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ज्ञानेंद्रपति से बातचीत : कुछ कहा, कुछ रह गया

‘हिन्दवी’ के वार्षिक आयोजन ‘हिन्दवी उत्सव’ [23 अगस्त 2026] के लिए ज्ञानेंद्रपति जी को बनारस से लेकर मेरा इलाहाबाद जाना तय हुआ था। मेरी एक कविता पर हिंदी समय-समाज आंदोलित था और मैं भीतर से बेतरह भरा हुआ। घर से तय करके चला था कि रास्ते भर फ़ोन नहीं देखूँगा। 

यदि मुझमें थोड़ा साहस होता तो यहाँ प्रस्तुत साक्षात्कार और बेहतर हो सकता था। थोड़ा अवकाश मिला होता तो मैं कुछ तैयारी कर सकता था। लेकिन वह सब मुमकिन नहीं हो पाया। मारे संकोच के मैं बहुत-से सवाल नहीं पूछ पाया; मसलन उम्र पकने के पहले चिह्न आपको सबसे पहले कौन-से दिखे थे, एकाएक तो नहीं इतने वयप्राप्त हो गए होंगे... जीवन में आई और रह गई स्त्रियों पर भी कुछ पूछने की इच्छा मेरे भीतर थी। अगर मैं पूछता तो वह अवश्य, कुछ ठहरकर सही, एक बहुत मौलिक जवाब देते। लेकिन मैं प्रोब नहीं करना चाह रहा था। उनकी निजता का हनन भी नहीं। मैं कुछ चाहता था तो उनके आस-पास फैले झुटपुटे-झुरमुटे रहस्य को पाटना। रिसर्च के एथिक्स मेरे आड़े आ रहे थे। बिना इन्फ़ॉरर्म्ड कंसेंट के कैसे कोई साक्षात्कार संभव है! 

यदि आपने सहज जिज्ञासा के चलते कुछ पूछा और एक बहुत विनीत कवि ने आपके सामने अपना हृदय, अपना जीवन आदि खोलकर रख दिया तो यह उसका बड़प्पन है। जब ज्ञानेंद्रपति जी ने बातें बतानी शुरू कीं, तो पहले-पहल मुझे लगा कि यह क्यों इतना सब बता रहे हैं! हम आज ही तो मिले हैं। क्या मैं इतनी जल्दी किसी के आगे खुल पाता! रिफ़्लेक्सिविटी की एक एक्सरसाइज़ भी मेरे भीतर चले जा रही थी। 

ज्ञानेंद्रपति जी स्मृतिधन्य हैं। ऐसे बहुत कम सवाल थे, जिनका जवाब देने के क्रम में वह भीतर-से कुछ उलीचते हुए लगे हों, उजलत के भी कोई निशान उधर नहीं मिले। जैसे सब बिल्कुल उनके सामने मौजूद था। बहुत से बीत गए लोगों के लिए वह ‘हैं’ का प्रयोग कर रहे थे, ‘थे’ का नहीं। उनके लिए सब घट चुका नहीं था। घट रहा था।

कहना न होगा मैं साक्षात्कार ले नहीं रहा था, ज्ञानेंद्रपति जी साक्षात्कार-सा कुछ देने लगे थे और मैंने अब उसे केवल दर्ज भर किया है। उनके पास बहुत-से स्वनामधन्यों से मिलने की कथाएँ हैं; एक बहुत इवेंटफ़ुल जीवन और उसके अपने उतार-चढ़ाव, जिसे बस वह वाक्य में पिरो-भर दे रहे थे।

बहुत देर तक हम कुछ न बोलते, एक चुप्पी की चादर घिरी रहती... फिर अचानक मुझे कुछ कौंधता और दिन की उमस कुछ टूटती। मेरे सवाल न होते तो एक तंद्रा की-सी अवस्था में वह सारा सफ़र काट सकते थे। वह अचानक मेरी ओर से उछले सवाल से कुछ चौंक जाते। सुनने में कुछ समस्या थी या वह किसी काव्यदिशा में डूबने लग जा रहे थे और मैं उन्हें टोक दे रहा था; मुझे नहीं मालूम, वह बस यह जान पाते कि कुछ बोला गया है। फिर मैं अपना सवाल दोहराता और वह उस यांत्रिक-से सवाल के एवज़ में बहुत समृद्ध करता जवाब देते।

यह साक्षात्कार-सा कुछ बनारस से इलाहाबाद की ओर जाते और इलाहाबाद से बनारस लौटते बखत एक चलती हुई गाड़ी में संभव हुआ है, इसलिए इसमें एक तरह की गति और प्रवाह सहज ही चला आया है। अर्टिगा में सवार हम पाँच लोग थे। माण्डवी आगे ड्राइवर के बग़ल बैठी थी। बीच में मैं और ज्ञानेंद्रपति जी। और पिछली सीट पर कल्याणी। हम सुबह आठ बजे बनारस से निकल गए थे। राजमार्ग वन-वे हो रखा था। काँवड़िए नंगे पाँव छोटी-छोटी टुकड़ियों में आते हुए दिख जा रहे थे। मैं एक आइसब्रेकर की तलाश में था कि तभी वह बोल पड़े...

ज्ञ : इधर के काँवड़िए उस तरह उत्पाती नहीं हैं, जैसे पश्चिमी यूपी के... बिहार-झारखंड में भी काँवड़-यात्रा होती है, लेकिन वैसा उपद्रव नहीं होता है। सुल्तानगंज से गंगा का पानी लेकर वैद्यनाथ धाम जाते हैं—मेन रोड पर गाड़ियाँ चल ही रही होती हैं, बहुत कम दूरी का पक्का रास्ता है। फिर समानांतर कच्ची सड़क, जो नंगे तलवों के लिए आरामदेह होती है, से आगे का रास्ता तय करते हैं। उधर यह मान्यता है कि अगर किसी से स्पर्श हो गया तो काँवड़ खंडित हो जाती है और यात्रा पूरी नहीं हो पाती। वह मानते हैं कि बाबा की इच्छा के बिना हम कुछ नहीं कर सकते, अगली बार फिर लेकर आएँगे; इसलिए उधर वह समस्या नहीं है, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होती है। इसलिए वे खेदग्रस्त चाहे जितने हों, वाचिक क्रोध तक प्रकट नहीं करते। ‘प्रकृति और कृति’ में ‘सावन में देवघर’ शीर्षक कविता में काँवड़-यात्रा का चित्रण मिलेगा। ध्यान दीजिए तो स्पष्ट होगा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काँवड़ियों की उपद्रवधर्मिता पिछले दशक में बढ़ी है। इसे योजना और यत्न-पूर्वक उनके द्वारा बढ़ाया गया है जो इस तरह उपद्रवी जेन-ज़ी की अपनी फ़ौज खड़ी करना चाहते हैं और प्रगतिकामी, प्रश्नाकुल जेन-ज़ी की आँखों से आँखें नहीं मिलाना चाहते। इस तरह आत्म-शुद्धि के एक परंपरा-निर्मित मार्ग को सत्ता तक पहुँचने या सत्ता में बने रहने के एक सुगम रास्ते में बदल दिया गया है।

इतने में माण्डवी बोल पड़ी, “झारखंड की सड़कें बिहार से अच्छी हैं...”

ज्ञ : हाँ, उसके कारण हैं कि वहाँ कोयले की खदाने हैं, अन्य खनिजों की भी। उन्हें वहाँ से ले जाने के लिए वे सड़कें बनी हैं, उनका अच्छा होना आवश्यक है। ‘संशयात्मा’ में आपको एक कविता मिलेगी—‘एक आदिवासी गाँव से गुज़रती सड़क’—जिसमें इन सड़कों के समाजशास्त्र के वास्तविक मर्म को बताया गया है। वे उन क्षेत्रों के विकास के लिए बढ़ी सभ्यता की बाँह नहीं हैं। ... [कुछ रुककर] इन खदानों में हादसे होते रहते हैं। कई बार लोग खदानों में दबकर मर जाते हैं, जिसके लिए वो आउटसोर्स कंपनी ज़िम्मेदार होती है, जो लोगों को बहाल करती है। जहाँ से खनन पूरा हो चुका है और जगह छोड़ी जा चुकी है, वहाँ से लोग खँखोलकर कोयला निकालते हैं। इन गड्ढों में जो लोग अवैधानिक तरीक़े से काम करते हुए मर जाते हैं; उनका कोई पे-रोल नहीं होता, इसलिए सब अनजाना रह जाता है। ये लोग साइकिल पर दोनों तरफ़ भरे बोरे लटकाए साठ-सत्तर किलोमीटर तक, साइकिल को ठेलकर कोयला ले जाते हैं। साइकिल के केवल दोनों पहिये पक्की सड़क की किनारी पर होते हैं और वे बग़ल के कच्चे रास्ते पर चलते हुए ठेलते जाते हैं। उनकी रीढ़ की हड्डी तक टेढ़ी हो जाती है और कई बार असमय जान चली जाती है। उनके पास इससे बेहतर काम करने के कोई विकल्प भी नहीं हैं। सरकार ने अब मनरेगा से भी अपने हाथ कुछ खींच लिए हैं। ऐसे और हादसे होंगे, जिनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाएगा।

एक लंबी खिंची हुई चुप्पी रही। मैंने उनसे पूछा कि सर क्या आप कुछ खाएँगे? उन्होंने कहा, “नहीं, छेना खाकर चला हूँ। आप लोगों को भूख हो तो आगे कहीं रुकवा लीजिएगा। कहीं कुछ तैलीय खाने से अच्छा होगा कि ऐसी किसी जगह रुकें जहाँ ताज़ा सिंकी रोटी मिल जाए और चाय...”

क : बनारस कैसे आए? क्या परिवार के लोग बनारस में पहले से रहते थे?

