माँ की आज्ञा उसके लिए वेद वाक्य थी, उपला लेकर वह आग लेने निकल पड़ा, पर घर के द्वार से निकलते-न-निकलते उसकी विचारधारा आग और उपले से हटकर किसी दूसरी ओर बदल गई। उसके पैर अपना काम करते रहे और मस्तिष्क अपना, पर दोनों में इस समय कोई सामंजस्य न था। पैरों का काम चलना है, दिशा का निर्णय नहीं; यह काम मस्तिष्क का है, पर मस्तिष्क उस समय अपनी ही धुन में था। प्रायः चार घंटे तक मस्तिष्क अपनी धुन में रहा और जब उसकी यह धुन टूटी, तो उसने देखा कि सुल्हड़ मिश्र अपने घर से आठ कोस दूर मंगलोर पहुँच गए हैं।
दुपहर हो गई थी, भूख का समय था। इस नगर में सुल्हड़ मिश्र के एक यजमान थे, वे हाथ में उपला सँभाले उनके घर पहुँचे। यजमान पुरोहित के दर्शन कर बहुत प्रसन्न हुआ। बात यह हुई कि उस दिन सोमवती अमावस्या थी। श्रद्धालु यजमान ने उस दिन एक गाय दान की थी और वह उसे किसी मज़दूर के द्वारा पुरोहितजी के घर भेजने का प्रबंध सोच रहा था।
पुरोहितजी ने यजमान के घर भोजन किया और अपनी गाय-बछिया लेकर लौट पढ़े। जिस राह लौटे, उसमें नदी पड़ी, पुरोहितजी सिर्फ़ एक धोती पहने थे। भीगने के भय से उसे निकाल कर आपने अपने सिर पर लपेट लिया और बलिया को कंधे पर ले, नदी पार की, पर नदी पार करते-न-करते आपकी विचार-धारा फिर किसी ओर जा भिड़ी और फलतः नदी पार कर आप बछिया को कंधे से उतारना और धोती पहनना, दोनों काम भूल गए और उसी रूप में अपने घर पहुँचे!
रास्ते में मज़ाक़ में लोगों ने पूछा—मिश्रजी! नीचे क्या है? पर आप अपने ध्यान में थे। बोले—गाय के नीचे बछिया है!
माने देखा उसका आज्ञापालक पुत्र, जो प्रातःकाल आग लेने गया था, शाम को गाय और बछिया लिए नंगाभूत बना उसके आँगन में खड़ा है। उसके इस पागलपन पर खीज कर माने ज़रा तेज़ी के स्वर में कहा—अरे, तुझे यों नंगा होते शर्म नहीं लगी! अब आपको अपने रूप का ध्यान हुआ। बाहर की ओर उसी रूप में लौटते-लौटते आपने कहा—ओह माँ मैं नदी पर धोती भूल आया हूँ, अभी लाता हूँ!
और सिर पर क्या बंधा है? मिश्रजी ने सिर से उतार कर धोती पहनी और तब पूरा क़िस्सा माँ को सुनाया। माँ के हृदय का वात्सल्य भर्त्सना की झिड़कियों के रूप में अपने इस युवक दार्शनिक पुत्र पर बरस पड़ा, पर यह बात पुत्र के लिए कोई नई तो न थी!
इस अलबेले दार्शनिक का अन्न सहारनपुर ज़िले के देवबंद नामक प्रसिद्ध क़स्बे में हुआ था। जन्म की तिथि का बता सकना तो असंभव है, पर इतना निश्चित है कि उस समय सम्राट् अकबर दिल्ली के सिंहासन पर आसीन थे।
सुल्हड़ मिश्र संस्कृत के प्रकांड पंडित थे, जीवन भर वे ब्रह्मचारी रहे और उन्होंने अपनी इस 'दार्शनिकता' से अपने आस-पास के वातावरण को सदा हास्यमय रखा। उन्हें मरे शताब्दियाँ गुज़र गई, पर अपने मधुर संस्मरणों के रूप में देवबंद और उसके आस-पास के देहात में वे आज भी जीवित हैं और बूढ़े बाबा आज भी रात के समय उनकी कहानी अपने बच्चों को सुनाया करते हैं।
वे जब तक जिए अपने नगर के सरदार रहे और सारी समस्याएँ अपनी तीक्ष्ण-प्रतिभा और तुरंत-बुद्धि के द्वारा सुलझाते रहे। नगर में कोई बात आती, लोग दौड़कर उनके पास आते और यह नामुमकिन था कि वहाँ उसका इलाज न होता। वे अपने नगर के लाल बुझक्कड़ थे!
