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यहीं तक

yahin tak

राजी सेठ

राजी सेठ

यहीं तक

राजी सेठ

और अधिकराजी सेठ

    जिस तेज़ी से वह थाली को धकियाकर उठा था, साफ़ था कि उस घटना से मेरे और पत्नी के बीच संवाद का पुल आने वाले कई दिनों तक टूटा रहेगा। गाँठ कहीं पड़ती है, कसाव कहीं महसूस होता है।

    ख़ास उसी के लिए ज़्यादा टमाटर डालकर बनाई सब्ज़ी का शोरबा थाली से टकराकर चटाई पर एक चिकना पीला धब्बा छोड़ गया था और पास रखे गिलास को लुढ़का गया था।

    आज कितने…कितने ही दिन बाद वह मेरे साथ खाने बैठा था। नहीं तो ज़्यादातर वह बरांडे में पड़ी काठ की मेज़ के आगे पीढ़ी जमाकर खाने बैठता है। अकेला। अपने भाई-बहनों के संग-साहचर्य से अछूता। उन सबको अपनी-अपनी उम्र की सड़कों पर खेलता-कूदता छोड़कर पता नहीं वह किस तरह इतनी जल्दी आगे चल निकला है! किसने धमा दिए हैं उसके हाथ में इस तरह के प्रश्नों के चाक़ू!

    इस भीड़-भरी गिरस्ती में जब मैंने उसकी उठान पर ध्यान दिया तो उसे उसी तरह बेचैन ही पाया। पल-पल कोंचता। प्रश्न पूछता...घर में कब-कब, क्यों और कैसे होता है? हमारी हैसियत के भीतर क्या है, बाहर क्या? क्यों आज शन्नो की गोलक तोड़ी जाती है और कल शाम को बादाम की ठंडाई पिसने लगती है? क्यों आज चप्पल ख़रीदने से इंकार होता है और कल जूता ख़रीदने की रज़ामंदी रुख़ में दिखाई देने लगती है? क्या कारण है कि दौड़ती हुई योजनाएँ ठिठक जाती हैं और ठिठके हुए इरादों को एकाएक पंख लग जाते हैं? किसलिए इतना लचीला है सब कुछ आसपास...अनुमान और नियंत्रण से परे...?

    उसकी आँखों में जिज्ञासाओं का एक हुजूम और उसकी मनःस्थिति अंडे के भीतर के द्रव की तरह अस्थिर...जिसे स्थिर करने का ज़िम्मा नीचे तपते ताप का होता है। इस ताप के स्वभाव को स्थिर कर पाने के कारण वह उलझता है।...बात-बात पर डाँवाडोल हर मुद्दे को अपने हाथ में ले लेने को आतुर...अपनी वयस्कता पर ज़रूरत से ज़्यादा आत्ममुग्ध। उसे लगता है कि वह अब वयस्क हो गया है, बल्कि वयस्क से भी थोड़ा अधिक। भाई-बहिनों से अधिक पिता के खेमे में। पिता के प्रति आदर को आहत किए बिना घर के केंद्र में जाने का एकमेव अधिकारी।

    वह नहीं जानता, घर के केंद्र में होना क्या होता है। अपने पर खिंचे एक चतुर्दिक को सहना होता है। हाथ ही हाथ होते हैं चारों तरफ़—याचक। कोंचते हुए। आँखें ही आँखें—भर्त्सना करती हुई, प्रश्न पूछती हुई—क्यों उनके पास वह सब नहीं है जो दूसरों के पास है? क्यों रूखी रोटी है, रोटी पर पिघलते मक्खन की तरावट नहीं? क्यों कमरे हैं, ड्राइंगरूम, बेडरूम नहीं? खरखरी खाटें हैं, पलंग और सोफ़े नहीं?—

    यह सब मात्र उससे पूछा जाता है जो केंद्र में होता है—घर का अकेला आक्रांत मुखिया।

    वह कैसे जानेगा केंद्र में कर्म अपना होता है, फल दूसरों के लिए? हार अपनी, पुरुषार्थ दूसरों के निमित्त...

    अभी तो वह बी.ए. के अंतिम वर्ष में ही है। गत वर्ष ड्रॉप कर दिया होता तो डिग्री मिल चुकी होती। ड्रॉप करने की बात भी मुझे तो ऐन परीक्षा के समय पता लग पाई थी। मैं नहीं जानता था कि वह पूरा साल पढ़ाई के साथ-साथ दो-तीन ट्यूशन और किसी प्राइवेट कंपनी के बिलिंग सेक्शन में पंचिंग का काम भी करता रहा था, इसीलिए परीक्षा की पूरी तैयारी नहीं कर पाया था।

    स्पष्ट था, उसने इस जानकारी से मुझे अलग रखा था। जान-बूझकर। दंड-सा देते हुए। जताते हुए कि यदि मैं अपने चारों ओर घेरे खींच सकता हूँ तो वह भी उस घेराबंदी में उतना ही समर्थ है।

    उसके और मेरे बीच यह जंग? होड़ और हिंसा?...नहीं। मुझे यह सब अच्छा नहीं लगा था। मेरी घेराबंदी अगर थी तो उसमें उसके लिए दंड नहीं था, सावधानी थी। उसे अपने से ही बचा सकने की सावधानी...

