अख़बारों में आचार्य सनेही जी के अस्वस्थ होकर अस्पताल में भरती किए जाने का समाचार पढ़ा। जी चाहा कि जाकर उनके दर्शन कर आऊँ पर 'गृह कारज नाना जजाला' में फँसकर घर से दो क़दम दूर कानपुर तो न जा पाया, हाँ कार्यवशात् दो दिनों के लिए दिल्ली ज़रूर पहुँच गया। मनोहर श्याम जोशी ने कहा, आप तो इतने पास रहते हैं, एक दिन हमारे लिए सनेही जी से मिल आइए। सुनकर लगा कि नई पीढ़ी मेरी मलामत कर रही है। कवि न होने पर भी पूज्य सनेही जी महाराज ने मुझे स्नेह प्रदान किया है। हिन्दी-भाषी समाज के प्रति उनके बड़े उपकार हैं। आधुनिक विराट कवि सम्मेलनों की परंपरा के इस बाबा आदम ने हमारे जनसाधारण के मानस को न केवल राष्ट्रवादी भावधारा ही से आप्लावित किया बल्कि खड़ी बोली की कविता वो भी प्रतिष्ठा दिलाई। 'सुकवि' संपादक के रूप में सनेही जी ने उन दिनों सुकवियों की एक अच्छी-ख़ासी बटालियन ही अँग्रेज़ों और हमारे अज्ञान से मोर्चा लेने के लिए खड़ी कर दी थी। सनेही-त्रिशूल के गीत राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों में निकलने वाली प्रभात-फेरियों मे ख़ूब गाए जाते थे।
वाग्देवी ने मुझे कवि होने का वरदान नही दिया। इस कमी को मैंने कविता का पाठक और श्रोता बनकर पूरा किया है। पढ़ने का शौक मुझे बचपन से ही है, अकेले में सस्वर काव्य-पाठ करने में मुझे बड़ा आनंद मिलता। एक समय में अनेक अच्छे-अच्छे कवियों की अनेक रचनाएँ मुझे याद भी थी। पूज्य सनेही जी की एक बहुत पुरानी कविता 'अशोक वाटिका में सीता' की कुछ पंक्तियाँ इस समय भी याद आ रही हैं :
मनोहर लंकपति की वाटिका थी,
प्रकृति रंगस्थली की नाटिका थी।
महा छवि जाल फूलों के चमन थे,
उलझते भौंर-से जाकर नयन थे,
घटा घनघोर घिरती आ रही थी,
हरित छवि हर दिशा मे छा रही थी।
सखी ने जब कहा, घनश्याम आए,
नयन खोले समझ कर राम झाए,
जिधर देखो उधर ही श्याम छवि थी,
हृदय मे भी भरी श्रीराम छवि थी।
इसी तरह कर्ण की मृत्यु पर दुर्योधन के विलाप वाली उनकी कविता की कुछ पंक्तियाँ भी मुझे अब तक याद है
नभ असित धरा पै काल-सा छा रहा था,
रविरथ द्रुतगामी भागता जा रहा था।
खग मृग अकुलाए भीत-से हो रहे थे,
शिव-अशिव कुवाणी बोलते रो रहे थे।
पं. गयाप्रसाद शुक्ल सनेही, यह नाम हिंदी-भाषी क्षेत्र में विशाल जन-समूह वाले कवि सम्मेलनों की परंपरा के महान संस्थाकों में शीर्षस्थ है और अमर भी। अपने लोकप्रिय 'सुकवि' पत्र के द्वारा भी जन-मन में खड़ी बोली के संस्कार जगाने और नई भाव-चेतना प्रतिष्ठित करने में श्रद्धेय सनेही जी प्रात स्मरणीय आचार्य द्विवेदी जी महाराज के कमांडर-इन-चीफ़ रहे हैं। सनेही जी के नेतृत्व में होने वाले पुराने कवि सम्मेलनों में, जन-समुद्र की एक बूँद बनकर, उन्हे देखने-सुनने का मुझे अनेक बार सौभाग्य-लाभ हुआ था। उस समय की जन-धारणा यह थी कि आचार्य सनेही जी जिस कवि-सम्मेलन में अपनी नवरत्नवत् शिष्य मंडली लेकर पहुँच जाए, वहाँ फिर और कोई पहुँचे या न पहुँचे रसगंगा बहेगी ही।
आचार्य का त्रिशूल रूप भी, किसी अगले ज़माने में सही समाजवादी दृष्टिकोण से लिखने वाला जन साहित्य का कोई इतिहासकार अवश्य ही बड़े आदर से याद करेगा, भले ही आज की बौद्धिक अराजक्ता में उसे भुना दिया गया हो। प्राणवंत भावों और शब्दों का सोमरस पिलाकर त्रिशूल जी ने हज़ारों-लाखों लोगों को स्वतनोन्मत्त देशभक्त बनाया था। निशूल जी के अनेक गीत आंदोलन-काल की प्रभात-फेरियों में गाए जाते थे। सन् 24 में 'माधुरी' के तीन अंकों में उनकी एक लंबी कविता 'आईन ए हिन्द' प्रकाशित हुई थी, जो हिंदी के साथ ही साथ उन्हें उर्दू शैली के कवियों में भी उच्च आसन पर प्रतिष्ठित कर देती है। 'आईन ए हिन्द' पढ़कर मन आज भी फरहार हो उठता है। अपनी इस कविता को उन्होंने तीन खंडों में बाँटा है हम अब क्या है, और आगे हम क्या होने वाले है। अपना लोभ संवरण न कर पाने के कारण हर प्रश्न-विभाग के कतिपय अंशों को यहाँ उद्धृत रहा हूँ...