ज्ञ : बनारस कैसे आया? आप मेरी कविता ‘सबसे साफ़ : त्रिलोचन’ जब पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि मैं यहाँ कैसे आया।

…आपको पता हो कि न हो 
बनारस आपका ही दिया है मुझको 
आपकी संगत में ही 
सँकरी गलियों के गर्भगृह में 
विराजते आत्मिक खुलेपन का
भेद मिला 
आपकी संगत में ही 
गंगा की बाँक 
अँकवारती ममतामयी बाँह बनी मुझको 
मैं तो आवारागर्द कॉलेजी छोरा था पटनिया 
खाता-फिरता यहाँ-वहाँ पटकनिया 
आता था बाँके नगर से मिलने 
जहाँ दूर-दूर से आते हैं लोग 
दूर-दूर ही रह जाते हैं
यह तो आप थे कि दोस्ती कराई 
और कित्ती गाढ़ी!

सुन, ठठाकर हँसे कवि त्रिलोचन 
हँसते-हँसते आँखों में आँसू आ गए

मेरा छोटा-सा घर 
भर गया निनाद से…

क : आप त्रिलोचन जी से पहली बार कब मिले?

ज्ञ : पहली बार मुझे याद है कि मैं उनसे पटना में ही मिला था, हिंदी साहित्य सम्मेलन में आयोजित एक कवि गोष्ठी में। उधर किसी सज्जन ने अपनी डायरी से एक सॉनेट सुनाया। उस सॉनेट की अगली पंक्तियाँ त्रिलोचन पहले ही से जान ले रहे थे—बुदबुदाते-से। मैंने उनसे बाद में चाय पीते हुए पूछा कि आप कैसे एंटीसिपेट कर रहे थे—उस कविता को पहले ही, तो उन्होंने बताया—“क्योंकि वो मेरा ही सॉनेट है, लगता है वह सॉनेट पढ़ते हुए इन्हें बहुत पसंद आया और उसे इन्होंने अपनी डायरी में नोट कर लिया, लेखक का नाम दर्ज किए बग़ैर। इससे इनकी ऊँची पसंद पता चलती है”—यह कहकर त्रिलोचन ठठाकर हँसे, साथ चाय पी रहे हम सब भी।

त्रिलोचन बहुत बड़े सॉनेटकार हैं। उनके जैसे अँग्रेज़ी में भी किसी ने सॉनेट नहीं लिखे हैं... ‘चीज़ किराये की है’—ये त्रिलोचन का एक सॉनेट है। हमारे एक प्रोफ़ेसर थे, कपिल मुनि तिवारी, जिनका त्रिलोचन के सॉनेट्स पर इस शीर्षक से ही एक लेख है। उन्होंने बताया है कि त्रिलोचन के पास सॉनेट के अपने मॉडल्स हैं। सॉनेट विधा इटली-प्रसूत रही है, तमाम यूरोपीय भाषाओं में फैली हुई। लेकिन किसी यूरोपीय भाषा में भी वैसे सॉनेट नहीं हैं। यूरोपीय सॉनेट व्यक्ति-मन की अभिव्यक्ति के रूप में सामने आते हैं। शेक्सपीयर ने भी सॉनेट लिखे जिनमें उनकी व्यक्तिगत ज़िंदगी के सुराग़ ढूँढ़े जाते हैं, यौन रुझान तक। त्रिलोचन ने अपने सॉनेटों में भारतीय समाज के सामूहिक मन को अभिव्यक्ति दी। उन्होंने सॉनेट को भीतर से बदल दिया। उनके सॉनेटों में ग़ज़ब की क्रियाशीलता भरी है, जीवन की गतिविधियाँ, प्रकृति के आत्मीय चित्र, लोगों के हर्ष-विषाद। अमूमन यूरोपीय सॉनेटों के दो मॉडल मिलते हैं। एक में आठ पंक्तियों और फिर छह पंक्तियों के दो खंड होते हैं। दूसरे मॉडल में तीन क्वार्टेट्स और एक कपलेट। त्रिलोचन ने दोनों मॉडल्स में सॉनेट लिखे हैं। नवीनता यह है कि त्रिलोचन वाक्य में कविता लिखते हैं, अर्थात् वाक्य अनिवार्य रूप से एक पंक्ति में पूरा नहीं भी हो सकता है, अगली पंक्ति के बीच तक या कहीं तक जाता हुआ हो सकता है। इनके अतिरिक्त लगातार अविभाजित चौदह पंक्तियों का मॉडल भी, जिसे निराला ने अपनाया था, त्रिलोचन के यहाँ मिलता है। सॉनेट तो प्रसाद, निराला और पंत ने भी लिखे। प्रसाद अपने सॉनेट को ‘चतुर्दशपदी’ कहते हैं और निराला—छोटी रचना—जिसके नमूने ‘अणिमा’ में मिलते हैं। पंत की जो निराला के प्रति कविता है, निराला को निवेदित कविताओं में मेरी दृष्टि में सर्वोत्तम, जो कुछ इस तरह शुरू होती है—“छंद-बंध-ध्रुव तोड़, फोड़ कर पर्वत-कारा / कवि तेरी कविता-धारा मुक्त अबाध अमंद रजत निर्झर-सी निःसृत...” एक सॉनेट ही है। त्रिलोचन ने निराला की तरह ही दोनों हाथों से कविताएँ लिखीं। सॉनेट में रोला छंद का प्रयोग किया, बरवै लिखे, गीत-प्रगीत, तो ‘नगई महरा’ और ‘भोरई केवट के घर’ जैसी मुक्तछांदिक कविताएँ भी जो निराला की ‘नये पत्ते’ में तलाशी गई ज़मीन पर आगे की यात्रा करती हैं। त्रिलोचन सहजता के सौंदर्य को उकेरनेवाले कवि हैं। भाषा में निरलंकार पर सावधान, व्यक्तित्व में निरहंकार पर स्वाभिमानी। 

क : उनसे हेल-मेल कैसे हुई?

ज्ञ : पटना में हुई पहली मुलाक़ात की बात बताई ही। दूसरी मुलाक़ात बनारस में उनके आवास पर हुई, जो रथयात्रा चौराहे के पास निराला निवेश कॉलोनी में किराये का एक घर था, बल्कि उस घर का एक छोटा हिस्सा जिसके बड़े हिस्से में मेरे एक मित्र बी.एच.यू. के प्रोफ़ेसर भी किरायेदार थे। जब उनके यहाँ अपने एक कविमित्र अक्षय उपाध्याय के साथ, जो एक साथ बनारसी और कलकतिया दोनों थे, पहुँचा तो त्रिलोचन बिस्तरे पर पालथी मारे बैठे थे। सामने एक थाली रखी थी जिसमें तीन कच्चे करेले पड़े थे। त्रिलोचन ने स्वागत किया और साथ करेले खाने का आमंत्रण दिया। अक्षय ने मना कर दिया। मैंने हथेली फैलाई और त्रिलोचन ने देखभाल कर सबसे खिच्चा करेला उस पर रखते हुए कहा : “करेले से ख़ून ही नहीं दिमाग़ भी शुद्ध होता है...” हम सब हँसे। करेले के अजाने कड़वे स्वाद की मीठी स्मृति मन में बसी हुई है, दिमाग़ पूरा-पूरा शुद्ध हो पाया हो या नहीं। त्रिलोचन की संगत में बनारस की गलियों में पदचारी करने का सिलसिला, जब भी बनारस आता, चलता रहा। 

क : उस वक़्त त्रिलोचन जी क्या कर रहे थे?

ज्ञ : त्रिलोचन कई भाषाएँ जानते थे—संस्कृत और अँग्रेज़ी के अलावा फ़ारसी और अरबी भी, अवधी भाषी और ‘अमोला’ के कवि तो थे ही, भोजपुरी पर भी अधिकार था। बीच-बीच में किसी स्कूल में भी पढ़ाते रहे। कई अख़बारों के लिए काम किया। कुछ दिन नागरी प्रचारिणी सभा के लिए भी। अख़बारों के मालिक उन्हें बहुत सताते। उनके लिखे में संपादक संशोधन की हिमाक़त करते। दिल्ली में भी वह इस ही तरह के काम करते रहे। जब अशोक वाजपेयी ने उन्हें सृजन-पीठ पर मध्य प्रदेश बुला लिया, तब उनकी स्थिति कुछ ठीक हुई।

क : तब बहुत-सी पत्रिकाएँ होंगी?

ज्ञ : हाँ, बहुत-सी; कोई शहर ऐसा नहीं था जहाँ से पत्रिकाएँ न निकलती हों। हम किसी शहर में पहुँच जाएँ, लोग मिलने आ जाते थे... जैसे जानते हों! लघु पत्रिकाओं का दौर था, लेखकों के बीच नाता था, लोग एक दूसरे के घर पर ही ठहरते, अतिथि-वत्सलता मिलती और निश्छल प्रेम।

क : आपको इलाहाबाद क्यों नहीं रुचा?

ज्ञ : जाते थे हम बहुत, पर वहाँ वो मस्ती नहीं थी—जो बनारस में है। संगम जाइएगा बस, वो भी जब जाइएगा... बाक़ी सिविल लाइंस, कॉफ़ी हाउस में हम बैठते थे; पर बनारस में जो जीवंतता है, वो इलाहाबाद में कभी नहीं थी। त्रिलोचन की आँख से भी इसे अगर देखना हो तो ‘नए इलाहाबादी’ शीर्षक उनका सॉनेट पढ़िए।

क : पूरबियों में काशी के लिए वैसे भी बेजोड़ आकर्षण है।

ज्ञ : बिल्कुल है। बिहार के बक्सर से रोहतास तक के लोग शादी-ब्याह के लिए भी अपनी ख़रीदारियाँ बनारस में ही करते रहे हैं। बी.एच.यू. में भी बिहार से आनेवाले छात्रों की संख्या ख़ासी होती है और वे अपनी ऊर्जा से परिसर को जीवंत बनाए रखते हैं।

क : आप पहली बार बनारस कब आए?

