अपनी तीन वर्ष की होश को ज़रा सँभालकर उन्होंने अपने आस-पास झाँका, तो वे सहम गए। माँ-बाप मर चुके थे और उनका पालन-पोषण उनके चाचा-चाची की देख-रेख में हो रहा था। उनके बचपन के संस्मरणों का सार है, बच्चे खिलाना, मार खाना, कुछ न कहना और सब कुछ सहना। यह कितना अद्भुत है कि इसी दमघोंटू वातावरण में उन्होंने अपने स्नेही बाबा से ग्यारहवें वर्ष में पैर रखते-न-रखते कर्मकांड की कामचलाऊ शिक्षा पा ली और इससे भी अद्भुत है यह कि इस नरक-कुंड में पलकर जो बालक निकला, उसके रोम-रोम में व्याप्त मिला मानव का प्रेम, सभी तरह के भेद-भावों से ऊपर जीवन के कण-कण में छाई ममता और ईश्वर-विश्वास। ओह, ऐसा कि संतों को भी ईर्ष्या हो! यह थे मेरे स्वर्गीय पिताजी श्री पंडित रमादत्त मिश्र।
प्लेग में बड़े भाई की मृत्यु हुई, तो शहर रो पड़ा, पर वे चार बजे श्मशान से लौटे, पाँच बजे गाय की सानी की, सात बजे उसे दुहा, 7 बजे ठाकुरजी की आरती की और नौ बजे गर्म दूध के दो गिलास लेकर माँ के पास पहुँचे 'ले दूध पीले और बहू को भी पिलादे!'
वे दूध-मिसरी तो माँ लाल मिर्च। चिल्लाकर बोली—'मेरा तो घर जल गया और तुम्हें दूध-मलाई सूझ रही है!'
स्वर में कहीं उद्वेग नहीं। बोले—'बिना खाए कौन जिया है बावली! मैं आज कह रहा हूँ, तू परसों खाएगी। बस तीन दिन का आगा-पीछा है।' अपने कमरे में लौट आए और दूध पीकर सो गए। रात भर उनका गुर्राटा सबने सुना और ठीक साढ़े चार बजे उनकी मधुर, तल्लीन स्वर-लहरी सदा की भाँति कानों में पड़ी—'पवन मंद सुगंध शीतल, हेम मंदिर शोभितम्; श्री निकट गंगा बहत निर्मल, बद्रीनाथ विश्वग्भरम्!'
***
छोटे भाई को एक संबंधी ने बहकाकर नहर में डुबा दिया। वे सब कुछ जानते थे, पर पुलिस से कहा—'नहाने घुसा, पैर रपट गया, मेरा भाग्य दारोगाजी, शक किस पर करूँ?'
माँ बहुत झल्लाई—'उस संडे को फाँसी चढ़ता देखकर मेरी छाती में ठंडक पड़ जाती, तुम्हें यह भी अच्छा न लगा।'
वही शांत स्वर 'अब आग एक घर में है, फिर दो में लग जाती; इससे क्या फ़ायदा?'
***
एक कोठा उन्होंने ख़रीद लिया। ख़रीद क्या लिया, मालिक ने उन्हें थोड़े-से रुपयों में दे दिया। कुटुंब के दूसरे धनी सदस्य उसे अधिक रुपयों में भी ख़रीदना चाहते थे, पर उन्हें वह न मिला।
पिताजी भोजन के लिए आसन पर बैठे कि अपने आदमियों के साथ, लाठियाँ लिए वे आ धमके और मारने की धमकियों के साथ, गालियों का एक दौंगड़ा-सा बरसा दिया उन्होंने।
वही उद्वेगहीन स्वर—'आओ भाई, पहले भोजन कर लो फिर मार लेना।'
गालियों की एक और बौछार उन पर पड़ी, तो बोले—'तुम बहुत हो, मैं इकला हूँ। भागा मैं कहीं जा नहीं रहा। आओ पहले खाना खालें!' जवाब में कुछ हुँकारें, कुछ फुँकारें और गालियों की कुछ तगड़ी बौछारें उन पर पड़ीं। अब उन्होंने गले से माला निकाल ली, आँखें बंद; नमः शिवाय, नमः शिवाय!
दस-पाँच मिनट बक-झक कर वे चले गए। माँ बोली—'वे बकते रहे, तुमने उन्हें जवाब तक नहीं दिया। मैं तुम्हारा लिहाज़ कर गईं, नहीं तो सिंडासी से गला पकड़कर जलती लकड़ी से चुनती नाशगयों को!'
