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अँगूठी

anguthi

नमिता सिंह

नमिता सिंह

अँगूठी

नमिता सिंह

और अधिकनमिता सिंह

    आप भी वही बात समझ रहे होंगे जो सब कह रहे हैं। मीरा ने आत्महत्या कर ली। यूँ देखा जाए तो इसमें कुछ ग़लत नहीं। ग़लत हो भी कैसे सकता है। पहले घर में झगड़ा हुआ। फिर वह घर से चली गई और रात-भर ग़ायब रही।

    घर से निकलकर जाते हुए उसे कई लोगों ने देखा। चौराहे के गणेश पान वाले से पूछिए। उसकी दुकान पर मुहल्ले-भर के लड़कों का जमघट रहता है। मीरा जब चौराह के पास पहुँचती तो ख़ुद-ब-ख़ुद उसका सिर झुक जाता और चाल तेज़ हो जाती। उसे लगता कि सब उसकी ही ओर देख रहे हैं या उसके बारे में ही बातें कर रहे हैं। लेकिन, उस दिन पान का बीड़ा मुँह में भरे हुए और अपनी खुली जाँघ पर हाथ मारते हुए गणेश आपको बतलाएगा—

    'अरे साहब, आजकल की लड़कियों का कोई ठिकाना नहीं, दुनिया-भर के कुकर्म कर आएँगी और क्या मज़ाल जो चेहरे पर शिकन भी जाए। देखने में तो ऐसी सीधी लगती थी कि पूछो मत। जाने क्या चक्कर था। रात का वक़्त और ऐसी बेधड़क चली जा रही थी पीछे मुड़कर जाने किसे देख रही थी। हमें क्या मालूम था, जी कि मरने जा रही है, वरना हमीं...।' और पान से रंगे दाँत दिखाता हँसने लगेगा वह।

    आप मीरा के घर जाएँगे। उसकी माँ तो आपको होश में मिलेगी नहीं। बीच-बीच में होश आने पर अलबत्ता चीख़ने लगती है, 'मार डाला रे मेरी बच्ची को! खा गई डायन उसे!' बिल्कुल ही होश गँवा बैठी है वह सदमे से!

    उसके पापा दो दिन से कमरे में ही हैं। उनकी सूरत देखना दूभर हो गया है। बरामदे में उसकी बुआ ज़रूर आने वाली औरतों से घिरी आपको दिखाई देंगी। वह भी ज़्यादा कुछ नहीं बतातीं। आँसू पोंछती, कह उठती हैं, 'क्या बताएँ बहिन जो! थोड़ा-बहुत उल्टा-सीधा तो इस उम्र में हो ही जाता है। माँ-बाप से कहन-सुनन भी होती है। पाली-सेंती लड़की यूँ चली गई।'

    मीरा की लाश के टुकड़े सवेरे ही रेलवे लाइन पर मिले थे, लड़कों के कॉलेज के पास जहाँ झाड़ियाँ हैं, वहीं एक झाड़ी में दुपट्टा उलझा पड़ा था। अब ये सारी बातें एक धागे में पिरो दें तो लोगों की बातों पर विश्वास हो जाएगा। वैसे भी अपने आसपास की बहू-बेटियों, ख़ास तौर पर जवान लड़कियों के लिए उल्टा-सीधा सुनने के लिए हमेशा तैयार बैठे रहते हैं। दूसरे के फटे में उँगली डालने में आनंद तो मिलता ही है, एक क्रूरतापूर्ण संतोष का अहसास भी होता है।

    मीरा एक सत्रह-अठारह साल की जवान लड़की थी। देखने में ठीक। वह ख़ूबसूरत नहीं तो बुरी भी नहीं। फिर यह उम्र ऐसी होती है जो हर लड़की में ख़ूबसूरती का एक अलग पैमाना लेकर आती है। उम्र का नया चढ़ाव, नई उमंगें, नई कल्पनाएँ, नई आशाएँ। नज़रें ही दूसरी हो जाती हैं। सारी दुनिया एक नए रंग में रंग जाती है। चिड़ियों की चहचहाहट, फूलों की रंगत, नीले आसमान में रुई के फाहों जैसे बादल जो क्षण-प्रतिक्षण अपना रूप बदलते हैं—इस उम्र में एक नया मतलब लेकर आते हैं। कविताओं की पंक्तियाँ, गीतों की धुनें नित नए अर्थ देती हैं। बहुत कुछ होता है इस दुनिया से लेने के लिए और इस दुनिया को देने के लिए। अपना जीवन, अपना अस्तित्व एक नई महत्ता का अहसास कराने लगता है।

