मदमाती मसूरी के तिलक पुस्तकालय से किंगक्रेक को उतरती घुमावदार पगडंडी। उस पर उतरा जा रहा हूँ मैं और मेरे पास-पास यह जा रहा है चना ज़ोर गर्म का बक्सा गले में डाले 16-17 साल का एक लड़का। आदमी आ-जा रहे हैं, पर यह आवाज़ नहीं लगाता, लटके नहीं गाता और चना ज़ोर गर्म की चिकी का तो सारा दार-मदार ही लटकों पर है।
तभी उसे मिला उसका एक साथी नीचे से ऊपर जाता, उसे भी उसका मौन अखरा—अबे, आवाज़ लगा, चुप क्यों है, गले में हाफू तो नहीं निकल आया।
तमक कर लड़के ने कहा—हाफू निकले तेरी ज़ोरू के गले में, जो हमसे सिकवाती फिरे। अबे चमचू, हमारे हाफू निकले, तो खाएँ क्या—तुझे तो तेरी बहू ने गोद ले रक्खा है, तुझे रोटियों की क्या फिकर?
साथी ने पत्ता काटा—अबे चिमगादड़ के, तो जलता क्यों है? मेरी बहू तो तुझे भी गोद लेकर लड्डू बाँट देगी, पर यह तो बता कि गुम क्यों है? लगा आवाज़, बाँध लटके, जो बरसे पैसा ही पैसा?
लड़के ने कहा—अबे, तू तो है चोखट की चप्पल कि जहाँ देखा, रपट पड़ा और हम हैं दूकानदार—दुनिया की रमज़ पहचानते हैं। जहाँ वैसा बरसने का डौल होता है, वहाँ चना ज़ोर गर्म वाले की आवाज़ झींगरी हो जाती है।
और अब मज़ाक़ की मूड़ से गंभीरता के धरातल पर आते हुए उसने कहा यहाँ एक कौड़ी का भी चना नहीं बिक सकता। बात यह है कि जो लोग किंगक्रेक पर उतर रहे हैं, उन्हें तो लगी रहती है हाबड़ ताबड़ कि पता नहीं मोटर में जगह मिलेगी या नहीं, कुली कहाँ गया, बीबी बच्चे कहाँ हैं? और जो लोग नीचे से ऊपर जा रहे हैं, उनका आधा जी तो फँसा रहता है चढ़ाई की थकान में और आधा होटल में, फिर बताओ, इस सड़क पर चना कोन खाए—यह तो यार, मौज के मसाले हैं।
बात आईं-गईं हुई, पर सोचना स्वभाव हो गया है, मैं सोचता रहा। पहली बात जो मन में आई, वह थी उस अपड़ लड़के में मनोवृत्तियों के विश्लेषण की सूक्ष्म और गहरी क्षमता। यह क्षमता देश की उस जीवन-शक्ति का एक प्रदर्शन है, जो सदियों की दासता और संघर्ष में भी मरी नहीं, दूसरी बात मन में आई यह कि इन अपढ़ बालकों के पास इतनी सरस, सजीव और स्वस्थ भाषा है कि हमारे महामहोपाध्याय इनसे अभी बरसों बोलने का तरीक़ा सीखा करें, बस तब से अपढ़ भाषाशास्त्रियों की खोज मेरा स्वभाव हो गया।
***
एक गाँव के मुखिया का घर—हम 3-4 मेहमान उनकी बैठक में भोजन की थालियों पर, जिनमें उनका एक लड़का भी! यह लड़का खाने में ज़रा प्रगतिशील। मुखिया जी बोले पंडित जी, यह पहले जन्म में जानवर था, इसलिए आदमी की जून पाकर भी इसका ढंग नहीं बदला। ख़ैर, थूनता, भसकता तो यह नहीं, पर खाने को खाता भी नहीं, निगलता है।
इन सब में क्या भेद है, मेहरबानी करके यह बताइए मुखिया जी! लड़के को उनकी झाड़ से बचाने के लिए मैंने बात बदली, तो मुखिया जी बोले—पंडित जी, आदमी खाता है, जानवर निगलता है, भूत थूनता है और राक्षस भसकता है।
और तब उन्होंने बताया कि खाना खाया जाता है धीरे-धीरे चबाकर, निगला जाता है पपोलकर जल्दी-जल्दी गले में उतारकर, थूना जाता है ढेरों भोजन बिना ठीक तरह चबाए पेट में भरकर और भसका जाता है बहुत तेज़ी से हाथ चलाकर, चारों ओर खिण्डाते हुए और हाथ मुँह को सानते हुए।
मुखियाजी ने यह बताया ही नहीं मुँह और हाथ को आकृति को मुद्राओं में बदलकर वहीं चारों भावों का प्रदर्शन भी किया। शब्दों की इस सूक्ष्म भेद-रेखा से कितने शिक्षित परिचित हैं?
