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सुल्हड़ मिश्र

sulhaD mishr

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

और अधिककन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

    अरे सुल्हड़, ले उपला, ज़रा सी आग तो ले आ!

    माँ की आज्ञा उसके लिए वेद वाक्य थी, उपला लेकर वह आग लेने निकल पड़ा, पर घर के द्वार से निकलते-न-निकलते उसकी विचारधारा आग और उपले से हटकर किसी दूसरी ओर बदल गई। उसके पैर अपना काम करते रहे और मस्तिष्क अपना, पर दोनों में इस समय कोई सामंजस्य था। पैरों का काम चलना है, दिशा का निर्णय नहीं; यह काम मस्तिष्क का है, पर मस्तिष्क उस समय अपनी ही धुन में था। प्रायः चार घंटे तक मस्तिष्क अपनी धुन में रहा और जब उसकी यह धुन टूटी, तो उसने देखा कि सुल्हड़ मिश्र अपने घर से आठ कोस दूर मंगलोर पहुँच गए हैं।

    दुपहर हो गई थी, भूख का समय था। इस नगर में सुल्हड़ मिश्र के एक यजमान थे, वे हाथ में उपला सँभाले उनके घर पहुँचे। यजमान पुरोहित के दर्शन कर बहुत प्रसन्न हुआ। बात यह हुई कि उस दिन सोमवती अमावस्या थी। श्रद्धालु यजमान ने उस दिन एक गाय दान की थी और वह उसे किसी मज़दूर के द्वारा पुरोहितजी के घर भेजने का प्रबंध सोच रहा था।

    पुरोहितजी ने यजमान के घर भोजन किया और अपनी गाय-बछिया लेकर लौट पढ़े। जिस राह लौटे, उसमें नदी पड़ी, पुरोहितजी सिर्फ़ एक धोती पहने थे। भीगने के भय से उसे निकाल कर आपने अपने सिर पर लपेट लिया और बलिया को कंधे पर ले, नदी पार की, पर नदी पार करते-न-करते आपकी विचार-धारा फिर किसी ओर जा भिड़ी और फलतः नदी पार कर आप बछिया को कंधे से उतारना और धोती पहनना, दोनों काम भूल गए और उसी रूप में अपने घर पहुँचे!

    रास्ते में मज़ाक़ में लोगों ने पूछा—मिश्रजी! नीचे क्या है? पर आप अपने ध्यान में थे। बोले—गाय के नीचे बछिया है!

    माने देखा उसका आज्ञापालक पुत्र, जो प्रातःकाल आग लेने गया था, शाम को गाय और बछिया लिए नंगाभूत बना उसके आँगन में खड़ा है। उसके इस पागलपन पर खीज कर माने ज़रा तेज़ी के स्वर में कहा—अरे, तुझे यों नंगा होते शर्म नहीं लगी! अब आपको अपने रूप का ध्यान हुआ। बाहर की ओर उसी रूप में लौटते-लौटते आपने कहा—ओह माँ मैं नदी पर धोती भूल आया हूँ, अभी लाता हूँ!

    और सिर पर क्या बंधा है? मिश्रजी ने सिर से उतार कर धोती पहनी और तब पूरा क़िस्सा माँ को सुनाया। माँ के हृदय का वात्सल्य भर्त्सना की झिड़‌कियों के रूप में अपने इस युवक दार्शनिक पुत्र पर बरस पड़ा, पर यह बात पुत्र के लिए कोई नई तो थी!

    इस अलबेले दार्शनिक का अन्न सहारनपुर ज़िले के देवबंद नामक प्रसिद्ध क़स्बे में हुआ था। जन्म की तिथि का बता सकना तो असंभव है, पर इतना निश्चित है कि उस समय सम्राट् अकबर दिल्ली के सिंहासन पर आसीन थे।

    सुल्हड़ मिश्र संस्कृत के प्रकांड पंडित थे, जीवन भर वे ब्रह्मचारी रहे और उन्होंने अपनी इस 'दार्शनिकता' से अपने आस-पास के वातावरण को सदा हास्यमय रखा। उन्हें मरे शताब्दियाँ गुज़र गई, पर अपने मधुर संस्मरणों के रूप में देवबंद और उसके आस-पास के देहात में वे आज भी जीवित हैं और बूढ़े बाबा आज भी रात के समय उनकी कहानी अपने बच्चों को सुनाया करते हैं।

    वे जब तक जिए अपने नगर के सरदार रहे और सारी समस्याएँ अपनी तीक्ष्ण-प्रतिभा और तुरंत-बुद्धि के द्वारा सुलझाते रहे। नगर में कोई बात आती, लोग दौड़कर उनके पास आते और यह नामुमकिन था कि वहाँ उसका इलाज होता। वे अपने नगर के लाल बुझक्कड़ थे!

    देवबंद में देवीकुंड पर काशी के विद्वानों का एक दल आकर ठहरा। विद्या-व्यसन का युग था—शास्त्रार्थ में विजय ही उन दिनों पांडित्य की कसौटी थी। आगत-विद्वानों ने शास्त्रार्थ का निमंत्रण दिया। देवबंद अपने विद्वानों के लिए उस दिन प्रसिद्ध था। अनेक पंडित शास्त्रार्थ के लिए वहाँ पहुँचे, पर पराजित होकर लौटे। काशी का एक विद्वान् ऐसा भयंकर तार्किक था कि कोई जम ही सका। नगर का सम्मान ख़तरे में पड़ने लगा—विद्वन्मंडली में चिंता छा गई। इकट्ठे होकर लोग नगर के सर्वे-सर्वा पंडित सुल्हड़ मिश्र के घर पहुँचे। पूरा समाचार सुनकर आपने दूसरे दिन शास्त्रार्थ के लिए चलना स्वीकार कर लिया।