    बरसात के बाद की छलछलाती नदी-सी मीरा उम्र के इसी पायदान पर पैर रखे थी। साँवला रंग और खिलने लगा था। सवेरे के समय फूलों पर चमकती ओस की बूँद जैसी आँखें भरी-भरी जो इस उम्र में देखती कम हैं, बोलती हैं और हँसती ज़्यादा हैं। मतलब यह कि मीरा एक भरा-पूरा जीवन थी—हँसता-खिलखिलाता बेहद उम्मीदों से भरा एक भविष्य थी।

    मीरा एक ठीक-ठाक घर से थी। पिता नौकरीपेशा। एक प्राइवेट फ़र्म में एकाउंटेंट। ख़ासा वेतन मिल जाता। बड़ा लड़का मीरा से दो साल बड़ा। मीरा की माँ एक सीधी-सादी औरत थी। आम मध्यवर्गीय घरों जैसी। उसकी टोपी इसके सिर पर और इसकी टोपी उसके सिर पर रखकर काम निकालने वाली नौबत तो कभी-कभी उस घर में भी जाती, जो अक्सर हमारे-आपके घरों में भी चलता है। यह दूसरी बात है कि बाहरी टीम-टाम से पलस्तर लगा रहता है—छेद ढँके रहते हैं, यूँ बातों की उड़ान का क्या हिसाब। मीरा की सुमन बहिनजी से पूछो। कॉलेज में पढ़ाती है! अपनी नियुक्ति होने के बाद स्टाफ़ रूम में बैठने लगी तो मालूम हुआ कि कोई भी नौकरी का ज़रूरतमंद नहीं। सब अपना ख़ाली समय बिताने के लिए या सिर्फ़ शौक़ के लिए नौकरी कर रहे हैं। सुमन बहिनजी को यह जानकर बहुत शर्म आई है। वह तो सिर्फ़ ज़रूरत के लिए नौकरी कर रही है। बाऊजी के मरने के बाद कहाँ रिसर्च, कहाँ की पी-एच.डी, सब ख़त्म। तुरंत ट्रेनिंग के लिए भी कितने पापड़ बेले। उस कमबख़्त हेड क्लर्क की ख़ुशामदें कीं। पिछले जाड़ों-भर उसके बच्चों को स्वेटर बुन-बुनकर पहनाए। प्रिंसिपल को कौन पूछता है? असली प्रिंसिपल तो अब हेड क्लर्क हुआ करते हैं—मैनेजर साहब के ख़ासुलख़ास। दो हज़ार रुपए नक़द दिए तब जाकर यह नौकरी नसीब हुई। लेकिन फिर और लोग भी तो इसी रास्ते से कॉलेज की नौकरी में आए होंगे। यह अच्छा शौक़ है जिसके लिए अपमान सहो, ख़ुशामदें करो—पैसा ख़र्चों। कमला बहिनजी के साथ क्या हुआ? उनके छोटे-छोटे दो बच्चे। कॉलेज आते समय उन्हें बाहर से बंद कर आतीं। पति सवेरे ड्यूटी पर जाते और शाम हुए घर लौटते। एक दिन उनके पीछे बड़ा बच्चा खेलते हुए सोफ़े से गिर पड़ा। नीचे जाने कोई कील वग़ैरह पड़ी थी कि क्या था, बच्चे के सिर से काफ़ी ख़ून निकल चुका था। छोटा बच्चा दहशत की वजह से अधमरा-सा हो रहा था।

    सुमन बहिनजी की समझ में नहीं आता कि यह कैसा शौक़ है जिसमें बच्चों की ज़िंदगी दाँव पर लगा दी जाए। यह कैसा शौक़ है जिसके लिए इस क़दर टेढ़े-मेढ़े रास्ते अपनाए जाएँ कि अपनी मंज़िल ही याद रहे। यह कैसा शौक़ है कि जिसकी वजह से दामन में काँटे ही काँटे भर लिए जाएँ। कुसुम बहिनजी और मैनेजर साहब को लेकर आज तक लोग उल्टी-सीधी बातें करते हैं।