वाक़ई वह ऐसी थी। पिताजी ने माला गले में डाली। बोले—मैं बोलता, वे और खड़े रहते। खाने का स्वाद आधा तो गया ही, वह बिल्कुल ही ठंडा हो जाता। ला परोस जल्दी!'
***
बहन का विवाह सिर पर था और पास में पैसा नहीं। सगाई के दिन ही 6 उधार मँगाकर काम चलाया। सबने कहा—जब पास पैसा नहीं, तो ठहर जाओ-अगले साल शादी हो जाएगी।
बोले—'अगले साल और इस साल का फर्क तो वे जानें, जिनके घर कहीं से धन आने की संभावना हो। मेरी लड़की की शादी तो इस साल भी ठाकुरजी करेंगे और अगले साल भी। उनके भंडारे में सब कुछ है, तुम फिकर मत करो!'
उसी दिन शाम को अचानक उन्होंने माँ से बड़ी थैली माँगी। वह समझी, कहीं से रुपए ले आए हैं। चुपके से तीन रुपए रखकर थैली माँ को लौटा दी। यह जल उठो 'इन्हीं तीन रुपल्लियों पर शादी करोगे लड़की की?'
बोले—'बावली, तेरी लड़की का कारन हो जाएगा और ये तीन रुपए बच्चे रह जाएँगे। तू नहीं जानती, ठाकुरजी की भुजा बड़ी लंबी है।'
समय जा रहा है, घड़ी आ रही है, पर ठाकुरजी की लंबी भुजा का कोई प्रमाण मिल नहीं रहा। माँ के प्राण सूख रहे हैं, पर पिताजी के चेहरे पर वही हँसी, वही चार बार रोज़ चाय, वही आरती और वही नींद! माँ जब-जब उन्हें कोंचती है, कह देते हैं—'मैंने अपना काम कर दिया, ठाकुरजी अपना काम करेंगे।' ठाकुरजी ने अपना काम नहीं किया और विवाह के 13 दिन रह गए। माँ का चेहरा पीला पड़ गया। अचानक तार आया—पिताजी के एक यजमान शिव पुराण की कथा सुनने को उन्हें बुला रहे हैं। यजमान डिप्टी कलक्टर थे। कथा पर पंद्रह सौ रुपए चढ़े। पिताजी दस दिन बाद घर लौटे, माँ झक रह गई।
धूमधाम से शादी की। लड़की अपनी सुसराल से लौटी, तो अन्नपूर्णा का भोज भी हुआ। शाम को पिताजी ने फिर थैली देखी। समय की बात उसमें 9 रुपए थे। 6 का ऋण उतार दिया; आगे बचे तीन! माँ से बोले—'तेरी लड़की के सब काम हो गए कि नहीं? फिर भी बचे रहे वे ही तीन! तुम लोग झट विश्वास छोड़ बैठते हो। मैं कहता न था कि ठाकुरजी की भुजा बड़ी लंबी है।'
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वे पंडित भी थे और चिकित्सक भी। एक दिन सात रुपए उनके पास आए और सातों उन्होंने ख़र्च कर दिए। माँ बहुत नाराज़ हुई कि 'कल त्योहार है, सवेरे-ही-सवेरे पूजा के लिए एक रुपया चाहिए, कहाँ से आएगा?' वही पेटेंट जवाब 'सब ठाकुरजी देंगे!' जवाब से माँ को संतोष न हुआ—'देखूँगी, दिन निकलते ही ठाकुरजी कैसे देते हैं?'
बात यह थी कि पिताजी सवेरे बहुत जल्दी भोजन करके घर से निकलते थे, पर कल भोजन हो सकता था पूजा के बाद और पूजा की कुंजी थी एक रुपया। पिताजी भी यह जानते थे, पर बोले—'खैर देख लेना, ठाकुरजी की भुजा बड़ी लंबी है।'
तड़क में चार बजे एक रोगी का बुलावा आया और दो रुपए लेकर वे लौटे। आते ही बोले—'यह लो एक रुपया पूजा का और एक ऊपर के ख़र्च का। यों ही हाय-हाय मचा देते हो तुम लोग!'
अपने ठाकुरजी में उनका अखंड विश्वास था और वाक़ई उनकी भुजा बड़ी लंबी थी। मैंने उन्हें कभी भय से विह्वल, निराशा से अस्तव्यस्त और क्रोध से क्षुब्ध नहीं देखा!