***
जिलाधीश श्री वीरेंद्र प्रताप साही, उनकी पत्नी श्रीमती गिरिजा कुमारी साही और मैं एक मेले में गए। शाम को जब हम लौटे तो दूसरी मोटर में एक डिप्टी कलेक्टर की पत्नी और बच्चे थे। यह मोटर पुरानी थी। रात का समय, जंगल का सफ़र, मोटर पुरानी; डिप्टी साहब की पत्नी ने अपनी मोटर हमारी मोटर से आगे कराई कि रास्ते में गाड़ी ख़राब हो जाए, तो हमें पता चले।
यह पुरानी मोटर जब साही साहब की मोटर के पास से एक सपाटे के साथ आगे निकली, तो श्रीमती साही ने कहा—अरे प्रभाकर जी, हमारे डिप्टी साहब की मोटर तो आज उड़न-खटोला होय गई है।
यह पुरानी मोटर कुछ दूर पर ठप्प हो गई, तो श्रीमती साही ने कहा—आपके डिप्टी साहब भी ख़ूब रहे कि ख़ुद तो मेले में रह गए और बच्चों को यह खड़खड़िया दे दी।
हम सब हँस पड़े, पर तभी मैंने कहा कि आज यह समझ में आया कि भाषा को मातृभाषा क्यों कहा गया है। तेज़ चली मोटर को उड़न-खटोला और ठप्प हुई को खड़खड़िया माँ-बहने ही कह सकती है कोई एम. ए. शास्त्री या साहित्य-रत्न नहीं!
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हमारे प्रेस में एक इंकमैन है रिजवान। कोई 12 वर्ष का अशिक्षित बालक। उस दिन मेरे सिर में तेल मलते-मलते बातें करने लगा। अपने पिता की चर्चा में बोला—मेरे अब्बा पतली बेंत से मारते-मारते बधिया खींच देते थे।
जो लोग बैल को बधिया करने की प्रक्रिया से परिचित हैं, वे ही इस अभिव्यक्ति का रस ले सकते हैं। यही बालक एक दिन बोला—जब आपने प्रेस खोला, तब तो मेरे पत्ते भी नहीं जमे थे। जीवन-वृक्ष की कितनी मधुर और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है?
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श्री शिवराम शर्मा देहात में जन्मे, पले और पनप रहे हैं। मैं उन्हें देहाती-प्रतिभा का मॉडल कहा करता हूँ। आप वैद्य हैं, अभिनेता हैं, लेखक है। उन्होंने एक अध्यापक का स्कैच लिखा। उसमें एक जगह कहा है—अजी, वह मास्टर तो गजब का पुतला था। गाँव भर के बालकों को उसने मोह लिया था—सब उसी के राग गाते थे, पर वह बिना ब्याहा था। थोड़े दिन बाद गाँव में खोट करने लगा। मैं जाने कितनी बार सोच चुका हूँ कि क्या कोई शहरी कथाकार, दुराचार की इससे सुंदर, संकेतात्मक और पूर्ण अभिव्यक्ति दे सकता है?
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एक देहात में मैं भाषण देने गया। जिनके घर ठहरा, उनका छोटा लड़का मुझसे हिल गया। रात में वह मेरी बुक्कल में बैठा था कि वे बाहर से आए और बोले—गोपाल, पंडित जी के साथ तेरी दोस्ती पहले ही दिन गदरा गई, भाई!” वाह, क्या दोस्ती गदराई है।
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मेरे मानसिक परिवार की एक सदस्या है जयमाला। वह अपने पति से असंतुष्ट थी; उसने अपने पति के एक मित्र की छाया में संतोष देखा और यह उनकी हो गई। आधार यह था कि ये उसकी रात-दिन प्रशंसा किया करते थे। कुछ दिन ख़ूब बीते और फिर यहाँ भी कलह का तूफ़ान उठ खड़ा हुआ।
अब उसके नए साथी उससे ऊब रहे थे; वह उनके जीवन का भार हो चली थी। एक दिन मैंने उससे पूछा—जयमाला बहन, पहले तो वे सदा तुम्हारी एक में सौ तारीफ़ किया करते थे, अब उन्हें तुममें कोई गुण ही दिखाई नहीं देता; आख़िर यह हुआ क्या?
जयमाला ने बस एक वाक्य कहा—मर्द को पेड़ पर लगा फूल ही अच्छा लगता है भाई साहब! और लंबे साँस के साथ वह चुप हो गई।
मैं उस दिन सुनकर सुन्न हो गया था और आज सोचकर सुन्न हुआ जाता हूँ। पुरुष का पूरा चरित्र 17 अक्षरों में समोकर रख दिया है, उधेड़कर रख दिया है—मर्द को पेड़ पर लगा फूल ही अच्छा लगता है। इतने संक्षेप में इतनी मुकम्मल बात कहने की शक्ति धरा के किस कवि में है?
एक विदेशी मनोविज्ञान-शास्त्री से एक युवती ने पूछा—महाशय, एक युवक हमेशा मेरे पीछे पड़ा रहता है, अपने प्यार की गहराइयों के गीत गाता रहता है; मैं क्या करूँ?”