    इतना ही था जो मैं उसके लिए कर सकता था। करना चाहता था। वही मुझे दरकार था। उसकी उठान को मैं दरगुज़र कर देना चाहता था। उसके दिलासों के प्रलोभक सेंक के बावजूद।

    ड्रॉप किया...चाकरी करते रहे और मुझे बताया तक नहीं, मैंने उससे पूछा था। ...मर गया था मैं?...अपाहिज हो गया था?...

    इसका उत्तर उसने नहीं, उसकी माँ ने दिया था...यह आड़ तो तुम्हीं ने रखी है, तुम उसका भरोसा नहीं करते तो वह भी...

    वह वहीं, उसी कमरे में चुप खड़ा था, चौखट से लगा। जैसे बरसते पानी के नीचे काठ का कोई टुकड़ा पड़ा भीगता हो।

    उसकी यह बेलाग-सी लगती मुद्रा मुझे छील गई। यह सब कुछ सायास था। मुझे मेरी ही छड़ी से सिखाने की कोशिश...कुछ भी हो, मैं पिता था कर्ता...घर...का मुखिया और वह?...उसका आचरण? कहाँ तो घर के केंद्र में जाने की ऐसी बेहिसाब व्यग्रता, कहाँ इतने पर्दों के पीछे काम करने की ऐसी आत्मसंचित खुद्दारी।

    इस अहसास ने मुझे चिढ़ाया था, अपने भीतर लौटाया नहीं।

    मैं क्या पूछ रहा हूँ? मैंने जान-बूझकर उसकी ओर उन्मुख होकर कहा था, मुझे कहने-सुनने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं इतनी बड़ी बात हो जाए और मुझे पता तक लगे।

    कहने-सुनने का सिस्टम इस घर में है कहाँ! सबके अपने-अपने गढ़ हैं। उसने बेहद दबी ज़बान से उत्तर दिया था।

    और इस सबके अगुआ तुम हो। यह उसकी माँ थी। वही सबसे अधिक क्षुब्ध रहा करती थी। दबे उत्ताप को उगलने को सतत तत्पर।

    तभी वह मुझे कमरे से बाहर चल पड़ने को तत्पर-सा दीखा था। मैं तप गया था। उसी के कारण यह झड़प और उसी की ऐसी अडोल अलिप्तता।

    बैठो। मैंने उसके आगे बढ़ते पैरों को उसकी आस्तीन खींचकर रोक लिया था। अप्रस्तुत होने के कारण पहले वह लड़खड़ाया, फिर पास रखे स्टूल पर बैठ गया धम्म से। साफ़ था कि मेरे इस तरह रोक लेने की खिसियाहट वहाँ तक हिंसा की नक़ाब लगाकर पहुँची थी।

    उसकी माँ तो बिल्कुल बिलबिला गई थी। क्रोध में थरथराती हुई। बेटे की पूरी तरह पक्षधर। बाप का जूता बेटे के पैर में अँटने लगता है तो बेटा दोस्त कहलाता है और तुम...तुम?...तुम्हारा तो विवेक मर गया है।

    उसकी माँ का इस तरह का कुछ भी कह देना मुझे सदा शमित ही करता है, अजीब तरह से बेबस। दौड़ता हुआ लौट आता हूँ।

    विवाद का सिरा मैंने ख़ुद ही नीचे धर दिया था। मुझे यही सुविधाजनक लगा था। मैं उन्हें भी नहीं समझा सकता था कि पानी जब बहने लगता है तो अपने नीचे की ज़मीन के रंग का ज़्यादा आभास देने लगता है, अपने उद्गम की निर्मलता का नहीं। कैसे कहता, उद्गम कहाँ है इन सब बातों का...मेरे दिलो-दिमाग़ के किस हिस्से में! मैं ख़ुद ही उठ गया था।

    बाहर जाते ही मैंने पत्नी को पुकारा था, कम-से-कम तुम तो उसे आवारा होने से रोक सकती थीं।