***
मानव के प्रति निष्काम ममता उनकी अपनी चीज़ थी। जो घासवाला उनकी गाय के लिए घास लाता, उसे चाय पिलाई जाती और यजमानों के यहाँ से आई-गई सुहाली-मिठाई अवश्य दी जाती। अगर वह बूढ़ा होता, तो उसे ज़रा-सी अफ़ीम की गोली भी वे दे देते। यह सब उन्हें अपनी शीतल पाटी पर बैठाकर किया जाता और इसके लिए वे अपना ही गिलास काम में लाते। इसके बाद न बर्तन में आग डाली जाती, न घर में गंगा जल छिड़का जाता। शहर के पंडित कहा करते—'रामा भिस्सर का तो भभेक भिरस्ट हो गया है!'
एक बूढ़े घासवाले ने कहा—'पंडितजी, हमें एक रजाई दे दो।' तब भादवे की भयंकर गर्मी पड़ रही थी। आश्चर्य से वे बोले—'अरे, आजकल रजाई क्या करेगा? बात यह थी कि बूढ़े ने पिछली सर्दियाँ मुश्किल से काटीं थीं, अगली सर्दियों के लिए यह अभी से चिंतित था। पिताजी ने सर्दियों में उसे एक रजाई देने का आश्वासन दे, विदा किया।
दीवाली पर जब उन्होंने अपने लिए रज़ाई निकाली, तो उस बूढ़े के लिए भी एक रज़ाई ठीक कराकर रख दी; पर वह बूढ़ा न आया। मैंने देखा कि वे बेचैन थे और बार-बार सबसे उस बूढ़े को पूछते थे! हमें उनकी बेचैनी पर हँसी आती थी और कभी-कभी झुँझलाहट भी 'उसे सौ बार गरज होगी तो आएगा, नहीं तो आप क्यों परेशान हैं!' वे कहते—'अरे भाई, वह बेचारा मालूम होता है, घर भूल गया है। नहीं तो वह ज़रूर आता!'
एक दिन वे घासमंडी जा पहुँचे और दो घंटे तक वहाँ खड़े रहे, पर वह बूढ़ा उन्हें न मिला। तब दूसरे घासवालों से उन्होंने उनके गाँव पूछे।
अंत में उस बूढ़े के गाँव का एक दूसरा घासवाला उन्हें मिल गया। उसके हाथ उन्होंने बूढ़े को ख़बर भिजवाई। ख़बर ले जाने के लिए भी उसे दो आने दिए। दूसरे दिन बुख़ार में हिलहिलाता वह बूढ़ा आया। सचमुच वह घर भूल गया था। पिताजी ने उसे अपने हाथों रज़ाई उड़ाई, चाय पिलाई और दवा दी। शाम को जब मैं बाहर से आया, तो बहुत ख़ुश होकर बोले—'ले भाई, आज हमारा वो काम हो गया।'
'क्या काम जी ?'
'वो बूढ़ा आया था, रजाई ले गया।' वे ऐसे ख़ुश थे कि जैसे आज उनका खोया हुआ लड़का पा गया हो!
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एक दिन एक तरुण घासवाला आया। वह भी एक रज़ाई चाहता था, पर रज़ाई घर में थी नहीं। उसकी कहानी इस प्रकार थी—घर में यह और उसकी माँ है। पिछले साल उनके पास एक रज़ाई का रूअड़ था, उसे माँ-बेटे ओढ़ लिया करते थे। वह टूट गया है। ठंड खाकर माँ बीमार हो गई है। बेहद तेज़ बुख़ार है। उसे इकली छोड़कर मजबूरी में वह घास बेचने आया है।
वे चिंता में पड़ गए, पर कहीं गुंजाइश न थी। सोचकर बोले—'अच्छा भाई, तू शाम को आना। हमारे पास तो कोई कपड़ा है नहीं, पर देखो, ठाकुरजी की भुजा बड़ी लंबी है।' वह चला गया। तीसरे पहर तक कोई प्रबंध नहीं हुआ। अचानक कुछ सूझा। उठकर कहीं गए और लौटे, तो एक पुरानी रज़ाई उनकी बग़ल में थी—किसी से माँगकर लाए थे! मेरे आत्माभिमान को बड़ी ठेस लगी। मैं नाराज़ हुआ, तो लाड़ में बोले—'बेटा! उनके यहाँ यह फ़ालतू पड़ी थी, इसके काम आ जाएगी; इसमें बेइज्जती की बात क्या है?' मुझे नरम करते हुए, बोले—'बस एक माँ है इसके। वह शीत में मर जाती, तो इसकी दुनिया अंधी हो जाती।' और यह कहकर जैसे क़िला जीत लिया उन्होंने—'अब दोनों आराम से पैर पसारकर सोएँगे।' रज़ाई के साथ माँ के लिए दवाई भी उसे मिली और पीने को चाय का गिलास भी।