    सुमन बहिनजी के चार छोटे भाई-बहिन हैं। एक भाई एम.एस-सी. में पढ़ रहा है। दो-एक साल में शायद वह कुछ ठिकाने पर लग जाए तो उनका कुछ बोझ हल्का हो। सुमन बहिनजी की एक छोटी बहिन राधा मीरा की दोस्त है और मीरा के साथ पढ़ती है।

    हरियाली तीज का दिन। मीरा को सुमन बहिनजी के घर जाना था और राधा से लेकर कुछ नोट्स उतारने थे। तय हुआ कि मीरा दुपहर में ही जाएगी। पहले पढ़ाई होगी, फिर झूला डाला जाएगा। वे लोग झूला झूलेंगी—गाना गाएँगी, फिर मिलकर खाना पकाया जाएगा। खाएँगे-पीएँगे, थोड़ी मौज-मस्ती करेंगे, शाम होने से पहले वह घर वापस जाएगी।

    मीरा नहाई-धोई। नया सलवार सूट पहना। दो चोटियाँ गूँथीं। काजल लगाया। माथे पर बिंदी लगाई—सितारे जैसी, छोटी चमकती। दो क्षण अपने को निहारती रही शीशे में और फिर हल्के से मुस्कुरा दी।

    ड्रेसिंग टेबल पर अँगूठी रखी थी। मीरा की बुआ की अँगूठी। बीच में बड़ा-सा नग, लाल रंग का। किनारे पर छोटे-छोटे हरे रंग के पन्ने। खिलते फूल-सी अँगूठी, दहकते अंगार-सी अँगूठी जिसे उसने उँगली में डाल लिया। उँगली में घुमाती रही, देखती रही। फिर उतारकर रख दी, वापस उसी जगह पर इधर-उधर देखते, उसने अपनी नोटबुक निकाली, पैन निकाला और चलने को तैयार। एक बार फिर शीशे में अपने को देखा। बिंदी कुछ ठीक से गोल नहीं थी। उसे ठीक किया। अँगूठी वहीं रखी थी। मन नहीं माना, दुबारा उँगली में डाल ली। क्या हर्ज है? पहनकर चली जाए। आकर वापस कर देगी। ख़ूब मज़ा आएगा। राधा इसे देखकर ज़रूर कुछ-न-कुछ कहेगी। सोचेगी कि उसकी मँगनी हो गई है। वह भी चुप रहेगी। हाँ भी नहीं कहेगी और इंकार भी नहीं करेगी। राधा का भाई प्रदीप। वह तो यही कहेगा कि देखा, मैं कहता था कि लड़कियों को क्या ज़रूरत है किताबों से सर मारने की। तुम्हारे मम्मी-पापा तो इसीलिए तुम्हें पढ़ा रहे हैं कि अच्छा पति मिल जाए। बस, अब क्या है! मँगनी हो गई, काम ख़त्म। क्या करना अब नोट्स उतारकर। तवा और पतीला उतारो अब...। बहुत मज़ेदार बातें करता है प्रदीप। अपनी बहन राधा को तो चिढ़ाता ही है, उसे भी नहीं बख़्शता। कुछ-न-कुछ कहता ही रहेगा।

    बुआजी नहा रही थीं। मीरा माँ के पास गई। माँ रसोई में थी।

    माँ, यह अँगूठी पहन जाऊँ मैं?

    अरे हट! रख दे। तेरी बुआ की अँगूठी है। पराई चीज़ का क्या शौक़ करना री। जा, वहीं रख दे।

    मैं पूछ लूँ बुआजी से?

    और दौड़ गई वह बाथरूम की ओर।

    माँ, माँ! मैंने बुआजी से पूछ लिया है। मैं जा रही हूँ—आ जाऊँगी चार-पाँच बजे तक।

    और अँगूठी उँगली में डालकर मीरा चली गई।

    राधा के घर ख़ूब अच्छा रहा। नोट्स उतारने में उसे काफ़ी समय लग गया। फिर खाना बनाया। जमकर खाया। ख़ूब गप्पबाजी की। सुमन बहिनजी घर पर ही थीं। प्रदीप बाहर गया हुआ था। दुपहर के बाद मीरा और राधा की कुछ सहेलियाँ भी गई। मीरा जैसा सोच रही थी, वैसा ही हुआ। राधा तथा उसकी सहेलियों ने जब अँगूठी देखी तो उसे ख़ूब छेड़ा, ख़ूब जुमलेबाजी की। उसने भी नहीं बताया कि यह किसकी अँगूठी है। बस, मुस्कुराती रही सहेलियों के सामने—यह तो टॉप सीक्रेट है—ख़ुद अंदाज़ा लगाओ कि क्या बात हो सकती है—अब कौन है वह भाग्यशाली, यह हम ख़ुद कैसे बता दें...अँगूठी का राज़ बताओ तो जानें।

