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आज ‘बेला’ का दूसरा जन्मदिन है

आज से दो वर्ष पूर्व वे देवियों के दिन थे, जब हिन्दी और ‘हिन्दवी’ के व्यापक संसार में ‘बेला’ का प्राकट्य हुआ था। देवियों की उपस्थिति और कला—रूप और कथ्य दोनों ही स्तरों पर—अत्यंत समृद्ध होती है। यह समृद्धि मनुष्य की रक्षा करती है और भाषा की भी।

‘बेला’ के शुभारंभ के लिए हमने 9 अप्रैल की तिथि चुनी थी। यह तिथि प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना और राहुल सांकृत्यायन की जन्मतिथि के रूप में समादृत है। इससे पूर्व वर्ष 2020 में हमने ‘हिन्दवी’ के शुभारंभ के लिए 31 जुलाई यानी प्रेमचंद-जयंती की तारीख़ चुनी थी। इससे हमारे वैचारिक रुझान की एक तस्दीक़ हो सकती है, हालाँकि हम यह भी मानते हैं कि प्रतिकार और कदाचार दोनों पर ही किसी विशेष रंग और विचार का एकाधिकार नहीं है।

हिन्दवी बेला का शुभारंभ एक ऐसे अदबी ठिकाने की तलाश में हुआ, जहाँ सिर्फ़ अदब ही नहीं; आर्ट और कल्चर और ज़ुबानों में रोज़-ब-रोज़ क्या हुआ, हो रहा और होने वाला है... इसकी इंदराजी नज़र आए। यह रजिस्टर कुछ इस क़दर खुले कि एक ऐसी घड़ी की शक्ल ले ले; जिसे कला, साहित्य और संस्कृति का समय जानने के लिए जब चाहे देखा जा सके।

गए दो वर्षों में हमने ‘बेला’ पर सबसे ज़्यादा जिस चीज़ का ध्यान रखा है, उसे समय में नियमितता कहते हैं। नियमितता—यानी regularity, नियमबद्धता, बाक़ायदा। रात-बिरात, दिन-दिनांत, देह-देहांत, अवकाश-अनवकाश, हारी-बीमारी, आँधी-पानी, शीत-लू, बाढ़-भूकंप, युद्ध-शांति, पलायन-विस्थापन, सुख-दुःख, आगमन-प्रस्थान... हमने किसी भी प्रकार की बाधा से ‘बेला’ की नियमितता को प्रभावित नहीं होने दिया। इस साधना-अनुशासन में ‘बेला’ पर गत 730 दिनों में 800+ और गत 365 दिनों में 400+ पोस्ट्स प्रकाशित हुई हैं और 200+ रचनाकार जुड़े हैं। हमने पाठ-वैविध्य और हस्तक्षेप के सम्मिलित स्वर-शैली में ‘बेला’ का संसार संभव करने की कोशिश की है।

आज हमारे पास इतनी रचनात्मक सामग्री है कि हिंदी समाज तत्काल कुछ नया लिखना हमेशा के लिए बंद भी कर दे, तब भी हम दो साल तक नियमित नया प्रकाशित कर सकते हैं।

इस पर भी ‘बेला’ पर फ़रमाइशी लेखन कभी प्रकाशित नहीं होता है। हमें इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती है; क्योंकि ‘बेला’ पर प्रकाशन के लिए आई रचनाएँ, समीक्षाएँ और सूचनाएँ इतनी ज़्यादा हैं कि हम अपनी सारी नियमितता के बावजूद उन्हें ही समय पर प्रकाशित नहीं कर पाते हैं। इसलिए हम फ़िलहाल रचनाएँ नहीं, क्षमा माँगने की स्थिति में हैं।

दरअस्ल, तात्कालिक महत्त्व की चीज़ों को हमें जल्द से जल्द प्रकाशित करना पड़ता है; क्योंकि एक वक़्त के बाद, वे उतनी प्रासंगिक नहीं रह जाती हैं। हम यह मानते हैं कि स्थायी महत्त्व की रचनाएँ धैर्य और उत्सुकता से सबल होती हैं।