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घर के सब लोग प्लेग में मर गए। बच गया सिर्फ़ जीजू! दस बारह साल का मुसलमान बालक। हमारे धोबी के साथ वह पिताजी से आ मिला और बस उनका पुत्र हो गया। उनके पास खाता, कपड़े पहनता और रात में घर जा सोता। भोला-सा सरल बालक; एक दिन पिताजी की तरह सूरज को हाथ जोड़ रहा था कि मुसलमानों में हल्ला मच गया। तार देकर उसका बहनोई बुलाया गया। मुश्किल से पिताजी ने उसे बहन के यहाँ जाने के लिए तैयार किया।
नए कपड़े पहनाकर उसे स्टेशन छोड़ने गए। जब तक गाड़ी दीखती रही, खड़े देखते रहे और इसके बाद भी मनिआर्डर—से उसे कभी-कभी रुपए भेजना जारी रहा।
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बर्फ़ बाला गली में आता, तो पास-पड़ोस के बच्चे उन्हें या घेरते! एक दिन चौदह बच्चों को उन्होंने बर्फ़ दिलाया और बर्फ़ वाले को पैसे देने के बाद एक पैसा ऊपर की ताक में रख दिया। मैं भी वहीं उनके पास खड़ा था। पूछा—यह पैसा वहाँ क्यों रख दिया आपने?
बात टालने को बाले—'यों ही रख दिया है, फिर उठा लूँगा? पर मुझे संतोष न हुआ, तो खुले—'यह पैसा भंगन की लड़की का है। जब आएगी, उठाकर दे दूँगा, बरफ खालेगी। आखिर उसमें भी तो जान है बेटा!'
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उनके लिए अपने बच्चे, पास-पड़ोस के बच्चे और भंगन के बच्चे में कोई भेद न था। बच्चे असल में उनकी जान थे। जब वे खाना खाते, तो इधर-उधर से कई बच्चे आ जुटते। उनका भोजन एक हंगामा ही होता। एक कहता मैं दाल से लूँगा, दूसरा आलू से। तीसरे का नाक पूँछते, चौथे को पानी देते। एक इस बात पर ऐंठता कि में गोदी में बैठूँगा, दूसरा रूठ जाता कि उसे गोद में क्यों लिया? सबको सँभालते और इस सँभाल में पूरा रस लेते। उनका भोजन सचमुच एक दृश्य होता!
उनकी चाय-गोष्ठी भी इसी तरह काफ़ी दिलचस्प होती। एक और गोष्ठी के भी वे संयोजक होते। वह सिर्फ़ सर्दियों में जमती। वे बीच में ज़मीन पर, अपने आसन पर उकडूँ बैठते और दोनों तरफ़ पलंगों पर बैठते बाल-गोपाल। वे गन्ना छीलते और पोरी बच्चों को देते रहते। पहले-पीछे का हँगामा यहाँ भी मच जाता, पर वे उसे सँभालते और गन्ना गोष्ठी जारी रहती।
इस गोष्ठी में उस समय मज़ा आ जाता, जब अचानक हम में से कोई तरुण आ पहुँचता। वे एक पोरी उसकी ओर भी बढ़ाते। इधर से हाथ बढ़ाने में ज़रा भी ढाल हुई कि वे कहते—'ओहो, अब तो आप बहुत ही बड़े हो गए हैं।' और तभी वे अपने को तीन अक्षरों में उंडेल-सा देते—'ले बेटे!' और पोरी हमें चूसनी पड़ती—हँसते-हँसते!
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वे थके-थकाए, पसीने से तर बाहर से लौटते—फल, सब्ज़ी, मिठाई और जाने क्या-क्या लिए। बच्चे दौड़ पड़ते—'बाबा आए, बाबा आए।' कोई ख़रबूज़ा माँगता, कोई मिठाई, कोई कमर पर चढ़ता, कोई पैरों को लिपट जाता। वे परेशान हो जाते, पर कभी न चिल्लाते। लाड़ में ही कहते—'अरे, ताला तो खोल लेने दिया करो। आते ही दुंद मचा देते हो। जो कुछ है तुम्हारे ही लिए तो है।'
एक दिन बच्चों का यह आक्रमण आरंभ हुआ ही था कि मैं आ गया। मैंने उन्हें डाँटा, तो मुझ पर ही एक डाँट पड़ी—'अरे तुझे तो ये कुछ नहीं कहते। तू क्यों हर वक़्त इनके पीछे पड़ा रहता है!' और जल्दी-जल्दी ताला खोलकर सबको कमरे में ले घुसे और मिठाई, फल बाँटने लगे।
***
अजीब-अजीब सवाल बच्चे उनसे पूछते और वे इस ढंग पर उनका जवाब देते कि बच्चों को आनंद भी मिलता और ज्ञान भी। एक दिन छोटी-सी गायत्री ने पूछा—'बाबा, तुम्हारे बाल सफेद क्यों हैं?'