वे भी दिन थे कभी, दम भरती थी दुनियां अपना,
था हिमालय की बलदी पे फरेरा अपना।
रंग अपना था जमा, बैठा था सिक्का अपना,
कोई मैदाँ था, वहाँ बजता या डंका अपना।
हमसरी के लिए अपनी कोई तैयार न था,
काम अपने लिए कोई, कहीं दुश्वार न था।
ख़ुशबयाँ ऐसे थे, जादू का असर रखते थे,
कोई फ़न बाक़ी न था, इल्मो हुनर रखते थे।
हम किसी का न कभी ख़ौफ़ो ख़तर रखते,
दिल बला का, तो क़यामत का जिगर रखते थे।
कोई शमशेरी-क़लम में न था सानी अपना,
पानी-पानी हुए दुश्मन, वो था पानी अपना।
दफ़अतन् रंग ज़माने का कुछ ऐसा बदला,
भाई-भाई से भिड़ा बाप से बेटा बिगड़ा।
ख़ानाजंगी से हुई घर में क़यामत वरपा,
एक को दूसरा खा जाने को तैयार हुआ।
तीन तेरह हुए जब हिंद में यों फूट पड़ी,
सारी दुनियां की मुसीबत भी यहीं टूट पड़ी।
छाई ग़फ़लत, तो उसे मुल्क ने मस्ती समझा,
चीज़ बेहद जो गराँ थी, उसे, सस्ती समझा।
होता वीरान गया बसती है बस्ती समझा,
पस्त होता गया लेकिन नहीं पस्ती समझा।
ग़ार में जाके पड़ा अब है निकलना मुश्किल,
ऐसा बीमार है, जिसका है सँभलना मुश्किल।
मादरे हिंद के बच्चों पै मुसीबत आई,
गोलियाँ गन से चलीं, भोर क़यामत आई,
खोले घूँघट गए, यों ख़तरे में इज़्ज़त आई,
हाय अफ़सोस नहीं फिर भी तौ ग़ैरत आई।
उनके पैरों पे रही, रक्खी जो पगड़ी हमने,
पेट के बल चले और नाक भी रगड़ी हमने।
क़ौम की आँखों से पर्दा-सा लगा हटने अब,
श्री तिलक जी जो डटे लोग लगे डटने अब।
मुल्क जब नशे में आज़ादी के सरशार हुआ,
आगे गाँधी जी बढ़े, प्रेम का अवतार हुआ,
दिल में फिर पैदा स्वदेशी के लिए प्यार हुआ,
तारे ज़र फिर हमें चखें का कता तार हुआ।
सिक्का मलमल की जगह बैठ गया खादी का,
हर तरफ़ शोर मचा मुल्क में आज़ादी का।
मुत्तफ़िक़ होके मुक़ाबिल में जुज़ोकुल आए,
कोई भी ईजा हो मरने के लिए गुल आए।
होंगे आज़ाद यही कहते हुए गुल आए,
फूल काँटों में खिंचे दाम में बुलबुल आए।
पाँव रखना हुआ दुश्वार, हुआ यह रेला,
लग गया जेल में याराने वतन का मेला।...
इस त्रिशूल को भुलाकर कोई स्वाधीन राष्ट्र भला जी सकता है?
कानपुर पहुँचने पर ललित (प्रा. ललितमोहन अवस्थी) ने मुझे बताया कि सनेही जी अब पहले से काफ़ी स्वस्थ हैं। उनका वज़न भी बारह पौंड बढ़ा है। वह ख़ूब प्रसन्न हैं, कहते थे, 'अब तो मैं फिर से कविता लिखने लायक़ हो चला हू। ललित, इस बार त्रयोदशी के दिन हमारे जन्म-दिवस पर यही अस्पताल मे एक कवि सम्मेलन होना चाहिए। डॉक्टर लोग बेचारे बड़े भले है, वे यहाँ सब इंतज़ाम कर देंगे। ये बातें सुनकर मन को बड़ा संतोष हुआ, लेकिन अस्पताल पहुँचने पर मालूम हुआ कि उनकी तबियत फिर पलट गई है। वह ग़फ़लत में पड़े है। दस्तो से कमज़ोरी बढ़ गई। कल तो सारे दिन उन्होने आँख भी नही खोली थी। सनेही जी की पुत्री कृष्णाकुमारी जी के मुख पर चिंता की गहरी छाप थी। मैंने ललित से कहा कि एक बार दूर से उनके दर्शन करना चाहता हूँ। सनेही जी के पुत्र मोहनप्यारे जी तुरंत हमें भीतर लिवा ले गए।
महाराज सो रहे थे। आँखों पर चश्मा चढ़ा हुआ था, चेहरा निर्विकार था। यद्यपि उनका शरीर अब पहले से अधिक कृश हो गया है, तदापि चेहरे पर वही पुराना कसाव, वही रोब है।
कल से बस इसी तरह पड़े हैं। आज तो बीच-बीच मे आँखें खुलती भी हैं, पर कल सारे दिन बेहोश रहे। ग्लूकोज चढ़ा, इंजेक्शन लगे, और कैप्सूल भी जाने काहे के दिए जा रहे हैं।
कल तो आँख ही नही खोली। दस्त भए, पर इन्हें जर का होस नही था। इधर ऐसे चिंतन हुए गए रह कि क्या बतावै। दुई-दुई पाउंड करि के सौलह पाउंड वज़न बढ़ा रहा इनका।
भाई-बहन की बातें कानों में पड़ रही थी। पर दृष्टि सनेही जी महाराज के चेहरे पर ही टिकी रही।
चालीस-बयालीस वर्ष पहले उन्हें एक कवि सम्मेलन में पहली बार दूर से देखा था। वह भरा-पूरा काली मूँछों वाला रोबीला चेहरा याद आया। ग्यारह वर्ष पहने उन्होंने अपने संबंध में लिखा था :
विश्व में विचारों के विचरता रहा विवश,
बस गया वहीं पे रहा न मन बस का।
कंठों में विराजा रसिको के फूलमाला हो के,
कुटिल कलेजो मे 'त्रिशूल' हो के अटका।
धाराधर विपदा के बरसे सहस्रधार,