    बहरहाल, ख़ूब ठिठोली हुई। मस्ती से गाने गाए, झूले में बैठे। शाम होते-होते वह घर चली आई।

    कपड़े बदलकर वह बाहर गई। माँ रसोई में थी। सोचा कि माँ का कुछ हाथ बँटा दे, फिर पढ़ने बैठेगी। रसोई में आई तो पूछा—

    अँगूठी बुआ को वापस कर दी?

    अँगूठी? उसने हाथ की ओर देखा। अँगूठी नदारद। थोड़ी-सी ढीली तो थी, लेकिन ऐसी ढीली भी नहीं कि निकल जाए। वह तो बहुत सावधान थी। धक् से रह गई। माँ ने उसका फक् पड़ता चेहरा देखा तो वह भी घबरा गई।

    क्यों, क्या हुआ? कहाँ डाल आई?

    कहीं नहीं माँ, उँगली में ही तो थी। कहाँ रह गई?

    और वह दौड़ गई कमरे की तरफ़, जहाँ उसने अभी कपड़े बदले थे। पलंग पर देखा, बिस्तर उलट दिया, नीचे, अलमारी के नीचे, ड्रेसिंग टेबल पर, उसके नीचे, कोनों में—सारा कमरा छान मारा। बाहर दरवाज़े से चलकर दुबारा उन्हीं जगहों पर देखा, जहाँ-जहाँ वह गई थी। अँगूठी नहीं मिली।

    मर जा नासपीटी! इसलिए मना कर रही थी। मर अब। तेरी बुआ हाय-हत्या मचाएगी। जा, भागकर जा और देख रास्ते में, राधा के घर। जा जल्दी...।

    मीरा बदहवासों जैसी उन्हीं कपड़ों में भागी गई। सारे रास्ते आँखें गड़ा-गड़ाकर देखती रही। राधा के घर, एक-एक कमरा छान मारा। हर चीज़ उलट-पुलट दी। घर का सारा सामान टटोल लिया। किचन, किचन के सारे डब्बे, बर्तन, कूड़ेदान, नालियाँ। राधा के किताबों के शेल्फ़-अलमारी, और तो और उसका बाथरूम-पखाना, कुछ भी तो नहीं बचा। अब? अब क्या करे? क्या करे वह? उसके पैर काँपने लगे। कलेजा जैसे मुँह को रहा हो। किस मुँह से वापस लौटे? उसका दिल चाहा कि वह यहीं रह जाए। लेकिन कैसे? घर तो लौटना ही था। फिर एक बार आँखों की पुतलियाँ सड़क पर चिपकाए क़दम-क़दम नापती वह घर की ओर बढ़ने लगी। हाथ में टॉर्च ले ली थी। लेकिन अँगूठी मिलनी थी, सो नहीं मिली।

    घर में घुसी। पैर ठिठक गए। सामने ही बुआजी दीख गईं—उफनती, उबलती। पूरे महाभारत की तैयारी थी। भयभीत हिरनी-सी उसने अपनी नज़रें उन पर गड़ा दीं। पीछे-पीछे माँ थीं। तमतमाया लाल चेहरा।

    क्यों, मिल गई? माँ ने लगभग चीख़ते हुए पूछा। स्पष्ट था कि माँ और बुआ में उसके पीछे कहासुनी हो चुकी थी।

    घोर विवशता के फंदों में जकड़ी मीरा चुप थी। अपनी डबडबाई आँखें उसने धार से नीचे झुका लीं। होंठ काँप रहे थे। हे भगवान! यह धरती फटे और वह धरती में समा जाए। यह क्या हो गया? किस कुघड़ी में उसने अँगूठी उँगली में डाली? क्यों डाली? हे भगवान! आज रक्षा कर लो, किसी तरह बुआ को दया जाए...।

    उसे इस तरह काँपते हुए, चुप खड़े देखकर माँ समझ गई। उसने झपटकर पास पड़ी झाड़ उठा ली और मीरा को पीटना शुरू कर दिया।

    नासपीटी! तभी मना किया था। मत पहन। पराई चीज़ और शौक़ पूरा कर करमजली! देख तो ली होती कि किसकी चीज़ थी। खो आई अँगूठी। मर नहीं गई। तू भी वहीं पर...।

    देखो भाभी, मुझे तो सुनाओ मत तुम। मुझे दिखाने के लिए यह नाटक करो। मेरा गहना खो जाए और वह भी मायके में। क्या जवाब दूँगी में वहाँ?