बोले—'बेटी, जब मैं छोय था, अपना सिर नहीं बुलाया करता था। मैल भर जाने से बाल सफ़ेद हो गए हैं।'
उत्तर की प्रतिक्रिया कितनी स्पष्ट थी 'बाबा, मैं तो रोज़ अम्मा से अपना सिर धुला लेती हूँ।'
प्रतिक्रिया पर कितनी बढ़िया पॉलिश उन्होंने की—'तभी तो तेरे बाल काले हैं बेटी!'
***
'पिताजी, आप बुढ़ापे में भी इतने स्वस्थ हैं, इसका रहस्य क्या है?' एक दिन मैंने पूछा, तो बोले—'तीन मुख्य कारण है इसके।'
1—मैं सदा नियमित रूपसे ब्रह्म-बेला में जागता हूँ और नहाने, खाने, घूमने आदि में भी नियमित रहता हूँ।
2—मैं सदा आदमी रहता हूँ, भगवान् कभी नहीं बनता। तुम्हें 100 मिल गए, तो ख़ुश और खो गए, तो गुम। मैं मानता हूँ, सब काम ठाकुर जी की इच्छा से हो रहा है। आया भी उनका, गया भी उनका। सुख भी उनका, दुख भी उनका।
3—मैं हमेशा बच्चों में खेलता हूँ। ये मुझे नया जीवन और फ़ुर्ती देते हैं। हँसकर बोले—मेरे बाल-मित्रों में और बुढ़ापे में युद्ध हो रहा है।
वह मुझे जितना थकाता है, ये उतनी ही शक्ति मुझे दे देते हैं। किसी दिन तो बुढ़ापा जीतेगा ही, पर ख़ैर, अभी तो बेचारा पिट रहा है!
***
एक बार मुझे पतंगबाज़ी की धुन सवार हुई। उन्हें पता चला कि मैं दूसरे मुहल्ले में जाकर पतंग उड़ाता हूँ। बस दूसरे ही दिन बाज़ार से आप कई बढ़िया पतंगें, हुचका और माँझा ले आए और ज्योंही शाम को लौटा कि वे सब चीज़ें मुझे दीं।
बोले—'भाई, आजकल शाम को जी नहीं लगता, इसलिए यह लाया हूँ। तू छत पर शाम को पतंग उड़ाया कर, मैं भी देखा करूँगा।' भाई साहब बहुत नाराज़ हुए—'और तो सब कुछ पढ़ा दिया। अब यह नई शिक्षा आप इन्हें देंगे!'
उनके उत्तर में उनकी स्पष्टता थी। बोले—'पतंग तो लड़के उड़ाएँगे ही। तुम उन्हें डाटोगे, तो वे चोरी से बुरे लड़कों के साथ उड़ाएँगे और पैसों के लिए घर की चीज़ें बेचना सीखेंगे!'
दूसरे दिन शाम को अपनी ही छत पर हमारी पतंग उड़ी। अपना हुक्का लेकर वे भी वहीं आ बैठे। पतंग सीधी हुई कि ये बोले—'दे ढील। अरे ढील दे भाई, हुचका सीधा छोड़ दे।' ढील ज़्यादा दे दो और पतंग पेटा खा गई, तो तुरंत हिदायत मिली—'सँभाल पेटा, अरे पेटा सँभाल। मार लंबी खींच!' कोई पतंग बराबरी में आई और वे बोले—दे गोत। यों नहीं, यों नहीं, तिरछा। दे बायाँ गोत, दे बायाँ!' हमने गोत दिया और पेंच लड़ गए। पेंच लड़े कि वे बोले—'दे ढील, अरे अब क्या है, दे ढील-छोड़ दे नाँव ख़ुदा के हाथ!' ढील चल दी, पर पतंग कमज़ोर थी। तुरंत बोले—'मार ठुमकी। हल्की, एकदम हल्की, नहीं तो झर्र हो जाएगी पतंग। देखता नहीं, हवा सो रही है।' पतंग ज़रा उठी, इठलाई और सरकी कि वे बोले—'अब दे ढील। हुचका ऊँचा कर ले। ऊँचा करले हुचका!' अब उन्होंने पतंग की ओर देखा। बोले—'घस्सा ठीक बैठ रहा है—कैंची ख़ूब चल रही है!' तभी दूसरी पतंग कट गई। हम अपने पहले मोर्चे पर क़ामयाब रहे। वे बोले—'कटती कैसे नहीं, अंडे की सूँत का माँझा लाया था मैं!'
