अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-4
निशांत
15 फरवरी 2026
तीसरी कड़ी से आगे...
चार
2019 में प्रकाशित अरुण कमल की एक कविता है—‘एक वृद्ध की रात’। एक बूढ़ा है जो जानता है कि ‘कुछ तो है जो मुझे खड़ा कर रहा इस उम्र में’। जिस उम्र में लोग तीर्थ पर निकल जाते हैं। दादा-नाना बनकर बच्चों को कहानियाँ सुनाते हैं, चुप रहते हैं, घर के कोने में पड़े रहते हैं, भक्ति-भजन की आरतियों में भीड़ बढ़ाते हैं। अरुण कमल भी अगले संग्रह में कुछ भक्ति टाइप की कविताएँ लिखते हैं, लेकिन अभी उनका वृद्ध ऐसा नहीं करता। वह कहता है—“मानेसर के मारुति मज़दूरों को सलाम / बेंगलुरु की दरजिनों को / बिहार की आँगनबाड़ी सेविकाओं को सलाम / महाराष्ट्र के किसानों को सलाम / वह लड़की जो खड़ी है न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज के बाहर / साँड के सामने निडर—/ जिसने भी मुट्ठी तानी उसको सलाम / वह अकेला जिसने मजमे में ताली नहीं बजाई / जिसने अंतिम साँस में हत्यारे को गाली दी / उसको सलाम”। (योगफल, पृष्ठ : 34)
वह उन सभी लोगों को सलाम करता है, जिसने भी मुट्ठी तानी। वह जानता है कि कुछ तो है जो मुझे इस उम्र में खड़ा कर रहा है। वह कुछ यही प्रतिरोध की क्षमता है। इसी क्षमता के सहारे वह अपना भी “एक टूटा फूटा दस्तख़त पत्थर की काली चट्टान पर” (वही, पृष्ठ : 35) करना चाहता है। यहाँ भी कवि अपने को अंत में लाता है। लगता है पहले वह उनसे ऊर्जा ग्रहण करता है, फिर तनकर खड़े होने की कोशिश करता है। अरुण कमल इस तरह से कविता में बाहरी बिंबों से चमत्कार पैदा करते हैं कि पाठक बिंबों को देखकर कवि को काफ़ी साहसी और प्रतिरोध से भरा पाता है, लेकिन वास्तव में वह ‘उन्हें सलाम’ करते हुए सिर्फ़ दूर खड़े होकर एक शब्द उच्चारता है कि मैं आप लोगों के साथ हूँ। मेरा भी प्रतिरोध दर्ज हो, लेकिन मौखिक या लिखित!
इसी तरह की एक कविता ‘अर्पण’ दर्ज है 1980 में प्रकाशित ‘अपनी केवल धार’ में जहाँ कवि लिखता है—“एक ही तो हैं हमारे लक्ष्य / एक ही तो हैं हमारी मुक्ति / साथ-साथ मिलकर चलेंगे हम / जहाँ गिरोगे तुम / वहीं रहेंगे हम/ जहाँ झुकोगे तुम/ वहीं उठेंगे हम / लाओ, मुझे दो अपना हाथ / चलो, मेरे पाँवों से चलो”। 2024 में आई ‘रंगसाज़ की रसोई’ में एक कविता की पंक्तियाँ हैं—“तुम सब अकेले नहीं / बाहर भी लोग थे करोड़ों / तुम्हारे लिए जगते सोते / जब तुम अपनी सुरंग में अकेले बंद होते हो / तब कोई नहीं आता तुम्हें बचाने / तुम्हीं को खोलने पड़ते हैं रास्ते / मलबे के ढेर को हटाते-हटाते / लेकिन यहाँ तुम नहीं थे अकेले।” 1980 से 2024 तक की कविता में शब्द ज़रूर अलग-थलग हो, भाव लगभग एक है। जमापूँजी वही है, जिसका सूद उठाया जा रहा है। तब भी स्थितियाँ कवि को वैसी ही दिखती थीं, आज भी। कवि सिर्फ़ कविता लिख रहा है। ‘कथोपकथन’ में अरुण कमल ने कहा भी है कि “चाह कर भी मैं वही लिखूँगा जो मैंने देखा-सुना है।” देखिए, अरुण कमल क्या देखते-सुनते हैं—उनका एक बिंबबहुल, 2004 में प्रकाशित ‘पुतली में संसार’ में एक छोटी-सी कविता है, जिसमें कविता इतनी ही है कि “मैं जब उठूँ तो चींटी भर जगह भी ख़ाली न हो” पर कवि बिंबों से इसका विस्तार करता है। आप भी पूरी कविता देखें :
मैं जब उठूँ तो भादों हो
पूरा चंद्रमा उगा हो ताड़ के फल-सा
गंगा भरी हो धरती के बराबर
खेत धान से धधाए
और हवा में तीज-त्योहार की गमक
इतना भरा हो संसार
कि जब मैं उठूँ तो चींटी भर जगह भी
ख़ाली न हो।
(पुतली में संसार, पृष्ठ : 100)