ज्ञ : पहली बार अपने बाबा के साथ, जब नन्हा बच्चा ही था, आया था। बाबा के संग उनके एक सहायक जो मज़बूत शरीर के एक माने हुए लठैत थे, चलते थे। उनकी काठी को तेल मिले न मिले, अपनी चिरसंगिनी लोहबंद लाठी को रोज़ सरसों का तेल पिलाना वह न भूलते थे और उसके बग़ैर घर से बाहर क़दम तक नहीं रखते थे। उनकी पीठ पर उनके गले में बाँहें डाले मैं पिठइयाँ लदा रहता था, अपने अँगोछे को तनिक फैलाकर मुझे पीछे से लपेटते हुए वह उसे अपनी कमर में कस लेते थे। इसी तरह मैं कलकत्ता भी घूम आया था। बनारस की बात करूँ... विश्वनाथ-गली में, मुझे आज भी आश्चर्यजनक ढंग से वह दृश्य याद है, कुछ बच्चे एक साँवले इकहरे अधेड़ सज्जन को राम-राम कहकर चिढ़ा रहे थे और वह माथा डुलाकर दोनों कानों में पहनी हुई छोटी घंटियाँ बजा रहे थे। यह दृश्य देख हम रुक गए, मैं कौतुक से भर उठा। वहीं के एक दुकानदार ने अपनी ओर से बताया कि यह सज्जन मथुरा की ओर के हैं और श्याम-नाम के अलावा किसी और के नाम को नहीं सुनना चाहते। मैंने बाद में जाना कि वह घंटाकर्ण थे। तब रामभक्ति-शाखा में भी ऐसे घंटाकर्ण होते थे जो राम-नाम के अलावा कोई और नाम नहीं सुनना चाहते थे। यदि तब वह घंटाकर्ण न दिखे होते तो अब कहाँ दिखते! हालाँकि अब भी ऐसे नए घंटाकर्ण मिल जाते हैं जो बाबा नाम केवलम् या मोदी नाम केवलम् के मंत्र-जाप से ही मुदित बने रहते हैं। उस बनारस-यात्रा की कोई और छवि याद नहीं सिवाय धर्मशाला के बाहर खड़े पक्षियों से गुंजान एक बौने पेड़ की छवि के, पता नहीं क्यों! 

क : बनारस के मूर्धन्यों में आपने किनके साथ संगत की है?

ज्ञ : पटना में था तो फणीश्वरनाथ रेणु और नागार्जुन की संगत मिली थी। बनारस बसने आया तो त्रिलोचन यहाँ से जा चुके थे और धूमिल दुनिया से, लेकिन यहाँ चंद्रबली सिंह और शिवप्रसाद सिंह की संगत मिली। यहाँ पहले से भी अनेक मित्र थे। काशीनाथ सिंह और शुकदेव सिंह से पुराना परिचय था। नए मित्र भी बने। अब अपने साथ रहने की कला आ गई है, वही ज़्यादा अच्छा लगता है।

क : उस दौर के दालमंडी के बारे में कुछ बताइए? क्या तब मशहूर नाचनेवालियाँ थीं?

ज्ञ : ‘सेवासदन’ के समय से, यानी लगभग सौ साल पहले से, इन्हें दालमंडी से हटाकर मडुआडीह के पास शिवदासपुर में बसाया जाना शुरू हुआ था। तब भी, नीचे दुकानें थीं और ऊपर के कोठे में कुछेक संगीतोपासिकाएँ बची हुई थीं। कभी-कभी कोई खनकदार आवाज़ सुनने को मिल जाती थी और तबले की वाद्य-ध्वनि भी। वहीं, नारियल वाली गली में जहाँ प्रसाद-कुल की विख्यात सुंघनी साहू की तम्बाकू की दुकान थी/है, पास ही ऊपर कोठे पर एक दो ऐसे डेरे बचे हुए थे। दालमंडी गली का जो प्रशस्तीकरण चल रहा है, उसके बाद वहाँ का परिदृश्य बदलनेवाला है।

टोल-नाके के ठीक पहले एक ढाबा दिखा। माण्डवी ने गाड़ी रुकवा दी। हम काउंटर पर गए। ज्ञानेंद्रपति जी ने पूछा, “क्या रोटियाँ मिल जाएँगी?” उधर बैठे लड़के ने बताया कि रोटी नहीं हो पाएगी, हाँ तंदूर में पराठा बना देगा। भीतर आलू की फ़िलिंग होगी। मैं उनकी तरफ़ देख रहा था, चाह रहा था कि वह इस विकल्प पर राज़ी हो जाएँ... कि गाड़ी बहुत धीरे बढ़ रही थी और छेने के भरोसे कितनी देर चलता है मामला! उन्होंने कहा, “ठीक है कर दो, बटर मत लगाना और पराठे के साथ ही चाय भी भिजवा देना।” पंद्रह-एक मिनट के इंतिज़ार के बाद उनका ऑर्डर आया। वह बहुत धीरे-धीरे पराठे को चाय में बोरकर खा रहे थे।

क : नागरी प्रचारिणी सभा का पराभव कब शुरू हुआ?

[पहली बार जब मैंने पूछा तो वह सवाल सुन नहीं पाए, लेकिन उन्होंने मेरा बोलना सुना और कहा pardon, मैं सवाल दोहराता हूँ तो वह कान पास लाकर सुनते हैं...]

ज्ञ : जब सुधाकर पांडेय आए तभी ये सब शुरू हो गया। उनके भाई रत्नाकर पांडेय राजीव गांधी और संजय गांधी को हिंदी पढ़ाते थे, राज्यसभा में भी थे, तो उनके पॉलिटिकल बैकग्राउंड का बहुत फ़ायदा था। अपने बाद उन्होंने अपने बेटे पद्माकर पांडेय को इसमें लगाया।

क : क्या सभा के प्रधानमंत्री शहर की राजनीति में कोई दख़्ल रखते थे?

ज्ञ : देश और राज्य की राजनीति में सभी संलग्न थे, उसका निश्चित लाभ मिलता था। अभी ही देखिए, कांग्रेस के नेता दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ सीधे बीजेपी में बुला लिए गए और उनको मंत्री भी बना दिया गया। यहाँ के सबसे बड़े नेता कमलापति त्रिपाठी थे, जो स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ सुलेखक-पत्रकार भी थे। यहाँ ब्राह्मणों की संख्या अधिक थी तो उसका प्रभाव था। अब के प्रधानमंत्री [सभा के] भी ब्राह्मण ही हैं, लेकिन वह विद्वान् हैं और क्रियाशील भी। उनके नेतृत्व में सभा ने नई करवट ली है।

क : जब पिछड़ों की राजनीति शुरू हुई, कांग्रेस को उसे समझने में इतना वक़्त क्यों लगा?

ज्ञ : कांग्रेस के साथ बात अलग थी, स्वाधीनता-संग्राम से निकली पार्टी थी। वह सबको साथ लेकर चलती थी। धार्मिक-सांप्रदायिक-जातिगत विभाजन उसकी घुट्टी में नहीं था, आज भी वह उससे दूर है, उसका चरित्र सर्वसमावेशी है। बाबू जगजीवन राम को उन्होंने उच्चासन दिया, वह उसके वाजिब हक़दार थे, उनके जैसा विलक्षण वक्ता मैंने अटल बिहारी वाजपेयी को भी नहीं पाया। 

क : अटल बिहारी वाजपेयी के कवि को आप कैसे देखते हैं?

ज्ञ : वह राष्ट्रवाद का थोथा रूप है, रेटॉरिक है, तुकबंदी है। कई लोगों के लिए वह कविता है, कई लोगों के लिए नहीं है। 

क : चेतना पारीक तो हैं ही, उनके अलावा भी आपकी कविताओं में बहुत-सी स्त्रियाँ हैं; मंजू श्रीवास्तव, बनानी बनर्जी, आदि जो अपने पूरे नाम के साथ आती हैं…

ज्ञ : मैंने उन पर बहुत लिखा है। ‘मनु को बनाती मनई’ में स्त्रियों पर लिखी कविताएँ ही संकलित हैं।

क : मैंने आज तक जिस स्त्री को ‘ट्राम में एक याद’ पढ़कर सुनाई है, उन सबको लगा है कि वही आपकी चेतना पारीक हैं। वह उन्हें ही संबोधित है। पुरुष-मित्र भी वैसी एक स्त्री से परिचित रहे हैं। आप हिंदी-संसार की उस लोकप्रिय काव्य-नायिका से कब मिले थे?

ज्ञ : चेतना पारीक से मेरी पहली मुलाक़ात नेशनल लाइब्रेरी में हुई थी, जहाँ मैं पढ़ने जाया करता था। उस समय वहाँ के मुख्य पुस्तकालयाध्यक्ष एक हिंदीभाषी सज्जन थे, किंचित् लेखक भी थे, मेरे मित्रवत् थे। उन्होंने कार्ड बनवा दिया था और शोधार्थी/पढ़ाके के लिए बने छोटे केबिनों में से एक केबिन में बैठने की अनुमति भी दे दी थी। कभी-कभी पूरा दिन मैं नेशनल लाइब्रेरी के परिसर में गुज़ार देता था। वहीं, पहली बार रेस्त्राँ के हॉल में मेरी एक मित्र ने चेतना पारीक को मुझसे मिलाया था। दरम्याने से थोड़े कम क़द की एक स्फूर्ति से भरी लड़की। जीवन की तमाम तरह की गतिविधियों में दिलचस्पी रखनेवाली उसकी फ़ितरत। उस पर दुलार ही उमड़ सकता था। आप पाएँगे, उस कविता में जिसकी वो नायिका है, मैंने उसे ‘नन्ही-सी नेक’ के रूप में याद किया है। आगे भी उसे ‘नन्ही गेंद-सी उल्लास से भरी’ कहा गया है। अपनी बहुमुखी और स्वावलंबी सक्रियताओं के कारण वह भारतीय युवतियों—और युवकों भी—की दोस्त बन बैठी है। उसके वर्तमान में भविष्य की झलक है, जो युवमन को भाती है। हम आज देख ही रहे हैं किस साहसी मुखरता से जेन-ज़ी की नवयुवतियाँ और जेन-अल्फ़ा की लड़कियाँ अपने को अभिव्यक्त कर रही हैं। चेतना पारीक उन्हीं की अग्रजा है।

क : आपके यहाँ अक्षरों पर बहुत-सी कविताएँ हैं। ‘मूर्धन्य ष के लिए विदागीत’ है...