तो भी मेरा धीरज घराधर न धसका।
चसका वही नवरस का है 'सनेही' अभी,
टसका नहीं मैं हूँ पछत्तर बरस का।
श्रावण शुक्ला 13 के दिन वह अपनी वय के 86 वर्ष पूरे करने 87 वें में प्रवेश करेंगे, पर ऐसा नहीं लगता कि वह अब भी कहीं से तनिक भी टसके हैं। मोहनप्यारे जी ने जब उनका चश्मा हटाया, तब उनकी आँखें खुल गई। बाईं और नजर गई, ललित को देखा, अच्छा तुम आए हो। फिर इधर दृष्टि घूमी, बहन जी ने उनरे कान के पास मुँह ले जाकर कहा, नागर जी आए है।
हूँ पहचान लिया। चेहरे पर स्नेह-स्निग्धता आई। अपने काले वालो वाले सिर को खुजलाया फिर मेरी ओर देखने लगे, मुस्कुराकर कहा, मुझे कोई रोग नहीं है। बस, खड़ा नही हो पाता, पैर लड़खड़ाते हैं।
मैंने उनके कान के पास मुँह ले जाकर कहा कि यह कमज़ोरी भी शीघ्र ही दूर हो जाएगी।
सनेही जी बोले, कुछ समझ में नही आया। बिटिया की बात सुनाई पड़ जाती है। बिटिया बिटिया जी ने झुककर उनसे मेरी बात कही। मोहनप्यारे जी उनकी सुनने की मशीन लाए, उनके कान में लगाई, पर उससे उन्हें लाभ न हुआ। 'बिटिया जी' के माध्यम से ही बात आगे बढ़ी। मैंने कहा, आचार्य द्विवेदी जी की जन्म-शताब्दी के अवसर पर दौलतपुर में आपके दर्शन हुए थे।
हाँ, हम गए थे। पर द्विवेदी जी के पास चेले नहीं गए थे। हमने अपना कर्तव्य निभाया। फिर रुकरर कहा, 'द्विवेदी जी ने बड़ी सेवा की। यह सब उन्हीं का वैभव है। वह ऐसी को भी बढ़ा गए जो पद्य तो अवश्य लिख लेते थे, पर कविता नहीं लिख पाते थे। मैंने काव्य रचा है।
आवाज़ में वही दमसम है। स्मृति अब भी चुस्त-दुरुस्त है। मूड़ में आकर कुछ पुराने संस्मरण सुनाने लगे। मैंने डायरी खोली तब बोले—ये सब बातें कही छपा मत दीजिएगा। कहकर हँसे। बिटिया जी के माध्यम से मैंने उन्हे आश्वासन दिया। गाड़ी आगे बढ़ी।
अपने दाहिने हाथ पर बायाँ हाथ फेरते हुए बोले, बीमारी-वीमारी कुछ नहीं। कल ज़रा निढाल हो गया था, बाक़ी अभी तक तो हम मालिश कराते रहे, साबुन लगाकर नहाते रहे। बीमारी क्या, बुढ़ापा बढ़ रहा है।... होता ही है।... फिर आँखों में चमक आई, चेहरा खिला, कहने लगे, वेणीमाधव खन्ना पुरस्कार मिला करता था उन दिनों। एक बार निर्णायक कमेटी में टंडन जी थे, हम थे और...और... तीसरा नाम याद न आया। थोड़ी देर तक अपनी स्मृति से उलझते रहे, फिर आगे बढ़ गए, तीन ही कवि भी थे जिनकी कविताओं का निर्णय होना था। शंकर जी—नाथूराम शर्मा 'शंकर', हमारे अनूप थे, और राधावल्लभ 'बंधु' थे। टंडन जी ने कहा कि सिद्धांत की बात है, शंकर जी को पुरस्कार मिलना चाहिए। ख़ैर, मिल गया। फिर अनूप ने हमसे कहा कि निर्णायकों को कविता का ज्ञान नहीं है। हमने कहा कि पंद्रह दिनों में तुमसे अच्छा कवि बना सकते है। और हमने जो कहा सो कर दिखलाया। हितैषी को बना दिया। वैसे अनूप भी अच्छे कवि थे। उनके पिता भी अच्छे कवि थे। अनूप मिडिल स्कूल में पढ़ते थे। मुंशी कृपादयाल निगम उन्हे लेकर हमारे पास आए थे। घनाक्षरिया अच्छी लिखी अनूप ने। हितैषी भी बहुत माजकर लिखते थे। दोनों तगड़े थे। दोनों ही हमारे सामने चले गए।
ललित ने उठकर उनके कान में कहा, अब आपके जन्म-दिवस पर यहाँ कवि-सम्मेलन होगा।
हाँ।...अच्छा है। 'डॉक्टर सब बड़े भले हैं बेचारे। सरकार ने हमारा यह प्रबंध करके बड़ा उपकार किया।...हितैषी सौ रुपया महीना वधवा गए थे सो वह भी आता है।
मैंने कहा, देश पर आपके इतने उपकार हैं कि उनको देखते हुए आपको मिलनेवाली ये सुविधाएँ नगण्य-सी लगती हैं। सुनकर चुप हो गए, चेहरे पर संतोष आया।
हम लोग काफ़ी देर बैठे। एक बार उठना चाहा, तो बैठा लिया फिर पुराने संस्मरण चले। अपने पुरवले जन्म के न जाने किस पुण्य के कारण मुझे भी कविगुरु का सहज स्नेह प्राप्त हो गया है। जब कभी दर्शन पाए, सदा उनसे स्नेह, ज्ञान और प्रेरणा की प्रसादी लेकर ही लौटा। वे बींसवी सदी में होने वाले हिंदी साहित्य के विकास के जीवित इतिहास हैं। यदि उनके आसपास रहने वाले समझदार नौजवान उनसे पुरानी बातें सुनकर लिख लें तो हमारे इतिहास की बहुत-सी बहुमूल्य सामग्री सुरक्षित हो जाए। सनेही जी की स्मरणशक्ति अद्भुत है। कानपुर के कोई धनी हिंदी प्रेमी यदि लगन के साथ उन पुरानी बातों को टेप पर रिकॉर्ड करा लें तो और भी अच्छा हो।
