्रतिष्ठा कभी रही नहीं। पोलिश कवि ज़्बिग्निएव हेर्बेर्त के शब्दों में—हमारा काम एक घिरे हुए शहर से रिपोर्ट भेजना भर है।” (कथोकथन, पृष्ठ : 160)

यह आज से लगभग पच्चीस साल पहले दिया गया वक़्तव्य अरुण कमल के उस मानस को दिखलाता है, जहाँ एक ठंडा कवि या रिपोर्ट लिखने वाला कवि बैठा है। इसलिए उसके पास अपने प्रेम, अपने जीवन और अपने घर-परिवार के लिए कविताएँ नहीं हैं। वह इनसे उदासीन है। दरअस्ल, कवि-मानस बनने में पटने के युवा दिनों के साथियों, प्रगतिशील लेखक संघ में आने-जाने और विचारधारा को विचार का चारा बना लेने से जैसा मानस बनता है, वैसी कविताएँ कवि लिखता है। प्रगतिशील लेखक संघ में रहकर अरुण कमल यही कर सकते थे कि विचारधारा को चारा की तरह कविता में इस्तेमाल कर लें और साथी समझ भी न पाएँ। उन्होंने यही किया भी। कभी किसी लड़ाई में कवि शामिल नहीं हुआ, दूर से देखते हुए चिल्लाया कि मैं आपके साथ हूँ, निजता की अभिव्यक्ति है, आप का अर्थ अन्य या दूसरा है यहाँ। अपने को महत्त्वपूर्ण मानते हुए दूसरे को अन्य मानना। ‘मैं’ ‘कुछ’ हूँ, ‘कुछ’ माने कवि, यह भाव शुरू से अरुण कमल के यहाँ है। उनका कवि, उन पर सवारी करता है। वह कवि का बाना चौबीस घंटे पहने रहते हैं। उनकी हर कविता में उनका कवि हावी है। उनके यहाँ निजता का लोप नहीं, निजता का गुणगान ख़ूब है। जब वह कहते हैं कि “गुन गाऊँगा / फाग के फगुआ के चैत के पहले दिन के गुन गाऊँगा / गुड़ के लाल पुओं / और चाशनी में इतराते मालपुओं के गुन गाऊँगा / दही में तृप्त उड़दबड़ों / और भुने जीरो / रोमहास से पुलकित कटहल और गुदाज बैगन के गुन गाऊँगा” (योगफल, पृष्ठ : 14)

आगे पूरी कविता पढ़ जाइए तो स्पष्ट नज़र आता है कि आम आदमी की अभिव्यक्ति से ज़्यादा इसे कविता बना देने की चालाकी करता हुआ कवि नज़र आता है। ये छोटी-छोटी चालाकियाँ क़स्बे के लोगों के यहाँ ज़्यादा होती हैं। अरुण कमल का कवि मानस इनसे ही बना हुआ प्रतीत होता है। अरुण कमल का कवि कुछ कवियों को आत्मसात् करके एक नई कविता लिख डालने में सिद्धहस्त है। यह ‘गुन गाऊँगा’ वाली कविता भी इसी चालाकी से निकली है जो रामजीवन शर्मा ‘जीवन’ की कविता ‘फागुन आयल’ से प्रभावित दिखती है—“रंग सोनहुला जौ पर छैलक / गेहुओं पर ऊ दखल जमैलक / तीसियों अब कुछ-कुछ करिआयल / कटहर में भी लेढा लागल / ओकरों मनुआ में रस जागल / बुढ़वा पाकड भी कोढ़िआयल / फागुन आयल फागुन आयल” (कथोपकथन, पृष्ठ : 103)।

अरुण कमल का कवि क़स्बे से बाहर नहीं निकल पाता। वह क़स्बे मतलब पटना की रिपोर्ट तो लिखता है, लेकिन अपना जीवन-प्रसंग नहीं। यह अच्छी बात तो है, लेकिन इस सोच-विचार ने उनकी काव्य-प्रतिभा के साथ अन्याय भी किया है। ‘स्वान्तः सुखाय रघुनाथ गाथा’ की तरह उन्हें ख़ास फ़्रेम में बाँध दिया। पटने की गंगा पर लगभग हर संग्रह में कविता मिलेगी, लेकिन पटने में दंगा न हुआ तो अरुण कमल दंगे पर कविता नहीं लिखेंगे, भले अयोध्या से लेकर गुजरात तक दंगा हो। लोग मारे जाएँ, लुटे-पिटे-कटे अरुण कमल जू को की फरक पैंदा! वह तो ‘पुतली में संसार’ और ‘एक भक्त के निवेदन’ (पहले ‘अनुनय विनय’ शीर्षक से प्रकाशित) लिखेंगे। वैसे भी सरकार पहले भी और आजकल भी भक्तों को पसंद करती थी और है।

जब अरुण कमल ‘एक भक्त के निवेदन’(विनय-अविनय) पूर्वग्रह में लिख-छपवा रहे थे तो याद रखना चाहिए कि ये वही अरुण कमल है जिनके बारे में विनोद दास ने लिखा है कि वह विश्वनाथ तिवारी अर्थात् साहित्य अकादेमी अर्थात सत्ता के प्रिय रहे हैं। कहने का लब्बोलुआब यह है कि जब साहित्यकार साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटा रहे थे, तब अरुण कमल जी साहित्य अकादमी की गोद में बैठे हुए थे और 1998 में एनडीए की सरकार में मिले साहित्य अकादेमी को सहला रहे थे। वह चाहे तो इसे अपने प्रिय कवि नागार्जुन की तरह डिफ़ेंड कर सकते है कि मैं इंदिरा गांधी नहीं, जनता के पैसे का पुरस्कार ले रहा था। शुक्ल जी के शब्दों में—धन्य है ये... ये लोग अर्थात् अरुण कमल अब (वागर्थ, नवंबर-2024, पृष्ठ-72) संत की तरह ज्ञान बाँटते हैं, ‘‘कविता से प्रेम का मतलब है स्वार्थ से ऊपर उठना और धन तथा सत्ता के प्रति हिकारत की भावना।’’ लेकिन यह सिर्फ़ कहने के लिए है और दूसरों के लिए है।

आगे पढ़िए : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-7

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