रूमा निषाद के बेला
घाटों पर बदलता बनारस
चइत की एक शाम अस्सी घाट पर चइत [चैत] चल रहा है। गुलमोहर में लाल-लाल फूल आ गए हैं। महुए रस से भर गए हैं। दिन-रात टप-टप-टप चू रहे हैं। आम के मंज़र अब टिकोरे में बदल गए हैं। गेहूँ की बालियाँ पक गई है
17 जून 2026
राप्ती से गंगा तक, गंगा से राप्ती तक
राप्ती से गंगा तक राप्ती एक सदाबहार नदी है जो मेरे गाँव से लगकर बहती है। मेरे घर के छत से उसकी विशालता को देखा जा सकता है। मेरा बचपन इसकी धाराओं के साथ खेलने में बीता है। इसकी नन्हीं-नन्हीं मछलियो