देवबंद में देवीकुंड पर काशी के विद्वानों का एक दल आकर ठहरा। विद्या-व्यसन का युग था—शास्त्रार्थ में विजय ही उन दिनों पांडित्य की कसौटी थी। आगत-विद्वानों ने शास्त्रार्थ का निमंत्रण दिया। देवबंद अपने विद्वानों के लिए उस दिन प्रसिद्ध था। अनेक पंडित शास्त्रार्थ के लिए वहाँ पहुँचे, पर पराजित होकर लौटे। काशी का एक विद्वान् ऐसा भयंकर तार्किक था कि कोई जम ही न सका। नगर का सम्मान ख़तरे में पड़ने लगा—विद्वन्मंडली में चिंता छा गई। इकट्ठे होकर लोग नगर के सर्वे-सर्वा पंडित सुल्हड़ मिश्र के घर पहुँचे। पूरा समाचार सुनकर आपने दूसरे दिन शास्त्रार्थ के लिए चलना स्वीकार कर लिया।
इसकी सूचना उन पंडितों के पास भेज दी गई और लिख दिया गया कि कल श्री सुल्हड़ मिश्र से आपका शास्त्रार्थ होगा। वे नगर के गुरु हैं और यदि आपने उन्हें पराजित कर दिया, तो नगर-विजय का प्रमाण-पत्र आपको दे दिया जाएगा। काशी के पंडित बड़े प्रसन्न हुए।
दूसरे दिन दुपहर बाद सुल्हड़ मिश्र 'बड़ा धोता बड़ा पोथा, पंडताः पगड़ा बड़ा' का साक्षात् उदाहरण बनकर देवीकुंड पहुँचे। प्रायः चार सौ विद्वान् उनके पीछे थे और हज़ारों नागरिक दर्शक भी। संस्कृत में कुशल-मंगल की बातें होने लगीं। बीच में सुल्हड़ मिश्र ने एक वाक्य कहा—प्रचलत्यद्य हवा—आज हवा बहुत चल रही है। काशी के पंडित ने 'हवा' के प्रयोग पर आपत्ति की; क्योंकि यह संस्कृत शब्द नहीं है। मिश्र जीने इसे शुद्ध संस्कृत शब्द बताया, पर काशी का पंडित इससे सहमत नहीं हुआ। विवाद को शांत करने की मुद्रा में मिश्र जी ने कहा—अच्छा जाने दीजिए इसे; आप 'गणानां त्वा' मंत्र सुनाइए।
पंडितजी ने तन्मयता के साथ उच्च स्वर में पढ़ना शुरू किया—ॐ बलिदान होगा। इसलिए जो भाई लड़ने-मरने को तैयार हों, वे तलवार लेकर चलें और अगर कोई तैयार न हो, तो मैं अपनी माँ को एक गठरी में बाँधकर ले जाऊँगा और अकेला ही यह काम करूँगा।
हिंदू इस टैक्स से दुखी थे, पर इस प्रकार उसका विरोध करना साहस का काम था, क्योंकि देवबंद मुगलों की एक छोटी-सी छावनी थी। लोगों ने सुल्हड़ मिश्र को बहुत समझाया और वैध उपायों का आश्रय लेने की सलाह दी, पर वे अपनी बात पर अटल रहे।