    वह आहत तो हुई सो हुई, उसकी त्यौरी मैंने चढ़ती देखी तो आगे टहल आया। जानता था, मेरी भभकी ख़ाली भभकी है, पानीदार दूध पर आई झिल्ली की तरह बेईमान! भीतर कहीं जानता था, यह ड्रॉप करना आवारगी के कारण नहीं, प्रथम श्रेणी को बनाए रखने के हक़ में हुआ होगा। इस मामले में वह मुझसे ज़्यादा समझदार था—शुद्ध वास्तविकतावादी। अपनी क्षमता को अपने परीक्षाफल की श्रेष्ठता में से ही अर्जित करना चाहता था। जानता था कि उसके पिता की हैसियत की जेब में सोने के संबंधों वाले सिक्के नहीं हैं, जिसे वह बेटे की उन्नति के हक़ में कभी भी भुना सके। झाड़फानूस के बिना की नंग-धड़ंग हेडक्लर्की थी जो कुछ और करे या करे, अपने अनुभव और निपुणता की आड़ में सामने वाले की ढाँप-हूँप को उघाड़ पाने का भय अवश्य पैदा कर लेती थी।

    इसके बाद कई दिन तक चुप्पी रही थी। एक आँख बचाता हुआ-सा पारस्परिक भाव। मुझे इस छोटी-सी झड़प ने अधिक उखाड़ा था, अधिक बेचैन किया। वे दोनों तो जहाँ के तहाँ थे। उसी अछूते तरीक़े से एक-दूसरे के साथ-साथ।

    समझ गया था, मेरी मंशा ही मात्र उलटी होकर नहीं पड़ती, मेरी नियति में उन दोनों का दिया तिरस्कार भी दर्ज हो जाता है।...चाहे मूक, चाहे मुखर।

    इतना साफ़ दीख जाने पर भी इस स्थिति ने मुझे डोलाया नहीं था। उनका साझीदार बनकर इस तिरस्कार से बच निकलने की कोई इच्छा मेरे भीतर जागी थी। कुछ भी हो अपनी इच्छा से...चुनाव से मैं उसकी पहुँच से परे रहने को था चाहे अपने क्षोभ और क्रोध के चरम पर खड़ा वह मेरे विरुद्ध अपने हथियारों को कितना भी पैना करता दीखे।

    कुछ नहीं था मेरे पास बाँटने को...जेठे राम का अभिषेक करके दशरथ की भूमिका में पैर रख लेने को।

    एक अकेला अपना ही रास्ता था अपने सामने। एक अभिशप्त केंद्र अपनी ही आस्था और विश्वास से रीता।

    मेरी बात और थी।

    मुझे केंद्र में रख दिया गया था—बिना चाहे, बिना पूछे। बाबू भजन-कीर्तन में रहते थे, उन्हीं दिनों से ही जब माँ कहती थीं, वह मेरे खेलने-खाने के दिन थे। उनको आँखों में एक नशा-सा रहता था हरदम। उखड़ा ध्यान बातें ऐसी करते थे जैसे सारे वेद-पुराण को घोंट-पीसकर पी चुके हैं।

    घर, बाहर, चौपाल, बरगद के नीचे मेले लगा करते थे लोगों के। वह नहा-धोकर स्नान-ध्यान, अर्चना-उपासना की दत्तचित्त देहरियाँ लाँघकर एक लोटा दूध चढ़ाकर बैठे थे लोगों के बीचोबीच...। उस दूध से उतरी मलाई जो माँ अक्सर बचा लेती थी, उनके चले जाने के बाद हम लोगों को पास बुलाकर चटाया करती थी उँगली-उँगली।

    एक दिन ऐसा करते-करते वह अंदर गए थे तो माँ ने साड़ी की चुन्नटों के नीचे सरका दी थी कटोरी। कुछ भी समझ में नहीं आया था। बाबू खँखारते हुए कुल्ला करके चले गए थे बाहर...माँ ने उसी कटोरी में एक चुटकी चीनी और मिलाकर, उसे और पतला करके और प्यार से हम लोगों को चटाना शुरू कर दिया था।

    बाबू को वहीं बैठने का ठरक था। उन्हीं-उन्हीं जगहों पर। उन्हीं-उन्हीं लोगों के बीच। तथाकथित भक्तों की श्रद्धा से लबालब आँखों के सामने। आत्ममुग्ध। कीर्तन और प्रवचन। प्रसाद और भभूत, समस्याएँ और समाधान...वह भी लोगों के बाबू...को तो यह भी पता नहीं था कि घर में उनके अपने घर में उनका तो दूध पीकर, फल-मेवे खाकर काम चल जाता था।

    एक दिन वह निकले। बड़े बरगद के नीचे पुरानी धर्मशाला में साधुओं की टोली एक रात के लिए टिकी थी। उन्हीं के साथ। कहकर तो गए थे, कि हरिद्वार जाकर लौट आऊँगा, पर आटे में नमक की तरह वहीं खप गए। उनके गंगा-स्पर्श पावन पैर फिर कभी नहीं लौटे।

    बाहर के, आसपास के पड़ोस के लोग उन्हें देख पाने को बेचैन रहे। उनका अभाव उन सब ने हम सबसे ज़्यादा ही महसूस किया। ठीक भी था, वह सब बाबू को आदर-प्यार देते थे, केवल कुछ शब्दों के बदले और हम सब...हमारी याचक आँखें और फैली हुई हथेलियाँ...