मनोविज्ञान-शास्त्री ने कहा—उससे विवाह कर लो, कुछ दिन बाद वह तलाक़ के तरीक़े खोजता दिखाई देगा।
बात वही है, जीवन का पहलू यही है, पर वह बात कहाँ? 'पेड़ पर लगा फूल' कलेजे में शूल-सा चुभ जाता है, तो चुभा ही रहता है, फिर निकलता नहीं।
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रेल उड़ी जा रही थी और वह देहाती डंडा पकड़े दरवाज़े पर खड़ा था। हवा का एक झोंका आया कि उसकी टोपी उड़ गई। उसने आव देखा न ताव, झट ख़तरे की ज़ंजीर खींच दी। गाड़ी ठहरी, तो गार्ड आया—क्यों खींची है तुमने ज़ंजीर?
किसी ने बताया कि इस बेचारे देहाती की टोपी उड़ गई थी। एक मामूली टोपी के लिए ज़ंजीर? अजीब बेवक़ूफ़ है यह देहाती! गार्ड को ग़ुस्सा आ गया। झल्लाकर उसने कहा—निकालो 50 रुपए।
कैसे 50 रुपिए गार्ड साहब? देहाती ने सरल भाव से कहा, तो सामने मुझे होना न था और गलियों में भले घर की लड़की उन दिनों निकलती न थी!
लुकते-छिपते सुसराल की गली के कई चक्कर काटे, पर इससे भला मतलब! ढलती दुपहरी में भंगी की लड़की उस घर से निकली, तो पास लगकर पूछा—वह लड़की कैसी है बहन?
इस प्रश्न के 30 वर्ष बाद तक मैंने जितने स्कैच लिखे हैं, उन सबको उस लड़की ने एक शब्द में मात कर दिया—जादो की भेन्ना राधा है बाबू जी, जाओ अपने घर बैठो।
राधा में भावी पत्नी का पूर्ण परिचय है, तो 'जाओं अपने घर बैठो' में मेरी संपूर्ण जाँच-पड़ताल का जवाब और यह भी कि मैं तुम्हें पहचान गई हूँ तुम कन्हैया हो!
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जन साधारण के पास अभिव्यक्तियों का नित-नूतन ऐसा भंडार है, बात करने का ऐसा लहज़ा है कि पांडित्य खड़ा ताका करे। भाई ग़ुलाम अनवर साबरी ने उस दिन एक मौलवी के मुँह पर किसान का झाँपड़ पड़ने की बात सुनाई तो हँसते-हँसते हम सब लोट-पोट हो गए—
एक मौलवी-ज़मींदार के पास उनका किसान आया, तो मौलवी साहब ने पूछा—इस साल तकातुरे अमतार से किश्तजारे गंदुम को कोई मफ़ाद पहुँचा या नहीं। उनका मतलब यह जानना था कि इस बारिश से गेहुँओं को कोई लाभ हुआ या नहीं, पर वे किससे किस भाषा में बोल रहे थे?
किसान जला भुना या बड़बड़ाया नहीं। बस उठते-उठते बोला—हुजूर इस वक़्त तो कुरान पढ़ रहे हैं, मैं कल आऊँगा।
किसान ने मौलवी को जो कुरान पढ़ाई, मौलवी सचमुच उसे ज़िंदगी भर याद रखेगा, इसमें शक़ नहीं!
***
उस दिन स्टेशन के पास दो देहाती बंधु आपस में लड़ पड़े। दोनों एक गाँव के। हरद्वार में गंगा-स्नान करने को एक साथ घर से चले, निश्चय ही दोनों मित्र, पर रास्ते में बात का बतंगड़ हो गया, तो भिड़ पड़े? मैंने बीच में पड़कर बीच-बचाव किया, तो हटते-हटते एक बोला—गे न समझना कि हम तुमसे उन्नीस हैं। जाने रहौ, बहुत बिगड़ैल हैं हम। अपनी पर आवैं, तो अवै सारे का थप्पड़नते मारत मारत मोह टमाटर बनाए दे हैं?
फफफ कर दूसरे ने कहा—तौ तुम हू ई समझे रहौ कि हमहू चून के ना हैं। घूँसनते मारत-मारत सारे का मोह भाँटा बनाय दैवै।
ठीक तो है, थप्पड़ की मार मुँह को लाल कर देगी और घूँसों की मार उसे फुला देगी—कितनी सर्वागंपूर्ण अभिव्यक्ति है यह?
हमारे देश के पास-जनसाधारण के पास-भाषा का ऐसा भंडार है कि हम उसकी उपेक्षा करके दर्शन और विज्ञान के ग्रंथ भले ही लिख लें, बात-चीत नहीं कर सकते। आम आदमी की बात-चीत में मस्तिष्क का माया-जाल नहीं, हृदय की सरल, सरसता होती है। चुटकुलों, कहानियों, दृष्टांतों, शब्दों और अभिव्यक्तियों का ऐसा संग्रह उसके पास है, जो बहुमूल्य है। इस दिशा में बहुत गहरे सतर्क प्रयत्नों की आवश्यकता है। ये प्रयत्न हमारी भाषा को समृद्ध और शक्तिशाली करने वाले होंगे, यह मेरा अखंड विश्वास है। आप घंटा भर किसी कुम्हार, चमार, धोबी, मल्लाह, किसान, ताँगेवाले या भड़भूजे के पास बैठिए, आपको 5, चमत्कार पूर्ण अभिव्यक्तियाँ या भावपूर्ण नए शब्द मिलेंगे। ये हमारी भाषा के हीरे हैं, मोती हैं; लाल हैं। मैं अक्सर सोचता हूँ, हम शिक्षितों को इन अशिक्षितों के द्वार शिष्य बनकर बैठना चाहिए।
madmati masuri ke tilak pustakalaya se kingakrek ko utarti ghumavadar pagDanDi. us par utra ja raha hoon main aur mere paas paas ye ja raha hai chana zor garm ka baksa gale mein Dale 16 17 saal ka ek laDka. adami aa ja rahe hain, par ye avaz nahin lagata, latke nahin gata aur chana zor garm ki chiki ka to sara daar madar hi latkon par hai.