    कमबख़्त! तेरी वजह से सुननी और सुननी आज सब सुन ली मैंने नुक़सान कराया सो अलग। तू मर जाए तो मुझे चैन पड़े...।

    माँ ने मानो बुआजी की बात सुनी ही हो!

    मीरा पिटती रही...सिसकती रही...एक बार भी उसने माँ का हाथ नहीं पकड़ा कि माँ मत मारो। क्षोभ और अपमान ने मानो उसके शरीर को सुन्न कर दिया हो। वह होंठ भींचे हुए थी—बहुत ज़ब्त किए थी, लेकिन रोकते- रोकते भी उसकी रुलाई फूट ही पड़ी। क्या करे वह? कहाँ जाए? बुआ, तू ही दया कर दे। मैं पैसे जोड़-जोड़कर तुम्हारी अँगूठी के दाम वापस कर दूँगी...ज़िंदगी-भर तुम्हारी ग़ुलामी करूँगी...।

    माँ ने झाड़ू फेंक दी थी और उसका बकना और मीरा को कोसना जारी था...माँ भी रो रही थी। मीरा की मौत माँग रही थी...अपनी मौत माँग रही थी। बुआ अंदर कमरे में चली गई। मीरा उकड़ बैठी घुटनों में सिर दिए सिसक रही थी।

    बाहर दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनाई दी।

    मेरी साइकिल में भी ताला लगा देना प्रमोद! पापा की आवाज़ सुनाई दी। भय्या और पापा भी गए थे।

    ऐं...मीरा? ऐसे कैसे बैठी है? क्या हुआ? रो क्यों रही है? पापा को देखकर उसकी रुलाई और तेज़ हो गई। उसने अपना सिर घुटनों के अंदर और ज़्यादा कर लिया।

    क्या बात हो गई भाई? बताती क्यों नहीं? कहाँ है तेरी माँ...?

    प्रमोद एक सेकंड उसके पास खड़ा रहा। फिर पापा के पीछे-पीछे भीतर चला गया। पापा अंदर माँ से बात कर रहे थे। माँ और बुआजी की तेज़-तेज़ आवाज़ें सुनाई देने लगीं। फिर उसने सुना, पापा उसे आवाज़ दे रहे थे, अंदर बुला रहे थे। नहीं, वह नहीं जाएगी उनके सामने। ऐसी ही बैठी रहेगी। जन्म-ज़िंदगी यहीं बैठी रहेगी, मुँह छिपाए।

    थोड़ी देर बाद प्रमोद बाहर आया।

    चल अंदर। पापा बुला रहे हैं।

    उसने कोई जवाब नहीं दिया।

    चलती है कि नहीं या लगाऊँ दो हाथ। चल भीतर। हमें सब कुछ मालूम हो गया है। प्रमोद ने बाँह पकड़ ली।

    छोड़ दो मुझे, छोड़ दो। मीरा ने हाथ झटक दिया। इसे क्या हक़ है मेरे ऊपर ग़ुस्सा दिखाने का। अपने कारनामे भूल गया…। मीरा यह सोच ही रही थी कि प्रमोद ने गद्द से उसकी पीठ पर हाथ मारा और उसकी बाँह पकड़, लगभग घसीटता हुआ उसे कमरे के भीतर ले आया और खड़ा कर दिया।

    माँ-पापा, बुआ फिर सबके सामने एक शर्मनाक पेशी। यह अग्नि-परीक्षा क्या हूँ ही अनवरत चलती रहेगी। समय किस क़दर खिंचता चला जा रहा था। शर्म से डूबा यह क्षण कितना लंबा हो रहा था।

    पापा का चेहरा उतरा हुआ था। थकी आवाज़। नज़रें मीरा के चेहरे पर गड़ी हुई।

    देखो मीरा। तुमने अपनी बुआ की अँगूठी पहनी ही क्यूँ? फिर पहनी थी तुम्हें ध्यान रखना चाहिए था। बोलो, कहाँ रह गई अँगूठी?