    माँ मशीन चलाने लगी थी उनके जाने के बाद। सुई में तागा मित्ती डालती, सत्तो मशीन का रेला फेरता! कपड़ा माँ सिलती। सिलकर ताक में रख देती। अक्सर सरोंलोगों के घरों में कपड़े पहुँचाने जाती। कभी-कभार माँ भी...भगत जी की पत्नी। वह पहुँच जाती तो लोग गद्गद हो जाते...आख़िर भगत जी के घर का पैर...बड़ी पुण्य वाली हो बहिन...भला ऐसा कहाँ होता है कि जीते-जी मोह-माया, तृष्णा से किसी को मुक्ति मिले...अरे, ऊँची आत्मा रही भगत जी की, कहाँ संसार के बंधनों में फँसती!

    हाँ, ऊँची आत्मा थी भगत जी की...सांसारिक बातों के बीच कहाँ अँटती! उन्होंने हमें नहीं सहा था पर हमें तो उन्हें सहना ही था...जब वह थे तब भी उनकी शर्तों पर और जब नहीं थे तब भी उन्हीं की दी हुई स्थितियों के बीच।

    गोपू की गाय का दूध जो भगत जी के लिए मुँह-अँधेरे जाया करता था, बंद हो गया।...फल, मेवे, घी, सब बंद। कभी-कभी टेकड़ी वालों के बाग़ से बहुत से अमरूद उतर जाते तो...वह सब याद करने का अब जी नहीं होता।

    माँ पता नहीं मुझे कैसे-कैसे देखने लगी थी...असल में मुझे देखने में उसे उतना झुकना नहीं पड़ता था जितना सत्तो और किशना को। मैं उन सबसे लंबा था माँ के झुके हुए कंधों के लगभग बराबर।

    'क्या कहना चाहती हो मुझसे?' मैं क्यों उससे पूछता। मैं...मैं...वेद-पुराणों की गहनता को समझने वाले भगत जी का बेटा...पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़ा भाई...मशीन फेरती माँ का जेठा।

    अब घर में रोटी लेकर माँ को मेरी बाट जोहते बैठे रहना नहीं पड़ता था। भुने चने, भुट्टे, केले, अमरूद सड़कों पर बहुतेरे मिल जाते थे!

    उन्हीं दिनों कोई हरिद्वार से तीर्थ करके आया था। बाबू के वैभव और संयम की कहानियाँ पोटली में साथ लेकर, जिसे गद्गद होकर हमारे आँगन में बिछा दिया गया था।

    क्या बताएँ बहिन! फलों के मेवों के ढेर लगे रहते हैं। दूध, दही, शहद, घी के मटके भरे रहते हैं, पर भगत जी?...न!...न! मज़ाल है आँख उठाकर भी देखें...!

    वह भरे पेट की निरासक्ति...बाबू का न्याय अपूर्व था।

    मेरी बात और थी...

    मैं कुएँ के-से भुतहे खोखल में रख दिया गया था जल्दी ही। बाहर कुएँ की पथरीली मेड़ पर थे—सबके चेहरे। घूरते, माँगते, कोंचते। उन सबमें से हर कोई याचक था—भिखारी। माँ की आँखों में कभी-कभी चमक उठने वाली वत्सलता की चौंध के सिवा।

    अक्सर माँ का डरा हुआ हाथ पीठ पर पड़ जाता था। जैसे समझाना चाहती हो, यह शाबाशी घर में इस क़दर उपयोगी हो उठने वाली मेरी मर्दानगी के लिए नहीं, रास्ते की थकान हरने के लिए है। बस!...ऐसे ही किसी क्षण में, मुँह उठाकर देखना अच्छा लगता था, चाहे उन झुर्रियों में चीख़ती आराम की चाह और ख़ाली खोखल आँखें फिर अक्सर रास्ते में अड़ जाया करती थीं। मुझे लगता था, माँ का मशीन चलाना अब बंद हो जाना चाहिए।

    मुझे लगता था, घर-घर जाकर क्लीनिंग पाउडर बेचना छोड़कर सत्तो को अपना दाख़िला भर देना चाहिए।