tabhi use mila uska ek sathi niche se uupar jata, use bhi uska maun akhra—abe, avaz laga, chup kyon hai, gale mein haphu to nahin nikal aaya.
tamak kar laDke ne kaha—haphu nikle teri zoru ke gale mein, jo hamse sikvati phire. abe chamchu, hamare haphu nikle, to khayen kya—tujhe to teri bahu ne god le rakha hai, tujhe rotiyon ki kya phikar?
sathi ne patta kata—abe chimgadaD ke, to jalta kyon hai? meri bahu to tujhe bhi god lekar laDDu baant degi, par ye to bata ki gum kyon hai? laga avaz, baandh latke, jo barse paisa hi paisa?
laDke ne kaha—abe, tu to hai chokhat ki chappal ki jahan dekha, rapat paDa aur hum hain dukanadar duniya ki ramaz pahchante hain. jahan vaisa barasne ka Daul hota hai, vahan chana zor garm vale ki avaz jhingri ho jati hai.
aur ab mazak ki mooD se gambhirta ke dharatal par aate hue usne kaha yahan ek kauDi ka bhi chana nahin bik sakta. baat ye hai ki jo log kingakrek par utar rahe hain, unhen to lagi rahti hai habhaDh tachaD ki pata nahin motar mein jagah milegi ya nahin, kuli kahan gaya, bibi bachche kahan hain? aur jo log niche se uupar ja rahe hain, unka aadha ji to phansa rahta hai chaDhai ki thakan mein aur aadha hotal mein, phir batao, is saDak par chana kon khaye—yah to yaar, mauz ke masale hain.
baat ain gain hui, par sochna svbhaav ho gaya hai, main sochta raha. pahli baat jo manmen aai, wo thi us apaD laDke mein manovrittiyon ke vishleshan ki sookshm aur gahri kshamata. ye kshamata desh ki us jivan shakti ka ek pradarshan hai, jo sadiyon ki dasta aur sangharsh mein bhi mari nahin, dusri baat man mein aai ye ki in apaDh balkon ke paas itni saras, sajiv aur svasth bhasha hai ki hamare mahamahopadhyay inse abhi barson bolne ka tariqa sikha karen, bas tab se apaDh bhashashastriyon ki khoj mera svbhaav ho gaya.
***
ek gaanv ke mukhiya ka ghar—ham 3 4 mehman unki baithak mein bhojan ki thaliyon par, jinmen unka ek laDka bhee! ye laDka khane mein zara pragtishil. mukhiya ji bole panDit ji, ye pahle janm mein janvar tha, isliye adami ki joon pakar bhi iska Dhang nahin badla. khair, thunta, bhasakta to ye nahin, par khane ko khata bhi nahin, nigalta hai.
in sab mein kya bhed hai, mehrbani karke ye bataiye mukhiya jee! laDke ko unki jhaaD se bachane ke liye mainne baat badli, to mukhiya ji bole—panDit ji, adami khata hai, janvar nigalta hai, bhoot thunta hai aur rakshas bhasakta hai.
aur tab unhonne bataya ki khana khaya jata hai dhire dhire chabakar, nigla jata hai papolkar jaldi jaldi gale mein utaar kar, dhuna jata hai Dheron bhojan bina theek tarah chabaye pet mein bharkar aur bhas ka jata hai bahut tezi se haath chalakar, charon or khiyeDate hue aur haath munh ko sante hue.
mukhiyaji ne ye bataya hi nahin munh aur haath ko akriti ko mudraon mein badalkar vahin charon bhavon ka pradarshan bhi kiya. shabdon ki is sookshm bhed rekha se kitne shikshit parichit hain?
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jiladhish shri virendr pratap sahi, unki patni shrimti girija kumari sahi aur main ek mele mein ge. shaam ko jab hum laute to dusri motar mein ek Dipti kalektar ki patni aur bachche the. ye motar purani thi. raat ka samay, jangalka safar, motar purani; Dipti sahab ki patni ne apni motar hamari motar se aage karai ki raste mein gaDi kharab ho jaye, to hamein pata chale.
ye purani motar jab sahi sahab ki motar ke paas se ek sapate ke saath aage nikli, to shrimti sahi ne kaha—are prabhakar ji, hamare Dipti sahab ki motar to aaj uDan khatola hoy gai hai.
ye purani motar kuch door par thapp ho gai, to shrimti sahi ne kaha—apke Dipti sahab bhi khoob rahe ki khud to mele mein rah ge aur bachchon ko ye khaDkhaDiya de di.
hum sab hans paDe, par tabhi mainne kaha ki aaj ye samajh mein aaya ki bhasha ko matribhasha kyon kaha gaya hai. tez chali motar ko uDan khatola aur thapp hui ko khaDkhaDiya maan bahne hi kah sakti hai koi em. e. shastari ya sahitya ratn nahin!
