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अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-8

सातवीं कड़ी से आगे...

आठ

अरुण कमल ‘मैं’ अर्थात् अपनी आँखों से दुनिया को देखते हैं। इसलिए विस्तार उनके यहाँ कम है। इसलिए कभी राजेश जोशी ने अरुण कमल की कविता के लिए कहा था, ‘‘उनके यहाँ कल्पनाशीलता कम है। अरुण कमल कछुआ वाली प्रवृत्ति के कवि हैं। छलाँग उनके यहाँ नहीं है।’’ इसलिए ‘लौटना’ उनका प्रिय शब्द है, जहाँ वह बार-बार ‘लौटना’ चाहते हैं। दरजिन, कल्याणी या कथावाचक में यह संभावना थी कि कविता की दुनिया में ये कविताएँ ‘टमाटर बेचने वाली बुढ़िया’, ‘मोचीराम’, ‘बलदेव खटीक’, ‘रामदास’, ‘चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती’, ‘नेवला’, ‘इंदु जी’, ‘ब्रूनो की बेटियाँ’, ‘ट्राम में एक याद’ जैसा मुकाम हासिल कर लें; लेकिन अरुण कमल की ये कविताएँ ऐसा नहीं कर पाई। वास्तव में कविता में जब चरित्र आते हैं तो वे कवि की विचारधारा, उसकी मानसिक निर्मिति, उसका इतिहास-भूगोल, संस्कृति और परंपरा को भी दिखलाते हैं। वे परंपरा का विस्तार करते हैं। परंपरा को जानना और उसका विस्तार करना दोनों दो अलग-अलग बातें हैं। अरुण कमल परंपरा को जानते हैं। बहुत अच्छी तरह जानते हैं—तुलसीदास-ग़ालिब से लेकर शेक्सपियर तक को। यह जानना और इसे बतलाने के लिए दरजिन, कथावाचक और कल्याणी जैसी कविताएँ लिखना कम बड़ी बात नहीं है। अरुण कमल ‘कम बड़ी बात’ को कविता में लिखते हैं। कभी-कभी बड़ी बातों को ‘कम’ कविता में लिखते हैं, जैसे—‘जीभ की गाथा’ कविता को देखें—“दाँतों ने जीभ से कहा—ढीठ, सँभलकर रह / हम बत्तीस हैं और तू अकेली / चबा जाएँगे जीभ उसी तरह रहती थी इस लोकतांत्रिक मुँह में / जैसे बाबा आदम के ज़माने में—/ बत्तीस दाँतों के बीच बेचारी इकली जीभ बोली, / मालिक आप सब झड़ जाओगे एक दिन / फिर भी मैं रहूँगी / जब तक यह चोला है।” (मैं वो शंख महाशंख, पृष्ठ : 55)

यह छोटी-सी कविता भी संस्कृत से लाकर हिंदी को समृद्ध करने के लिए लिखी गई है, उसी तरह कम शब्दों में। इस कविता के संदर्भ में कवि और संस्कृत के आचार्य अष्टभुजा शुक्ल को पढ़े जाने की ज़रूरत है—“इस कविता (जीभ की गाथा) में, पहले की बाल-कविता—एक बार छिड़ गई बहस जब हवा और सूरज में—की ध्वनियाँ और तर्ज़ हैं। यहाँ बड़ी विदग्धता के साथ अरुण कमल ने अपने बहुत आत्मीय और पुरखे कवि तुलसी को जैसे—बाबा आदम के ज़माने में—जिभि दसनन्हि महं जीभ बेचारी के टर्म में याद किया है। दाँतों और जीभ के इस संवाद और विवाद में दाँत वर्चस्व के प्रतीक हैं तो जीभ प्रतिवाद का। वैसे ऐसे संवाद संस्कृत में काफ़ी पहले से विद्यमान है जिसमें जीभ की उक्ति है—यूयं सर्वे पतिब्यथ (तुम सब तोड़कर गिरा दिए जाओगे) मैं कोई ऐसी एक बात बोल दूँगी—एकमेव बचो वच्मि।” (पूर्वग्रह, पृष्ठ : 204)

अरुण कमल की कम कविता ‘देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर’ है। पर जो है वह चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ की तरह दिखती तो है, है कि नहीं यह तो समय तय करेगा।

इसी तरह की उनकी एक कविता है—‘पुतली में संसार’। इस पर लिखते हुए कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने महाभारत से एक संस्कृत का श्लोक उद्धृत किया है, पहले उसका अर्थ फिर श्लोक—“ ‘गीता’ में अर्जुन का कथन है कि ‘मेरे अंगों में वेदना हो रही है और मुँह सूखा जा रहा है। मेरा शरीर काँप रहा है और मुझे रोमांच हो रहा है। हाथ से गाण्डीव छूट रहा है और त्वचा भी जल रही है। मैं खड़ा रहने में असमर्थ हूँ, अपने को भूल रहा हूँ और मेरा मन भटक रहा है....’

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥

उपर्युक्त श्लोकों की अनुगूँज अरुण कमल की इन काव्य-पंक्तियों में साफ़ सुनाई पड़ती है—

इतने घट्ठों इतने ठेलों भरी देह में यह कैसा कंपन
मैं सारे मंत्र भूल रहा हूँ
सारी सिद्धि निष्काम हो रही है
ढीली पड रही है उँगलियाँ
पसीने में मुट्ठी का कसाव कम
मेरे पाँव हिल रहे हैं
कंठ सूख रहा है—
मुझे तो देखना था बस आँख का गोला
और मैं इतना अधिक सब कुछ क्यों देख रहा हूँ देव्।

(पहल-79, पृष्ठ : 184-85)

पंकज का आभार कि अब मुझे भी यह अनुगूँज साफ़-साफ़ सुनाई दे रही है।

आगे पढ़िए : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-9

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