    मुझे लगता था, मित्ती को अब बिना किसी विलंब के वहाँ भेज देना चाहिए जहाँ से पेड़ों और पक्षियों पर टँगी उसकी भटकती निगाहों का ठौर मिल जाए। वह साबुन वाले लड़के द्वारा पाए प्लास्टिक के मनकों वाले हार की अवहेलना कर सके। किशना और सर्रो उनके बारे में सोचने का जी नहीं चाहता था। कोशिश करो तो सिर के ऊपर की छत बित्ता-बित्ता नीचे धसकती घोंट देने की धमकियाँ देने लगती थी।

    मेरे लिए ज़रूरी था—एक-एक क़दम सोचना। वामन का पग मेरा नहीं हो सकता था—बाबू से मिले संस्कारों और दैवी विश्वासों के बावजूद। दिव्य-भव्य जो कुछ भी था, वह बाबू के लिए था, मेरे लिए नहीं। मेरे लिए थी—ठोस कंकरीली-पथरीली कंकरोली-पथरीली ज़मीन।

    और फिर एक दिन क्यों, वह भी तो मेरे इसी इतिहास का एक हिस्सा है—एक निर्णायक हिस्सा!

    एक दिन कोई आया था और मेरी देह पर लगी खरोंचों की दाह को अनजाने लेप देने के लटके देने लग गया था।

    मैं कोई अफ़सर नहीं था कि बड़ी-सी मेज़, कोई चपरासी, एक अदद टेलीफ़ोन, और आदेश देने का हक़ मेरे अहं को रुतबा देने के लिए हासिल होते।

    हर समय फ़ाइलों के ढेर पर झुकी रहने वाली मेरी गर्दन का विद्रोह, रीढ़ के रास्ते उतरता-उतरता काठ की कुर्सी पर जमे मेरे नितंबों तक पहुँचते अपना नाम बदल लेता था—दर्द!

    एक दिन माँ ने फटी-पुरानी धोती तहाकर प्लास्टिक की थैली में डालकर गद्दी बना दी थी। देह राजा हो गई लगी थी उस दिन।

    वह आया था। मेरी पीठ पर हाथ रखकर, मुझे टोहकर, अपने नाम की फ़ाइल की तरफ़ इशारा करके मुझे बाहर लिवा ले गया था। दफ़्तर के सामने के स्टॉल से उसने ख़ूब ज़्यादा दूध डलवाकर भभकता हुआ चाय का एक प्याला बनवाकर मुझे नज़र किया था और पनीर के पकौड़ों से लबालब भरी एक प्लेट। कैप्स्टन की एक सिगरेट उसने मेरी उँगलियों में खोंस दी थी और मेरी मुट्ठी में दाब दिया था—एक गड्डी सुख।

    मैंने अपनी मुट्ठी भींच ली थी। पहले लगा था, मैं तैयार नहीं हूँ, पर मैं असल में तैयार ही था। एक सतही हिचकिचाहट के बाद। उस रात मैं सो नहीं पाया था। अँधेरा मुझे बड़ा निर्मम लगा था। सुबह उठने पर जान में जान आई थी। सुबह में सेंक था। रोशनी थी। चीज़ों के सही आकार-प्रकार दिखाकर अँधेरे के भय-भ्रम को तोड़ सकने की शक्ति।

    जल्दी ही लगने लगा था, मैं यहाँ इतना अकेला नहीं हूँ। दूसरों के विश्वास को पा सकने का नायाब हथियार मुझे हासिल हो गया है। मुट्ठियाँ झाड़ दी थीं मैंने उन सब पर…कृपाओं की बरसात बनाकर।

    वह सब भीगे। तृप्त हुए। आकंठ डूबे। उनके चेहरों पर लिखी इबारतें पढ़ता-पढ़ता मैं भूल गया था उस निर्मम अँधेरे में अकेला जागते होने की बात...हवा में डोलती बाबू की दी वेद-पुराणों की सदाचारी सीखें। विरासत के बोझ को मैंने फ़ालतू समझकर झाड़ दिया था।

    अब तक बाबू ने मुझे नाकाम किया था। मैं पहली बार उन्हें नाकाम कर पाया था। उनकी ज़रूरत का, उनके स्मरण और आचरण का अतिक्रमण करके। धीरे-धीरे माँ की मशीन छूट गई थी। अब वह बरांडे में सफ़ेद कलफ़दार धोती पहने पीढ़े पर बैठी दीखतीं...यह शुभ्र भव्यता पहले कहाँ छिपी बैठी थी? सत्तो ठेकेदारी करता अब शिलांग में रहता था। सर्रो और मित्ती अपने संसार में कब की खप चुकी थीं। किशना के बारे में सोचने में डर नहीं लगता था। वह अपनी छोटी-सी दुकान में फल बेचता अक्सर मेरी दूसरी बाँह होने का भ्रम पैदा करने को होता था, पर चुप हो जाता था। शायद अपने घर की लगाम के अनुशासन में लौट जाना उसके लिए ज़रूरी था।