मुझे आश्चर्य हुआ कि वे पूरे पतंगशास्त्री हैं। कभी पतंग उड़ाई है पिताजी?' बोले—'हाँ बेटा, उड़ाते हैं? खेल-भटक कर ही आदमी बड़ा होता है।' पूछा—'आपने भी अपने समय पर सभी उड़ाते हैं। खेल-भटक कर ही आदमी बड़ा होता है।'
***
वे सूझ के धनी थे। इस सूझ की तीन धाराएँ थीं। पहली यह कि आप उनसे कहीं मज़ाक़ करें, अपनी वाक्चातुरी से उन्हें मात देना चाहें, वे अपनी तुझसे फ़ौरन आपको छका देंगे।
एक धनी यजमान की लड़की का विवाह था। लग्न था नौ बजे का, पर भड़े आदमियों के बड़े प्रबंध; संस्कार आरंभ हुआ रात में एक बजे। वर-पक्ष के तरुण पंडित ने पूछा—'पंडितजी किस लग्न में कार्यारंभ हो रहा है यह?' वे उसके शास्त्रार्थी निशाने को ताड़ गए। बोले—भैया, यह 'फुरसत-लग्न' है। दोनों पक्षों को जब प्रबंध आदि से फुरसत मिल जाती है, यह आरंभ होता है।' पंडितजी झेंपे और लोग हँसे! मुझसे बोले—'पहली ही टंकोर में चित हो गया बेटा।'
दूसरी धारा थी चिकित्सा में। आयुर्वेद के वे कोई विशेष पंडित न थे, पर कभी-कभी ऐसा निशाना लेते थे कि डिग्रियाँ और चोगे बगलें झाँकते रह जाते थे।
एक धनी सज्जन का बहलवान गाँव से गेहूँ भर कर लाया। गाड़ी हाँके चला आ रहा था कि उसकी जबाड़ी बंद हो गई। न कहीं दर्द, न बेहोशी, पर मुँह बंद। डॉक्टर आए। कानी आँखों पर थर्मामीटर थिरके, स्टेथिसकोपों ने दिल की ख़बर ली; नो टैंपरेचर, नो हार्टट्रबल! जम्बूड़ से मुँह फाड़कर अंदाजन कुछ दवाएँ उसमें डाली गईं, पर कुछ न हुआ।
वैद्य लोग पधारे। अत्यंत गंभीर मुद्रा में नाड़ी थामी गई, उँगलियों ने बात, पित्त, कफ की सरगम नापी, परस्पर कुछ चोंचें लड़ीं, माधव निदान के श्लोकों का शुद्ध-अशुद्ध उच्चारण हुआ और बड़ी सावधानी के साथ कुछ रस-भस्में उतारी गईं, पर बिल्कुल उसी तरह जैसे अँग्रेज़ी राज़ के बागी उस ज़माने में खैबर दर्रा पार कर जाते थे।
तब हकीम जी तशरीफ़ लाए; अपना चोगा कंधों पर और पान मुँह में सँभाले हुए। अपनी ख़ानदानी हिकमत पर योंही एक-आध उड़ता-सा इशारा डालकर, आपने नब्ज़ देखी, दिल टटोला और चेहरे पर ग़ौर फ़रमाई। कुछ समझ में नहीं आया, फिर भो बहुत गंभीरता के साथ माजूने दिलकुशा को शर्बते दीनार में मिलाकर चटाने और ऊपर से एक छटाँक अर्क पोदीना और ग़ुलाब मिलाकर पिलाने का मशवरा दे गए। चिमटे से मुँह खोलकर यह भी गले की भट्टी में झोंक दिया गया, पर फूँस की ही तरह!