अंत में 200 चुने हुए ब्राह्मण अपनी-अपनी तलवार लेकर साथ चले। चिता जोड़ते ही मुगल सिपाही ने टैक्स माँगा, पर सुल्हड़ मिश्र के एक ही वार से उसका सर धड़ से अलग हो, खेलने लगा। दूसरे सिपाही ने दौड़ कर छावनी में ख़बर दी। सूबेदार ने 60 फ़ौजी सिपाहियों का एक जत्था इन लोगों को गिरफ़्तार करने के लिए भेजा, जो कि इन्हें 'असौजिये आम' के पास मैदान में मिला। संक्षिप्त-सी बातचीत के बाद तलवारें म्यानों से निकलीं और चमक उठीं। फ़ौजी सिपाही सचे हुए थे, पर इधर भी मर मिटनेवाले ब्राह्मण थे, फलतः घंटों टेढ़ घंटे की झपट में उन सिपाहियों को सदा के लिए सोना पड़ा। तब और सिपाही आए और उनका भी यही हाल हुआ।
दूसरे दिन प्रातः लोगों ने देखा कि सुल्हड़ मिश्र लापता है। शहर में उनकी कायरता की निंदा होने लगी, पर वे उस समय दिल्ली के पथ पर दौड़े जा रहे थे। जिस समय वे दिल्ली पहुँचे सौभाग्यवश सम्राट अकबर की सवारी निकल रही थी। कूद कर वे हाथी के सामने खड़े हो गए। सिपाही ने उन्हें हटाना चाहा, पर वे अड़ गए। सम्राट् का आदेश हुआ—कल दरबार में हाज़िर हो। दूसरे दिन दरबार पहुँचकर आपने इस अन्यायपूर्ण टैक्स की बात सुनाई। सम्राट ने उसे उठाने का आदेश दिया और सूबेदार के नाम एक परवाना लिखकर उन्हें दे दिया गया।
मौहर-दस्तख़त का परवाना लेकर दौड़े-दौड़े आप देवबंद आए। सारे शहर में ख़ुशी छा गई और लोगों ने सुल्हड़ मिश्र को हाथों हाथ उठा लिया। सूबेदार की रिपोर्ट भी बाद में दिल्ली पहुँची, पर सम्राट ने ब्राह्मणों के इस विप्लव को 'स्वाभाविक' कहकर टाल दिया; टैक्स हटाने का आदेश तो वे सुल्हड़ मिश्र के हाथों भेज ही चुके थे।
मुगल साम्राज्य के काग़ज़ात में यह परवाना है, या नहीं, इसे तो खोजी विद्वान् ही देख सकते हैं, पर देवीकुंड के मैदान में बनी मुगल सिपाहियों की सैकड़ों क़ब्रें आज भी सुल्हड़ मिश्र और उनके साथियों की बहादुरी के गीत गा रही हैं। वे आज नहीं हैं, पर देवीकुंड का स्मशान उनका अमर स्मारक है, जो रोज़ किसी न किसी को जीवन-कथा पर इति लिखकर भी उनकी यशोगाथा का अंत नहीं कर पाता!
are sulhaD, le upla, zarasi aag to le aa!
maan ki aagya uske liye vedavakya thi, upla lekar wo aag lene nikal paDa, par ghar ke dvaar se nikalte na nikalte uski vichar dhara aag aur uple se hatkar kisi dusri or badal gai. uske pair apna kaam karte rahe aur mastishk apna, par donon mein is samay koi samanjasya na tha. pairon ka kaam chalna hai, disha ka nirnay nahin; ye kaam mastishk ka hai, par mastishk us samay apni hi dhunmen tha. praayः chaar ghante tak mastishk apni dhun mein raha aur jab uski ye dhun tuti, to usne dekha ki sulhaD mishr apne ghar se aath kos door manglor pahunch ge hain.