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hamare pres mein ek inkmain hai rijvan. koi 12 varsh ka ashikshit balak. us din mere sir mein tel malte malte baten karne laga. apne pita ki charcha mein bola—mere abya patli bent se marte marte badhiya kheench dete the.
jo log bailko badhiya karne ki prakriya se parichit hain, ve hi is abhivyakti ka ras le sakte hain. yahi balak ek din bola—jab aapne pres khola, tab to mere patte bhi nahin jame the. jivan vrikshki kitni madhur aur marmasparshi abhivyakti hai?
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shri shivram sharma dehat mein janme, pale aur panap rahe hain. main unhen dehati pratibha ka mauDal kaha karta hoon. aap vaidya hain, abhineta hain, lekhak hai. unhonne ek adhyapak ka skaich likha. usmen ek jagah kaha hai—aji, wo mastar to gazab ka putla tha. gaanv bhar ke balkon ko usne moh liya tha sab usi ke raag gate the, par wo bina byaha tha. thoDe din baad gaanv mein khot karne laga. main jane kitni baar soch chuka hoon ki kya koi shahri kathakar, durachar ki isse sundar, sanketatmak aur poorn abhivyakti de sakta hai?
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ek dehat mein main bhashan dene gaya. jinke ghar thahra, unka chhota laDka mujhse hil gaya. raat mein wo meri bukkal mein baitha tha ki ve bahar se aaye aur bole—gopal, panDit ji ke saath teri dosti pahle hi din gadra gai, bhai!” baad, kya dosti gadrai hai.
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mere manasik parivar ki ek sadasya hai jaymala. wo apne pati se asantusht thee; usne apne pati ke ek mitr ki chhaya mein santosh dekha aur ye unki ho gai. adhar ye tha ki ye uski raat din prshansa kiya karte the. kuch din khoob bite aur phir yahan bhi kalah ka tufan uth khaDa hua.
ab uske ne sathi usse uub rahe the; wo unke jivan ka bhaar ho chali thi. ek din mainne usse puchha—jaymala bahan, pahle to ve sada tumhari ekmen sau tarif kiya karte the, ab unhen tummen koi gun hi dikhai nahin deta; akhir ye hua kyaa?
jaymala ne bas ek vakya kaha—mard ko peD par laga phool hi achchha lagta hai bhai sahab! aur lambe saans ke saath wo chup ho gai.
main us din sunkar sunn ho gaya tha aur aaj sochkar sunn hua jata hoon. purush ka pura charitr 17 akshron mein samokar rakh diya hai, udheD kar rakh diya hai—mard ko peD par laga phool hi achchha lagta hai. itne sankshep mein itni mukammal baat kahne ki shakti dhara ke kis kavi mein hai?
ek videshi manovigyan shastari se ek yuvati ne puchha—mahashay, ek yuvak hamesha mere pichhe paDa rahta hai, apne pyaar ki gahraiyon ke geet gata rahta hai; main kya karun?”
manovigyan shastari ne kaha—usse vivah kar lo, kuch din baad wo talaq ke tariqe khojta dikhai dega.
baat vahi hai, jivan ka pahlu yahi hai, par wo baat kahan? peD par laga phool kaleje mein shool sa chubh jata hai, to chubha hi rahta hai, phir nikalta nahin.
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rel uDi ja rahi thi aur wo dehati DanDa pakDe darvaje par khaDa tha. havaka ek jhonka aaya ki uski topi uD gai. usne aav dekha na taav, jhat khatreki janjir kheench di. gaDi thahri, to gaarD aaya kyon khinchi hai tumne zanjir?
kisi ne bataya ki is bechare dehati ki topi uD gai thi. ek mamuli topi ke liye zanjir? ajib bevaquf hai ye dehati! gaarD ko ghussa aa gaya. jhallakar usne kaha— nikalo 50 rupe.
kaise 50 rupiye gaarD sahab? dehati ne saral bhaav se kaha, to samne mujhe hona na tha aur galiyonmen bhale ghar ki laDki un dinon nikalti na thee!
lukte chhipte susral ki gali ke kai chakkar kate, par isse bhala matlab! Dhalti dopahri mein bhangi ki laDki us ghar se nikli, to paas lagkar puchha—vah laDki kaisi hai bahan?
is parashn ke 30 varsh baad tak mainne jitne skaich likhe hain, un sabko us laDki ne ek shabd mein maat kar diya—jado ki bhenna radha hai babu ji, jao apne ghar baitho.
radha mein bhavi patni ka poorn parichay hai, to jaon apne ghar baitho mein meri sampurn jaanch paDtal ka javab aur ye bhi ki main tumhein pahchan gai hoon tum kanhaiya ho!
