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ये भाषा-शास्त्री

ye bhasha shastari

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

ये भाषा-शास्त्री

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

और अधिककन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

    मदमाती मसूरी के तिलक पुस्तकालय से किंगक्रेक को उतरती घुमावदार पगडंडी। उस पर उतरा जा रहा हूँ मैं और मेरे पास-पास यह जा रहा है चना ज़ोर गर्म का बक्सा गले में डाले 16-17 साल का एक लड़का। आदमी आ-जा रहे हैं, पर यह आवाज़ नहीं लगाता, लटके नहीं गाता और चना ज़ोर गर्म की चिकी का तो सारा दार-मदार ही लटकों पर है।

    तभी उसे मिला उसका एक साथी नीचे से ऊपर जाता, उसे भी उसका मौन अखरा—अबे, आवाज़ लगा, चुप क्यों है, गले में हाफू तो नहीं निकल आया।

    तमक कर लड़के ने कहा—हाफू निकले तेरी ज़ोरू के गले में, जो हमसे सिकवाती फिरे। अबे चमचू, हमारे हाफू निकले, तो खाएँ क्या—तुझे तो तेरी बहू ने गोद ले रक्खा है, तुझे रोटियों की क्या फिकर?

    साथी ने पत्ता काटा—अबे चिमगादड़ के, तो जलता क्यों है? मेरी बहू तो तुझे भी गोद लेकर लड्डू बाँट देगी, पर यह तो बता कि गुम क्यों है? लगा आवाज़, बाँध लटके, जो बरसे पैसा ही पैसा?

    लड़के ने कहा—अबे, तू तो है चोखट की चप्पल कि जहाँ देखा, रपट पड़ा और हम हैं दूकानदार—दुनिया की रमज़ पहचानते हैं। जहाँ वैसा बरसने का डौल होता है, वहाँ चना ज़ोर गर्म वाले की आवाज़ झींगरी हो जाती है।

    और अब मज़ाक़ की मूड़ से गंभीरता के धरातल पर आते हुए उसने कहा यहाँ एक कौड़ी का भी चना नहीं बिक सकता। बात यह है कि जो लोग किंगक्रेक पर उतर रहे हैं, उन्हें तो लगी रहती है हाबड़ ताबड़ कि पता नहीं मोटर में जगह मिलेगी या नहीं, कुली कहाँ गया, बीबी बच्चे कहाँ हैं? और जो लोग नीचे से ऊपर जा रहे हैं, उनका आधा जी तो फँसा रहता है चढ़ाई की थकान में और आधा होटल में, फिर बताओ, इस सड़क पर चना कोन खाए—यह तो यार, मौज के मसाले हैं।

    बात आईं-गईं हुई, पर सोचना स्वभाव हो गया है, मैं सोचता रहा। पहली बात जो मन में आई, वह थी उस अपड़ लड़के में मनोवृत्तियों के विश्लेषण की सूक्ष्म और गहरी क्षमता। यह क्षमता देश की उस जीवन-शक्ति का एक प्रदर्शन है, जो सदियों की दासता और संघर्ष में भी मरी नहीं, दूसरी बात मन में आई यह कि इन अपढ़ बालकों के पास इतनी सरस, सजीव और स्वस्थ भाषा है कि हमारे महामहोपाध्याय इनसे अभी बरसों बोलने का तरीक़ा सीखा करें, बस तब से अपढ़ भाषाशास्त्रियों की खोज मेरा स्वभाव हो गया।

    ***

    एक गाँव के मुखिया का घर—हम 3-4 मेहमान उनकी बैठक में भोजन की थालियों पर, जिनमें उनका एक लड़का भी! यह लड़का खाने में ज़रा प्रगतिशील। मुखिया जी बोले पंडित जी, यह पहले जन्म में जानवर था, इसलिए आदमी की जून पाकर भी इसका ढंग नहीं बदला। ख़ैर, थूनता, भसकता तो यह नहीं, पर खाने को खाता भी नहीं, निगलता है।