रचनाओं का आकांक्षित मंगल उनके अभ्यस्त संस्कार के अंतराल में रहता है। ये संस्कार विकसित करने में प्रकाशन-स्थलों का महत्त्वपूर्ण योगदान है, जहाँ से एक रचनाकार की कमज़ोर रचनाएँ बार-बार वापस आती हैं। उन्हें अस्वीकृत किया जाता है या थोड़ी गुंजाइश होने पर पुनः उन पर काम करने, फिर भी बात न बनने पर एक बार और काम करने के लिए कहा जाता है... अंततः प्रकाशन बहुत प्रतीक्षा, परिश्रम और अध्यवसाय का परिणाम है। ऐसी प्रक्रियाओं से गुज़रकर ही स्थायी महत्त्व की रचनाएँ आकार लेती हैं; फिर कहीं जाकर इनका एक संग्रह बनता है और उसके लिए भी वैसी ही प्रतीक्षा, मेहनत और अध्ययनशीलता दरकार होती है—जैसी रचना-प्रकाशन के लिए। दरअस्ल, रचे जाने का जो आंतरिक अचीवमेंट होता है—वह महफ़िलों, जनसंपर्कों और जल्दबाज़ियों से हासिल नहीं हो सकता। महफ़िलों, जनसंपर्कों और जल्दबाज़ियों से जो हासिल होता है; वह हम अपने आस-पास रोज़-ब-रोज़ देख ही रहे हैं।

इस समय जब लेखक प्रसिद्धि, स्वीकृति और वैधता पाने के लिए लिटरेरी एजेंटों, प्रकाशकों और सोशल मीडिया के प्लान ख़रीद रहे हैं; सब तरफ़ प्रबुद्धता और संदिग्धता का अजब संगम है, कवियों-लेखकों की भाषा—कवियों-लेखकों की भाषा-सी नहीं लग रही है; ऐसे में हम यह बताना ज़रूरी समझते हैं कि हम गढ़ी गई छवियों, छद्म आभामंडलों और क़िस्तों पर ख़रीदे गए ब्लू टिकों से आक्रांत, भयभीत और प्रभावित नहीं होते हैं।

जैसे संसार की सारी प्रकाशन-संस्थाएँ मानती हैं; हम भी यह मानते हैं कि लेखक के विचार लेखक के ही होते हैं और संपादक, प्रकाशक, प्रकाशन-स्थल उन्हें सामने भर लाते हैं... ताकि अभिव्यक्ति, हस्तक्षेप और संवाद की संस्कृति सुरक्षित रहे। लेकिन हिंदी में गठजोड़ और स्वार्थ इस क़दर प्रबल हैं कि लोग दिमाग़ और आँख मूँदकर संदेह करते हैं, और इस तरह ही विश्वास।

इस दृश्य में ‘बेला’ की भूमिका-मंशा बीच बहस में कूदने की नहीं है। हम या तो बहस शुरू करते हैं या उसका पटाक्षेप करते हैं, हालाँकि कवि कह चुका है :

बहस नहीं चल पाती
हत्याएँ होती हैं

फिर जो बहस चलती है
उसका भी अंत हत्याओं में होता है

‘बेला’ पर हम न Provoke करते हैं, न Provoke होते हैं।

हिंदी में इधर सादा चीज़ों का प्रचार-प्रसार करने की कोशिशें कुछ ज़्यादा ही की जाने लगी हैं; इससे प्रतीत होता है कि मानो हिंदी एक बीमार भाषा है और इसे अपनी स्वस्थ, चटक और उल्लसित परंपरा याद नहीं है। यों भी नहीं है कि यह सादगी उच्च विचारों से संचालित हो या उस ओर अग्रसर हो। यह सादापन प्राय: अपनी कायरताओं, धूर्तताओं और धाँधलियों को छुपाने के लिए गंभीरता का आवरण धारण करता है।

कुणाल कामरा के हास्यबोध, व्यंग्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कट्टर समर्थक स्वयं और अपने निकटस्थों के प्रसंग में हुए व्यंग्य से अत्यंत आहत हो उठते हैं, मंडलियाँ बनाकर अनैतिकतापूर्ण ढंग से हमलावर होते हैं, गंदी-गंदी गालियाँ देते हैं, झूठे आक्षेप लगाते हैं, अफ़वाहें और ग़फ़लत फैलाते हैं, दृश्य को विषाक्त करते हैं, संपादकीय विवेक और स्वतंत्रता की हत्या करते या चाहते हैं... यह एक चुनी हुई दृष्टिहीनता है, जो आपको और चाहे जो बना दे—ईमानदार, नैतिक और लोकतांत्रिक नहीं बना सकती।