ज्ञ : यह देखने का एक नज़रिया है। मूर्धन्य ष की बस आकृति भर बची है। आत्मा चली गई है, बस शरीर बचा हुआ है। उसका उच्चारण हमारी जिह्वा से खो गया है। वही हाल ‘ऋ’ का भी है। इसीलिए राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी साहित्य सम्मलेन के एक वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए यह प्रस्तावित किया था कि ऋषि को रिशि की तरह लिखा जाए। वह दिन बहुत दूर नहीं जब ऐसा ही होगा। भाषा स्वतः जटिल से सरल होती चलती है, हालांकि बीच-बीच में मानकीकरण की प्रक्रिया के कारण विपरीत गति भी चलती है। हिंदी के व्याकरणाचार्य किशोरीदास वाजपेयी मानते थे कि भाषा का कभी ह्रास नहीं होता, सदैव विकास होता है। इसीलिए वह ‘अपभ्रंश’ शब्द का प्रयोग उचित नहीं मानते, उसकी जगह वह उसे ‘तृतीय प्राकृत’ कहना पसंद करते हैं। 

क : आप पटना के छात्र-आंदोलन में सक्रिय रहे होंगे?

ज्ञ : ‘भिनसार’ में जेपी-नीत छात्र-आंदोलन जिसे बाद में जेपी ने ही संपूर्ण क्रांति आंदोलन कहा, से संबंधित तीन कविताएँ मिलेंगी। ‘पटना : 18 मार्च, 1974’ जब इस आंदोलन का बीज-वपन हुआ था, आंदोलित छात्रों के जुलूस पर लाठीचार्ज के बाद गोली चली थी जिससे एक छात्र की मौत हो गई थी। उस जुलूस में मैं शामिल था। यह कविता उसका आँखों देखा हाल है, एक फ़ंतासी में ढल जाता हुआ। ‘बिहार 1974’ और ‘पटना : 18 मार्च 1975’—ये दोनों रिपोर्ताज शैली में लिखी कविताएँ हैं। उन बेचैन दिनों के बारे में मैंने ‘भिनसार’ की भूमिका में भी कुछ लिखा है, उसे वहाँ देखा जा सकता है।

क : आप लालू जी को तभी से जानते रहे होंगे?

ज्ञ : जब मैं पटना विश्वविद्यालय के बी.एन. कॉलेज में स्नातक-पाठ्यक्रम में दाख़िल हुआ, लालू वहीं से स्नातक होने के बाद लॉ कॉलेज में दाख़िल हो चुके थे बी.एल. की डिग्री के लिए। जल्द ही छात्रसंघ के चुनाव होने थे। अध्यक्ष पद के लिए लालू यादव एक प्रबल उम्मीदवार के रूप में देखे जा रहे थे। वामपंथी मिज़ाज के छात्रों का एक संगठन था बी.एस.ए.—बिहार स्टूडेंट्स एसोसिएशन—जिससे मैं जुड़ा था। लालू कॉलेज-कॉलेज भाषण देते घूम रहे थे। हम भी। हम जातिवाद से ऊपर उठने का आह्वान करते और यह कहने से भी नहीं चूकते कि जो दो वाक्य भी शुद्ध नहीं बोल सकता, उसे अध्यक्ष कैसे बनाया जा सकता है। लालू जीत गए, हमारे उम्मीदवार काफ़ी पीछे रहे। यह तो मेरी समझ में बाद में आया कि लालू संवादधर्मिता के मामले में हमसे बहुत आगे थे। 18 मार्च 1974 के बाद जब छात्रों का रोष घना होकर आंदोलन की शक्ल ले रहा था, जेपी ने उसके नेतृत्व का अनुरोध स्वीकार कर लिया। जेपी को आगे कर आंदोलन का आग़ाज़ करनेवाली जो सभा गांधी मैदान में हुई, छात्रसंघ का अध्यक्ष होने के नाते उसकी अध्यक्षता लालू यादव ने की। एक अविस्मरणीय दृश्य। अनेक विशाल जनसभाओं के साक्षी रहे गांधी मैदान ने इतना जनभराव पहले कभी नहीं देखा था। सभा समाप्त होने के तुरत बाद, आगामी के पूर्व-संकेत-सी, तेज़ आँधी आई और फिर बौछारों वाली बारिश शुरू हो गई। बाद में लालू यादव बिहार की विधानसभा में और फिर संसद में भी अपनी मनोरंजक वक्तृता के कारण मीडिया में लोकप्रिय बने रहे। उनके कहे में विदूषक की-सी उत्फुल्लता थी। सच तो यह है कि लालू यादव ने अपनी भाषण-कला को लोहा सिंह के मॉडल पर माँजा-चमकाया था। [ मैंने पूछा कि कौन लोहा सिंह?] लोहा सिंह कौन? आकाशवाणी पटना से भोजपुर के विख्यात हिंदी लेखक, वस्तुतः नाटककार, रामेश्वर सिंह काश्यप का एक ध्वनि नाटक दैनिक रूप से प्रसारित होता था जिसके मुख्य किरदार थे लोहा सिंह—एक रिटायर्ड आर्मीमैन। इस चरित्र का ध्वनि-अभिनय रामेश्वर सिंह काश्यप ख़ुद करते थे। आर्मीमैन की कड़कीली आवाज़ में उनकी भोजपुरी-मिश्रित हिंदी सुनते हुए हँसते-हँसते श्रोताओं के पेट में बल पड़ जाते थे। वह एक अतिशय लोकप्रिय कार्यक्रम था। तो बात यह थी जब हम काश्यप जी के लोहा सिंह को सुनते हुए हँसी से लोटपोट हुए जा रहे थे, लालू यादव उसे अपने वाक्-तंत्र में उतारते हुए संवाद-शैली को माँज रहे थे।

क : अभी हाल ही में किसी से पता चला कि आप जेल सुपरिंटेंडेंट थे...

ज्ञ : मैं सर्विस में था। केवल बारह साल सर्विस की। बाद में सचिवालय में आ गया था, अलग से पैसे तो कमाने नहीं थे। वहाँ समझिए लोग पाँच साल में करोड़पति से ज़्यादा बन जाते हैं, क्योंकि जेल जैसी संस्थाओं में करप्शन इंस्टीट्यूशनलाइज्ड होता है। [एक लंबे पॉज के बाद स्वतः] अभी मेरी इकोनॉमी खेती से ही चलती है।

क : आप इमरजेंसी के पहले नौकरी में आ गए थे?

ज्ञ : ठीक उसके बाद। अगर जनता दल की सरकार नहीं आई होती तो नौकरी से पहले होनेवाले पुलिस वेरिफ़िकेशन में ही मुझे छेंक लिया जा सकता था। कैंपस से हमने एक पत्रिका निकाली थी—‘GAP : एक युवा दुभाषिया’—हिंदी-अँग्रेज़ी में मिश्रित एक बुलेटिननुमा क्षीणकाय पर तीक्ष्णधी पत्रिका जिसका एक अंक ही आ पाया, दूसरा अंक प्रेस में था जब इमरजेंसी के दौरान इसे वहाँ से उठा लिया गया। सत्ता का स्वभाव स्वेच्छाचारी होता है जो इमरजेंसी में खुलकर सामने आ गया था। आज भी तो उस स्वभाव के दरस हमें हो रहे हैं।

क : इधर दाढ़ी ट्रेंड में है... पर आप तो बहुत पहले से दाढ़ी रख रहे हैं, क्या इससे कभी कोई दिक़्क़त आई? 

ज्ञ : जबसे दाढ़ी उगी और थोड़ी घनी हुई, तबसे ही आईने में अपने चेहरे को दाढ़ी के बग़ैर देखने की कल्पना भी मेरे लिए मुश्किल है। जब नौकरी में दाख़िल हुआ तो एक साल की ट्रेनिंग में से आधा साल पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज में बिताने की बाध्यता थी। जेल सुपरिंटेंडेंट के पदासीन के लिए कोई वर्दी नहीं होती, कम से कम बिहार में। हजारीबाग़ के पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज में डीवाय.एस.पी. के लिए मुक़र्रर वर्दी पहनकर उन्हीं के साथ ग्राउंड पर ट्रेनिंग दी जाती थी, हमारा एक ही बैच होता था। वर्दी के साथ दाढ़ी की संगति नहीं थी। विशेष अनुमति के लिए मैं प्रिंसिपल महोदय से जाकर मिला। वह डी.आई.जी. रैंक के बहुत शालीन दिखनेवाले पर सख़्त माने जानेवाले अधिकारी थे—कोई झा साहब। मैंने कहा, रेजर या उस्तरा लगाने से मेरे चेहरे की त्वचा पर एलर्जी के निशान उभरने लगते हैं, परेशानी होती है। उन्होंने पूछा कि कोई मेडिकल सर्टिफ़िकेट है जो बताए कि ऐसा है। मैंने कहा : नहीं। उन्होंने कहा : तो फिर यह संभव नहीं। मैं उदास हो गया। उन्होंने कहा : हमारे डॉक्टर के पास चले जाइए। मैं खड़ा रहा। थोड़ी देर बाद मैंने कहा : सर, सच्ची बात तो यह है कि मुझे कोई एलर्जी-वलर्जी नहीं, बस यह है कि दाढ़ी के बग़ैर मैं अपने चेहरे की कल्पना तक नहीं कर सकता। केवल छह महीनों की तो बात है, उसके आगे मुझे वर्दी पहननी नहीं। निभा दीजिए। झा साहब ने विनोदपूर्वक मेरी आँखों में झाँका और कहा, एप्लिकेशन लिख दीजिए... मुझे अनुमति मिल गई।