यहाँ कह सकते हैं कि अरुण कमल वही देखते-सुनते हैं जो नारद को देखना-सुनना होता है। जनांदोलन में शामिल होने से एक कवि आलोकधन्वा या नवारुण भट्टाचार्य या पाश या वरवर राव बन सकता है। ये सारे कवि अरुण कमल के समकालीन और पड़ोसी कवि हैं, लेकिन कवि भारतीय पुलिस की तरह घटना घट चुकने के बाद, अपराधी के भाग जाने के बाद घटनास्थल पर पहुँचता है—अपना फ़र्ज़ पूरा करने। कई बार लगता है कि अरुण कमल कविता-कार्य को फ़र्ज़ पूरा करने की तरह करते हैं। इसलिए एक कवि हर कवि से बार-बार पूछता रहता था कि—‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’
एक फ़िल्म में नायक कुछ नहीं कर पाता तो दौड़ने लगता है। लगातार दौड़ते रहता है। यह दौड़ना प्रतिरोध करने में तब्दील हो जाता है। वह चुप होकर बैठ सकता था। रोज़मर्रा के दैनिक कार्य-व्यापारों में चुपचाप शामिल हो सकता था। अपने मन को समझा सकता था कि इससे ज़्यादा कुछ नहीं हो सकता। लेकिन नहीं, वह प्रतिरोध करता है दौड़कर। लगातार दौड़कर। जैसे शिवमूर्ति के एक उपन्यास ‘अगम बहे दरियाव’ में एक नायक गीत गाकर प्रतिरोध करता है। लगातार गीत गाकर। अपने साथ हुए अन्याय को गीत गाकर प्रतिरोध की शक्ति में बदल डालने की लगातार कोशिश। सफलता-असफलता से परे। कविता या साहित्य भी लगातार प्रतिरोध होता है, जो है उससे बेहतर के लिए। जाता पिसती हुई औरत या भाई को राखी बाँधती हुई स्त्री जो गीत गाती है—वह सुख-दुख की अभिव्यक्ति होते हुए भी प्रतिरोध की काव्यमय प्रस्तुति होती है। जब एक कवि और लेखक इसमें चूकता है तो वह जीवन में सफल और साहित्य में असफल होते जाता है। सफलता की पहली सीढ़ी है—समय के साथ संयोजन, समायोजन, समन्वय करना। जो कर पाता है, वह वीर हो जाता है आज के समय में। वही राज करता है। वही धरा को भोगता है। वीर भोग्या वसुंधरा। वह सच्चा लेखक भले न हो, पर लेखक का बाना धारण किए वह लेखकों की दुनिया में विचरते रहता है—मुंबई, पटना, भोपाल, इलाहाबाद, दिल्ली को जेब में डाले—जब तक जीवित है।
अरुण कमल के यहाँ प्रतिरोध या विरोध-विद्रोह की एक टूटी-फूटी चालाकी से भरी काव्यमय भंगिमा शुरुआत से लेकर अभी तक फैली हुई है। जिस तरह फ़िल्मों में प्रेम का अभिनय करते-करते हीरो सचमुच किसी नायिका से प्रेम करने लगता है और कुछ दिनों बाद उसे समझ में आता है कि अभिनय और वास्तविकता में अंतर होता है। अभिनय से पैसे कमाए जा सकते हैं। पद और पद्म सम्मान या अन्य पुरस्कार पाए जा सकते हैं। फिर वह प्रोफ़ेशनल लाइफ़ और पर्सनल लाइफ़ को अलग करके चलने लगता है। अंततः वह सिर्फ़ अभिनय से प्रेम करने लगता है। अभिनय को अपना पेशा बना लेता है। इसी तरह कविता लिखते-लिखते कविता से भी प्रेम होने लगता है। कविता में मार्क्सवाद कहते-कहते कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से बोलने लगते हैं अरुण कमल। मार्क्सवादी विचारधारा को कहे बिना या कविता में लाए बिना आप प्रगतिशील लेखक संघ में नहीं जा सकते। प्रगतिशील लेखक संघ में होना और कविता में उसको यूज़ करना इस कवि को आता है। यह प्रतिरोध नागार्जुन या अन्य समकालीन कवियों का जिनका ऊपर ज़िक्र हो चुका है कि तरह सीधे-सीधे कविता में नहीं आता। आता है भाषा चमत्कार के साथ। ग़ज़ब है भाषा का चमत्कार अरुण कमल के यहाँ। यह क़स्बाई भाषा है। कहने का तरीक़ा भी क़स्बाई लोगों की तरह का है—उनकी चालाक़ियों से लैस। लेकिन है। अरुण कमल एक काफ़ी शातिर टाइप के कवि हैं। क़स्बे की भाषा में कहा जाए तो काफ़ी चालाक़ कवि। साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे टाइप के। प्रतिरोध भी रहे और सीधे-सीधे नाम लेने से बच भी जाया जाए। ‘कविता की वापसी’ कराने वाले अशोक वाजपेयी ने सही लिखा है—“प्रतिष्ठान और व्यवस्था के विरुद्ध कुछ सामान्य किस्म के प्रहार किसी को चोट नहीं पहुँचाते और उनसे जुड़ा बड़बोला रेह्टरिक लेखक को अपने बारे में यह भ्रम दे सकता है कि वह क्रांतिकारी है।” (कहाँ किधर से : पहचान सीरीज़, संपादक : अशोक वाजपेयी, पृष्ठ : 132) अब वित्त मंत्री कहने से किसी भी सरकार को घंटा न फ़र्क़ पड़ता है। अरुण कमल की एक प्रतिनिधि कविता देखें, जिसका शीर्षक ही है—‘वित्त मंत्री के साथ नाश्ते की मेज़ पर’। अरुण कमल ने वहीं नीचे कोष्ठक में लिखा है—‘एक तस्वीर’ मतलब खींची हुई कोई तस्वीर जो उन्होंने काफ़ी सहेजकर रखी है और उसे बीच-बीच में देखते रहे होंगे। किसी दिन उसे देखकर उन्होंने यह कविता लिखी है। इस कविता की पहली पंक्ति में ही अरुण कमल ने अरुण कमल को ‘बेनिफ़िट ऑफ़ डाउट’ दे दिया है, देखें—“यही एक तस्वीर है जहाँ मेरा चेहरा थोड़ा दब गया है / और मुझसे पूरी तरह मिलता भी नहीं / पीछे न तो तारीख़ है न स्थान / पूरी मेज़ भोजन से भरी है / इतनी भरी कि मेरी भूख ही मर गई / अभी-अभी दिवालिया हुए थे बैंक / करोड़ों-करोड़ बेरोज़गार / मधेपुरा बाढ़ में / दिल्ली में दहशत / सड़कें भीखमंगों से पटी / चारों ओर एक हूक / मेरा सौभाग्य था जो मैं वित्त मंत्री के साथ था उस सुबह / नाश्ते के मेज़ पर / चलते समय उन्होंने उपहार दिया—एक छुरी एक काँटा / मेड इन अमेरिका और लाड़ से कंधा थपथपा / राष्ट्रभाषा में कहा—टेक केयर यंग मैन... टेक केयर।” (मैं वो शंख महाशंख, पृष्ठ : 55) पहली बात की अरुण कमल को वहाँ जाना ही नहीं चाहिए या कवि को। फिर भी वह जाता है और बड़ी चालाकी से अपनी सफ़ाई में पहले ही कह डालता है कि ‘यही एक तस्वीर है जहाँ मेरा चेहरा थोड़ा दब गया है’ ताकि पाठकों को भ्रम में रखा जाए कि मैं वहाँ ख़ुश नहीं हूँ जाकर। तो भैया गए क्यों? फिर धधाकर यह कहना कि ‘मेरा सौभाग्य था जो मैं वित्त मंत्री के साथ था उस सुबह नाश्ते की मेज़ पर’। यह बतलाता है कि कितनी तीव्र इच्छा थी वित्त मंत्री के साथ फ़ोटो खिंचवाने की। एक पतले जल की तरह की भाषा का प्रतिरोध यहाँ दिखता तो है, पर उससे ज़्यादा दिखती है चालाकी। जबकि उन्हीं के समकालीन विष्णु नागर या मदन कश्यप के यहाँ स्पष्ट और बेबाकी है ज़्यादा, चालाकी है कम। जबकि ‘घोषणा’ कविता में अरुण कमल कहते हैं—“सो, मैं भारत का एक नागरिक, एतद्द् द्वारा घोषणा करता हूँ कि नींद / मुझे राष्ट्र के सर्वोच्च पद से ज़्यादा प्यारी है’ (नए इलाक़े में, पृष्ठ : 67) या ‘उत्सव’ में यह कहना कि ‘जिनके मुँह में कौर मांस का उनको मगही पान’ या ‘थूक’ कविता जो मानबहादुर सिंह की हत्या पर लिखी गई है; उसमें प्रतिरोध है, चालाकियों के बनिस्बत कम है।
अरुण कमल को यह अच्छे से पता है कि कहाँ, क्या, कैसे और क्यों करना-कहना है। कवि है तो कभी-कभी काव्य-सत्य उनकी क़लम से बाहर आ जाता है—“जहाँ बोलना था चुप रहा / जिससे बोलना बंद कर देना था / उससे ‘हँस’-‘हँस’कर बोला”। (वही, पृष्ठ : 26)
यह काव्य-सत्य उन्हीं आम लोगों का हैं जो जीवन में समझौते कर लेते हैं या थोड़े से लाभ के लिए झुक जाते हैं। कवि अपनी वाणी में उनकी वाणी को स्वर देता है या उनकी वाणी में अपनी वाणी को। बात तो एक ही है।
आगे पढ़िए : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-5
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