***
jan sadharan ke paas abhivyaktiyon ka nit nutan aisa bhanDar hai, baat karne ka aisa lahja hai ki panDitya khaDa taka kare. bhai ghulam anvar sabari ne us din ek molbi ke munh par kisan ka jhanpaD paDne ki baat sunai to hanste hanste hum sab lot pot ho ge—
ek maulavi zamindar ke paas unka kisan aaya, to molvi sahab ne puchha—is saal takature abhtar se kishtjare gandum ko koi mafad pahuncha ya nahin. unka matlab ye janna tha ki is barish se gehunon ko koi laabh hua ya nahin, par ve kisse kis bhasha mein bol rahe the?
kisan jala bhuna ya baDabDaya nahin. bas uthte uthte bola—huzur is vaqt to kuran paDh rahe hain, main kal auunga.
kisan ne maulavi ko jo kuran paDhai, maulavi sach much use zindagi bhar yaad rakhega, ismen shaq nahin!
us din steshan ke paas do dehati bandhu aapas mein laD paDe. donon ek gaanv ke. haradvar mein ganga snaan karne ko ek saath ghar se chale, nishchay hi donon mitr, par raste mein baat ka batangaD ho gaya, to bhiD paDe? mainne beech mein paDkar beech bachav kiya, to hatte hatte ek bola—ge na samajhna ki hum tumse unnis hain. jane rahau, bahut bigDail hain hum. apni par avain, to avai sare ka thappaDante marat marat moh tamatar banaye de hain?
phaphaph kar dusre ne kaha—tau tum hu ii samjhe rahau ki hamhu choon ke na hain. ghunsanate marat marat sare ka moh bhanta banay daivai.
theek to hai, thappaD ki maar munh ko laal kar degi aur ghunson ki maar use phula degi—kitni sarvagampurn abhivyakti hai yah?
hamare desh ke paas jansadharan ke paas bhasha ka aisa bhanDar hai ki hum uski upeksha karke darshan aur vigyan ke granth bhale hi likh len, baat cheet nahin kar sakte. aam adami ki baat cheet mein mastishk ka maya jaal nahin, hriday ki saral, sarasta hoti hai. chutakulon, kahaniyon, drishtanton, shabdon aur abhivyaktiyon ka aisa sangrah uske paas hai, jo bahumulya hai. is disha mein bahut gahre satark pryatnon ki avashyakta hai. ye prayatn hamari bhasha ko samriddh aur shaktishali karne vale honge, ye mera akhanD vishvas hai. aap ghanta bhar kisi kumhar, chamar, dhobi, mallah, kisan, tangevale ya bhaDbhuje ke paas baithiye, aapko 5, chamatkar poorn abhivyaktiyan ya bhavpurn ne shabd milenge. ye hamari bhasha ke hire hain, moti hain; laal hain. main aksar sochta hoon, hum shikshiton ko in ashikshiton ke dvaar shishya bankar baithna chahiye.
madmati masuri ke tilak pustakalaya se kingakrek ko utarti ghumavadar pagDanDi. us par utra ja raha hoon main aur mere paas paas ye ja raha hai chana zor garm ka baksa gale mein Dale 16 17 saal ka ek laDka. adami aa ja rahe hain, par ye avaz nahin lagata, latke nahin gata aur chana zor garm ki chiki ka to sara daar madar hi latkon par hai.
tabhi use mila uska ek sathi niche se uupar jata, use bhi uska maun akhra—abe, avaz laga, chup kyon hai, gale mein haphu to nahin nikal aaya.
tamak kar laDke ne kaha—haphu nikle teri zoru ke gale mein, jo hamse sikvati phire. abe chamchu, hamare haphu nikle, to khayen kya—tujhe to teri bahu ne god le rakha hai, tujhe rotiyon ki kya phikar?
sathi ne patta kata—abe chimgadaD ke, to jalta kyon hai? meri bahu to tujhe bhi god lekar laDDu baant degi, par ye to bata ki gum kyon hai? laga avaz, baandh latke, jo barse paisa hi paisa?
laDke ne kaha—abe, tu to hai chokhat ki chappal ki jahan dekha, rapat paDa aur hum hain dukanadar duniya ki ramaz pahchante hain. jahan vaisa barasne ka Daul hota hai, vahan chana zor garm vale ki avaz jhingri ho jati hai.
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baat ain gain hui, par sochna svbhaav ho gaya hai, main sochta raha. pahli baat jo manmen aai, wo thi us apaD laDke mein manovrittiyon ke vishleshan ki sookshm aur gahri kshamata. ye kshamata desh ki us jivan shakti ka ek pradarshan hai, jo sadiyon ki dasta aur sangharsh mein bhi mari nahin, dusri baat man mein aai ye ki in apaDh balkon ke paas itni saras, sajiv aur svasth bhasha hai ki hamare mahamahopadhyay inse abhi barson bolne ka tariqa sikha karen, bas tab se apaDh bhashashastriyon ki khoj mera svbhaav ho gaya.
