अपना नोबेल चाँद से भी दूर क्यों लगता है?
शशांक मिश्र
07 अक्तूबर 2026
हर साल अक्टूबर आते ही एक अलग बयार चलने लगती है। शिउली के फूल खिलते हैं। रावण जलते हैं। नोबेल मिलते हैं। नवंबर में दिसंबर आने की भड़भड़ भरी रहती है। अक्टूबर चौदहवीं का चाँद है। यानी तनिक गुंजाइश है—गति धीमी भी चलेगी, ऐसी निश्चिंतता। त्योहारी सीज़न, धूलकणों में घुलती हल्की ठंड, गर्म कपड़ों की धूप दिखाई—सब तो है ही।
बचपन का अक्टूबर तो अभी भी ठेले से हरी चटनी के साथ उस पुराने रद्दी अख़बार से बने लिफ़ाफ़े में धरी, अभी-अभी कढ़ाही से निकली गर्म मूँगफलियों में क़ैद है, जिस पर लिखा होता था—‘कड़ाके की ठंड के चलते कक्षा 1 से 8 तक के स्कूल 15 जनवरी तक बंद रहेंगे।’
पहले रोडवेज़ बसों में किन्नरों से पहले एक सज्जन घुसा करते थे। एक हाथ में तमाम मेल की कलाई घड़ियाँ पकड़े होते थे और दूजे में होती थीं जनरल नॉलेज की ढेर सारी किताबें। बहुत दूर की बात तो नहीं, लेकिन मुझ जैसे सैकड़ों उत्तर भारतीयों ने उन्हीं किताबों से रटा है कि ईटानगर, अरुणाचल प्रदेश की राजधानी है। उन किताबों में एक चीज़ खास होती थी—उस साल के नोबेल विजेताओं के नाम भी पता चलते थे। अब जब से बड़े हुए हैं, हमारे लिए अक्टूबर नोबेल पुरस्कारों की घोषणाओं का भी महीना है।
यूरोप में एक देश है। नाम है स्वीडन। यहीं 19वीं शताब्दी में महान् वैज्ञानिक और आविष्कारक अल्फ़्रेड नोबेल पैदा हुए। इनकी ज़िंदगी जुनून में कटी। ख़ूब चीज़ें खोजीं-बनाईं। आगे चलकर इन्होंने एक ऐसा विस्फोटक विकसित किया, जिसका नाम पड़ा ‘डायनामाइट’। इनकी उपलब्धियों में तीन सौ पचास से अधिक पेटेंट भी शामिल थे। पेटेंट मिलने का मतलब है कि आविष्कारक को अपने आविष्कार के निर्माण, उपयोग या बिक्री पर क़ानूनी एकाधिकार मिलता है। 63 साल का अपना जीवन पूरा करते-करते इन्होंने वसीयत भी लिखी। उसी में ख़्वाहिश थी कि उनकी संपत्ति के बड़े हिस्से से एक ट्रस्ट बने और मानवता के हित में उत्कृष्ट योगदान देने वालों को हर साल पुरस्कार दिए जाएँ।
‘उत्कृष्ट मानवसेवा’ की इस योजना के दो अजब-ग़ज़ब ध्रुव भी हैं, जिनकी दूरी आप दोनों हाथ दाएँ-बाएँ फैलाकर भी नहीं माप सकते। नोबेल शांति पुरस्कार के लिए एडॉल्फ़ हिटलर एक बार और महात्मा गांधी 12 बार नामांकित हो चुके हैं। बड़ी बात यह है कि दोनों के नाम शांति पुरस्कार के लिए भेजे गए, लेकिन दोनों को ही यह पुरस्कार नहीं मिला।
और अब हालत यह है कि नोबेल पुरस्कार भी हर आदमी का ‘मानो तो गंगा माँ हूँ, न मानो तो बहता पानी’ है। कुछ लोग इसे श्रेष्ठ बताएँगे, इसके गुण गाएँगे तो कुछ कहेंगे कि यह यूरोप-केंद्रित है या पश्चिम जिसे चाहे, उसे ही देता है। सारी बहसें एक तरफ़ हैं, लेकिन इंस्टाग्राम रील के कॉन्टेंट की तर्ज पर कहें तो आज भी नोबेल का ‘AURA 1000+’ है।
लेकिन हर साल अक्टूबर में हमें मिलता है—नोबेल विजेता का नया नाम। ये नाम ऐसे होते हैं जिन्हें एक बार में सही-सही बोला ही न जा पाए। अगर नाम का उच्चारण सही हो भी जाए तो जिस काम के लिए उन्हें यह पुरस्कार मिला है, उसे समझने की जद्दोजहद में आप पूरा खप जाएँगे। ट्विटर (अब X) पर किसी ने वर्ल्ड मैप पर फिज़िक्स के नोबेल विजेताओं के जन्मस्थान दर्शाते हुए एक तस्वीर साझा की थी। तमाम लाल बिंदियाँ फैली थीं। भारत में सिर्फ़ एक थी। वह भी धीरे-धीरे शताब्दी पुरानी होने वाली है।
आलम यह है कि इस देश में साइंटिफिक टेंपरामेंट झलझला जा रहा है। यहाँ किसी बात पर ‘क्यों और कैसे’ की जगह ‘कहाँ और कब’ हावी है। मुझे पिछला अक्टूबर याद आ रहा है। वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार प्रियदर्शन ने साहित्य के नोबेल की घोषणा की पूर्वसंध्या पर हिंदी के सात दावेदारों के नाम एक यूट्यूब वीडियो में बताए। लेकिन यह वही बात साबित हुई—‘न चाची की मूँछें होंगी, न चाचा कहलाएँगी।’
इधर देश की कुछ ख़बरें हैं, जो इसके इतिहास और वर्तमान से नत्थी हैं। मैं यहाँ बिना किसी विचार के उन्हें लगा रहा हूँ :
• अगस्त, 2026 : Astrotalk ने 1 अरब डॉलर का मूल्यांकन हासिल कर भारत का नया यूनिकॉर्न बनने का दावा किया।
• सितंबर, 2025 : आईआईटी-बीएचयू में ‘मिथकों से विज्ञान तक’ किताब के लेखक गौहर रज़ा का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया।
इसी अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के दिन चाँद धरती के सबसे क़रीब होगा, लेकिन अपना नोबेल इतना दूर क्यों लगता है?
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