    पापा...पता नहीं पापा! मैंने जान-बूझकर कहीं नहीं गिराई। मुझे माफ़ कर दो...। दोनों हाथ जोड़कर मीरा सिसकने लगी। उसकी आवाज़ भर्रा गई थी। उसके पैर काँपने लगे। दीवार के सहारे उसने सर टिका दिया।

    तुमने ही बहुत सर चढ़ा रखी है भय्या! वरना इतनी बड़ी लड़की और इतनी लापरवाह? इतनी बड़ी लड़कियाँ पूरा-पूरा घर देखती हैं। बड़ी-बड़ी गृहस्थी चलाती हैं। हमारे वक़्त तो तुमने हमें इंटर भी रो-रोकर कराया। आज तुम्हारी अपनी लाड़ली कॉलेज जा रही है। दुनिया-भर के फ़ैशन कर रही है। घूम रही है, फिर रही है। तिस पर यह हाल।

    क्या चाहती हो बीबी तुम? जान ले लो इसकी अगर इससे तुम्हारा कुछ बनता हो तो। दूसरी अँगूठी बनवा लो अपने भाई साहब से कहकर।

    माँ से बोले बिना रहा गया। उसने मीरा के प्रति अपनी ननद के ईर्ष्या भाव को हमेशा से महसूस किया था।

    पापा एकदम बीचबचाव की-सी मुद्रा में बोले—

    नहीं भाई, नुक़सान तो हुआ ही है उषा का। फिर इस महीने में उषा जाएगी वापस। उसकी विदाई। वैसे ही इतना ख़र्चा होगा। कहाँ से बनेगी अँगूठी? एक हज़ार से क्या कम लगेगा।

    बस, यही तो बात है भय्या! भाभी को कोई मतलब नहीं इन सब बातों से। ख़ुद मज़े में रहती हैं। सास, ससुर। सबके बीच में रहना पड़े ससुराल में तब मालूम हो। शादी में जो सामान दिया तुम लोगों ने उसकी जो धज्जियाँ उड़ाई वहाँ सबने कि बस। आज तक ताने सुनती हूँ। कभी ख़बर ली तुम लोगों ने? अबकी करवाचौथ पर भिजवा दिए दो सौ रुपए। कपड़े, सामान। अब यह इल्ज़ाम और लगेगा कि मायके वालों को भरती है। मायके वालों को जेवर दे आई अपने।

    बस करो उषा! जो कुछ भी किया! तुम्हें मालूम है, सब कैसे किया गया। पिताजी क्या छोड़ गए थे; सिवा क़र्जे के। फिर कौन हमारी रिश्वत की कमाई है? जितना हो सकता था, किया। तुम इतना परेशान मत हो उषा। हो पाएगा तो इसकी माँ का ज़ेवर बेचकर बनवा दूँगा तुम्हारी अँगूठी, बस! पापा को ग़ुस्सा चढ़ने लगा। बुआ यह देखकर सकपका गई। बुआ ने पापा को कहीं भीतर तक आहत कर दिया था। पापा की नज़र फिर मीरा पर पड़ी जो सहमी, सिकुड़ी दीवार के सहारे खड़ी थी एक पैर थोड़ा-सा उठाए और दीवार से टिकाए। उसके पैरों में झनझनाहट-सी हो रही थी। बिजली की लहर पूरे पैरों से होती हुई ऊपर को मानो दौड़ जाती। लेकिन पापा की आँखों से निकलती घृणा की लहर उसे फिर सुन्न करने लगी।

    तेरे भी दिमाग़ बहुत ख़राब हो गए हैं। यह सब शौक़ अपने घर जाकर करना। ज़रूरत क्या थी तुझे अँगूठी पहनने की? क्या जान निकल रही थी तेरी उसके बिना? बुआ की खिसियाहट बढ़ने लगी। उसे अब कुछ कहना बेहद ज़रूरी लगने लगा।

    मुझे तो लगता है, कहीं किसी को दे आई है यह। क्यों री मीरा, कहीं किसी को प्रेज़ेंट तो नहीं कर आई तू? सोचा पराई जाय में गोदान।

    कैसी बातें करती हो बीबी! दे किसे आएगी? अरे, लापरवाही करी, गिरा आई कहीं पर, सो भुगतेगी...।