हमारे निराला जी भी सनेही जी के प्रति बड़ी श्रद्धा रखते थे। एक बार उत्तर प्रदेश सरकार की एक शिक्षा फ़िल्म डॉक्यूमेटरी के लिए, तत्कालीन शिक्षा प्रसार अधिकारी और सुकवि श्री द्वारकाप्रसाद माहेश्वरी निराला जी के कविता-पाठ का सवाक् चलचित्र बनाने की इच्छा से मुझे और डॉ. रामविलास शर्मा को सिफ़ारिश करने के लिए उनके यहाँ ले गए। हमारी प्रार्थना पर आशुतोष निराला जी कृपापूर्वक सदय भी हुए। तब अपनी कविताओं के अलावा उन्होंने विवेकानंद, रवींद्रनाथ और बहादुर शाह ज़फ़र की रचनाओं के बाद सनेही जी की एक कविता भी सुनाई थी।
पूज्य सनेही जी महाराज 86 वर्ष के नौजवान है। वे पुराने भारत की सदाबहार जवानी के जीते-जागते रहस्य है। इस बीमारी में भी वही तेवर, वही दमखम और मुस्कुराहट उनके व्यक्तित्व की दिव्य शोभा बनी हुई है। पाँच वर्ष पूर्व आचार्य द्विवेदी जन्मशती समारोह के अवसर पर मैंने दौलतपुर में उनके दर्शन किए थे। शाम को पंडाल के बाहर टहलते हुए उन्होंने एकाएक मेरी ओर घूमकर कहा, आपने जब मुझे अस्पताल में देखा था तब भी मैं मुसकुरा रहा था और देखिए, अब भी मुसकुरा रहा हूँ। इस बार फिर अस्पताल में ही भेंट हुई, लाख लट चुके है मगर मुस्कुराहट अब भी जवान है। उनकी अपराजेयता, उनका यह 'धीरज धराधर' अब भी अडिग है।
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harit chhavi har disha mae chha rahi thi.
sakhi ne jab kaha, ghanshyam aaye,
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shiv prshiv kuvani bolte ro rahe the.
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ve bhi din the kabhi, dam bharti thi duniyan apna,
tha himalay ki baldi pe pharera apna.
rang apna tha jama, baitha tha sikka apna,
koi maidan tha, vahan bajta ya Daka apna.
hamsari ke liye apni koi taiyar na tha,
kaam apne liye koi, kahi dushvar na tha.
khushabyan aise the, jadu ka asar rakhte the,
koi pham baqi na tha, ilmo hunar rakhte the.
hum kisi ka na kabhi khaufo khatar rakhte,
dil bala ka, to qayamat ka jigar rakhte the.
koi shamsheri qalam mein na tha sani apna,
pani pani hue dushman, wo tha pani apna.
dafatan rang jamane ka kuch aisa badla,
bhai bhai se bhiDa baap se beta bigDa.
khanajgi se hui ghar mae qayamat varpa,
ek ko dusra kha jane ko taiyar hua.
teen terah hue jab hind mein yon phoot paDi,
sari duniyan ki musibat bhi yahin toot paDi.
chhai ghaflat, to use mulk ne masti samjha,
cheez behad jo garaun thi, use, sasti samjha.
hota viran gaya basti hai basti samjha,
past hota gaya lekin nahin pasti samjha.
ghaar mein jake paDa ab hai nikalna mushkil,
aisa bimar hai, jiska hai sanbhalana mushkil.
madre hind ke bachchon pe musibat aai,
goliyan gan se chali, bhor qayamat aai,
khole ghunghat ge, yon khatre mein izzat bhai,
haay afsos nahin phir bhi to gairat aai.
unke pairon pe rahi, rakhi jo pagDi hamne,
pet ke bal chale aur naak bhi ragDi hamne.
kaum ki ankhon se parda sa laga hatne ab,
shri tilak ji jo Date log lage Datne ab.
mulk jab nashe mein azadi ke sarshar hua,
aage gandhi ji baDhe, prem ka avtar hua,
dil mein phir paida svadeshi ke liye pyaar hua,
tare zar phir hamein chakhen ka kata taar hua.
sikka malmal ki jagah baith gaya khadi ka,
har taraf shor macha mulk mein azadi ka.
muttfiq hoke muqabil mein juzokul aaye,
koi bhi iija ho marne ke liye gul aaye.
honge azad yahi kahte hue gul aaye,
phool kanton mein khinche daam mein bulbul aaye.
paanv rakhna hua dushvar, hua ye rela,
lag gaya jel mein yarane vatan ka mela. . . .
is trishul ko bhulakar koi svadhin raashtr bhala ji sakta hai?
