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रससिद्ध कवीश्वर:सनेही जी

rassiddh kavishvarahasnehi ji

अमृतलाल नागर

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रससिद्ध कवीश्वर:सनेही जी

अमृतलाल नागर

और अधिकअमृतलाल नागर

    अख़बारों में आचार्य सनेही जी के अस्वस्थ होकर अस्पताल में भरती किए जाने का समाचार पढ़ा। जी चाहा कि जाकर उनके दर्शन कर आऊँ पर 'गृह कारज नाना जजाला' में फँसकर घर से दो क़दम दूर कानपुर तो जा पाया, हाँ कार्यवशात् दो दिनों के लिए दिल्ली ज़रूर पहुँच गया। मनोहर श्याम जोशी ने कहा, आप तो इतने पास रहते हैं, एक दिन हमारे लिए सनेही जी से मिल आइए। सुनकर लगा कि नई पीढ़ी मेरी मलामत कर रही है। कवि होने पर भी पूज्य सनेही जी महाराज ने मुझे स्नेह प्रदान किया है। हिन्दी-भाषी समाज के प्रति उनके बड़े उपकार हैं। आधुनिक विराट कवि सम्मेलनों की परंपरा के इस बाबा आदम ने हमारे जनसाधारण के मानस को केवल राष्ट्रवादी भावधारा ही से आप्लावित किया बल्कि खड़ी बोली की कविता वो भी प्रतिष्ठा दिलाई। 'सुकवि' संपादक के रूप में सनेही जी ने उन दिनों सुकवियों की एक अच्छी-ख़ासी बटालियन ही अँग्रेज़ों और हमारे अज्ञान से मोर्चा लेने के लिए खड़ी कर दी थी। सनेही-त्रिशूल के गीत राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों में निकलने वाली प्रभात-फेरियों मे ख़ूब गाए जाते थे।

    वाग्देवी ने मुझे कवि होने का वरदान नही दिया। इस कमी को मैंने कविता का पाठक और श्रोता बनकर पूरा किया है। पढ़ने का शौक मुझे बचपन से ही है, अकेले में सस्वर काव्य-पाठ करने में मुझे बड़ा आनंद मिलता। एक समय में अनेक अच्छे-अच्छे कवियों की अनेक रचनाएँ मुझे याद भी थी। पूज्य सनेही जी की एक बहुत पुरानी कविता 'अशोक वाटिका में सीता' की कुछ पंक्तियाँ इस समय भी याद रही हैं :

    मनोहर लंकपति की वाटिका थी,

    प्रकृति रंगस्थली की नाटिका थी।

    महा छवि जाल फूलों के चमन थे,

    उलझते भौंर-से जाकर नयन थे,

    घटा घनघोर घिरती रही थी,

    हरित छवि हर दिशा मे छा रही थी।

    सखी ने जब कहा, घनश्याम आए,

    नयन खोले समझ कर राम झाए,

    जिधर देखो उधर ही श्याम छवि थी,

    हृदय मे भी भरी श्रीराम छवि थी।

    इसी तरह कर्ण की मृत्यु पर दुर्योधन के विलाप वाली उनकी कविता की कुछ पंक्तियाँ भी मुझे अब तक याद है

    नभ असित धरा पै काल-सा छा रहा था,

    रविरथ द्रुतगामी भागता जा रहा था।

    खग मृग अकुलाए भीत-से हो रहे थे,

    शिव-अशिव कुवाणी बोलते रो रहे थे।

    पं. गयाप्रसाद शुक्ल सनेही, यह नाम हिंदी-भाषी क्षेत्र में विशाल जन-समूह वाले कवि सम्मेलनों की परंपरा के महान संस्थाकों में शीर्षस्थ है और अमर भी। अपने लोकप्रिय 'सुकवि' पत्र के द्वारा भी जन-मन में खड़ी बोली के संस्कार जगाने और नई भाव-चेतना प्रतिष्ठित करने में श्रद्धेय सनेही जी प्रात स्मरणीय आचार्य द्विवेदी जी महाराज के कमांडर-इन-चीफ़ रहे हैं। सनेही जी के नेतृत्व में होने वाले पुराने कवि सम्मेलनों में, जन-समुद्र की एक बूँद बनकर, उन्हे देखने-सुनने का मुझे अनेक बार सौभाग्य-लाभ हुआ था। उस समय की जन-धारणा यह थी कि आचार्य सनेही जी जिस कवि-सम्मेलन में अपनी नवरत्नवत् शिष्य मंडली लेकर पहुँच जाए, वहाँ फिर और कोई पहुँचे या पहुँचे रसगंगा बहेगी ही।