मैंने तब उन्हें नहीं बताया था कि मेरे बैग में अन्य सामानों के साथ एक रेजर भी है जिसे मैं लेता आया था। मेरी ज़िंदगी का पहला रेजर और शायद आख़िरी भी! उसे रेणु जी ने मुझे भेंट किया था। हुआ यह था कि एक दिन कॉफ़ी हाउस से निकलकर हम एक दुकान में गए थे जहाँ रेणु जी को कुछ ख़रीदना था। उनके काउंटर पर उन्हें छोड़, मैं दूसरे काउंटर पर चला गया था जहाँ रेजर आदि मौजूद थे। मैं रेजर, ब्लेड, छोटा आईना आदि निकलवाकर देखने लगा। तभी रेणु जी पास आ खड़े हुए। उन्होंने पूछा : “यह आपकी ज़िंदगी का पहला रेजर है न! इसे मैं आपको भेंट करूँगा।” उन्होंने देख-भालकर एक रेजर चुना जिसके भीतर ब्लेड ठीक से बंद हो जाता था। मैं कैश-काउंटर पर अरे, नहीं! अरे, नहीं! करता रहा... लेकिन उन्होंने उस रेजर की क़ीमत अपने बिल में जुड़वाई। वही रेजर! वह आज भी कहीं मेरे घर में होगा, रेणु जी के कर-स्पर्श को याद करता हुआ।

इस दाढ़ी के कारण एक बार मैं पिटते-पिटते बचा था। हुआ यह था कि संगीत नाटक अकादेमी द्वारा भुवनेश्वर में आयोजित नाट्य महोत्सव में आमंत्रित था। मेरा काव्यनाटक ‘एकचक्रानगरी’ नेमिचंद्र जैन द्वारा संपादित ‘नटरंग’ में प्रकाशित हो चुका था। मुझे ‘आब्जर्वर’ के रूप में बुलाया गया था। महोत्सव ठीक-ठाक चल रहा था, नाट्य-प्रदर्शन हो रहे थे, अचानक ख़बर आई कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों ने कर दी है। अफ़रा-तफ़री मच रही थी। समारोह तत्क्षण रद्द कर दिया गया। सबको लौटने की जल्दी थी। शामियाना कहें या आशियाना उजड़ चुका था। हमें रेलवे स्टेशन तक पहुँचाया गया। वहीं एक उग्र भीड़ ने मुझे सिख समझकर घेर लिया। उन्हें भी पीटने के लिए एक सिख चाहिए था। थोड़े लंबे केशों के साथ मेरी दाढ़ी सामने मौजूद थी। वह तो कहिए पहला हत्थड़ मुझ पर पड़ता उसके बस पहले भीड़ को चीरते हुए मेरे ओड़ियाभाषी होस्ट वहाँ पहुँच गए और मैं बच गया। तभी देखा एक छोटी-सी भीड़ ने रतन थियाम को घेर रखा था। रतन थियाम—मणिपुर के मशहूर नाट्य-निर्देशक—की पतली दाढ़ी लोगों को असमंजस में डाल रही थी। कुछ लोग उन्हें सिख मानने के हिमायती थे, कुछ हिचक रहे थे। पिछली रात ही मैंने उन्हें, उनके अनुरोध पर, ‘एकचक्रानगरी’ को नाटकीय ढंग से पढ़कर सुनाया था। और भी अनेक लोग थे। थियाम ने कान खोलकर और आँखें मूँदकर उस पाठ को सुना था और बड़े प्रीत हुए थे। ख़ैर, हम समय से पहुँच गए थे। ट्रेनें ख़ाली-ख़ाली आ रही थीं। तब ही कोरमंडल एक्सप्रेस वहाँ पहुँची और मैं उसमें चढ़ गया। थियाम को दूसरी ट्रेन लेनी थी। उन्हें मित्रों के सुपुर्द कर मैं कुछ निश्चिंत था। ट्रेन में ऊपर की बर्थ पर लेटकर मैंने आँखें मूँद लीं। नीचे बैठे दाढ़ीदार चेहरे का दिखना ख़तरनाक हो सकता था।

क : नौकरी छोड़ने पर घर में कोई वबाल नहीं हुआ था?

ज्ञ : कुछ-कुछ, पर मैं कोई परवाह नहीं करता था। मेरी चिंताएँ अलग थीं। वे ही मुझे चला रही हैं।

ढनगते-ढनगते हम कार्यक्रम शुरू होने के ऐन पहले कार्यक्रम-स्थल पर पहुँचे।  ज्ञानेंद्रपति जी थक चुके थे सो उन्हें ‘हिन्दवी’ के एक सदस्य होटल में उनके रूम तक पहुँचा आए। इसके बाद वह कुछ देर में संयत होकर आयोजन-स्थल पर आए। 

ज्ञानेंद्रपति जी ने बहुत ओजस्वी स्वर में शासन को चुभती ‘कुम्भग्न’ आदि नई कविताएँ पढ़ीं। श्रोताओं ने जिन्हें हाथों-हाथ लिया। फिर उनसे ‘ट्राम में एक याद’ की फ़रमाइश की जाने लगी। उन्होंने संकोच के चलते, तनिक बचते हुए कहा कि मेरे पास उसका टेक्स्ट नहीं है। उनका यह बोलना था और हम देखते हैं कि ‘हिन्दवी’ की टीम के एक सदस्य ने एकदम फ़ुर्ती से उसका सुव्यवस्थित प्रिंट लाकर उनके सामने रख दिया है। सभागार में ठहाका गूँज गया। जैसे उनकी टीम ऐसी किसी घड़ी के लिए तैयार होकर ही चली थी। ज्ञानेंद्रपति जी ने इस कविता का बहुत सुंदर और यादगार पाठ किया। वहाँ उपस्थित अधिकांश सहृदयों को वह कविता मुँह-ज़बानी याद थी। इसलिए उनका पाठ ऐकांतिक नहीं होने पाता था—सब भावकों के अंतस्-पाठ में घुल-मिलकर उनका पाठ हम तक लौट रहा था। बहुत-सी नव-युवतियाँ इस पाठ को ऐसी चमकती आँखों से सुन रही थीं, जैसे यह पाठ बस उनके लिए हो रहा हो... मानो, इस सभागार में बस दो लोग हों, एक वो और दूसरे ज्ञानेंद्रपति जी। जबकि ज्ञानेंद्रपति जी पहले ही यह स्पष्ट कर चुके थे कि यह कविता एक गतिशील स्त्री के बारे में भले ही हो, लेकिन कोई प्रेम-कविता नहीं है। उनके काव्यपाठ ने समूचे कार्यक्रम को एक सिनेमैटिक क्लाइमैक्स सरीखी उठान से नवाज़ा। सब श्रोता अपनी-अपनी जगह पर खड़े होने लगे। स्टैंडिंग ओवेशन। ज्ञानेंद्रपति जी को इस रिसेप्शन को प्रोसेस करने में कुछ वक़्त लगा। पाठ समाप्त कर वह अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गए; लेकिन सारे सभागार को खड़ा पाकर एकाएक उन्हें कुछ कौंधा और फिर उन्होंने खड़े होकर, हाथ-जोड़कर सबका अभिवादन स्वीकार किया।

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अगले रोज़ सुबह साढ़े आठ बजे तक हम ज्ञानेंद्रपति जी को होटल से लेकर बनारस के लिए निकले। हम आज कल से कुछ अधिक परिचित थे। उन्होंने मिलते ही सबसे पूछा, “आप लोग ठीक से सोए? कोई दिक़्क़त तो नहीं हुई?” कल्याणी ने हम सबकी तरफ़ से हामी भरी। ज्ञानेंद्रपति जी ने सुबह का नाश्ता नहीं किया था। हम में से किसी ने भी नहीं। मैंने ड्राइवर से कहा, “भाई, आगे किसी ठीक-सी जगह पर रोक देना।” उन्होंने तुरत मना किया, “मैं वैसे भी देर से उठता हूँ। देर से खाता हूँ। कोई दिक़्क़त नहीं है। क्यों न सीधे चल लिया जाए?” इलाहाबाद का घेरा डाँकने में ही हमें दस बज चुके थे। हमें कोई आइडिया नहीं था कि कब तक पहुँच सकेंगे। हम शास्त्री ब्रिज तक किसी तरह पहुँचे।

क : आप भगवान् को मानते हैं?