    अपनी खिसियाहट और रोष में परिहास का पुट लाने की कोशिश करती हुई बुआ माँ को नज़रअंदाज़ करती हुई फिर बोली—

    क्यों, उस दिन कौन छोड़ने आया था तुझे मीरा? बातें तो उससे इस तरह कर रही थी जैसे बहुत जान-पहचान हो। देखो भाभी, तुम्हें बुरा तो बहुत लगता है लेकिन तुमने छूट बहुत दे रखी है। हमें तो कभी घर से निकलने भी नहीं दिया भय्या ने और कभी ऐसे सहेलियों-दोस्तों के साथ घूमने-फिरने की इजाज़त मिली। ख़ैर, हमारा तो क्या बिगड़ा। अच्छा ही रहा। अब अपनी औलाद पर नज़र रखो। आज तो अँगूठी की बात है, चली गई। कल लड़की हाथ से निकल जाए।

    मीरा के पापा तो अपनी बहन का मुँह ताकते रह गए। इस नई बात के उद्घाटन से वह सकते में गए। मीरा की माँ की तरफ़ देखा उन्होंने। माँ का चेहरा फक था। इससे ज़्यादा अपमान और क्या हो सकता है? ननद रानी ने आज सारी कसर निकाल ली थी।

    कौन था वह, प्रमोद की माँ? तुमने तो मुझे कभी कुछ नहीं बताया? कहाँ जाती है यह? क्यों, क्या सचमुच किसी को दे आई तू अँगूठी?

    मीरा के होश उड़ गए। उबरने की उम्मीद लग रही थी, फिर किस गहराई में जा गिरी वह? बुआ भी किस जनम का बदला ले रही है? किसके लिए कह रही है? पापा ने इतने बड़े झूठ पर विश्वास कर लिया? तो अब याद आया। उस दिन कॉलेज में ड्रामा था। रात के नौ बजे गए थे। वह प्रमोद भय्या का इंतज़ार करती रही। जब सब लोग चले गए और उसे लेने के लिए कोई नहीं आया तो सुमन बहनजी ने उसे प्रदीप के साथ घर भेजा था। उन्होंने कहा था कि लड़कियों की ज़िम्मेदारी उनके ऊपर है और वह रात के समय उसे अकेले नहीं जाने देंगी...।

    पापा, बुआ ड्रामे वाले दिन की बात कह रही हैं। वह तो प्रदीप भय्या थे, राधा के और सुमन बहनजी के भाई। मुझे कॉलेज से लेने कोई नहीं आया था, इसलिए उन्हें साथ भेजा था।

    मीरा जल्दी-जल्दी अपनी सफ़ाई देती हुई रो पड़ी।

    बुआ झूठ बोलती हैं पापा बुआ...से मना कर दीजिए...। मीरा की आवाज़ बिखरने लगी।

    चुप रह! वह झूठ बोलती है और तू सच बोलती है। मीरा के पापा को लग कि अभी उषा फिर जाने क्या-क्या बोलने लगेगी। परत-दर-परत नंगा करेगी सबको।

    कमबख़्त, तू पहनकर गई ही क्यूँ थी। फिर कहाँ गिरा आई—किसे दे आई, बोल!

    पापा को ग़ुस्सा होते देखा तो प्रमोद भी शेर।

    बोलती है कि नहीं या लगाऊँ दो हाथ।

    तुम जाओ प्रमोद! तुम्हें वर्माजी के पास पहुँचना है। चलो। पापा ने सख़्त लहज़े में कहा तो प्रमोद भुनभुनाता तेज़-तेज़ पैर रखता हुआ बाहर चला गया। मीरा की सिसकियाँ तेज़ हो गईं। किससे दया की उम्मीद करे? पापा थे जो बचा सकते थे, वह भी ग़ुस्सा हो गए।

    उसके पापा का दिमाग़ भन्ना रहा था। उन्हें कुछ समझ नहीं रहा था। उषा के मन में क्या-क्या भरा है, उन्हें आज मालूम हुआ। वह कहीं बहुत भीतर तक आहत हो गए थे। इस महीने उषा की विदाई भी करनी थी। यूँ ही एक बढ़ा ख़र्चा था, तिस पर यह नुक़सान और भरो। क्या पता, ठीक ही कहती हो वह। लड़कपन में मीरा किसी को अँगूठी दे ही आई हो। यह उम्र ही ऐसी होती है। कहानी-उपन्यास पढ़-पढ़कर और सिनेमा देखकर यही सब तो सीखते हैं ये लोग। उषा ठीक कह सकती है। ये सब आजकल के लड़के-लड़कियों की बातें हम लोग क्या जानें। वरना ऐसे कहाँ गिर जाती अँगूठी? लेकिन मीरा से यह उम्मीद तो नहीं थी। ठीक कहती है उषा कि लड़की कहीं हाथ से निकल जाए।

    नहीं पापा, नहीं, किसी को नहीं दी मैंने। पापा मेरी...बात मान लो, पापा...!