    इन सब में क्या भेद है, मेहरबानी करके यह बताइए मुखिया जी! लड़के को उनकी झाड़ से बचाने के लिए मैंने बात बदली, तो मुखिया जी बोले—पंडित जी, आदमी खाता है, जानवर निगलता है, भूत थूनता है और राक्षस भसकता है।

    और तब उन्होंने बताया कि खाना खाया जाता है धीरे-धीरे चबाकर, निगला जाता है पपोलकर जल्दी-जल्दी गले में उतारकर, थूना जाता है ढेरों भोजन बिना ठीक तरह चबाए पेट में भरकर और भसका जाता है बहुत तेज़ी से हाथ चलाकर, चारों ओर खिण्डाते हुए और हाथ मुँह को सानते हुए।

    मुखियाजी ने यह बताया ही नहीं मुँह और हाथ को आकृति को मुद्राओं में बदलकर वहीं चारों भावों का प्रदर्शन भी किया। शब्दों की इस सूक्ष्म भेद-रेखा से कितने शिक्षित परिचित हैं?

    ***

    जिलाधीश श्री वीरेंद्र प्रताप साही, उनकी पत्नी श्रीमती गिरिजा कुमारी साही और मैं एक मेले में गए। शाम को जब हम लौटे तो दूसरी मोटर में एक डिप्टी कलेक्टर की पत्नी और बच्चे थे। यह मोटर पुरानी थी। रात का समय, जंगल का सफ़र, मोटर पुरानी; डिप्टी साहब की पत्नी ने अपनी मोटर हमारी मोटर से आगे कराई कि रास्ते में गाड़ी ख़राब हो जाए, तो हमें पता चले।

    यह पुरानी मोटर जब साही साहब की मोटर के पास से एक सपाटे के साथ आगे निकली, तो श्रीमती साही ने कहा—अरे प्रभाकर जी, हमारे डिप्टी साहब की मोटर तो आज उड़न-खटोला होय गई है।

    यह पुरानी मोटर कुछ दूर पर ठप्प हो गई, तो श्रीमती साही ने कहा—आपके डिप्टी साहब भी ख़ूब रहे कि ख़ुद तो मेले में रह गए और बच्चों को यह खड़खड़िया दे दी।

    हम सब हँस पड़े, पर तभी मैंने कहा कि आज यह समझ में आया कि भाषा को मातृभाषा क्यों कहा गया है। तेज़ चली मोटर को उड़न-खटोला और ठप्प हुई को खड़खड़िया माँ-बहने ही कह सकती है कोई एम. ए. शास्त्री या साहित्य-रत्न नहीं!

    ***

    हमारे प्रेस में एक इंकमैन है रिजवान। कोई 12 वर्ष का अशिक्षित बालक। उस दिन मेरे सिर में तेल मलते-मलते बातें करने लगा। अपने पिता की चर्चा में बोला—मेरे अब्बा पतली बेंत से मारते-मारते बधिया खींच देते थे।

    जो लोग बैल को बधिया करने की प्रक्रिया से परिचित हैं, वे ही इस अभिव्यक्ति का रस ले सकते हैं। यही बालक एक दिन बोला—जब आपने प्रेस खोला, तब तो मेरे पत्ते भी नहीं जमे थे। जीवन-वृक्ष की कितनी मधुर और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है?

    ***

    श्री शिवराम शर्मा देहात में जन्मे, पले और पनप रहे हैं। मैं उन्हें देहाती-प्रतिभा का मॉडल कहा करता हूँ। आप वैद्य हैं, अभिनेता हैं, लेखक है। उन्होंने एक अध्यापक का स्कैच लिखा। उसमें एक जगह कहा है—अजी, वह मास्टर तो गजब का पुतला था। गाँव भर के बालकों को उसने मोह लिया था—सब उसी के राग गाते थे, पर वह बिना ब्याहा था। थोड़े दिन बाद गाँव में खोट करने लगा। मैं जाने कितनी बार सोच चुका हूँ कि क्या कोई शहरी कथाकार, दुराचार की इससे सुंदर, संकेतात्मक और पूर्ण अभिव्यक्ति दे सकता है?