ज्ञ : भगवान् तो आदमी ने बनाया है, आदमी के हाथ का खिलौना है। आदमी की रचना है, इसलिए अलग-अलग महाद्वीपों में अलग-अलग आकृतियों और रंग रूपवाले अलग-अलग भगवान् हैं। बाइबिल में कहा है कि ईश्वर ने आदमी को अपनी छवि में गढ़ा है। दिखता हुआ सच यह है कि आदमी ने ईश्वर को अपनी छवि में गढ़ा है। हालाँकि उसे अब आदमी द्वारा भी अनकिया नहीं किया जा सकता। अब वह एक शक्तिशाली संस्थान है। बहुतेरे लोगों की जीविका उसी के भरोसे चलती है, उस पर उनका भरोसा हो या नहीं। यह भी है कि बहुतेरे लोग उससे मनोवैज्ञानिक संबल पाते हैं। राजसत्ता भी धर्मसत्ता से संधि कर चलना चाहती है, इसमें दोनों का भला है।

मैं कुंभ के अलावा हरेक माघ मेले में प्रयाग आता था और उसके पहले पटना में रहते हुए हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर जुड़नेवाले सोनपुर के मेले में जाता था। बनारस आने के बाद कार्तिक पूर्णिमा पर मनाई जानेवाली देव-दीपावली के जनोत्सव में शिरकत करता था। लोग अपने सामूहिक बल से घाटों की दीप-सज्जा करते थे। ‘गंगातट’ में देव-दीपावली से जुड़ी दो कविताएँ हैं। अब यह सरकारी आयोजन बना दिया गया है और दीयों की संख्या बेतहाशा बढ़ा दी गई है। अयोध्या में सरयू किनारे दीपावली की एक रात पहले मनाए जानेवाले दीपोत्सव में भी दीयों की संख्या हर साल बढ़ाई जा रही है—गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किए जाने के लिए। इसमें राजकोष का पैसा लगाया जा रहा है। जब अन्य देशों में दीपोत्सव मनाया ही नहीं जाता तो दीयों की कम संख्या से भी आप गिनीज़ में अव्वल बने रहेंगे। जन-धन के दुरुपयोग के अलावा लाखों-लाख दीये जलाकर वायु-प्रदूषण को बढ़ाने में कौन-सी बुद्धिमानी है! राजसत्ता और धर्मसत्ता की दुरभिसंधि से लाभान्वित होनेवाले लोग भारत में स्कूलों की ख़स्ता हालत की चिंता नहीं करते। स्कूलों की ही क्यों, कॉलेजों की भी हालत अच्छी नहीं है। जनसंख्या बढ़ रही है और पिछले दस वर्षों में एक लाख के क़रीब प्राथमिक-माध्यमिक विद्यालयों को बंद किया जा चुका है—चाहे स्कूलों को मिलाने के नाम पर ही। विश्वविद्यालयों को आवंटित की जानेवाली बजट राशि में भी भारी कटौती की जा रही है। शिक्षा को एक लाभकारी उद्योग के रूप में देखा जा रहा है और उसे प्राइवेट सेक्टर को सौंपा जा रहा है। शिक्षा दिनोंदिन मामूली आदमी की पहुँच से बाहर होती जा रही है। यही हाल चिकित्सा-व्यवस्था का है। सरकारी अस्पताल लगभग बेजान हो चुके हैं। ग्रामांचलों में प्राथमिक चिकित्सा-केंद्रों पर ज़ंग-खाए ताले झूलने लगे हैं, लेकिन जयकारों के बीच हाहाकार सुनाई नहीं देता। सब चंगा सी!

माण्डवी इस सुदीर्घ उत्तर को बहुत ग़ौर से पीछे मुड़े-मुड़े सुन रही थी, उसने पूछा कि स्प्रिचुअल एस्पेक्ट ऑफ़ रिलीजन भी तो एक चीज़ है, उस पर आप क्या सोचते हैं?

ज्ञ : अध्यात्म वस्तुतः आत्म का उन्नयन है। एक कवि के यहाँ सृष्टि की समग्रता से सर्जनात्मक रूप से जुड़ने के उपक्रम के कारण यह कार्रवाई स्वाभाविक रूप से चलती रहती है। कबीर ने भी सहज समाधि की बात कही थी। कर्मयोग और ज्ञानयोग की तरह एक भावयोग भी होता है। कवि भावयोगी होता है। कविता को जीना-लिखना अपने आपमें एक आध्यात्मिक कार्रवाई ही है।

क : मंदिरों का स्थापत्य तो खींचता होगा? 

ज्ञ : हाँ, बहुत! दक्षिण भारत के मंदिरों का स्थापत्य बहुत उन्नत है, वे एक हद तक आक्रांताओं से बचे रह गए। बनारस मंदिरों का शहर है जिसके केंद्र में भले विश्वनाथ हों, लेकिन जहाँ अनेकानेक गौण देवताओं की मौजूदगी है। उनमें आस्था रखनेवाले लोगों की संख्या बहुत बड़ी है। बनारस से जुड़ी मेरी कविताओं में बहुतेरे मंदिरों के चित्र मिलेंगे, वहाँ की जीवन-छवियाँ। ‘गंगातट’ में ‘समरकांत उवाच’ के केंद्र में विश्वनाथ मंदिर है। विश्वनाथ-गली से जुड़ी हुई एक कविता ‘अष्टावक्र का वंशज’ भी वहाँ मिलेगी जो बनारस से जुड़ी हुई मेरी कविताओं में वस्तुतः पहली कविता है। मुड़कट्टा बाबा और ढेलहवा बाबा जैसे लोक-देवताओं पर भी कविताएँ आपको मेरे यहाँ मिलेंगी। ‘संशयात्मा’ में यहाँ के चौंसठ विनायकों से जुड़ी हुई ‘उस दिन’ शीर्षक कविता मिलेगी। ‘गंगा-बीती’ में ‘वह एक मंदिर’ शीर्षक कविता मिलेगी। ‘प्रकृति और कृति’ में ‘रचयिता की आँखें’ और ’एक तपस्वी पीपल’ मंदिरों से जुड़ी कविताएँ हैं। दक्षिण के मंदिरों से संबंध रखनेवाली कुछ कविताएँ भी वहाँ मिलेंगी। पुरी के जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी हुई कविता ‘पुरी-परिक्रमा’ भी वहाँ मिलेगी।

माण्डवी का व्रत था तो वह अपने साथ दर्जन-भर केले लेकर चली थी। उसने सबको केला ऑफ़र किया। मैंने तुरत हाथ बढ़ाकर ले लिया। अब तक कल्याणी की मोशन सिकनेस चालू हो चुकी थी। उसने मना कर दिया। ज्ञानेंद्रपति जी ने भी पहले कहा, “नहीं, रहने दीजिए।” फिर कुछ सोचकर, शायद उसका मन रखने के लिए [!] कहा, “अच्छा लाइए।” ड्राइवर लगातार हॉर्न बजाए जा रहा था। लोग-बाग़ बाइक लेकर रॉन्ग साइड घुसे चले आ रहे थे। मैंने उनसे पूछा, आप ड्राइव कर लेते हैं?

ज्ञ : ट्रेनिंग के दौरान जीप-ड्राइविंग सिखाई गई थी। जीप चला लेता था। जब छात्र था, तब जावा बाइक चलाता था।

बेतरह जाम लगा था। काँवड़ियों ने कुछ बजा रखा था। भोजपुरी गाने की कोई सुनी हुई धुन मुझे छू कर गुज़री...

क : थिएटर में देखी पहली फ़िल्म याद है?

ज्ञ : ठीक-ठीक नहीं बता सकता, लेकिन फ़िल्में देखता ख़ूब था। ग्यारहवीं के बाद, जब बारहवीं की पढ़ाई के लिए भागलपुर के टी.एन.बी. कॉलेज में दाख़िल हुआ तो भागलपुर में फ़िल्में देखने का सिलसिला शुरू हुआ। शायद कोई फ़िल्म छूटती न थी। उन दिनों रविवार को मॉर्निंग शो में बांग्ला की और अँग्रेज़ी की भी फ़िल्में दिखाई जाती थी। सत्यजीत राय, ऋत्विक घटक आदि की फ़िल्में वहीं देखीं। फिर जब ग्रेजुएशन के लिए पटना आना हुआ तो पटना में कुछ ही पहले स्थापित सिने सोसाइटी का सदस्य बना। विश्व के महान् फ़िल्मकारों की क्लासिक फ़िल्में देखने को मिलती थीं। बनारस आने के बाद फ़िल्में देखने का सिलसिला लगभग बंद हो गया, हालाँकि अब सेलफोन पर कभी-कभी कुछ फ़िल्में देख लिया करता हूँ।

वह चाह रहे थे कि जितनी तेज़ी से संभव हो, हम लोग बनारस पहुँच जाएँ और हो ऐन उसके उलट रहा था। आम दिनों में जहाँ हम तीनेक घंटे में बनारस पहुँच जाते, आज सावन का अंतिम सोमवार होने के चलते साढ़े बारह बजे तक भी हम घिसट ही रहे थे। अभी हमने हंडिया भी नहीं डाँका था। मेरे बहुत इसरार करने पर वह कुछ खाने के लिए कहीं रुकने पर राज़ी हुए। माण्डवी ने एक रेस्त्राँ देखकर गाड़ी रुकवाई । वह वैसे सजा था जिसे सौंदर्य-दृष्टि रखनेवाला अभिजात kitsch की संज्ञा देता है। ज्ञानेंद्रपति जी बैठते ही बोले, “दक्षिण भारतीय व्यंजनों की सुगंध आ रही है।” मैंने पूछा, “सर, डोसा खाएँगे?” वह बोले, “हाँ, कह दें...” मैंने उनके लिए डोसा और अपने लिए अल्फ़्रेडो पास्ता मँगवाया।

सबसे पहले उनका डोसा आया। देखने में ठीक लग रहा था। उन्होंने चखा, दूसरे ही कौर में बोल पड़े, “यदि साँभर में मीठी नीम की पत्तियाँ न मिलें तो जान जाओ कि अमुक दक्षिण भारतीय व्यंजन ठीक से नहीं बना है।”

उनसे खाया नहीं जा रहा था। लेकिन फिर भी छोड़ने में कुछ संकोच होता था। कतराते थे। वह छोटे-छोटे कौर तोड़ने लगे। इतने में माण्डवी ने पूछा, “सर, बनारस में साउथ इंडियन किधर खाते हैं?” 

“केरला कैफ़े...” उन्होंने बताया। उस ही क्रम में हममें से किसी ने पूछा, “क्या आपने कोई हाउस हेल्प नहीं रखी है?”