    बुआ ने एक नज़र अपनी भाभी पर डाली। क्या था उन आँखों में चुनौती? नहीं, साँप की तरह लहराती हँसी माँ तड़पकर रह गई।

    उधर मीरा बिलख रही थी। पापा के पैर पकड़े हुए थी।

    पापा...मेरा विश्वास कीजिए पापा...किसी को कुछ नहीं दिया मैंने...अबकी बार माफ़ कर दो पा...पा...फिर कभी नहीं पहनूँगी कभी कुछ नहीं पहनूँगी...पा...पा!

    जिबह किए जा रहे जानवर की तरह डकरा रही थी मीरा। उसकी जवानी के रंग—उसकी उमंगें कहर बनकर उस पर टूट रही थीं। पापा उसकी आख़िरी उम्मीद, हरहराते विशाल समुद्र में धकेल दी गई। मीरा के हाथों का आख़िरी सहारा...और यह सहारा भी उसके हाथों से फिसल रहा था।

    नहीं मीरा! तुम्हें अँगूठी लेकर आना है। जाओ, वापस लेकर आओ...।

    डूबती-उतराती मीरा को वह बर्फ़ीली सर्द आवाज़ भीतर तक चीरती चली गई।

    जब तक अँगूठी मिले, घर वापस मत आना, जाओ...। और अचानक एक विस्फोट मौत की घाटी के गुमसुम सन्नाटे को भेदते हुए उसके पापा अचानक अपनी पूरी ताक़त के साथ चीख़ पड़े।

    जाओ...चली जाओ...। ऐसा लगा मानो उन्हें दौरा पड़ गया हो।

    पापा की अप्रत्याशित चीख़ सुनकर मीरा ही नहीं, माँ और बुआ भी काँप उठीं। बुआ उठकर दूसरे कमरे में चली गईं। मीरा का रोना एकदम बंद हो गया। जड़ हो गई वह। उसकी आँखें खुली ज़रूर थीं लेकिन आसपास, माँ-पापा के चेहरे धुँधलाते जा रहे थे। दिमाग़ धीरे-धीरे सुन्न हो रहा था, मानो बेहोशी का इंजेक्शन दे दिया गया हो। पापा की आवाज़ अब अधिक डरावनी नहीं लग रही थी। शेष रही चेतना की किसी अनजानी सतह पर, नन्ही-सी ख़ूबसूरत आशा की परी अपने पंख फैलाए उड़ती हुई उसे दिखाई देने लगी थी। हँसती हुई उसके सामने हथेली फैलाए, हथेली पर लाल दप-दप करती अँगूठी...हम तुम्हारी परीक्षा ले रहे थे मीरा रानी...लो, यही है तुम्हारी अँगूठी बचपन में खेला हुआ एक ड्रामा...हाँ, ड्रामा ही तो...लेकिन यह ड्रामा कब ख़त्म होगा? बहुत हो गया, उसे नींद-सी रही थी।

    और मीरा ने महसूस किया था कि उसके पापा ने उसका हाथ पकड़कर उसे दरवाज़े से बाहर कर दिया है। एकदम ख़ामोश, नीम बेहोशी की हालत में मुब्तिला मीरा की नज़र अपनी माँ पर पड़ी या नहीं, यह कहा नहीं जा सकता, जो होंठ भींचे खड़ी थी और अपने पल्लू से आँखें पोंछ रही थी। दिमाग़ के साथ-साथ मीरा के कान भी सुन्न हो गए थे। ज़ोर से बंद हुए दरवाज़े को वह फटी-फटी आँखों से कुछ देर तक देखती रही और फिर धीरे-धीरे दरवाज़े के सहारे, बाहर देहरी पर ही बैठ गई थी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 239)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : नमिता सिंह
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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