    सबने चुपचाप ले लिया था और मुट्ठियाँ बंद कर ली थीं। सवाल नहीं किए थे। हिसाब नहीं माँगा था। जो मिलता गया, उसे स्वीकारते गए थे। पहले कृतज्ञता से, फिर सुविधा की सभ्यता से और अंततः अधिकार की ठसक के साथ।

    एक वह ही था—तेजस्वी माथे वाला वह चमकीली निडर आँखों वाला वह...मेरे ही शुक्राणुओं में से जन्मा...प्रश्नों के बेदर्द नेजे हाथों में लिए मेरा ही साक्षात् सामना करता हुआ वह।

    वह मुझे भी मशीन के सामने बैठी माँ की तरह उठा देना चाहता था। उसके हिसाब से मैं वौखलाया हुआ था—उलझा हुआ अस्थिर, जाने कैसी-कैसी भूलों के लिए मजबूर!

    उसके विचार से घर की एक बेहतर रूपरेखा हो सकती थी—सुनियोजित। जो मुझसे पता नहीं क्यों नहीं सधती थी। मैं...मैं शायद बूढ़ा हो गया था। (वह अपनी माँ से पूरी चिंता और गंभीरता से कहता रहता है।) अपने हिस्से से ज़्यादा मेहनत-मशक़्क़त कर चुका था। मेरी साँस उखड़ती थी। मैं लपककर चल भी नहीं पाता था।

    उसके ख़याल में मेरे थके-माँदे देह-मन को पूरी तरह जवान हो गए बेटे के पुरुषार्थ के अधीन हो जाना चाहिए और एक समझदार व्यक्ति की तरह परिधि पर जाना चाहिए। बड़े पुत्र को केंद्र में जाने का विश्वास और अधिकार देते हुए। मिल सकनी चाहिए उसे अपने पिता की विरासत। सुख-दुःख का पूरा लेखा-जोखा इस घर की दीवारों पर लिखे गए इतिहास का ज्ञान और गंध।

    और यह सब तो है जो उसे नहीं दिया जा सकता। नहीं बताया जा सकता। उसे यहाँ तक...पहुँचने का रास्ता। इस तरह सुखों-सुविधाओं को पा लेने की विजय-गाथा नहीं बताया जा सकता कि कैसे मैंने अपनी पीठ पर उस चालाक दबाव को पहचानते हुए भी...दूध के रंग की लबालब चाय का आशय समझते हुए भी...हाँ, समझते हुए ही नहीं, उसे नहीं जानना है एक पस्त घबराए हुए आदमी का ज़िंदगी से इस तरह का...समझौता कोई दूसरा रास्ता बना पाए होने की हड़बड़ाई हुई नरमजान असमर्थता।

    वह नहीं जानता, मैं सच में नहीं चाहता कोई भी भागीदार...नहीं चाहता रास्ते पर अपने क़दमों के निशान इस इतिहास को यहीं इसी जगह, मेरे साथ दफ़न हो जाना होगा, चाहे मेरा यह रवैया उसके और मेरे बीच तनाव के कितने ही चक्रव्यूहों की रचना करता रहे।

    आज भी मैं उससे क़तई उलझना नहीं चाहता था। कितने ही दिनों बाद वह मेरे साथ खाना खाने बैठा था। मैं भरसक बचने की चेष्टा कर रहा था, चाहे कुछ वैसी ही आँधी के तेवर तने लग रहे थे। उसने मुझसे स्कूटर बुक कराने की बात कही थी। मुझे अच्छा लगा था। वह कुछ माँग रहा है—मुझसे। अपने पिता से।

    हो जाएगा, मैंने भरसक निरुद्वेग आवाज़ में कहा।

    ऐसी कोई ज़रूरत नहीं है। मैं कर लूँगा। आपको बता दिया...आपने पिछली बार...

    तो यह सूचना थी! पिछली बार के उलाहने का प्रतिकार! क्या कर लोगे?

    कुछ भी...अपनी समझ से...

    अपनी समझ तो इतनी ही है कि ड्रॉप...

    यही सही। आपने कौन-सा कभी समझाने की कोशिश की है? इस घर की पर्दादारी में तो यह समझ में ही नहीं आता कि कौन-सी माँग जायज़ है, कौन-सी नाजायज़। कौन-सी चीज़ हक़ में मिल रही है, कौन-सी भीख में...

    तुम्हें आम खाने से मतलब या पेड़ गिनने से?