    इसकी सूचना उन पंडितों के पास भेज दी गई और लिख दिया गया कि कल श्री सुल्हड़ मिश्र से आपका शास्त्रार्थ होगा। वे नगर के गुरु हैं और यदि आपने उन्हें पराजित कर दिया, तो नगर-विजय का प्रमाण-पत्र आपको दे दिया जाएगा। काशी के पंडित बड़े प्रसन्न हुए।

    दूसरे दिन दुपहर बाद सुल्हड़ मिश्र 'बड़ा धोता बड़ा पोथा, पंडताः पगड़ा बड़ा' का साक्षात् उदाहरण बनकर देवीकुंड पहुँचे। प्रायः चार सौ विद्वान् उनके पीछे थे और हज़ारों नागरिक दर्शक भी। संस्कृत में कुशल-मंगल की बातें होने लगीं। बीच में सुल्हड़ मिश्र ने एक वाक्य कहा—प्रचलत्यद्य हवा—आज हवा बहुत चल रही है। काशी के पंडित ने 'हवा' के प्रयोग पर आपत्ति की; क्योंकि यह संस्कृत शब्द नहीं है। मिश्र जीने इसे शुद्ध संस्कृत शब्द बताया, पर काशी का पंडित इससे सहमत नहीं हुआ। विवाद को शांत करने की मुद्रा में मिश्र जी ने कहा—अच्छा जाने दीजिए इसे; आप 'गणानां त्वा' मंत्र सुनाइए।

    पंडितजी ने तन्मयता के साथ उच्च स्वर में पढ़ना शुरू किया—ॐ बलिदान होगा। इसलिए जो भाई लड़ने-मरने को तैयार हों, वे तलवार लेकर चलें और अगर कोई तैयार हो, तो मैं अपनी माँ को एक गठरी में बाँधकर ले जाऊँगा और अकेला ही यह काम करूँगा।

    हिंदू इस टैक्स से दुखी थे, पर इस प्रकार उसका विरोध करना साहस का काम था, क्योंकि देवबंद मुगलों की एक छोटी-सी छावनी थी। लोगों ने सुल्हड़ मिश्र को बहुत समझाया और वैध उपायों का आश्रय लेने की सलाह दी, पर वे अपनी बात पर अटल रहे।

    अंत में 200 चुने हुए ब्राह्मण अपनी-अपनी तलवार लेकर साथ चले। चिता जोड़ते ही मुगल सिपाही ने टैक्स माँगा, पर सुल्हड़ मिश्र के एक ही वार से उसका सर धड़ से अलग हो, खेलने लगा। दूसरे सिपाही ने दौड़ कर छावनी में ख़बर दी। सूबेदार ने 60 फ़ौजी सिपाहियों का एक जत्था इन लोगों को गिरफ़्तार करने के लिए भेजा, जो कि इन्हें 'असौजिये आम' के पास मैदान में मिला। संक्षिप्त-सी बातचीत के बाद तलवारें म्यानों से निकलीं और चमक उठीं। फ़ौजी सिपाही सचे हुए थे, पर इधर भी मर मिटनेवाले ब्राह्मण थे, फलतः घंटों टेढ़ घंटे की झपट में उन सिपाहियों को सदा के लिए सोना पड़ा। तब और सिपाही आए और उनका भी यही हाल हुआ।

    दूसरे दिन प्रातः लोगों ने देखा कि सुल्हड़ मिश्र लापता है। शहर में उनकी कायरता की निंदा होने लगी, पर वे उस समय दिल्ली के पथ पर दौड़े जा रहे थे। जिस समय वे दिल्ली पहुँचे सौभाग्यवश सम्राट अकबर की सवारी निकल रही थी। कूद कर वे हाथी के सामने खड़े हो गए। सिपाही ने उन्हें हटाना चाहा, पर वे अड़ गए। सम्राट्‌ का आदेश हुआ—कल दरबार में हाज़िर हो। दूसरे दिन दरबार पहुँचकर आपने इस अन्यायपूर्ण टैक्स की बात सुनाई। सम्राट ने उसे उठाने का आदेश दिया और सूबेदार के नाम एक परवाना लिखकर उन्हें दे दिया गया।

    मौहर-दस्तख़त का परवाना लेकर दौड़े-दौड़े आप देवबंद आए। सारे शहर में ख़ुशी छा गई और लोगों ने सुल्हड़ मिश्र को हाथों हाथ उठा लिया। सूबेदार की रिपोर्ट भी बाद में दिल्ली पहुँची, पर सम्राट ने ब्राह्मणों के इस विप्लव को 'स्वाभाविक' कहकर टाल दिया; टैक्स हटाने का आदेश तो वे सुल्हड़ मिश्र के हाथों भेज ही चुके थे।

    मुगल साम्राज्य के काग़ज़ात में यह परवाना है, या नहीं, इसे तो खोजी विद्वान् ही देख सकते हैं, पर देवीकुंड के मैदान में बनी मुगल सिपाहियों की सैकड़ों क़ब्रें आज भी सुल्हड़ मिश्र और उनके साथियों की बहादुरी के गीत गा रही हैं। वे आज नहीं हैं, पर देवीकुंड का स्मशान उनका अमर स्मारक है, जो रोज़ किसी किसी को जीवन-कथा पर इति लिखकर भी उनकी यशोगाथा का अंत नहीं कर पाता!

    स्रोत :
    • पुस्तक : दीप जले, शंख बजे (पृष्ठ 108)
    • रचनाकार : कन्हैलाल मिश्र 'प्रभाकर'
    • प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ
    • संस्करण : 1951

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