    ***

    एक देहात में मैं भाषण देने गया। जिनके घर ठहरा, उनका छोटा लड़का मुझसे हिल गया। रात में वह मेरी बुक्कल में बैठा था कि वे बाहर से आए और बोले—गोपाल, पंडित जी के साथ तेरी दोस्ती पहले ही दिन गदरा गई, भाई!” वाह, क्या दोस्ती गदराई है।

    ***

    मेरे मानसिक परिवार की एक सदस्या है जयमाला। वह अपने पति से असंतुष्ट थी; उसने अपने पति के एक मित्र की छाया में संतोष देखा और यह उनकी हो गई। आधार यह था कि ये उसकी रात-दिन प्रशंसा किया करते थे। कुछ दिन ख़ूब बीते और फिर यहाँ भी कलह का तूफ़ान उठ खड़ा हुआ।

    अब उसके नए साथी उससे ऊब रहे थे; वह उनके जीवन का भार हो चली थी। एक दिन मैंने उससे पूछा—जयमाला बहन, पहले तो वे सदा तुम्हारी एक में सौ तारीफ़ किया करते थे, अब उन्हें तुममें कोई गुण ही दिखाई नहीं देता; आख़िर यह हुआ क्या?

    जयमाला ने बस एक वाक्य कहा—मर्द को पेड़ पर लगा फूल ही अच्छा लगता है भाई साहब! और लंबे साँस के साथ वह चुप हो गई।

    मैं उस दिन सुनकर सुन्न हो गया था और आज सोचकर सुन्न हुआ जाता हूँ। पुरुष का पूरा चरित्र 17 अक्षरों में समोकर रख दिया है, उधेड़कर रख दिया है—मर्द को पेड़ पर लगा फूल ही अच्छा लगता है। इतने संक्षेप में इतनी मुकम्मल बात कहने की शक्ति धरा के किस कवि में है?

    एक विदेशी मनोविज्ञान-शास्त्री से एक युवती ने पूछा—महाशय, एक युवक हमेशा मेरे पीछे पड़ा रहता है, अपने प्यार की गहराइयों के गीत गाता रहता है; मैं क्या करूँ?”

    मनोविज्ञान-शास्त्री ने कहा—उससे विवाह कर लो, कुछ दिन बाद वह तलाक़ के तरीक़े खोजता दिखाई देगा।

    बात वही है, जीवन का पहलू यही है, पर वह बात कहाँ? 'पेड़ पर लगा फूल' कलेजे में शूल-सा चुभ जाता है, तो चुभा ही रहता है, फिर निकलता नहीं।

    ***

    रेल उड़ी जा रही थी और वह देहाती डंडा पकड़े दरवाज़े पर खड़ा था। हवा का एक झोंका आया कि उसकी टोपी उड़ गई। उसने आव देखा ताव, झट ख़तरे की ज़ंजीर खींच दी। गाड़ी ठहरी, तो गार्ड आया—क्यों खींची है तुमने ज़ंजीर?

    किसी ने बताया कि इस बेचारे देहाती की टोपी उड़ गई थी। एक मामूली टोपी के लिए ज़ंजीर? अजीब बेवक़ूफ़ है यह देहाती! गार्ड को ग़ुस्सा गया। झल्लाकर उसने कहा—निकालो 50 रुपए।

    कैसे 50 रुपिए गार्ड साहब? देहाती ने सरल भाव से कहा, तो सामने मुझे होना था और गलियों में भले घर की लड़की उन दिनों निकलती थी!

    लुकते-छिपते सुसराल की गली के कई चक्कर काटे, पर इससे भला मतलब! ढलती दुपहरी में भंगी की लड़की उस घर से निकली, तो पास लगकर पूछा—वह लड़की कैसी है बहन?

    इस प्रश्न के 30 वर्ष बाद तक मैंने जितने स्कैच लिखे हैं, उन सबको उस लड़की ने एक शब्द में मात कर दिया—जादो की भेन्ना राधा है बाबू जी, जाओ अपने घर बैठो।

    राधा में भावी पत्नी का पूर्ण परिचय है, तो 'जाओं अपने घर बैठो' में मेरी संपूर्ण जाँच-पड़ताल का जवाब और यह भी कि मैं तुम्हें पहचान गई हूँ तुम कन्हैया हो!