    आचार्य का त्रिशूल रूप भी, किसी अगले ज़माने में सही समाजवादी दृष्टिकोण से लिखने वाला जन साहित्य का कोई इतिहासकार अवश्य ही बड़े आदर से याद करेगा, भले ही आज की बौद्धिक अराजक्ता में उसे भुना दिया गया हो। प्राणवंत भावों और शब्दों का सोमरस पिलाकर त्रिशूल जी ने हज़ारों-लाखों लोगों को स्वतनोन्मत्त देशभक्त बनाया था। निशूल जी के अनेक गीत आंदोलन-काल की प्रभात-फेरियों में गाए जाते थे। सन् 24 में 'माधुरी' के तीन अंकों में उनकी एक लंबी कविता 'आईन हिन्द' प्रकाशित हुई थी, जो हिंदी के साथ ही साथ उन्हें उर्दू शैली के कवियों में भी उच्च आसन पर प्रतिष्ठित कर देती है। 'आईन हिन्द' पढ़कर मन आज भी फरहार हो उठता है। अपनी इस कविता को उन्होंने तीन खंडों में बाँटा है हम अब क्या है, और आगे हम क्या होने वाले है। अपना लोभ संवरण कर पाने के कारण हर प्रश्न-विभाग के कतिपय अंशों को यहाँ उद्धृत रहा हूँ...