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ek gaanv ke mukhiya ka ghar—ham 3 4 mehman unki baithak mein bhojan ki thaliyon par, jinmen unka ek laDka bhee! ye laDka khane mein zara pragtishil. mukhiya ji bole panDit ji, ye pahle janm mein janvar tha, isliye adami ki joon pakar bhi iska Dhang nahin badla. khair, thunta, bhasakta to ye nahin, par khane ko khata bhi nahin, nigalta hai.
in sab mein kya bhed hai, mehrbani karke ye bataiye mukhiya jee! laDke ko unki jhaaD se bachane ke liye mainne baat badli, to mukhiya ji bole—panDit ji, adami khata hai, janvar nigalta hai, bhoot thunta hai aur rakshas bhasakta hai.
aur tab unhonne bataya ki khana khaya jata hai dhire dhire chabakar, nigla jata hai papolkar jaldi jaldi gale mein utaar kar, dhuna jata hai Dheron bhojan bina theek tarah chabaye pet mein bharkar aur bhas ka jata hai bahut tezi se haath chalakar, charon or khiyeDate hue aur haath munh ko sante hue.
mukhiyaji ne ye bataya hi nahin munh aur haath ko akriti ko mudraon mein badalkar vahin charon bhavon ka pradarshan bhi kiya. shabdon ki is sookshm bhed rekha se kitne shikshit parichit hain?
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jiladhish shri virendr pratap sahi, unki patni shrimti girija kumari sahi aur main ek mele mein ge. shaam ko jab hum laute to dusri motar mein ek Dipti kalektar ki patni aur bachche the. ye motar purani thi. raat ka samay, jangalka safar, motar purani; Dipti sahab ki patni ne apni motar hamari motar se aage karai ki raste mein gaDi kharab ho jaye, to hamein pata chale.
ye purani motar jab sahi sahab ki motar ke paas se ek sapate ke saath aage nikli, to shrimti sahi ne kaha—are prabhakar ji, hamare Dipti sahab ki motar to aaj uDan khatola hoy gai hai.
ye purani motar kuch door par thapp ho gai, to shrimti sahi ne kaha—apke Dipti sahab bhi khoob rahe ki khud to mele mein rah ge aur bachchon ko ye khaDkhaDiya de di.
hum sab hans paDe, par tabhi mainne kaha ki aaj ye samajh mein aaya ki bhasha ko matribhasha kyon kaha gaya hai. tez chali motar ko uDan khatola aur thapp hui ko khaDkhaDiya maan bahne hi kah sakti hai koi em. e. shastari ya sahitya ratn nahin!
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hamare pres mein ek inkmain hai rijvan. koi 12 varsh ka ashikshit balak. us din mere sir mein tel malte malte baten karne laga. apne pita ki charcha mein bola—mere abya patli bent se marte marte badhiya kheench dete the.
jo log bailko badhiya karne ki prakriya se parichit hain, ve hi is abhivyakti ka ras le sakte hain. yahi balak ek din bola—jab aapne pres khola, tab to mere patte bhi nahin jame the. jivan vrikshki kitni madhur aur marmasparshi abhivyakti hai?
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shri shivram sharma dehat mein janme, pale aur panap rahe hain. main unhen dehati pratibha ka mauDal kaha karta hoon. aap vaidya hain, abhineta hain, lekhak hai. unhonne ek adhyapak ka skaich likha. usmen ek jagah kaha hai—aji, wo mastar to gazab ka putla tha. gaanv bhar ke balkon ko usne moh liya tha sab usi ke raag gate the, par wo bina byaha tha. thoDe din baad gaanv mein khot karne laga. main jane kitni baar soch chuka hoon ki kya koi shahri kathakar, durachar ki isse sundar, sanketatmak aur poorn abhivyakti de sakta hai?
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ek dehat mein main bhashan dene gaya. jinke ghar thahra, unka chhota laDka mujhse hil gaya. raat mein wo meri bukkal mein baitha tha ki ve bahar se aaye aur bole—gopal, panDit ji ke saath teri dosti pahle hi din gadra gai, bhai!” baad, kya dosti gadrai hai.
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mere manasik parivar ki ek sadasya hai jaymala. wo apne pati se asantusht thee; usne apne pati ke ek mitr ki chhaya mein santosh dekha aur ye unki ho gai. adhar ye tha ki ye uski raat din prshansa kiya karte the. kuch din khoob bite aur phir yahan bhi kalah ka tufan uth khaDa hua.
ab uske ne sathi usse uub rahe the; wo unke jivan ka bhaar ho chali thi. ek din mainne usse puchha—jaymala bahan, pahle to ve sada tumhari ekmen sau tarif kiya karte the, ab unhen tummen koi gun hi dikhai nahin deta; akhir ye hua kyaa?
jaymala ne bas ek vakya kaha—mard ko peD par laga phool hi achchha lagta hai bhai sahab! aur lambe saans ke saath wo chup ho gai.