    ***

    जन साधारण के पास अभिव्यक्तियों का नित-नूतन ऐसा भंडार है, बात करने का ऐसा लहज़ा है कि पांडित्य खड़ा ताका करे। भाई ग़ुलाम अनवर साबरी ने उस दिन एक मौलवी के मुँह पर किसान का झाँपड़ पड़ने की बात सुनाई तो हँसते-हँसते हम सब लोट-पोट हो गए—

    एक मौलवी-ज़मींदार के पास उनका किसान आया, तो मौलवी साहब ने पूछा—इस साल तकातुरे अमतार से किश्तजारे गंदुम को कोई मफ़ाद पहुँचा या नहीं। उनका मतलब यह जानना था कि इस बारिश से गेहुँओं को कोई लाभ हुआ या नहीं, पर वे किससे किस भाषा में बोल रहे थे?

    किसान जला भुना या बड़बड़ाया नहीं। बस उठते-उठते बोला—हुजूर इस वक़्त तो कुरान पढ़ रहे हैं, मैं कल आऊँगा।

    किसान ने मौलवी को जो कुरान पढ़ाई, मौलवी सचमुच उसे ज़िंदगी भर याद रखेगा, इसमें शक़ नहीं!

    ***

    उस दिन स्टेशन के पास दो देहाती बंधु आपस में लड़ पड़े। दोनों एक गाँव के। हरद्वार में गंगा-स्नान करने को एक साथ घर से चले, निश्चय ही दोनों मित्र, पर रास्ते में बात का बतंगड़ हो गया, तो भिड़ पड़े? मैंने बीच में पड़कर बीच-बचाव किया, तो हटते-हटते एक बोला—गे समझना कि हम तुमसे उन्नीस हैं। जाने रहौ, बहुत बिगड़ैल हैं हम। अपनी पर आवैं, तो अवै सारे का थप्पड़नते मारत मारत मोह टमाटर बनाए दे हैं?

    फफफ कर दूसरे ने कहा—तौ तुम हू समझे रहौ कि हमहू चून के ना हैं। घूँसनते मारत-मारत सारे का मोह भाँटा बनाय दैवै।

    ठीक तो है, थप्पड़ की मार मुँह को लाल कर देगी और घूँसों की मार उसे फुला देगी—कितनी सर्वागंपूर्ण अभिव्यक्ति है यह?

    हमारे देश के पास-जनसाधारण के पास-भाषा का ऐसा भंडार है कि हम उसकी उपेक्षा करके दर्शन और विज्ञान के ग्रंथ भले ही लिख लें, बात-चीत नहीं कर सकते। आम आदमी की बात-चीत में मस्तिष्क का माया-जाल नहीं, हृदय की सरल, सरसता होती है। चुटकुलों, कहानियों, दृष्टांतों, शब्दों और अभिव्यक्तियों का ऐसा संग्रह उसके पास है, जो बहुमूल्य है। इस दिशा में बहुत गहरे सतर्क प्रयत्नों की आवश्यकता है। ये प्रयत्न हमारी भाषा को समृद्ध और शक्तिशाली करने वाले होंगे, यह मेरा अखंड विश्वास है। आप घंटा भर किसी कुम्हार, चमार, धोबी, मल्लाह, किसान, ताँगेवाले या भड़भूजे के पास बैठिए, आपको 5, चमत्कार पूर्ण अभिव्यक्तियाँ या भावपूर्ण नए शब्द मिलेंगे। ये हमारी भाषा के हीरे हैं, मोती हैं; लाल हैं। मैं अक्सर सोचता हूँ, हम शिक्षितों को इन अशिक्षितों के द्वार शिष्य बनकर बैठना चाहिए।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दीप जले, शंख बजे (पृष्ठ 220)
    • रचनाकार : कन्हैलाल मिश्र 'प्रभाकर'
    • प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ
    • संस्करण : 1951

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