kanpur pahunchne par lalit (pra० lalitmohan avasthi) ne mujhe bataya ki sanehi ji ab pahle se kafi svasth hain. unka vazan bhi barah paunD baDha hai. wo khoob prasann hain, kahte the, ab to main phir se kavita likhne layaq ho chala hu. lalit, is baar trayodashi ke din hamare janm divas par yahi aspatal mae ek kavi sammelan hona chahiye. Dauktar log bechare baDe bhale hai, ve yaha sav intzaam kar denge. ye baten sunkar man ko baDa santosh hua, lekin aspatal pahunchne par malum hua ki unki tabiyat phir palat gai hai. wo ghaflat mein paDe hai. dasto se kamzori baDh gai. bal to sare din unhone ankh bhi nahi kholi thi. sanehi ji ki putri krishnakumari ji ke mukh par chinta ki gahri chhaap thi. mainne lalit se kaha ki ek baar door se unke darshan karna chahta hoon. sanehi ji ke putr mohnapyare ji turant hame bhitar liva le ge.
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vishv mae vicharon ke vicharta raha vivash,
bas gaya vahin pe raha na man bas ka.
kantho mae viraja rasiko ke phulmala ho ke,
kutil kalejo mae trishul ho ke jhatka.
dharadhar vipda ke barse sahasrdhar,
to bhi mera dhiraj gharadhar na dhaska.
chaska vahi navras ka hai sanehi abhi,
taska nahin main hoon pachhattar baras ka.
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haan, hum ge the. par dvivedi ji ke paas chele nahin ge the. hamne apna kartavya nibhaya. phir ruvyar kaha, dvivedi ji ne baDi seva ki. ye man unhin ka vaibhav hai. wo aisi ko bhi baDha ge jo padya to avashya likh lete the, par kavita nahin likh pate the. mainne kavya racha hai.
avaz mein vahi damsam hai. smriti ab bhi chust durust hai. mooD mein aakar kuch purane sansmran sunane lage. mainne Dayri kholi tab bole—ye sab baten kahi chhapa mat dijiyega. vahkar hame. nitiya ji ke madhyam se mainne unhe ashvasan diya. gaDi aage baDhi.
apne dahine haath par bayan haath pherte hue bole, bimari vimari kuch nahin. kal zara niDhal ho gaya tha, baqi abhi tak to hum malish karate rahe, sabun lagakar nahate rahe. bimari kya, buDhapa baDh raha hai. . . . hota hi hai. . . . phir ankhon mae chamak aai, chehra khila, kahne lage, venimadhav khanna puraskar mila karta tha un dinon. ek baar nirnayak kameti mein tanDan ji the, hum the aur. . . aur. . . tisra naam yaad na aaya. thoDi der tak apni smriti se ulajhte rahe, phir aage baDh ge, teen hi kavi bhi ye jinki kavitaon ka nirnay hona tha. shankar ji—nathuram sharma shakar, hamare anup the, aur radhavallabh bandhu the. tanDan ji ne kaha ki siddhant ki baat hai, shankar ji ko puraskar milna chahiye. khair, mil gaya. phir anup ne hamse kaha ki nirnaykon ko kavita ka gyaan nahin hai. hamne kaha ki pandrah dinon mein tumse achchha kavi bana sakte hai. aur hamne jo kaha so kar dikhlaya. hitaishi wo bana diya. vaise anup bhi achchhe kavi the. unke pita bhi achchhe kavi the. anup miDil skool mein paDhte the. munshi kripadyal nigam unhe lekar hamare paas aaye the. ghanakshariya achchhi likhi anup ne. hitaishi bhi bahut majkar likhte the. donon tagDe the. dono hi hamare samne chale ge.
lalit ne uthkar unke kaan mein kaha, ab aapke janm divas par yaha kavi sammelan hoga.
haan. . . . achchha hai. Dauktar sab baDe bhale hain bechare. sarkar ne hamara ye prbandh karke baDa upkaar kiya. . . . hitaishi sau rupya mahina vadhva ge the mo wo bhi aata hai.
mainne kaha, desh par aapke itne upkaar hain ki unko dekhte hue aapko milnevali ye suvidhayen naganya si lagti hain. sunkar chup ho ge, chehre par santosh aaya.
hum log kafi der baithe. ek baar uthna chaha, to baitha liya phir purane sansmran chale. apne pushyle janm ke na jane kis punya ke karan mujhe bhi kaviguru ka sahj sneh praapt ho gaya hai. jab kabhi darshan pae, sada unse sneh, gyaan aur prerna ki prasadi lekar ho lauta. ve binsvi sadi mein hone vale hindi sahitya ke vikas ke jivit itihas hain. yadi unke asapas rahne vale samajhdar naujavan unse purani baten sunkar likh len to hamare itihas ki bahut si bahumulya samagri surakshit ho jaye. sanehi ji ki smarnshakti adbhut hai. kanpur ke koi dhani hindi premi yadi lagan ke saath un purani baton ko tep par rikaurD kara len to aur bhi achchha ho.
hamare nirala ji bhi sanehi ji ke prati baDi shraddha rakhte the. ek baar uttar pardesh sarkar ki ek shiksha film Daukyumetri ke liye, tatkalin shiksha prasar adhikari aur sukvi shri dvarkaprsad maheshvari nirala ji ke kavita paath ka savan chalchin banane ki ichchha se mujhe aur Dau० ramavilas sharma ko sifarish karne ke liye unke yahan le ge. hamari pararthna par ashutosh nirala ji kripapurvak sadasya bhi hue. tav apni kavitaon ke alava unhonne vivekanand, ravindrnath aur bahadurshah japhar ki rachnano ke baad sanehi ji ki ek kavita bhi sunai thi.