    जो घर को घर मानकर रहेगा, उसे पेड़ गिनकर आम खाने पड़ेंगे। अपनी आवाज़ की सख़्ती छिपाने की उसने कोई कोशिश नहीं की।

    ...मैं तुम्हारा बाप हूँ या तुम मेरे बाप? मैं शायद उसकी ललकार का सामना कर पाने के कारण उद्गम को छोड़ नालियों की तरफ़ चल निकला था।

    उसने भी अब तक की लिहाज़ की ओढ़ी हुई चादर को उतार फेंका!

    आप मेरे बाप हैं, मैं आपका बाप। आपके-मेरे बीच कोई असली रिश्ता बनता ही नहीं।...रिश्तों के नाटक हैं सारे...आपकी अपनी दुनिया है, अपने क़िले...आप पालते हैं, हम पलते हैं आप...टुकड़े देते हैं और हम खाते हैं क्योंकि...क्योंकि हम कुछ और कर ही नहीं सकते बेबस हैं...नक्कारे और पालतू... कहकर उसने थाली को एक ही झटके में आगे धकिया दिया था।

    कई रंगों के इस उफान को झेलते उसका पतला-सा चेहरा एकाएक गड्डमड्ड हो गया था—दयनीय और उत्तेजित! एक अधबनी-सी करुणा उसके होंठों पर थरथराकर उसकी तमतमाहट को झूठा कर गई।

    वह उठ गया था। सब्ज़ी के शोरबे से सने हाथ काँपते-से, इस घर में बस आप ही आप हैं। बाक़ी सब टुकड़ख़ोर...पालतू...एडोलसेंट... कहता हुआ वह वैसे ही जूठे हाथों से ही बाहर निकल गया। शोरबे के पीले चिकने धब्बों को हम दोनों के बीच घूरता छोड़कर।

    मुझे लगा, उसकी माँ लपककर उसके पीछे जाएगी हमेशा की तरह, पर वह वहीं-की-वहीं बैठी रही। सन्नाटे में। चेहरा उलाहने के गाढ़े-गाढ़े धुएँ से आवृत्त। उसके इस उपालंभ पुते चेहरे का में आदी हो गया हूँ। उसे ख़ूब-ख़ूब अबूझ लगती हैं ये बातें। उसके हिसाब से मैं घोर अहंकारी हूँ। नियम और व्यवहार का हत्यारा। यह हक़ तो हर गए—गुज़रे को भी मिल जाता है अपने आप...और वह?...ऐसा हीरा लड़का!' ऐसा क्या है कि अपने ही घर में रहते कोई इतना बेगाना महसूस करे...

    मेरे पास इन बोले-अबोले उलाहनों का कोई उत्तर नहीं। सीधे-स्वाभाविक हक़ के पक्ष में खड़ा होकर अपने नंगेपन तक पहुँच जाने का साहस भी नहीं। कैसे कहूँ कि उस भरोसे को पैदा करने की मेरे भीतर कोई चेष्टा नहीं...मुझे नहीं चाहिए कोई वारिस नहीं...चाहिए...उसकी उजली अछूती अस्मिता का आत्मदान...किसलिए मैं किसी के भविष्य को विरासत के अंधकार के नाम गिरवी रखता फिरूँ?...इसका मुझे कोई हक़ नहीं...वह मेरा बेटा है तब तो और भी नहीं कुछ दिन बाद वह भी समझ लेगा, उसका पिता नहीं था कोई, जैसा मैंने समझ लिया था।

    लो! यह भी खा लो। उसने बेटे की थाली में पड़ी दूसरी अनछुई रोटी को उठाकर मेरी थाली में पटक-सा दिया है।

    इस पटकने से उसने जो काम लिया है, उसे मुँह से लेना चाहती तो शायद अपनी ज़रूरत के शब्द ही जुटा पाती। और मैं भी...और कोई प्रसंग होता तो दो-चार झापड़ रसीद करता। यह मेरा घर है। मेरे स्वामित्व के गले में कुत्ते के-से व्यवहार का पट्टा?...नहीं, यह नहीं हो सकता था। पर हो रहा था। मैं होने दे रहा था।

    मैं खाता रहता हूँ। मुँह में पड़े अन्न के बे-स्वाद लोंदे को चबाता रहता हूँ। अपने बचाव की कोई और ढाल मेरे पास नहीं है और उतना उखड़ जाना भी मेरे पक्ष में नहीं है।

    तुम भी खा लो, मैं सहजता का हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाता हूँ।

    वह झन्न से अपनी कटोरी में परोसी सब्ज़ी कुकर में पलटकर मेरे सुझाव की अस्वीकृति को और बड़बोला कर देती है।

    कुछ खाया नहीं होगा सुबह से...आज मंगल है—क्यों नहीं...