    वे भी दिन थे कभी, दम भरती थी दुनियां अपना,

    था हिमालय की बलदी पे फरेरा अपना।

    रंग अपना था जमा, बैठा था सिक्का अपना,

    कोई मैदाँ था, वहाँ बजता या डंका अपना।

    हमसरी के लिए अपनी कोई तैयार था,

    काम अपने लिए कोई, कहीं दुश्वार था।

    ख़ुशबयाँ ऐसे थे, जादू का असर रखते थे,

    कोई फ़न बाक़ी था, इल्मो हुनर रखते थे।

    हम किसी का कभी ख़ौफ़ो ख़तर रखते,

    दिल बला का, तो क़यामत का जिगर रखते थे।

    कोई शमशेरी-क़लम में था सानी अपना,

    पानी-पानी हुए दुश्मन, वो था पानी अपना।

    दफ़अतन् रंग ज़माने का कुछ ऐसा बदला,

    भाई-भाई से भिड़ा बाप से बेटा बिगड़ा।

    ख़ानाजंगी से हुई घर में क़यामत वरपा,

    एक को दूसरा खा जाने को तैयार हुआ।

    तीन तेरह हुए जब हिंद में यों फूट पड़ी,

    सारी दुनियां की मुसीबत भी यहीं टूट पड़ी।

    छाई ग़फ़लत, तो उसे मुल्क ने मस्ती समझा,

    चीज़ बेहद जो गराँ थी, उसे, सस्ती समझा।

    होता वीरान गया बसती है बस्ती समझा,

    पस्त होता गया लेकिन नहीं पस्ती समझा।

    ग़ार में जाके पड़ा अब है निकलना मुश्किल,

    ऐसा बीमार है, जिसका है सँभलना मुश्किल।

    मादरे हिंद के बच्चों पै मुसीबत आई,

    गोलियाँ गन से चलीं, भोर क़यामत आई,

    खोले घूँघट गए, यों ख़तरे में इज़्ज़त आई,

    हाय अफ़सोस नहीं फिर भी तौ ग़ैरत आई।

    उनके पैरों पे रही, रक्खी जो पगड़ी हमने,

    पेट के बल चले और नाक भी रगड़ी हमने।

    क़ौम की आँखों से पर्दा-सा लगा हटने अब,

    श्री तिलक जी जो डटे लोग लगे डटने अब।

    मुल्क जब नशे में आज़ादी के सरशार हुआ,

    आगे गाँधी जी बढ़े, प्रेम का अवतार हुआ,

    दिल में फिर पैदा स्वदेशी के लिए प्यार हुआ,

    तारे ज़र फिर हमें चखें का कता तार हुआ।

    सिक्का मलमल की जगह बैठ गया खादी का,

    हर तरफ़ शोर मचा मुल्क में आज़ादी का।

    मुत्तफ़िक़ होके मुक़ाबिल में जुज़ोकुल आए,

    कोई भी ईजा हो मरने के लिए गुल आए।

    होंगे आज़ाद यही कहते हुए गुल आए,

    फूल काँटों में खिंचे दाम में बुलबुल आए।

    पाँव रखना हुआ दुश्वार, हुआ यह रेला,

    लग गया जेल में याराने वतन का मेला।...

    इस त्रिशूल को भुलाकर कोई स्वाधीन राष्ट्र भला जी सकता है?

    कानपुर पहुँचने पर ललित (प्रा. ललितमोहन अवस्थी) ने मुझे बताया कि सनेही जी अब पहले से काफ़ी स्वस्थ हैं। उनका वज़न भी बारह पौंड बढ़ा है। वह ख़ूब प्रसन्न हैं, कहते थे, 'अब तो मैं फिर से कविता लिखने लायक़ हो चला हू। ललित, इस बार त्रयोदशी के दिन हमारे जन्म-दिवस पर यही अस्पताल मे एक कवि सम्मेलन होना चाहिए। डॉक्टर लोग बेचारे बड़े भले है, वे यहाँ सब इंतज़ाम कर देंगे। ये बातें सुनकर मन को बड़ा संतोष हुआ, लेकिन अस्पताल पहुँचने पर मालूम हुआ कि उनकी तबियत फिर पलट गई है। वह ग़फ़लत में पड़े है। दस्तो से कमज़ोरी बढ़ गई। कल तो सारे दिन उन्होने आँख भी नही खोली थी। सनेही जी की पुत्री कृष्णाकुमारी जी के मुख पर चिंता की गहरी छाप थी। मैंने ललित से कहा कि एक बार दूर से उनके दर्शन करना चाहता हूँ। सनेही जी के पुत्र मोहनप्यारे जी तुरंत हमें भीतर लिवा ले गए।

    महाराज सो रहे थे। आँखों पर चश्मा चढ़ा हुआ था, चेहरा निर्विकार था। यद्यपि उनका शरीर अब पहले से अधिक कृश हो गया है, तदापि चेहरे पर वही पुराना कसाव, वही रोब है।

    कल से बस इसी तरह पड़े हैं। आज तो बीच-बीच मे आँखें खुलती भी हैं, पर कल सारे दिन बेहोश रहे। ग्लूकोज चढ़ा, इंजेक्शन लगे, और कैप्सूल भी जाने काहे के दिए जा रहे हैं।

    कल तो आँख ही नही खोली। दस्त भए, पर इन्हें जर का होस नही था। इधर ऐसे चिंतन हुए गए रह कि क्या बतावै। दुई-दुई पाउंड करि के सौलह पाउंड वज़न बढ़ा रहा इनका।

    भाई-बहन की बातें कानों में पड़ रही थी। पर दृष्टि सनेही जी महाराज के चेहरे पर ही टिकी रही।

    चालीस-बयालीस वर्ष पहले उन्हें एक कवि सम्मेलन में पहली बार दूर से देखा था। वह भरा-पूरा काली मूँछों वाला रोबीला चेहरा याद आया। ग्यारह वर्ष पहने उन्होंने अपने संबंध में लिखा था :