pujya sanehi ji maharaj 86 varsh ke naujavan hai. ve purane bharat ki sata bahar javani ke jite jagte rahasya hai. is bimari mae bho vahi tevar, bahi damkham aur muskurahat unke vyaktitv ki divya shobha bani hui hai. paanch varsh poorv acharya dvivedi janmashti samaroh ke avsar par mainne daulatpur mein unke darshan kiye the. shaam ko panDal ke bahar tahalte hue unhonne ekayek meri or ghumvar kaha, apne jab mujhe aspatal mein dekha tha tab bhi main muskura raha tha aur dekhiye, ab bhi muskura raha hoon. is baar phir aspatal mein hi bhent hui, laakh lat chuke hai magar muskurahat ab bhi javan hai. unki aprajeyna, unka ye dhiraj dharadhar ab bhi aDig hai.
akhbaro mae acharya sanehi ji ke asvasth hokar aspatal mein bharti kiye jane ka samachar paDha. ji chaha ki jakar unke darshan kar auun par grih karaj nana jajala mein phaskar ghar se do qadam door kanpur to na ja paya, ha karyavgat do dino ke liye dilli zarur pahunch gaya. manohar shyaam joshi ne kaha, aap to itne paas rahte hain, ek din hamare liye sanehi ji se mil aaie. sunkar laga ki nai piDhi meri malamat kar rahi hai. kavi na hone par bhi pujya sanehi ji maharaj ne mujhe sneh pradan kiya hai. hindi bhashi samaj ke prati unke baDe upkaar hain. adhunik virat kavi sammelno ki parampara ke is baba aadam ne hamare jansadharan ke manas ko na keval rashtravadi bhavdhara hi se aplavit kiya balki khaDi boli ki kavita wo bhi pratishtha dilai. sukvi sampadak ke roop mein sanehi ji ne un dinon suvaviyo ki ek achchhi khasi bataliyan ho angrezo aur hamare agyan se morcha lene ke liye khaDi kar di thi. sanehi trishul ke geet rashtriy andolan ke dino mein nikalne vali parbhat pheriyo mae khoob gaye jate the.
vagdevi ne mujhe kavi hone ka vardan nahi diya. is kami ko mainne kavita ka pathak aur shrota bankar pura kiya hai. paDhne ka shauk mujhe bachpan se hi hai, akele mein sasvar kavya paath karne mae mujhe baDa anand milta. ek samay mein anek achchhe achchhe kaviyon ki anek rachnaye mujhe yaad bhi ki. pujya sanehi ji ki ek bahut purani kavita ashok vatika mein sita ki kuch panktiya is samay bhi yaad aa rahi hainh
manohar lankapati ki vatika thi,
prkriti rangasthli ki natika thi.
maha chhavi jaal phulo ke chaman the,
ulajhte bhaur se jakar nayan the,
ghata ghanghor ghirti shra rahi thi,
harit chhavi har disha mae chha rahi thi.
sakhi ne jab kaha, ghanshyam aaye,
nayan khole samajh kar raam jhaye,
jidhar dekha udhar hi shyaam chhavi tho,
hriday mae bhi bhari shriram chhavi thi.
isi tarah karn ki mrityu par duryodhan ke vilap vali unki kavita vi kuch panktiya bhi mujhe ab tak yaad hai
nabh asit dhara pai kaal sa chha raha tha,
raviray drutgami bhagta ja raha tha.
khag mrig akulaye bheet se ho rahe the,
shiv prshiv kuvani bolte ro rahe the.
pan. gaya parsad shukl sanehi, ye naam hindi bhashi kshetr mein vishal jan samuh vale kavi sammelnon ki parampara ke mahan sansthapka mae shirshasth hai aur amar bhi. apne lokapriy suvi patr ke dvara bhi jan man mae khaDi boli ke sanskar jagane aur nai bhaav chetna prnishthit karne mein shraddhey sanehi jo praan smarniy acharya dvivedi ji maharaj ke kamanDar in cheef rahe hain. sanehi ji ke netritv ma honevale purane kavi sammelno mae, jan samudr ki ek boond bankar, unhe dekhne sunne va mujhe anek vaar saubhagya laabh hua tha. um samay ki jan dharna ye thi ki acharya sanehi ji jim kavi sammelan mae apni navratnvan shishya manDli lekar pahunch jaye, baha phir aur koi pahunche ya na pahunche rasganga bahegi hi.
acharya ya trishul roop bhi, kimi agle zamane mein sahi samajvadi drishtikon se likhne vala jan sahitya ya koi itihaskar avashya hi baDe aadar se yaad karega, bhale hi aaj ki bauddhik arajakta mein use bhuna diya gaya ho. pranvant bhavo aur shabdo ka somras pilakar trishul ji ne hazaro lakho logo ko svatnonmatt deshabhakt banaya tha. nishul ji ke anek geet andolan kaal ki parbhat pheriyo mae gaye jate the. san 24 mae madhuri ke teen anko mae unki ek lambi kavita grain e hind prakashit hui thi, jo hindi ke saath hi saath unhe urdu shaili ke kaviyon mein bhi uchch aasan par pratishthit kar deti hai. ain e hind paDhkar man aaj bhi pharhar ho uthta hai. apni is kavita ko unhonne teen khanDo mein banta hai hum ab kya hai, aur aage hum kya hone vale hai. apna kar pane ke karan har parashn vibhag ke katipay ansho ko raha hoon. . .
ve bhi din the kabhi, dam bharti thi duniyan apna,
tha himalay ki baldi pe pharera apna.
