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अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-5

चौथी कड़ी से आगे...

पाँच

अरुण कमल क़स्बे की मानसिकता वाले पटने के कवि हैं। एक ख़ास पटनिया आग्रह है उनकी कविता में। अरुण कमल की कविता में एक पटना-टोन लगातार उपस्थित है, जैसे राजेश जोशी में भोपाल, मंगलेश डबराल में पहाड़। लेकिन भोपाल और पहाड़ से वे कवि बाहर निकले, अरुण कमल पटना से बाहर नहीं निकल पाए।

अरुण कमल की पढ़ाई-लिखाई और अब तक का जीवन पटने में बीता है। वह इस शहर में ऐसे रहे जैसे यह शहर उनमें। दोनों एक-दूसरे के पर्याय हो गए हैं—जीवन में भी और कविता में भी। इसलिए अरुण कमल की कविताओं में पटने की इतनी सघन उपस्थिति है। इसलिए उनके यहाँ घर, परिवार, पिता, बेटे-बेटियों, पत्नी, दादी-नानी, मौसी पर कविताएँ नहीं के बराबर हैं। दो कविता भाभी को लेकर हैं भी तो वहाँ ज़बरदस्त फ़िल्मी कंट्रास्ट है जो कविता को फ़िल्म की ऊँचाई पर पहुँचाकर छोड़ता है। पूरा-पूरा दृश्य बिंब है और वह भी फ़िल्म की भाषा में कहें तो ‘क्लाइमैक्स’ है। इन दो कविताओं के अलावा एकाध और कविताएँ होंगी। अरुण कमल के यहाँ निजी कविताएँ या कविता में निजी स्पेस कम है, जबकि कुछ दृश्य-चित्र और बिंब या कहें तो व्यक्तियों पर उन्होंने कुछ काव्यमय कविताएँ लिखी हैं। ऐसी ही एक कविता है ‘भीष्म जी ने दरी बिछा ली’, लेकिन ऐसी कविताएँ स्मृति के ख़ज़ाने से निकलकर आई हुई कविताएँ हैं जो साधारण का महिमामय गान करती हैं। इसी तरह कुछ गीत या गाथा सीरीज़ में भी अरुण कमल ने रह-रहकर कविताएँ लिखी हैं। जहाँ साधारण की महिमा है। आम इंसान की उपस्थिति। लेकिन इस आम इंसान की सिर्फ़ लिखित उपस्थिति है और दूर से देखा हुआ चित्र—“एक दिन देखा उसे मैंने / पटने के अशोक राजपथ पर / अगल-बग़ल सिपाही / कमर में रस्सा!” (पुतली में संसार, पृष्ठ : 23)

ऐसे बहुत से लोगों के दृश्य चित्र या बिंब अरुण कमल के यहाँ हैं। यह देखिए—“मैं देख रहा हूँ / वह हत्यारा बारह साल जेल में काटने के बाद / अभी इस वक़्त जेल के आख़िरी गेट पर खड़ा है / पास के इंतज़ार में।” ( सबूत, पृष्ठ : 24)

और तो और ‘नए इलाक़े में’ की शुरुआत ही होती है—“इस नए बसते इलाक़ों में / जहाँ रोज़ बन रहे हैं नए-नए मकान / मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ” (नए इलाक़े में, पृष्ठ : 13)

और अंत में—“समय बहुत कम है तुम्हारे पास / आ चला पानी / ढहा आ रहा अकास / शायद पुकार ले कोई पहचान ऊपर से देखकर।” (वही, पृष्ठ : 14)

यह देखा हुआ दृश्य बिंब ही अरुण कमल की कविता की जान है। दादी-नानी की कहानियों में एक राक्षस के प्राण एक सुग्गे में बसते थे। अरुण कमल की कविता के प्राण इन दृश्य बिंबों में बसते हैं। अधिकतर दृश्य बिंब प्रकृति के हैं। पटने के हैं। क़स्बे के हैं। कुछ स्मृतियों के ख़ज़ाने से हैं और कुछ गीत-शैली में हैं तो वहाँ किताबी हैं। किताबी कहने का अर्थ है तुलसीदास, शेक्सपियर टाइप की कविताएँ पढ़कर सीखे गए दृश्य-बिंब। और एक बात अरुण कमल पटने में या कहीं भी यात्रा में होते हैं तो दृश्य को या बातचीत को कविता की शक्ल में लिख लेते हैं। यह एक अच्छा गुण है। इससे कुछ संवेदनशील कविताएँ उनके पास आ गई हैं—ख़ासकर ट्रेन की यात्रा में टीटी से की गई बातचीत या एक स्त्री का बग़ल में बैठकर सोना, लरकोर भाभी का पानी भरने बाहर नल पर जाना, होटल में खाना खाना और खाना दे जाने वाले बच्चे को कोने में खड़े रोते देखना आदि। यहाँ रामचंद्र शुक्ल की बात याद आती है—‘यात्रा के लिए निकलती रही है बुद्धि पर हृदय को साथ लेकर’ पर इस बुद्धि-हृदय के मणिकांचन संजोग से ‘चिंतामणि’ जैसे निबंध और आलोचना की पुस्तक अरुण कमल के अंदर से नहीं आई, कुछ कविताएँ निकलीं। यों अरुण कमल आलोचक हैं ही नहीं। वह अच्छे से जानते हैं कि “आलोचना का काम देखते हुए एक बात मुझको यह लगी कि अभी हिंदी का वैचारिक आलोचनात्मक वातावरण शिथिल है। दूसरी बात यह लगी कि अच्छे-बुरे का भेद और विवेक भी शिथिल है। तीसरी बात यह कि हममें संघर्ष करने की क़ुव्वत कम हुई है और लेखन भी एक हॉबी या साइड-बिजनेस हो गया है। अनेक प्रकार की निवृत्तियों के बाद की एक मनबहलाऊ प्रवृति।” (तद्भव 29, पृष्ठ : 145)

अनुभव सिर्फ़ सामाजिक ही नहीं होता, वह व्यक्तिगत भी होता है। ऊपर नारायण और नारद वाले प्रसंग का ज़िक्र हो चुका है। और अरुण कमल ने इसी ‘अर्थात् औरों की कथा-II’ में लिखा है—“अंततः एक कवि की कविता उसके निजी जीवन पर ही निर्भर करती है।” (तद्भव-30, पृष्ठ : 152) ‘कविता’ की जगह आप ‘आलोचना’ भी पढ़ सकते हैं और हॉबी तथा साइड-बिजनेस के बारे में अरुण कमल से बेहतर और कौन जान सकता है। अरुण कमल के यहाँ आलोचना के बहाने यात्रा में जाने का शग़ल रहा है। कभी सत्यप्रकाश मिश्र बुला रहे हैं तो कभी अशोक वाजपेयी भारत भवन या रज़ा फ़ाउंडेशन में बोलने के लिए, कभी कोई सरकारी प्रतिष्ठान और इसे ही बाद में अरुण कमल ने आलोचना कहकर चला दिया। (संदर्भ : ‘कविता और समय’ तथा ‘गोलमेज़’ की भूमिका अर्थात् ‘आभार’)

आगे पढ़िए : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-6

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