तब बुलाया गया कुंदन सयाना। उसने इसे सैयद का असर बतलाया और 'कालो कलकत्ते वाली, भर ले खप्पर नाच बजना ताली' का मंगलाचरण करके जाने कितने मंतर-तंतर पढ़े-किए, पर सैयद न उतरा। मुफ़्त का तमाशा कौन न देखे। लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई।
तभी उधर आ निकले पिताजी। उन्होंने उसे देखा और पाँच मिनट उसके साथियों से बातें कीं। वे घर से अपनी सूँघनी उठा लाए और दाबदी एक तकड़ी-सी चुटकी। तड़-तड़ छींः, एक-दो-तीन। आई पाँच-सात छींकें और खुल गई जबाड़ी! रात में मैंने कहा—'आज तो आपने चमत्कार कर दिया।' बोले—'चमत्कार क्या था उसमें। गेहूँ इकट्ठे करने में दो रात जागा। बस थक गया बेचारे का पट्टा-पठ्ठा। आई जो जम्भाई तो ख़ून रुक गया जबा ड़े का—बस जबाड़ी बंद! छींकों ने नस-नस हिलादी, ख़ून में हरकत आई, जबाड़ा खुल गया।' इस तरह के उनके कई संस्मरण हैं।
तीसरी धारा थी अपने मित्रों और यजमानों के आपसी झगड़े निमटाने में। वे दो विरोधियों के बीच में शक्कर की ऐसी डली बन जाते, जो धीरे-धीरे घुलकर दोनों को मीठा कर देती। इस दिशा में तो असल में सच्ची सद्भावना ही उनकी सूझ थी।
पति-पत्नी के झगड़ों में उनकी सहानुभूति हमेशा मैंने पत्नी की ओर देखी—'अरे भाई, स्त्री तो गाय है, उसका सताना, राम-राम। वह कभी सींग भी मार दे, तो क्या? हमेशा दूध और बछड़े देती है!' यह उनकी 'दलील' थी।
उनकी यह सहानुभूति इसलिए और भी अधिक महत्वपूर्ण है कि माँ का स्वभाव काफ़ी कड़वा था, पर सच तो यह है कि वे इतने मीठे थे कि संसार को कोई भी कड़वाहट, उन तक पहुँचते-न-पहुँचते स्वयं मीठी हो जाती थी!
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सामाजिक परंपराओं में मैं घोर क्रांतिकारी और भारत के बूढ़े हैं घोर दकियानूस, पर हम दोनों में कभी टक्कर नहीं हुई। जब मैंने सार्वजनिक रूप से अपनी पत्नी को पर्दे से बाहर ला खड़ा किया, तो मेरे क़स्बे पर बिजली-सी गिर पड़ी—इस चर्चा के सिवाय लोगों को और जैसे कुछ काम ही न था। चौधरी लोगों ने तो इसे पंचायत बुलाने का विषय समझा। पिताजी ने मुझे समझाया तो मैंने केवल एक बात उनसे कही—'पिताजी, यदि मैं आपके युग के वातावरण में रहूँगा, तो मेरे व्यक्तित्व का विकास रुक जाएगा। आप इसे सोच लें और यदि आपकी प्रसन्नता इसी में है, तो मैं इधर नहीं रहूँगा।' आधे घंटे तक चुप बैठे रहे और तब अचानक बोले—'हाँ बेटा, तू अपने ही रास्ते पर चल। गर्मियों में रजाई ओढ़ना ठीक नहीं है!' मैं उनकी तरफ़ देखता रह गया।श्ओह, वे कितने अच्छे थे!
apni teen varsh ki hosh ko zara sanbhalakar unhonne apne aas paas jhanka, to ve saham ge. maan baap mar chuke the aur unka palan poshan unke chacha chachi ki dekh rekh mein ho raha tha. unke bachpan ke sansmarnon ka saar hai, bachche khilana, maar khana, kuch na kahna aur sab kuch sahna. ye kitna adbhut hai ki isi damghotu vatavran mein unhonne apne snehi baba se gyarahven varsh mein pair rakhte na rakhte karm kaanD ki kamachlau shiksha pa li aur isse bhi adbhut hai ye ki is narak kunD mein palkar jo balak nikla, uske rom rom mein vyaapt mila manav ka prem, sabhi tarah ke bhed bhavon se uupar jivan ke kan kan mein chhai mamta aur iishvar vishvas. oh, aisa ki santon ko bhi iirshya ho! ye the mere svganya pitaji shri panDit ramadatt mishr.
pleg mein baDe bhai ki mrityu hui, to shahr ro paDa, par ve chaar baje shmshaan se laute, paanch baje gaay ki sani ki, saat baje use duha, 7 ॥ baje thakurji ki aarti ki aur nau baje garm doodh ke do gilas lekar maan ke paas pahunche le doodh pile aur bahu ko bhi pilade!
ve doodh misri to maan laal mirch. chillakar boli—mera to ghar jal gaya aur tumhein doodh malai soojh rahi hai!
svar mein kahin udveg nahin. bole—bina khaye kaun jiya hai bavli! main aaj kah raha hoon, tu parson khayegi. bas teen din ka aaga pichha hai. apne kamre mein laut aaye aur doodh pikar so ge. raat bhar unka gurrata sabne suna aur theek saDhe chaar baje unki madhur, tallin svar lahri sada ki bhanti kanon mein paDi—pavan mand sugandh shital, hem mandir shobhitam ; shri nikat ganga baht nirmal, badrinath vishvagbhram!
