कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर के संस्मरण
मेरे पिताजी
अपनी तीन वर्ष की होश को ज़रा सँभालकर उन्होंने अपने आस-पास झाँका, तो वे सहम गए। माँ-बाप मर चुके थे और उनका पालन-पोषण उनके चाचा-चाची की देख-रेख में हो रहा था। उनके बचपन के संस्मरणों का सार है, बच्चे खिलाना, मार खाना, कुछ न कहना और सब कुछ सहना। यह कितना
ये चरित्रहीन
रम्मो थी अपने नगर की रूपरमणी वारांगना और कुँवर बलदेवसिंह उसी नगर के रईस। दोनों में गहरे संबंध थे। यों रम्मो का घर सबका घर था, पर काली आँखों कोई उसके कोठे क़दम रखे, तो झाड़ू ही वहाँ मोरछल थी। कुँवर साहब महीने की पहली तारीख़ को कुछ हरे पत्ते उसके हाथों
सुल्हड़ मिश्र
"अरे सुल्हड़, ले उपला, ज़रा सी आग तो ले आ!" माँ की आज्ञा उसके लिए वेद वाक्य थी, उपला लेकर वह आग लेने निकल पड़ा, पर घर के द्वार से निकलते-न-निकलते उसकी विचारधारा आग और उपले से हटकर किसी दूसरी ओर बदल गई। उसके पैर अपना काम करते रहे और मस्तिष्क अपना,
यशपाल
कौन आया है जी?" सहारनपुर जेल के 7 नं० वार्ड में किसी नए कांग्रेसी के आने की ख़बर पाते ही उत्कंठा से मैंने अपने एक साथी से पूछा। "आपका चेला आ गया है पंडित जी!" "कौन चेला?" "यशपाल, जिसे आप याद कर रहे थे!" मैं बान बटना बंदकर चौक में पहुँचा,
ये दीप, ये शंख
इसी आत्मा की आरती के ये हैं कुछ दीप, ये है कुछ शंख। दीप तो जलता है अँधेरे में कि हम देख सकें, पर क्या देख सकें? कहाँ निशा का दिग्दिगंतव्यापी अंधकार और कहाँ दीप का दो-चार गज पर ही टूट जाने-वाला प्रकाश? हम क्या देख सकें; बस यही कि अंधकार महान् है और प्रकाश