ज्ञ : सेल्फ़ हेल्प इज़ द बेस्ट हेल्प—यही मानता हूँ।

उनसे वो भारी-भरकम बेस्वाद डोसा किसी तरह नहीं खाया जा रहा था। तब उन्होंने एक आम राय जानने की ग़रज़ से कहा, “यह पूरा ही खाया जाए, ज़रूरी तो नहीं!” हम सबने एक स्वर में कहा, “हाँ सर, क़तई ज़रूरी नहीं।” हम अब उठने को थे कि कल्याणी ने वेटर को बुला एक ब्लैक कॉफ़ी के लिए बोला। उन्होंने कहा, “ब्लैक कॉफ़ी मैं भी ले सकता हूँ।” दो कॉफ़ी बोली गईं । कमज़र्फ़ों ने प्लास्टिक के कप में बेतरह गरम, एकदम छलकती हुई कॉफ़ी लाकर रख दी। उन्होंने दो-एक सिप लिए... और बाक़ी अनपीया ही छोड़ दिया। बिल चुकता कर हम गाड़ी में आकर बैठ गए। हमारा पौन घंटे से ऊपर उस बेकार रेस्त्राँ में व्यर्थ हुआ। उनके चेहरे पर थकन और हताशा स्पष्ट दीखती थी। जैसे कह रहे हों, अभी तक कितनी दूरी तय कर ली होती, नाहक़ रुके। मेरे पास कोई बचाव नहीं था। कोई विकल्प नहीं। मैंने उनकी तरफ़ देखे बग़ैर पूछा…

क : अपने समकालीनों में आपको कौन रुचता है?

ज्ञ : विष्णु खरे मुझे ठीक लगते हैं। वह बहुत अच्छे दोस्त भी थे। उनके साथ दिल्ली में बहुत समय बिताया है। एक बार मैं उनके घर पर ही रुका था, होटल में आकर वह मुझे अपने साथ ले गए थे। तब वह उस कॉलेज में ही इंग्लिश के लेक्चरर थे, जिसके हिंदी विभाग में कैलाश वाजपेयी थे। बाद में विष्णु खरे साहित्य अकादेमी में उपसचिव हुए और फिर नवभारत टाइम्स के संपादक। मुझे अपनी स्कूटर पर दिल्ली घुमाने वाले व्यक्ति वही थे—हुमायूँ का मक़बरा, क़ुतुब मीनार वग़ैरा उन्होंने ही दिखाया। उनमें एक नैरेशन है, गद्यात्मकता है। कथात्मक। एक खंडित महाकाव्यात्मकता। बाक़ी अनेक लोग भी ठीक हैं। लेकिन कोई पूरा नहीं लगता। सब इकहरे हैं। मैंने कहीं कहा भी है, कवि को एक धातु का नहीं, अष्टधातु का बना होना चाहिए। मेरे आदर्श कवि निराला हैं और मुक्तिबोध। 

क : आपका मास्टर्स तो इंग्लिश से था। इंग्लिश और विश्व साहित्य में आपको कौन भाता है?

ज्ञ : अँग्रेज़ी मेरे लिए विश्व-साहित्य को पढ़ने का एक माध्यम रही है। इंग्लिश में लिखने वाले कवियों में मुझे ज़्यादातर अमरीकी कवि पसंद आते रहे हैं। वाल्ट ह्विटमैन इनमें अव्वल हैं। वह लोकतंत्र के, तमाम मनुष्यों की समानता के विशेषकर स्त्री-पुरुष बराबरी के, व्यक्ति के गौरव और व्यापक समाज की हित-चिंता के अद्वितीय कवि हैं। वास्तविक अर्थों में उन्होंने ही कविता को छंद आदि के बंधन से मुक्त किया और जीवन की विस्तृत ज़मीन पर उतारा। आधुनिक कविता का यह एक नया प्रस्थान बना। दूसरे अमरीकी कवियों में मुझे कार्ल सैंडबर्ग और रॉबर्ट फ़्रॉस्ट पसंद आते हैं। फ़्रॉस्ट में कथात्मकता को कविता में कम से कम शब्दों में साधने की कला है। सैंडबर्ग में लोक-राग का एक ज़मीनी रूप मिलता है। उनके बाद स्पैनिश भाषा के कवि पाब्लो नेरूदा मेरे प्रिय कवि हैं जिनके यहाँ छू लेने वाली ऐंद्रियता मिलती है। रूसी कवि व्लादिमीर मायकोवस्की भी मेरे प्रिय कवि रहे हैं जिनकी राजनीतिक चेतना ने मुझे प्रभावित किया है। जर्मन कवि-नाटककार बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की कविताएँ फ़ाशीवाद पर अपने वेधक तंज़ के कारण मुझे बार-बार पठनीय लगती रही हैं। तुर्की कवि नाज़िम हिकमत की कविताएँ तमाम यातनाओं को झेलते हुए भी ज़िंदगी के गझिन ब्योरों को दर्ज करनेवाली और अपनी जन-पक्षधरता को विश्वासपूर्वक बचाए रखनेवाली और इसलिए प्रेरक लगती हैं। और भी अनेक नाम हो सकते हैं।

क : अज्ञेय से आप कभी मिले थे? 

ज्ञ : हाँ! 

क : क्या उनसे आपके संबंध और उनसे हुई मुलाक़ातों की कोई ऐसी स्मृति है, जो उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के साथ-साथ उनके मनुष्य रूप को भी सामने लाती हो? उनके साथ बिताए समय का कोई प्रसंग, संवाद या अनुभव जिसे आप आज पीछे मुड़कर विशेष अर्थपूर्ण पाते हैं?

ज्ञ : अज्ञेय से मेरी पहली भेंट तब हुई थी जब पटना के गंगातीरे स्थित एक सामाजिक विज्ञान शोध-संस्थान में उनका काव्यपाठ आयोजित था। मैं कॉलेजिया छात्र था और मैं भी आमंत्रित था। अज्ञेय को पहले स्थानीय कवियों को सुनना था। हम सबने एक-एक कविता सुनाई। अज्ञेय दिलचस्पी से सुन रहे थे। फिर उनका काव्यपाठ हुआ। सधी हुई गंभीर आवाज़। फिर संचालक ने प्रश्न आमंत्रित किए। लोग अपनी जिज्ञासाएँ प्रकट करने लगे। अज्ञेय के उत्तर संक्षिप्त और सारगर्भित होते थे। मैंने भी एक प्रश्न पूछा वह यह कि बड़े कलाकारों के यहाँ ऐसा देखा गया है कि उनकी सर्जनात्मक अभिव्यक्ति के एक विशिष्ट दौर में रचनाशीलता का एक ख़ास प्रकार आकार लेता है। जैसे कि पाब्लो पिकासो के यहाँ क्यूबिज्म और ब्ल्यू पीरियड आदि के दौर मिलते हैं, लेकिन आपके यहाँ ऐसा नहीं लगता। अभी-अभी आपकी दो कविता-पुस्तकें लगभग एक साथ आई हैं—‘क्योंकि मैं उसे जानता हूँ’ और ‘सागर-मुद्रा’। दो भिन्न भावभूमियों की रचनाएँ। इससे क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है? वहाँ मौजूद रेणु जी कुछ विचलित दिखाई दिए। अज्ञेय थोड़ी देर मौन रहे। फिर उनका संक्षिप्त उत्तर आया : लेकिन ऐसा हो सकता है... गोष्ठी समाप्त होने के बाद हम सबने हाथ जोड़े और चलने को हुए। अज्ञेय ने लपककर मुझसे हाथ मिलाया। उनकी पकड़ सख़्त थी और हथेली में ऊष्मा थी। जब हम चल पड़े तो रास्ते में मेरे संगी मित्र रघुवीर सिंह ने जो एक संवेदनशील सरदार थे, और प्रायः मेरे साथ विचरते थे, मुझसे कहा कि भाई मेरे, आप इतने आक्रामक स्वर में क्यों बोल रहे थे! मैं थोड़ा लज्जित हुआ। बस यही कहा कि ऐसा अनजाने हुआ होगा।

अज्ञेय से बीच में एकाध संक्षिप्त भेंटें पटना में और हुईं रेणु जी के साथ, कॉफ़ी हाउस में भी। थोड़ी लंबी भेंट तब हुई जब दिल्ली गया था। नेशनल पब्लिशिंग हाउस में उसके संपादक अपने मित्र पद्मधर त्रिपाठी के साथ बैठा था। तिपहरी का वक़्त था, घंटी बजने पर पद्मधर ने फ़ोन उठाया तो दूसरी तरफ़ अज्ञेय थे। ‘नया प्रतीक’ के प्रकाशन का ज़िम्मा नेशनल पब्लिशिंग हाउस ने लिया था। उनके बीच बातें होने के बाद, फ़ोन रखने से पहले, पद्मधर ने उन्हें बताया कि बग़ल में ज्ञानेंद्रपति बैठे हैं, पटना के मेरे कवि-मित्र। अज्ञेय ने कहा कि उन्हें फोन दें कृपया। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कब तक दिल्ली में हूँ। मैंने बताया, कल निकलना है। अज्ञेय ने पूछा, क्या आज आपकी शाम ख़ाली है। मैंने कहा : बेशक़, शाम कनॉट प्लेस की ओर जाना है। अज्ञेय ने कहा, तो उधर ही मिलते हैं। ज़रा फोन पद्मधर जी को दीजिए। तय हुआ कि पद्मधर के साथ हम कनॉट प्लेस के अम्बैस्डर होटल पहुँचेंगे। ऐसे तो कनॉट प्लेस में हम मोहनसिंह प्लेस के कैफ़े में बैठते थे, लेकिन आज अज्ञेय के ठीये पर मिलना था। हम पहुँचे, शायद पद्मधर के स्कूटर से। अज्ञेय तभी पहुँचे थे। हम भीतर बैठे। अज्ञेय ने चाय का आदेश दिया। इधर-उधर की बातें होती रहीं। टिकोजी से ढकी हुई केतली में लंबी पत्तियों की ख़ुशरंग चाय थी, सुगंधित। मेरी पसंदीदा। पद्मधर कुछ अन्यमनस्क हो रहे थे। उन्हें कुछ काम था। उन्होंने जाने की इजाज़त माँगी। अज्ञेय ने कहा, आप जाएँ, हम चाय का एक और राउंड लगाएँगे। अब बातें मुख्यतया साहित्य पर केंद्रित हो गईं। अज्ञेय बोलने से अधिक सुनने में दिलचस्पी ले रहे थे। बात नाटकों पर चल निकली। मैं ‘एकचक्रानगरी’ लिख चुका था और दूसरा काव्य-नाटक लिख रहा था। उन दिनों मैं एब्सर्ड ड्रामा का तल्लीन पाठक हो रहा था। बातों के बीच मैंने उन्हें कहा, आपका ‘उत्तर प्रियदर्शी’ एक विफल नाटक है, उसमें क्रियाशीलता का घोर अभाव है, केवल दार्शनिक ध्वनित होते संवादों के सहारे नाटक नहीं लिखा जा सकता। अज्ञेय ने मेरी बात में दिलचस्पी दिखाई। मेरा कहना था कि हमारी पौराणिक कथाओं में एब्सर्ड ड्रामा के बीज-तत्त्व भरे हुए हैं, उनमें कल्पनाशक्ति की लीलाएँ दिखती हैं, बस उन्हें बोध-कथा या सुबोध कथा की तरह नहीं, बल्कि दुर्बोध कथा की तरह कहने की ज़रूरत है। अज्ञेय कुछ सोचते दिखे। चाय के दूसरे दौर के बाद हम बाहर आए। अज्ञेय अपनी कार की ओर बढ़े और मैं मोहनसिंह प्लेस की ओर निकल आया।