rang apna tha jama, baitha tha sikka apna,
koi maidan tha, vahan bajta ya Daka apna.
hamsari ke liye apni koi taiyar na tha,
kaam apne liye koi, kahi dushvar na tha.
khushabyan aise the, jadu ka asar rakhte the,
koi pham baqi na tha, ilmo hunar rakhte the.
hum kisi ka na kabhi khaufo khatar rakhte,
dil bala ka, to qayamat ka jigar rakhte the.
koi shamsheri qalam mein na tha sani apna,
pani pani hue dushman, wo tha pani apna.
dafatan rang jamane ka kuch aisa badla,
bhai bhai se bhiDa baap se beta bigDa.
khanajgi se hui ghar mae qayamat varpa,
ek ko dusra kha jane ko taiyar hua.
teen terah hue jab hind mein yon phoot paDi,
sari duniyan ki musibat bhi yahin toot paDi.
chhai ghaflat, to use mulk ne masti samjha,
cheez behad jo garaun thi, use, sasti samjha.
hota viran gaya basti hai basti samjha,
past hota gaya lekin nahin pasti samjha.
ghaar mein jake paDa ab hai nikalna mushkil,
aisa bimar hai, jiska hai sanbhalana mushkil.
madre hind ke bachchon pe musibat aai,
goliyan gan se chali, bhor qayamat aai,
khole ghunghat ge, yon khatre mein izzat bhai,
haay afsos nahin phir bhi to gairat aai.
unke pairon pe rahi, rakhi jo pagDi hamne,
pet ke bal chale aur naak bhi ragDi hamne.
kaum ki ankhon se parda sa laga hatne ab,
shri tilak ji jo Date log lage Datne ab.
mulk jab nashe mein azadi ke sarshar hua,
aage gandhi ji baDhe, prem ka avtar hua,
dil mein phir paida svadeshi ke liye pyaar hua,
tare zar phir hamein chakhen ka kata taar hua.
sikka malmal ki jagah baith gaya khadi ka,
har taraf shor macha mulk mein azadi ka.
muttfiq hoke muqabil mein juzokul aaye,
koi bhi iija ho marne ke liye gul aaye.
honge azad yahi kahte hue gul aaye,
phool kanton mein khinche daam mein bulbul aaye.
paanv rakhna hua dushvar, hua ye rela,
lag gaya jel mein yarane vatan ka mela. . . .
is trishul ko bhulakar koi svadhin raashtr bhala ji sakta hai?
kanpur pahunchne par lalit (pra० lalitmohan avasthi) ne mujhe bataya ki sanehi ji ab pahle se kafi svasth hain. unka vazan bhi barah paunD baDha hai. wo khoob prasann hain, kahte the, ab to main phir se kavita likhne layaq ho chala hu. lalit, is baar trayodashi ke din hamare janm divas par yahi aspatal mae ek kavi sammelan hona chahiye. Dauktar log bechare baDe bhale hai, ve yaha sav intzaam kar denge. ye baten sunkar man ko baDa santosh hua, lekin aspatal pahunchne par malum hua ki unki tabiyat phir palat gai hai. wo ghaflat mein paDe hai. dasto se kamzori baDh gai. bal to sare din unhone ankh bhi nahi kholi thi. sanehi ji ki putri krishnakumari ji ke mukh par chinta ki gahri chhaap thi. mainne lalit se kaha ki ek baar door se unke darshan karna chahta hoon. sanehi ji ke putr mohnapyare ji turant hame bhitar liva le ge.
maharaj so rahe the. ankhon par chashma chaDha hua tha, chehra nirvikar tha. yadyapi unka sharir ab pahle se adhik krish ho gaya hai, tadapi chehre par vahi purana kasav, vahi rob hai.
bal se bas isi tarah paDe hain. aaj to beech beech mae ankhen khulti bhi hain, par kal sare din behosh rahe. glukoj chaDha, injekshan lage, aur kaipsul bhi jane kahe ke diye ja rahe hain.
kal to bhagya hi nahi kholi. dast bhe, par inhen jar ka haus nahi tha. idhar aime chitann huD ge rah ki kya batave. dui dui paunD kari ke saulah paunD vazan baDha raha inka.
bhai bahan ki baten kanon mein paD rahi thi. par drishti sanehi ji maharaj ke chehre par ho tiki rahi.
chalis bayalis varsh pahle unhen ek kavi sammelan mein pahli baar door se dekha tha. wo bhara pura kali munchhon vala robila chehra yaad aaya. gyarah varsh pahne unhonne apne sambandh mein likha tha ha
vishv mae vicharon ke vicharta raha vivash,
bas gaya vahin pe raha na man bas ka.
kantho mae viraja rasiko ke phulmala ho ke,
kutil kalejo mae trishul ho ke jhatka.
dharadhar vipda ke barse sahasrdhar,
to bhi mera dhiraj gharadhar na dhaska.
chaska vahi navras ka hai sanehi abhi,
taska nahin main hoon pachhattar baras ka.
shravan shukla 13 ke din wo apni yay ke 86 varsh pure karne 87 ven mein pravesh karenge, par aisa nahin lagta ki wo av bhi vahi se tanik bhi tamke hain. mohnapyare ji ne jab unka chashma hataya, tab unki ankhen khul gai. bayo aur najar gai, lalit ko dekha, achchha tum aaye ho. phir idhar rashti ghumi, bahan ji ne unre kaan ke paas muh le jakar kaha, nagar ji aaye hai.
hoon. pahchan liya. chehre par sneh mnigdhta aai. apne kale valo vale sir ko khujlaya phir meri or dekhne lage, musakrakar kaha, mujhe koi rog nahin hai. bas, khaDa nahi ho pata, pair laDkhaDate hain.