dopahar ho gai thi, bhookh ka samay tha. is nagar mein sulhaD mishr ke ek yajman the, ve hathmen upla sanbhale unke ghar pahunche. yajman purohit ke darshan kar bahut prasann hua. baat ye hui ki us din somavti amavasya thi. shraddhalu yajman ne us din ek gaay daan ki thi aur wo use kisi mazdur ke dvara purohitji ke ghar bhejne ka prbandh soch raha tha.
purohitji ne yajman ke ghar bhojan kiya aur apni gaay bachhiya lekar laut paDhe. jis raah laute, usmen nadi paDi, purohitji sirf ek dhoti pahne the. bhigne ke bhay se use nikal kar aapne apne sir par lapet liya aur baliya ko kandhe par le, nadi paar ki, par nadi paar karte na karte apaki vichar dhara phir kisi or ja bhiDi aur phalatः nadi paar kar aap bachhiya ko kandhe se utarna aur dhoti pahanna, donon kaam bhool ge aur usi roop mein apne ghar pahunche!
raste mein mazak mein logon ne puchha—mishrji! niche kya hai? par aap apne dhyaan mein the. bole—gay ke niche bachhiya hai!
mane dekha uska agyapalak putr, jo pratःkal aag lene gaya tha, shaam ko gaay aur bachhiya liye nangabhut bana uske angan mein khaDa hai. uske is pagalpan par kheej kar mane zara tezi ke svar mein kaha—are, tujhe yon nanga hote sharm nahin lagi! ab aapko apne roop ka dhyaan hua. bahar ki or usi roop mein lautte lautte aapne kaha—oh maan main nadi par dhoti bhool aaya hoon, abhi lata hoon!
aur sir par kya bandha hai? mishrji ne si rase utaar kar dhoti pahni aur tab pura qissa maan ko sunaya. maan ke hriday ka vatsalya bhartasna ki jhiDkiyon ke roop mein apne is yuvak darshanik putr par baras paDa, par ye baat putr ke liye koi nai to na thee!
is albele darshanik ka ann saharanpur zile ke devband namak prasiddh qasbe mein hua tha. janm ki tithi ka bata sakna to asambhav hai, par itna nishchit hai ki us samay samrat akbar dilli ke sinhasan par asin the.
sulhaD mishr sanskrit ke prkaanD panDit the, jivan bhar ve brahamchari rahe aur unhonne apni is darshanikta se apne aas paas ke vatavran ko sada hasyamay rakha. unhen mare shatabdiyan guzar gai, par apne madhur sansmarnon ke roop mein devband aur uske aas paas ke dehat mein ve aaj bhi jivit hain aur buDhe baba aaj bhi raat ke samay unki kahani apne bachchon ko sunaya karte hain.
ve jab tak jiye apne nagar ke sardar rahe aur sari samasyayen apni teekshn pratibha aur turant buddhi ke dvara suljhate rahe. nagar mein koi baat aati, log dauDkar unke paas aate aur ye namumkin tha ki vahan uska il na hota. ve apne nag rake lalabujhakkaD the!
devband mein devikunD par kashi ke vidvanon ka ek dal aakar thahra. vidya vyasan ka yug tha—shastrarth mein vijay hi un dinon panDitya ki kasauti thi. aagat vidvanon ne shastrarth ka nimantran diya. devband apne vidvanon ke liye us din prasiddh tha. anek panDit shastrarth ke liye vahan pahunche, par parajit hokar laute. kashi ka ek vidvan aisa bhayankar tarkik tha ki koi jam hi na saka. nagar ka samman khatre mein paDne laga—vidvanmanDli mein chinta chha gai. ikatthe hokar log nagar ke sarve sarva panDit sulhaD mishr ke ghar pahunche. pura samachar sunkar aapne dusre din shastrarth ke liye chalna svikar kar liya.
iski suchana un panDiton ke paas bhej di gai aur likh diya gaya ki kal shri sulhaD mith se aapka shastrarth hoga. ve nagar ke guru hain aur yadi aapne unhen parajit kar diya, to nagar vijay ka prmaan patr aapko de diya jayega. kashi ke panDit baDe prasann hue.