अज्ञेय से अगली किंचित् लंबी भेंट पटना में हुई। कॉफ़ी हाउस के ‘रेणु कॉर्नर’ में जहाँ एक लंबूतरे आयताकार टेबल के दोनों तरफ़ लंबे कोच पड़े रहते थे, जिसमें हम ठँसकर बैठते थे, एक दिन वहाँ अज्ञेय भी थे। थोड़ी देर बाद अज्ञेय ने कहा, चलिए अलग बैठकर कुछ बातें करते हैं। हम एक दूसरी छोटी टेबल पर आ गए। कॉफ़ी के बीच उन्होंने कहा कि मुझे ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक के रूप में कार्य करना है, एक टीम बना रहा हूँ, चाहिए तो आप ज्वॉइन कीजिए। बाद में रेणु जी ने मुझे कहा कि अज्ञेय उनसे मेरे बारे में पूछ रहे थे। मैंने रेणु जी को इस प्रस्ताव के बारे में बताया। रेणु जी जानते थे कि मैं बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन द्वारा चयनित हो चुका हूँ और ज्वॉइनिंग लेटर की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। रेणु जी का विचार था कि मुझे ‘नवभारत टाइम्स’ ज्वॉइन करना चाहिए। सरकारी नौकरी की तुलना में वह मेरी प्रकृति के ज़्यादा अनुकूल होगा। लेकिन घर पर मेरे बाबा थे जो यह इच्छा पाले थे कि मुझे राजपत्रित अधिकारी के रूप में काम करते देखें, भले ही उसे मैं बाद में छोड़ दूँ। बाबा की इच्छा के आगे मैं नतमस्तक था। मैंने रेणु जी को बताया। रेणु जी ने अज्ञेय को बता दिया होगा। उसके बाद अज्ञेय से मेरी प्रत्यक्ष भेंट नहीं हुई। हाँ, उनका एक पत्र ज़रूर मिला। पत्र जितेंद्र सिंह के पते पर केयर ऑफ़ आया था। जितेंद्र सिंह टाइम्स ऑफ़ इंडिया के ब्यूरो चीफ़ थे और अज्ञेय के मित्र। किसी के घर ठहरना हुआ तो अज्ञेय उनके यहाँ ही रुकना पसंद करते थे। संक्षिप्त पत्र में अज्ञेय ने पच्चीस-तीस कविताओं की माँग की थी। इतना भर। किसलिए—यह नहीं बताया था। ‘नया प्रतीक’ निकल रहा था। उन्हीं दिनों अज्ञेय चौथा सप्तक के संपादन की तैयारी कर रहे थे, हालाँकि यह मुझे मालूम नहीं था। मैंने कविताएँ नहीं भेजी थीं। बाद में राजस्थान के एक कवि-मित्र ने मुझे बताया था कि उन्हें भी इस तरह का ही एक पत्र अज्ञेय ने लिखा था। उन्होंने भी कविताएँ नहीं भेजी थीं। बहरहाल, चौथा सप्तक जब सामने आया तो हिंदी जगत् को लगा था कि वह तीन सप्तकों की गरिमा को बढ़ाने की जगह धूमिल करनेवाला था। जब ‘प्रतीक’ ‘नया प्रतीक’ के रूप में दोबारा शुरू हुआ था, तब राजस्थान से निकलने वाली पत्रिका ‘बिंदु’ के संपादक नंद चतुर्वेदी ने अपने एक संपादकीय को शीर्षक दिया था—‘काल के एक और आयाम का स्वामित्व’। ऐसा लग रहा था, काल-चिंतन चाहे जितना करते हों, तत्कालीन समय अज्ञेय के हाथों से छूट रहा था। थोड़ा बाद में अज्ञेय ने ‘जय जानकी जीवन यात्रा’ निकाली थी। बिहार में राज्यसभा सांसद और पटना के पारिजात प्रकाशन के मालिक, स्वयं सुलेखक, शंकर दयाल सिंह तथा उत्तर प्रदेश में पं. विद्यानिवास मिश्र उसके मुख्य कर्ता-धर्ता थे। शंकर दयाल जी मित्रवत् थे, विद्यानिवास जी भी सुपरिचित थे। उस यात्रा के लंबे रूट पर कहीं भी मैं उसमें शामिल नहीं हो पाया था।

हममें से अनेक के मन में अज्ञेय के प्रति पूर्वग्रह मौजूद थे। शायद ये प्रतिष्ठित प्रगतिशील आलोचकों द्वारा हमारे ज़ेहन में बोए गए थे। लेकिन बाद में उन आलोचकों ने अपने को संशोधित किया था। अज्ञेय की जन्मशती के अवसर के लगभग नामवर सिंह अपने व्याख्यान का निर्धारित विषय भुलाकर अज्ञेय की कविता ‘नाच’ सुनाने लगे थे। अज्ञेय को बूढ़ा गिद्ध बतानेवाले अशोक वाजपेयी अज्ञेय में कविता का एक दरवाज़ा खुलता पाने लगे थे/हैं। यह इतिहास का न्याय है। अज्ञेय भारतीय परंपराओं के बोध को आधुनिकता की चेतना से समन्वित करनेवाले युगांतरकारी लेखक हैं। क्या गद्य, क्या कविता, उनका योगदान नवोन्मेषकारी है। उनके लिखे में कभी कहीं एक शब्द अतिरिक्त नहीं मिलता। क्या जीवन में, क्या लेखन में वे सदा चिंतनशील मितभाषिता से पेश आते रहे। उनके बग़ैर भारतीय साहित्य का नक़्शा पूरा नहीं बनता।

क : कविता आप तक कैसे आती है या आप कविता तक कैसे जाते हैं?

ज्ञ : आप पहले से नहीं जानते कौन-सी चीज़, घटना, स्थिति या कोई व्यक्ति या मानवेतर प्राणी, कुछ भी आपके दिमाग़ पर ऐसी दस्तक दे बैठेगा जिससे वह आलोड़न शुरू हो जाएगा जो आपके भीतर जमा जीवनगत तथ्यों, अवलोकनों, अर्धविस्मृत एहसासों में हलचल उठाकर वह प्रक्रिया शुरू कर देगा जिसमें अपनी पहली पंक्ति की धुँधली रोशनी के साथ कविता आगे बढ़ती है। कविता के लिए, चाहे उसे रचनाकार के रूप में लिखना हो या भावक के रूप में ग्रहण करना हो, चित्त की मुक्तावस्था ज़रूरी है। अनुभूति-सिद्ध ज्ञान ही कविता के काम का होता है। उसके लिए प्रस्तुत बना रहना एक शांत उद्यम है। जिस तरह किसी के भी जीवन में प्रेम की प्रतीक्षा बनी रहती है, कवि के यहाँ कविता की प्रतीक्षा जागती रहती है, जाने-अनजाने, अहर्निश।

प्रस्तुत साक्षात्कार में ज्ञानेंद्रपति जी की प्रांजल वाक्-भाषा को जस का तस रखा गया है। इसके लिपिबद्ध रूप को पढ़कर, जहाँ ज़रूरी लगा, उन्होंने शोध दिया है। यह बातचीत पूरी हो गई है या हम किसी उपसंहार पर पहुँच गए हैं, इस प्रकार का कोई अतिशयोक्तिपूर्ण दावा मैं नहीं करूँगा... अब आख़िरी प्रश्न...

क : आपने कविता और अपने समय—दोनों के कई दौर देखे हैं। आज के समय में आपको एक कवि के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या दिखाई देती है?

ज्ञ : आज के लेखक के सामने सबसे बड़ी समस्या, जिससे जूझने से वह बच नहीं सकता, पर्यावरण की है। स्वार्थांध पूँजीवाद द्वारा निर्देशित तथाकथित विकास ने पूरी पृथ्वी के वर्तमान-भविष्य को ग्रस लिया है। प्राकृतिक पर्यावरण के सार्वत्रिक विनाश के साथ तमाम देश-समाजों के सामाजिक पर्यावरण की भी सीवनें उधड़ रही हैं। सांस्कृतिक पर्यावरण भी विनाश की अनुकूलता में विकृत होता हुआ नष्ट हो रहा है। पुरानी रूढ़ियों को भी नई पॉलिश से चमकाया जा रहा है। दिग्भ्रमित लोगों के बीच खड़ा कवि ऐसे में अपनी ज़िम्मेदारी से मुकर नहीं सकता। जन-विवेक को उद्बुद्ध करने का दायित्व-निर्वाह ही आज कविता का अग्रगामी रास्ता हो सकता है।

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