    विश्व में विचारों के विचरता रहा विवश,

    बस गया वहीं पे रहा मन बस का।

    कंठों में विराजा रसिको के फूलमाला हो के,

    कुटिल कलेजो मे 'त्रिशूल' हो के अटका।

    धाराधर विपदा के बरसे सहस्रधार,

    तो भी मेरा धीरज घराधर धसका।

    चसका वही नवरस का है 'सनेही' अभी,

    टसका नहीं मैं हूँ पछत्तर बरस का।

    श्रावण शुक्ला 13 के दिन वह अपनी वय के 86 वर्ष पूरे करने 87 वें में प्रवेश करेंगे, पर ऐसा नहीं लगता कि वह अब भी कहीं से तनिक भी टसके हैं। मोहनप्यारे जी ने जब उनका चश्मा हटाया, तब उनकी आँखें खुल गई। बाईं और नजर गई, ललित को देखा, अच्छा तुम आए हो। फिर इधर दृष्टि घूमी, बहन जी ने उनरे कान के पास मुँह ले जाकर कहा, नागर जी आए है।

    हूँ पहचान लिया। चेहरे पर स्नेह-स्निग्धता आई। अपने काले वालो वाले सिर को खुजलाया फिर मेरी ओर देखने लगे, मुस्कुराकर कहा, मुझे कोई रोग नहीं है। बस, खड़ा नही हो पाता, पैर लड़खड़ाते हैं।

    मैंने उनके कान के पास मुँह ले जाकर कहा कि यह कमज़ोरी भी शीघ्र ही दूर हो जाएगी।

    सनेही जी बोले, कुछ समझ में नही आया। बिटिया की बात सुनाई पड़ जाती है। बिटिया बिटिया जी ने झुककर उनसे मेरी बात कही। मोहनप्यारे जी उनकी सुनने की मशीन लाए, उनके कान में लगाई, पर उससे उन्हें लाभ हुआ। 'बिटिया जी' के माध्यम से ही बात आगे बढ़ी। मैंने कहा, आचार्य द्विवेदी जी की जन्म-शताब्दी के अवसर पर दौलतपुर में आपके दर्शन हुए थे।

    हाँ, हम गए थे। पर द्विवेदी जी के पास चेले नहीं गए थे। हमने अपना कर्तव्य निभाया। फिर रुकरर कहा, 'द्विवेदी जी ने बड़ी सेवा की। यह सब उन्हीं का वैभव है। वह ऐसी को भी बढ़ा गए जो पद्य तो अवश्य लिख लेते थे, पर कविता नहीं लिख पाते थे। मैंने काव्य रचा है।

    आवाज़ में वही दमसम है। स्मृति अब भी चुस्त-दुरुस्त है। मूड़ में आकर कुछ पुराने संस्मरण सुनाने लगे। मैंने डायरी खोली तब बोले—ये सब बातें कही छपा मत दीजिएगा। कहकर हँसे। बिटिया जी के माध्यम से मैंने उन्हे आश्वासन दिया। गाड़ी आगे बढ़ी।

    अपने दाहिने हाथ पर बायाँ हाथ फेरते हुए बोले, बीमारी-वीमारी कुछ नहीं। कल ज़रा निढाल हो गया था, बाक़ी अभी तक तो हम मालिश कराते रहे, साबुन लगाकर नहाते रहे। बीमारी क्या, बुढ़ापा बढ़ रहा है।... होता ही है।... फिर आँखों में चमक आई, चेहरा खिला, कहने लगे, वेणीमाधव खन्ना पुरस्कार मिला करता था उन दिनों। एक बार निर्णायक कमेटी में टंडन जी थे, हम थे और...और... तीसरा नाम याद आया। थोड़ी देर तक अपनी स्मृति से उलझते रहे, फिर आगे बढ़ गए, तीन ही कवि भी थे जिनकी कविताओं का निर्णय होना था। शंकर जी—नाथूराम शर्मा 'शंकर', हमारे अनूप थे, और राधावल्लभ 'बंधु' थे। टंडन जी ने कहा कि सिद्धांत की बात है, शंकर जी को पुरस्कार मिलना चाहिए। ख़ैर, मिल गया। फिर अनूप ने हमसे कहा कि निर्णायकों को कविता का ज्ञान नहीं है। हमने कहा कि पंद्रह दिनों में तुमसे अच्छा कवि बना सकते है। और हमने जो कहा सो कर दिखलाया। हितैषी को बना दिया। वैसे अनूप भी अच्छे कवि थे। उनके पिता भी अच्छे कवि थे। अनूप मिडिल स्कूल में पढ़ते थे। मुंशी कृपादयाल निगम उन्हे लेकर हमारे पास आए थे। घनाक्षरिया अच्छी लिखी अनूप ने। हितैषी भी बहुत माजकर लिखते थे। दोनों तगड़े थे। दोनों ही हमारे सामने चले गए।