mainne unke kaan ke paas munh le jakar kaha ki ye kamzori bhi seeghr hi door ho jayegi.
sanehi ji bole, kuchh samajh mae nahi aaya. bitiya ki baat sunai paD jati hai. bitiya bitiya ji ne bhukkar unse meri baat kahi. mohnapyare ji unki sunne ki mashin laye, unke kaan mein lagai, par usse unhen laabh na hua. bitiya jee ke madhyam se hi baat aage baDhi. mainne kaha, acharya dvivedi ji ki janm shatabdi ke avsar par daulatpur mein aapke darshan hue the.
haan, hum ge the. par dvivedi ji ke paas chele nahin ge the. hamne apna kartavya nibhaya. phir ruvyar kaha, dvivedi ji ne baDi seva ki. ye man unhin ka vaibhav hai. wo aisi ko bhi baDha ge jo padya to avashya likh lete the, par kavita nahin likh pate the. mainne kavya racha hai.
avaz mein vahi damsam hai. smriti ab bhi chust durust hai. mooD mein aakar kuch purane sansmran sunane lage. mainne Dayri kholi tab bole—ye sab baten kahi chhapa mat dijiyega. vahkar hame. nitiya ji ke madhyam se mainne unhe ashvasan diya. gaDi aage baDhi.
apne dahine haath par bayan haath pherte hue bole, bimari vimari kuch nahin. kal zara niDhal ho gaya tha, baqi abhi tak to hum malish karate rahe, sabun lagakar nahate rahe. bimari kya, buDhapa baDh raha hai. . . . hota hi hai. . . . phir ankhon mae chamak aai, chehra khila, kahne lage, venimadhav khanna puraskar mila karta tha un dinon. ek baar nirnayak kameti mein tanDan ji the, hum the aur. . . aur. . . tisra naam yaad na aaya. thoDi der tak apni smriti se ulajhte rahe, phir aage baDh ge, teen hi kavi bhi ye jinki kavitaon ka nirnay hona tha. shankar ji—nathuram sharma shakar, hamare anup the, aur radhavallabh bandhu the. tanDan ji ne kaha ki siddhant ki baat hai, shankar ji ko puraskar milna chahiye. khair, mil gaya. phir anup ne hamse kaha ki nirnaykon ko kavita ka gyaan nahin hai. hamne kaha ki pandrah dinon mein tumse achchha kavi bana sakte hai. aur hamne jo kaha so kar dikhlaya. hitaishi wo bana diya. vaise anup bhi achchhe kavi the. unke pita bhi achchhe kavi the. anup miDil skool mein paDhte the. munshi kripadyal nigam unhe lekar hamare paas aaye the. ghanakshariya achchhi likhi anup ne. hitaishi bhi bahut majkar likhte the. donon tagDe the. dono hi hamare samne chale ge.
lalit ne uthkar unke kaan mein kaha, ab aapke janm divas par yaha kavi sammelan hoga.
haan. . . . achchha hai. Dauktar sab baDe bhale hain bechare. sarkar ne hamara ye prbandh karke baDa upkaar kiya. . . . hitaishi sau rupya mahina vadhva ge the mo wo bhi aata hai.
mainne kaha, desh par aapke itne upkaar hain ki unko dekhte hue aapko milnevali ye suvidhayen naganya si lagti hain. sunkar chup ho ge, chehre par santosh aaya.
hum log kafi der baithe. ek baar uthna chaha, to baitha liya phir purane sansmran chale. apne pushyle janm ke na jane kis punya ke karan mujhe bhi kaviguru ka sahj sneh praapt ho gaya hai. jab kabhi darshan pae, sada unse sneh, gyaan aur prerna ki prasadi lekar ho lauta. ve binsvi sadi mein hone vale hindi sahitya ke vikas ke jivit itihas hain. yadi unke asapas rahne vale samajhdar naujavan unse purani baten sunkar likh len to hamare itihas ki bahut si bahumulya samagri surakshit ho jaye. sanehi ji ki smarnshakti adbhut hai. kanpur ke koi dhani hindi premi yadi lagan ke saath un purani baton ko tep par rikaurD kara len to aur bhi achchha ho.
hamare nirala ji bhi sanehi ji ke prati baDi shraddha rakhte the. ek baar uttar pardesh sarkar ki ek shiksha film Daukyumetri ke liye, tatkalin shiksha prasar adhikari aur sukvi shri dvarkaprsad maheshvari nirala ji ke kavita paath ka savan chalchin banane ki ichchha se mujhe aur Dau० ramavilas sharma ko sifarish karne ke liye unke yahan le ge. hamari pararthna par ashutosh nirala ji kripapurvak sadasya bhi hue. tav apni kavitaon ke alava unhonne vivekanand, ravindrnath aur bahadurshah japhar ki rachnano ke baad sanehi ji ki ek kavita bhi sunai thi.
pujya sanehi ji maharaj 86 varsh ke naujavan hai. ve purane bharat ki sata bahar javani ke jite jagte rahasya hai. is bimari mae bho vahi tevar, bahi damkham aur muskurahat unke vyaktitv ki divya shobha bani hui hai. paanch varsh poorv acharya dvivedi janmashti samaroh ke avsar par mainne daulatpur mein unke darshan kiye the. shaam ko panDal ke bahar tahalte hue unhonne ekayek meri or ghumvar kaha, apne jab mujhe aspatal mein dekha tha tab bhi main muskura raha tha aur dekhiye, ab bhi muskura raha hoon. is baar phir aspatal mein hi bhent hui, laakh lat chuke hai magar muskurahat ab bhi javan hai. unki aprajeyna, unka ye dhiraj dharadhar ab bhi aDig hai.
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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