‘बेला’ के दो बरस के सफ़र में देखने वाले देख सकते हैं कि यहाँ हिंदी की सबसे नवीन पीढ़ी और विचारोत्तेजक आवाज़ें दर्ज हुई हैं। हमने दैनिक अख़बारों के फ़ीचर विभाग की पुरानी, लेकिन अब डूब-धुँधला चुकी विरासत को ‘बेला’ के ज़रिये ऑनलाइन नवीकृत एवं अद्यतन करने और बचाने की कोशिश की है। इस प्रयत्न में हमने वैचारिकता, प्रतिबद्धता और सुंदरता को अशक्त नहीं होने दिया है। हमें व्यक्तियों के आहत होने से ज़्यादा चिंता, मूल्यों के आहत होने की है। हमने ‘बेला’ की भाषा को अख़बारी ढंग से साहित्यिक और साहित्यिक ढंग से अख़बारी बनाने पर बल दिया है।

हमने हिंदी की ऑनलाइन साहित्यिक पत्रकारिता में स्तंभ-लेखन की वापसी कराई है। हमारी देखा-देखी दूसरे मंच भी अब इस यत्न में संलग्न हुए हैं। यह ख़ुशी की बात है। व्यंग्य से बचने वाले मंच अब उसकी धार से घायल होने को तैयार हैं, यह ‘बेला’ की कामयाबी है। हमने स्तंभ-लेखन में नवाचार को प्रमुखता से प्रवेश दिया है। इस क्रम में जेएनयू क्लासरूम के क़िस्सेजापान डायरीसूफ़ी साहित्य की तस्वीरकाम से मुक्तिClubhouse के दिनों सेक़ुबूलनामा जगह-जगह, रविवासरीय : 3.0, दास्तान-ए-गुरूज्जीस, इलाहाबाद तुम बहुत याद आते हो!, बिंदुघाटी, कवियों के क़िस्से वाया AI, AI : वाह! क्या एक्टिंग कर रहा है, विकुशुयोग [विनोद कुमार शुक्ल के देहावसान की तिथि (23 दिसंबर 2025) से लेकर उनकी जन्मतिथि (1 जनवरी 2026) तक प्रतिदिन उन पर केंद्रित एक आलेख], ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’ [अरुण कमल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित दस क़िस्तों एक आलेख] जैसे स्तंभ शुरू और सफलतापूर्वक समाप्त हुए; वहीं जगह-जगह 2.0, रविवासरीय : 4.0, रागदर्पण, शंखनाद और रीलमरील जैसे स्तंभ जारी हैं और भविष्य में कुछ नए स्तंभ प्रस्तावित हैं, आने वाले हैं।

इस वर्ष ‘बेला’-प्रसंग में एक सुखमय संयोग यह भी जुड़ा है कि दैनिक भास्कर—‘हिन्दवी’ के साथ एक विशेष अनुबंध के तहत, प्रत्येक रविवार को अपने लोकप्रिय स्तंभ ‘रसरंग’ में हिन्दवी बेला पर प्रकाशित लेखों को पुनर्प्रकाशित कर रहा है।

सूचना और रपट, सिनेमा और रंगमंच, यात्रा और स्मरण, समीक्षा और संस्मरण, कथा और कथेतर, संवाद और अनुवाद, विवाद और अपवाद, प्रश्न और प्रसंग, अलंकार और पुरस्कार, लोक और अध्यात्म, सुझाव और सलाह, मत और पत्र, संगीत समारोह और पुस्तक मेले, अवसाद और  दुर्लभ तस्वीरों से ‘बेला’ ने दो वर्ष के भीतर-भीतर ही एक ऐसी आर्काइव तैयार कर दी है, जिसकी समकालीनता और विश्वसनीयता चकित करती है।

इस अवसर पर हम अपने सभी रचनाकारों, कलाकारों, स्तंभकारों, रिपोर्टरों, अनुवादकों, सलाहकारों, शुभचिंतकों, धूमकेतुओं, इंद्रधनुषों, तारों, ग्रहों, उपग्रहों, नक्षत्रों, स्रोतों को पूरे दिल से शुक्रिया कहते हैं। आप सबके बग़ैर ‘बेला’ के शुभारंभ का यह वैविध्यमय विस्तार संभव नहीं हो सकता था और भविष्य में भी इस विस्तार के विस्तार में आपका योगदान होना ही है।

‘बेला’ की नियमितता को निर्बाध रखने में ‘हिन्दवी’ के संपादकीय, सोशल मीडिया और कला-विभाग की भी बड़ी भूमिका है। इस सिलसिले में हरि कार्की, रचित और संचित भट्ट के नाम बहुत उल्लेखनीय हैं।

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