    ललित ने उठकर उनके कान में कहा, अब आपके जन्म-दिवस पर यहाँ कवि-सम्मेलन होगा।

    हाँ।...अच्छा है। 'डॉक्टर सब बड़े भले हैं बेचारे। सरकार ने हमारा यह प्रबंध करके बड़ा उपकार किया।...हितैषी सौ रुपया महीना वधवा गए थे सो वह भी आता है।

    मैंने कहा, देश पर आपके इतने उपकार हैं कि उनको देखते हुए आपको मिलनेवाली ये सुविधाएँ नगण्य-सी लगती हैं। सुनकर चुप हो गए, चेहरे पर संतोष आया।

    हम लोग काफ़ी देर बैठे। एक बार उठना चाहा, तो बैठा लिया फिर पुराने संस्मरण चले। अपने पुरवले जन्म के जाने किस पुण्य के कारण मुझे भी कविगुरु का सहज स्नेह प्राप्त हो गया है। जब कभी दर्शन पाए, सदा उनसे स्नेह, ज्ञान और प्रेरणा की प्रसादी लेकर ही लौटा। वे बींसवी सदी में होने वाले हिंदी साहित्य के विकास के जीवित इतिहास हैं। यदि उनके आसपास रहने वाले समझदार नौजवान उनसे पुरानी बातें सुनकर लिख लें तो हमारे इतिहास की बहुत-सी बहुमूल्य सामग्री सुरक्षित हो जाए। सनेही जी की स्मरणशक्ति अद्भुत है। कानपुर के कोई धनी हिंदी प्रेमी यदि लगन के साथ उन पुरानी बातों को टेप पर रिकॉर्ड करा लें तो और भी अच्छा हो।

    हमारे निराला जी भी सनेही जी के प्रति बड़ी श्रद्धा रखते थे। एक बार उत्तर प्रदेश सरकार की एक शिक्षा फ़िल्म डॉक्यूमेटरी के लिए, तत्कालीन शिक्षा प्रसार अधिकारी और सुकवि श्री द्वारकाप्रसाद माहेश्वरी निराला जी के कविता-पाठ का सवाक् चलचित्र बनाने की इच्छा से मुझे और डॉ. रामविलास शर्मा को सिफ़ारिश करने के लिए उनके यहाँ ले गए। हमारी प्रार्थना पर आशुतोष निराला जी कृपापूर्वक सदय भी हुए। तब अपनी कविताओं के अलावा उन्होंने विवेकानंद, रवींद्रनाथ और बहादुर शाह ज़फ़र की रचनाओं के बाद सनेही जी की एक कविता भी सुनाई थी।

    पूज्य सनेही जी महाराज 86 वर्ष के नौजवान है। वे पुराने भारत की सदाबहार जवानी के जीते-जागते रहस्य है। इस बीमारी में भी वही तेवर, वही दमखम और मुस्कुराहट उनके व्यक्तित्व की दिव्य शोभा बनी हुई है। पाँच वर्ष पूर्व आचार्य द्विवेदी जन्मशती समारोह के अवसर पर मैंने दौलतपुर में उनके दर्शन किए थे। शाम को पंडाल के बाहर टहलते हुए उन्होंने एकाएक मेरी ओर घूमकर कहा, आपने जब मुझे अस्पताल में देखा था तब भी मैं मुसकुरा रहा था और देखिए, अब भी मुसकुरा रहा हूँ। इस बार फिर अस्पताल में ही भेंट हुई, लाख लट चुके है मगर मुस्कुराहट अब भी जवान है। उनकी अपराजेयता, उनका यह 'धीरज धराधर' अब भी अडिग है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : जिनके साथ जिया (पृष्ठ 22)
    • रचनाकार : अमृतलाल नागर
    हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी

    हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी

    ‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।

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