    पर यह सहानुभूति उस पर औंधी होकर पसरी है। वह और व्यग्र हो जाती है। अव्यक्त क्रोध में बार-बार घुटनों में खोंसी जाती साड़ी की चुन्नटों को एकाएक आज़ाद करके उठ खड़ी होती है और लपककर बाहर निकल जाती है।

    हाथ धोने उठता हूँ तो उसे बेटे की खाट के पास ज़मीन पर बैठा पाता हूँ। मुझे देखते ही वह पास रखे भूरे स्वेटर को उधेड़ने का कोई छोर ढूँढ़ने का नाटक करने लगती है। एक संधिहीन ख़ामोशी...

    बेटा नहीं तो बेटे की खाट। ख़ाली खाट। वह दृश्य मुझे जाने कहाँ झोंक देता है।

    इस समय तो मुझे वही विराट होकर दीख रही है। ख़ाली खाट के पास ज़मीन पर सिर झुकाए बैठी...घुटती हुई...भूखी, प्यासी, उपासी, आहत...अपने ही भीतर से उठते हाहाकार की गूँजों के बीच...

    मेरे भीतर कहीं कुछ दरका है। अचानक। बिना चेतावनी के।

    अंदर क्यों नहीं जाती? वह वैसे ही बैठी रहती है—जड़।

    जाएगा! कोई पहली बार ही तो नहीं है न...

    हो जाएगी किसी दिन आख़िरी बार...तब तुम, वह बोली थी आक्रमण की इच्छा से, पर फलाँगते आते अशुभ कथन के आवेग से ख़ुद ही घबरा गई।

    मैं वहीं टहलता रहता हूँ। शायद...शायद उसकी मौज़ूदगी की मजबूरी से बँधा। उसे क्या पता...आज कितने बरसों बाद इस शिला को तनिक सरका देने की इच्छा हुई है। उसे कह देने की कि क्यों नहीं...किसलिए नहीं...वह मेरा बेटा है तब तो एकदम नहीं। वह उसकी माँ है तो क्या, मेरी पत्नी भी तो...

    छाती पर अड़ा बैठा यह जमाव खिसकना चाहता है। शायद पहली बार हो सकता है, आवृत्ति की संभावनाओं का डर भी इसमें शामिल हो। देखते-देखते वे दोनों एक मोर्चे में तब्दील हो जाते हैं। मेरे विरुद्ध तने हुए। मेरे तनाव के प्रत्युत्तर में। वह समझ सकेगी, मेरे लिए यह दूरी, यह तनाव ज़रूरी है। यदि बना रहे तो मोर्चाबंदी टूट सकती है—अपने हाथों से। रिश्ते की नज़दीकी के उत्ताप से।

    वह चाहे तो देख सकती है कि चाबुक ताना ज़रूर जाता है पर मारा तो नहीं जाता। इसका गवाह उसके बेटे का शरीर है...उसका मन...उसकी आत्मा उसके भीतर उफनते आलोक का झरना। अपने संघर्ष में से रास्ता बनाने...अपने पैरों पर सीधे खड़े होने की वैसी तड़प क्या देखी है कभी...कहीं और?

    वह क्यों समझती है कि उसका बेटा किसी की दवा का मोहताज है...पालतू और बेचारा? कितनी दूर तक ठान लेता है अपने बूते। उसके पास मोहलत है...हिम्मत है...सिर पर घनी घनेरी छाँह। अभी तो उसके पैरों में ताक़त पनप रही है...आँखों में उजला स्वच्छ आकाश...आसपास ख़ूब-ख़ूब खुली धूप। उसे क्या पड़ी है कि वह मेरे बनाए दरवाज़ों से जीवन के आँगन में प्रवेश करे?

    चाहता हूँ, जो उसने नहीं देखा, वह उसे देखे। उसे भी सहज हो सके सहना—जैसे मुझे। उस आहत दया की फुहारें छोड़ती सड़ी-गली ममता को भूलकर...

    उठो तो... मैंने फिर उसकी बाँह पकड़ी है। अपने पंजों पर उसके पास बैठते हुए।

    मुझे मत छुओ, अपनी बाँह झटकते हुए उसने मुझे परे धकेल दिया है और दाँत पीसते हुए लपककर खिड़की की चौखट से जा लगी है।

    दाँत पीसता हुआ यह रौद्र रूप ख़ाली खाट के पास आहत प्रतीक्षारत बैठी स्त्री की छवि को निगलता जा रहा है—झड़प से।

    मुझे ख़ुद ही लग रहा है, वह घड़ी टल जाने को है टल रही है। भाग रही है बेतहाशा...पीछे देखे बिना।

    कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं एक इतिहास से लोहा लेते-लेते दूसरे इतिहास की गिरफ़्त में आता चला जा रहा हूँ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 290)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : राजी सेठ
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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