अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-3
निशांत
15 फरवरी 2026
दूसरी कड़ी से आगे...
तीन
मेरे लिए वे कविता का ककहरा सीखने के दिन थे। कवि-मित्र प्रकाश के सहारे यह संग्रह ‘अपनी केवल धार’ पढ़ गया। यह ‘धार’ कविता दिमाग़ में बैठ गई थी। मैंने उन दिनों अपने मित्रों के बीच इस कविता का कई बार सामूहिक पाठ किया था। आज भी जब अरुण कमल इस कविता का पाठ करते हैं या ‘संबंध’ कविता का तो अच्छा लगता है। (अरुण कमल इन्हीं दो कविताओं का पाठ हर जगह करते हैं।) आज से पैंतालीस साल पहले भी इसी तरह लोगों को अच्छा लगता होगा। लेकिन पिछले पैंतालीस सालों में हिंदी कविता पर बहुत फ़र्क़ पड़ा है, लेकिन अरुण कमल वहीं खड़े हैं, जहाँ पहले संग्रह के समय थे।
जैसे पहले प्रेम, प्रेमपत्र की स्मृति, हाथ पकड़कर चलने का अनुभव, पहला चुम्बन, पहला यौन-संबंध आप भूल नहीं पाते; उसी तरह पहली किताब और ऊपर से हिट हो जाए तो आप उससे उबर नहीं पाते। कुछ ऐसा ही हुआ अरुण कमल के साथ। उस ज़माने में जब नागार्जुन अपनी किताब ख़ुद छाप-बेच रहे थे। ‘कविता की वापसी’ अभी अशोक वाजपेयी की राह देख रही थी। अरुण कमल कविया रहे थे। छा गए थे। लरिकाई का प्रेम और तरुणाई का अनुभव, जवानी का नशा और बुढ़ापे की हवस काफ़ी ख़तरनाक होती है। सब एक-दूसरे को काफ़ी प्रभावित करते हैं। अस्सी में आए ‘अपनी केवल धार’ की एक कविता है—‘ईर्ष्या’ :
सचमुच विश्वजीत
मुझे तुम्हारा यह ऐश ट्रे बहुत पसंद है
बिल्कुल पापी के फूल की तरह
खिल रहा है तुम्हारे टेबुल पर
सचमुच
कल न्यूट्रॉन बम गिरेगा
हम तुम सब मर जाएँगे
सब कुछ नष्ट हो जाएगा
फिर भी इस टेबुल पर
इसी तरह चमकता रहेगा
शान से यह ऐश-ट्रे
आज मुझे
इस ऐश-ट्रे से ईर्ष्या हो रही है
मुझे ईर्ष्या हो रही है।
(‘अपनी केवल धार’, पृष्ठ : 52)
यह कविता लिखकर संग्रह में छपवाकर अरुण कमल को समझ में आ गया कि जीवन के किसी भी पल, क्षण, अनुभव को कविता में तब्दील किया जा सकता है। जिस तरह ‘पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज’ हो सकता है, उसी तरह कोई कवि जो कवि बन चुका है, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, वाणी प्रकाशन से कम उम्र में किताब, इनाम-इकराम पा चुका हो, वह कुछ भी लिख दे कविता हो जाएगी। नंदकिशोर नवल ने शायद इसी तरफ़ इशारा किया है, उनके तीसरे संग्रह पर लिखते हुए कि अरुण कमल ने केदार, त्रिलोचन और नागार्जुन के लीक पर ही चलते रहे। अपनी कोई नई लीक नहीं बनाई। “अरुण कमल ने पुरानी लीक पर चलना ही ठीक समझा और पूर्वोक्त कवियों में से उन्होंने विशेष रूप से नागार्जुन को अपना आदर्श बनाया। आरंभ में अपने सरल और सच्चे स्वर के साथ और भोजपुरी के रस से भींगे शब्दों और मुहावरों से उन्होंने पाठकों का ध्यान आकर्षित किया, लेकिन धीरे-धीरे उनमें यह चीज ‘मैनर’ के रूप में विकसित होने लगी, जिसके परिणामस्वरुप कविता की पूरी संरचना पर ध्यान देना उन्होंने छोड़ दिया। एक दुर्घटना उनके साथ यह हुई कि उन पर छोटे-मोटे पुरस्कारों की इस क़दर वर्षा हुई कि उन्होंने अपने को सिद्ध कवि मान लिया। इसी मान्यता के फलस्वरूप उनमें प्रत्येक वस्तु को कविता में तब्दील कर देने का विश्वास हद से ज़्यादा बढ़ा हुआ दिखलाई पड़ता है। इसी से वह ज़्यादा निसार कविताएँ लिखते हैं।” इतना ही नहीं आगे वह और लिखते हैं कि अरुण कमल के पास—“भारी संख्या में ऐसी कविताएँ हैं—छोटी-बड़ी, जिनमें कोई बड़ी बात या गहन संवेदना नहीं, सिर्फ़ उसका ऊपर से स्पर्श है। कविता साधारण से साधारण चीज़ों पर भी हो सकती है, पर उसमें छिपे कवित्व को उद्घाटित करना ज़रूरी है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो उसमें और गपशप, लतीफ़े, जुमलेबाज़ी आदि में कोई फ़र्क़ न रह जाएगा।” इसी तरह पहले संग्रह से लेकर तीसरे संग्रह तक में आलोचक-संपादक नंदकिशोर नवल को ऐसी कविताएँ दिख जाती हैं। ‘रंगसाज़ की रसोई’ (2024) में ‘कुछ लोककथाएँ’ शीर्षक से आठ कविताएँ है जो आज