main us din sunkar sunn ho gaya tha aur aaj sochkar sunn hua jata hoon. purush ka pura charitr 17 akshron mein samokar rakh diya hai, udheD kar rakh diya hai—mard ko peD par laga phool hi achchha lagta hai. itne sankshep mein itni mukammal baat kahne ki shakti dhara ke kis kavi mein hai?
ek videshi manovigyan shastari se ek yuvati ne puchha—mahashay, ek yuvak hamesha mere pichhe paDa rahta hai, apne pyaar ki gahraiyon ke geet gata rahta hai; main kya karun?”
manovigyan shastari ne kaha—usse vivah kar lo, kuch din baad wo talaq ke tariqe khojta dikhai dega.
baat vahi hai, jivan ka pahlu yahi hai, par wo baat kahan? peD par laga phool kaleje mein shool sa chubh jata hai, to chubha hi rahta hai, phir nikalta nahin.
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rel uDi ja rahi thi aur wo dehati DanDa pakDe darvaje par khaDa tha. havaka ek jhonka aaya ki uski topi uD gai. usne aav dekha na taav, jhat khatreki janjir kheench di. gaDi thahri, to gaarD aaya kyon khinchi hai tumne zanjir?
kisi ne bataya ki is bechare dehati ki topi uD gai thi. ek mamuli topi ke liye zanjir? ajib bevaquf hai ye dehati! gaarD ko ghussa aa gaya. jhallakar usne kaha— nikalo 50 rupe.
kaise 50 rupiye gaarD sahab? dehati ne saral bhaav se kaha, to samne mujhe hona na tha aur galiyonmen bhale ghar ki laDki un dinon nikalti na thee!
lukte chhipte susral ki gali ke kai chakkar kate, par isse bhala matlab! Dhalti dopahri mein bhangi ki laDki us ghar se nikli, to paas lagkar puchha—vah laDki kaisi hai bahan?
is parashn ke 30 varsh baad tak mainne jitne skaich likhe hain, un sabko us laDki ne ek shabd mein maat kar diya—jado ki bhenna radha hai babu ji, jao apne ghar baitho.
radha mein bhavi patni ka poorn parichay hai, to jaon apne ghar baitho mein meri sampurn jaanch paDtal ka javab aur ye bhi ki main tumhein pahchan gai hoon tum kanhaiya ho!
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jan sadharan ke paas abhivyaktiyon ka nit nutan aisa bhanDar hai, baat karne ka aisa lahja hai ki panDitya khaDa taka kare. bhai ghulam anvar sabari ne us din ek molbi ke munh par kisan ka jhanpaD paDne ki baat sunai to hanste hanste hum sab lot pot ho ge—
ek maulavi zamindar ke paas unka kisan aaya, to molvi sahab ne puchha—is saal takature abhtar se kishtjare gandum ko koi mafad pahuncha ya nahin. unka matlab ye janna tha ki is barish se gehunon ko koi laabh hua ya nahin, par ve kisse kis bhasha mein bol rahe the?
kisan jala bhuna ya baDabDaya nahin. bas uthte uthte bola—huzur is vaqt to kuran paDh rahe hain, main kal auunga.
kisan ne maulavi ko jo kuran paDhai, maulavi sach much use zindagi bhar yaad rakhega, ismen shaq nahin!
us din steshan ke paas do dehati bandhu aapas mein laD paDe. donon ek gaanv ke. haradvar mein ganga snaan karne ko ek saath ghar se chale, nishchay hi donon mitr, par raste mein baat ka batangaD ho gaya, to bhiD paDe? mainne beech mein paDkar beech bachav kiya, to hatte hatte ek bola—ge na samajhna ki hum tumse unnis hain. jane rahau, bahut bigDail hain hum. apni par avain, to avai sare ka thappaDante marat marat moh tamatar banaye de hain?
phaphaph kar dusre ne kaha—tau tum hu ii samjhe rahau ki hamhu choon ke na hain. ghunsanate marat marat sare ka moh bhanta banay daivai.
theek to hai, thappaD ki maar munh ko laal kar degi aur ghunson ki maar use phula degi—kitni sarvagampurn abhivyakti hai yah?
hamare desh ke paas jansadharan ke paas bhasha ka aisa bhanDar hai ki hum uski upeksha karke darshan aur vigyan ke granth bhale hi likh len, baat cheet nahin kar sakte. aam adami ki baat cheet mein mastishk ka maya jaal nahin, hriday ki saral, sarasta hoti hai. chutakulon, kahaniyon, drishtanton, shabdon aur abhivyaktiyon ka aisa sangrah uske paas hai, jo bahumulya hai. is disha mein bahut gahre satark pryatnon ki avashyakta hai. ye prayatn hamari bhasha ko samriddh aur shaktishali karne vale honge, ye mera akhanD vishvas hai. aap ghanta bhar kisi kumhar, chamar, dhobi, mallah, kisan, tangevale ya bhaDbhuje ke paas baithiye, aapko 5, chamatkar poorn abhivyaktiyan ya bhavpurn ne shabd milenge. ye hamari bhasha ke hire hain, moti hain; laal hain. main aksar sochta hoon, hum shikshiton ko in ashikshiton ke dvaar shishya bankar baithna chahiye.
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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