dusre din dopahar baad sulhaD mishr baDa dhota baDa potha, panDtaः pagDa baDa ka sakshat udahran bankar devikunD pahunche. praayः chaar sau vidvan unke pichhe the aur hazaron nagarik darshak bhi. sanskrit mein kushal mangal ki baten hone lagin. beech mein sulhaD mishr ne ek vakya kaha—prachlatyadya hava—aj hava bahut chal rahi hai. kashi ke panDit ne hava ke prayog par apatti kee; kyonki ye sanskrit shabd nahin hai. mishr jine ise shuddh sanskrit shabd bataya, par kashi ka panDit isse sahmat nahin hua. vivad ko shaant karne ki mudra mein mishr ji ne kaha—achchha jane dijiye ise; aap gananan tvaa mantr sunaiye.
panDitji ne tanmayta ke saath uchch svar mein paDhna shuru kiya—ॐ balidan hoga. isliye jo bhai laDne marne ko taiyar hon, ve talvar lekar chalen aur agar koi taiyar na ho, to main
apni maan ko ek gathri mein baandh kar le jaunga aur akela hi ye kaam karunga.
hindu is taiks se dukhi the, par is prakar uska virodh karna sahas ka kaam tha, kyonki devband muglon ki ek chhoti si chhavani thi. logon ne sulhaD mishrko bahut samjhaya aur vaidh upayon ka ashray lene ki salah di, par ve apni baat par atal rahe.
ant mein 200 chune hue brahman apni apni talvar lekar saath chale. chita joDte hi mugal sipahi ne taiks manga, par sulhaD mishr ke ek ho varse uska sar dhaD se alag ho, khelne laga. dusre sipahi ne dauD kar chhavani mein khabar di. subedar ne 60 phauji sipahiyon ka ek jattha in logon ko giraftar karne ke liye bheja, jo ki inhen asaujiye aam ke paas maidan mein mila. sankshipt si batachit ke baad talvaren myanon se niklin aur chamak uthin. phauji sipahi sache hue the, par idhar bhi mar mitnevale brahman the, phalatः ghanto teDh ghante ki jhapat mein un sipahiyon ko sada ke liye sona paDa. tab aur sipahi aaye aur unka bhi yahi haal hua.
dusre din praatः logon ne dekha ki sulhaD mishr lapata hai. shahr mein unki kayarta ki ninda hone lagi, par ve us samay dilli ke path par dauDe ja rahe the. jis samay ve dilli pahunche saubhagyvash samrat akbar ki savari nikal rahi thi. kood kar ve hathi ke samne khaDe ho ge. sipahi ne unhen hatana chaha, par ve aD gaye. samrat ka adesh hua—kal darbar mein hazir ho. dusre din darbar pahunchakar aapne is anyaypurn taiks ki baat sunai. samrat ne use uthane ka adesh diya aur subedar ke naam ek parvana likh kar unhen de diya gaya.
mauhar dastkhat ka parvana lekar dauDe dauDe aap devband aaye. sare shahr mein khushi chha gai aur logon ne sulhaD mishr ko hathon haath utha liya. subedar ki riport bhi baad mein dilli pahunchi, par samrat ne brahmnon ke is viplav ko svabhavik kahkar taal diya; taiks hatane ka adesh to ve sulhaD mishr ke hathon bhej hi chuke the.
mugal samrajya ke kaghzat mein ye parvana hai, ya nahin, ise to khoji vidvan hi dekh sakte hain, par devikunD ke maidanmen bani mugal sipahiyon ki saikDon kabren aaj bhi sulhaD mishr aur unke sathiyon ki bahaduri ke geet ga rahi hain. ve aaz nahin hain, par devikunD ka smshaan unka amar smarak hai, jo roz kisi na kisiko jivan katha par iti likhkar bhi unki yashogatha ka ant nahin kar pata!
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हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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