नंदकिशोर नवल होते तो उन्हें भी कविता नहीं लगती। ‘रंगसाज़ की रसोई’, पृष्ठ : 93 से एक कविता आप देखें और आप ही तय करें कि यह कविता है कि नहीं—“मरकत द्वीप पर एक राजा राज करता था। बहुत प्रतापी था। लेकिन एक दिन अचानक विद्रोह हो गया। प्रजा के कोप और तख़्तापलट के डर से वो राजा एक बड़ा सूटकेस लिए हवाई-अड्डे आ गया ताकि जो भी जहाज़ मिले, जहाँ का भी मिले, पकड़े और नौ दो ग्यारह हो जाए। पहुँचा और बेधड़क घुसने लगा। राजा जो ठहरा। पर उसे संतरी ने रोक दिया। किसी तरह वहाँ से छूटा तो आव्रजन अधिकारी ने पासपोर्ट पर ठप्पा मारने से मना कर दिया। वहाँ से भी छूटा तो इतना भारी सूटकेस उठाए दूर तक चलना और सीढ़ियाँ चढ़ना मुश्किल लगा। पसीने छूट गए। उसने कुलियों को डाँटकर बुलाया। राजा जो ठहरा। लेकिन वे जस का तस खड़े रहे। राजा के आगे ये लोग क्या थे, कीड़े-मकोड़े! लेकिन ज़रा भी डिगे नहीं। तब राजा को लगा कि वह तभी तक राजा है जब तक प्रजा उसे राजा मानती है। नज़र बदलते दुनिया का सबसे बड़ा राजा भी कुछ नहीं एक फटे सूटकेस के सिवा।” अरुण कमल अभी भी उसी मानसिकता में है कि कुछ भी लिख दूँगा तो कविता हो जाएगी। यह गद्य में लिखी गई, किशोरों को सुनाने वाली नैतिक कथाएँ हैं। किशोरों की पत्रिका ‘नंदन’ या ‘बाल’हंस’’ में छपने लायक़, लेकिन अरुण कमल इसे कविता मानते हैं तो मैं भी मान लेता हूँ। दरअस्ल, अरुण कमल का कवि मानस अभी भी उसी लीक पर चल रहा है, जिस पर नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, केदारनाथ सिंह चले थे। इनके प्रभाव और उससे न उबर पाने की असफलता से दबा पड़ा है अरुण कमल का कवि। मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि नागार्जुन होते तो क्या इस कविता को ऐसे ही लिखते?
कवि की कविता का ग्राफ़ क्या पहाड़ चढ़ने की तरह होता है? सीधी और खड़ी चढ़ाई के शिखर पर पहुँचकर फिर नीचे उतरना पड़ता है? शिखर पर पहुँचने में काफ़ी समय, श्रम, मेहनत, ऊर्जा और जीवटता लगती है। पर उतरने में काफ़ी कम समय। लगभग तुरंत। एक धक्का या एक लुढ़कन और आप ज़मीन पर वहीं जहाँ से शुरू किए थे या फिर ऐसी दुनिया जो अनजान हो, अपहचानी हो, नई हो, एकदम अचानक से सामने आ गई नई दुनिया। और आप भौचक्के हो कि यह क्या? यह गिरना आपकी मान, प्रतिष्ठा और अब तक की यात्रा को नष्ट करना है। आज ‘आलोचना’ जैसी पत्रिका के संपादक, आलोचक और कवि परमानंद श्रीवास्तव को कितने लोग पढ़ते हैं? एक समय साहित्य अकादेमी से लेकर नामवर सिंह तक उनकी जेब में रहते थे। आज?
राजेंद्र यादव कहा करते थे कि तुम मुझे एक अच्छी कहानी दे दो, मैं ‘हंस’ को छह महीने तक जिलाये और चर्चा में बनाए रखूँगा। अर्थात् बाक़ी पाँच महीने भी ‘हंस’ निकलेगा। हर महीने सौ के हिसाब से लगभग छह सौ पेज। ये छह सौ पेज भरती के लेखक होंगे। इनकी भी ज़रूरत है, नहीं तो छह महीने तक ‘हंस’ निकलेगा कैसे? दरअस्ल, महत्त्वपूर्ण लेखन कभी-कभी ही होता है। हर दिन रूटीन के हिसाब से सुबह-शाम मिलाकर हर रोज़ दो कविता लिखने वाले कवि भी इसी संसार में है। और हर सप्ताह एक कहानी लिखने वाले कहानीकार-आलोचक भी। जो बेचारे लिखने के लिए ही जीते हैं। पर इसी तरह एक समय के महत्त्वपूर्ण कवि, संपादक और आलोचक तेलहंडे में चले जाते हैं। उनका महत्त्व वर्तमान में छह सौ पृष्ठों की भरती की सामग्री के लिए ही होता है। इसमें हम-आप कुछ नहीं कर सकते। ख़राब कविताओं का उदाहरण देना नहीं चाहता, लेकिन हर कवि हमेशा अच्छी कविता नहीं लिख सकता। रियाज़ी कविताएँ भी होती हैं हर कवि के पास और हर संग्रह में होती है। लेकिन गद्य, वो भी बच्चों के लिए नीतिपरक छोटी-छोटी कहानियाँ लिखकर उन्हें कविता नहीं कहना चाहिए अरुण कमल को। इसलिए कुछ ऊपर से लुढ़कता हुआ संग्रह है—‘रंगसाज़ की रसोई’। वैसे इसका नाम अच्छा है, ऊँची दुकान फीके पकवान की तरह।
आगे पढ़िए : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-4
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