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chhote bhaiko ek sambandhi ne bahkakar nahr mein Duba diya. ve sab kuch jante the, par pulis se kaha—nahane ghusa, pair rapat gaya, mera bhagya darogaji, shak kis par karun?
maan bahut jhallai—us sanDe ko phansi chaDhta dekhkar meri chhati mein thanDak paD jati, tumhein ye bhi achchha na laga.
vahi shaant svar ab aag ek ghar mein hai, phir do mein lag jati; isse kya fayda?
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ek kotha unhonne kharid unhen thoDe se rupyon mein de diya. liya. kharid kya liya, malik ne kutumb ke dusre dhani sadasya use adhik rupyon mein bhi kharidna chahte the, par unhen wo na mila.
pitaji bhojan ke liye aasan par baithe ki apne adamiyon ke saath, lathiyan liye ve aa dhamke aur marne ki dhamakiyon ke saath, galiyon ka ek daungDa sa barsa diya unhonne.
vahi udveghin svar—ao bhai, pahle bhojan kar lo phir maar lena.
galiyon ki ek aur bauchhar unpar paDi, to bole—tum bahut ho, main ikla hoon. bhaga main kahin ja nahin raha. aao pahle khana khalen! javab mein kuch hunkaren, kuch phunkaren aur galiyon ki kuch tagDi bauchharen unpar paDin. ab unhonne gale se mala nikal li, ankhen band; namः shivay, namः shivay!
das paanch minat bak jhak kar ve chale ge. maan boli—ve bakte rahe, tumne unhen javab tak nahin diya. main tumhara lihaz kar gain, nahin to sinDasi se gala pakaDkar jalti lakDi se chunti nashagyon ko!
vaqii wo aisi thi. pitaji ne mala gale mein Dali. bole—main bolta, ve aur khaDe rahte. khane ka svaad aadha to gaya hi, wo bilkul hi thanDa ho jata. la paros jaldi!
***
bahan ka vivah sir par tha aur paas mein paisa nahin. sagai ke din hi 6) udhaar mangakar kaam chalaya. sabne kaha—jab paas paisa nahin, to thahar jao agle saal shadi ho jayegi.
bole—agle saal aur is saal ka farq to ve janen, jinke ghar kahin se dhan aane ki sambhavna ho. meri laDki ki shadi to is saal bhi thakurji karenge aur agle saal bhi. unke bhanDare mein sab kuch hai, tum phikar mat karo!
usi din shaam ko achanak unhonne manse baDi thaili mangi. ye samjhi, kahin se rupe le aaye hain. chupke se teen rupe ramykar thaili maan ko lauta di. ye jal utho inhin teen rupalliyon par shadi karoge laDki kee?
bole—bavli, teri laDki ka karan ho jayega aur ye teen rupe bachche rah jayenge. tu nahin janti, thakurji ki bhuja baDi lambi hai.
samay ja raha hai, ghaDi aarhi hai, par thakurji ki lambi bhuja ka koi prmaan mil nahin raha. maan ke praan sookh rahe hain, par pitaji ke chehre par vahi hansi, vahi chaar baar roz chaay, vahi aarti aur vahi neend! maan jab jab unhen konchti hai, kah dete hain—mainne apna kaam kar diya, thakurji apna kaam karenge. thakurji ne apna kaam nahin kiya aur vivah ke 13 din rah ge. maan ka chehra pola paD gaya. achanak taar aya—pitaji ke ek yajman shiv puran ki katha sunne ko unhen bula rahe hain. yajman Dipti kalaktar the. katha par pandrah sau rupe chaDe. pitaji das din baad ghar laute, maan jhak rah gai.
dhumdham se shadi ki. laDki apni susral se lauti, to annpurna ka bhoj bhi hua. shaam ko pitaji ne phir thaili dekhi. samay ki baat usmen 6) rupe the. 6) ka rin utaar diya; aage bache teen! maan se bole—teri laDki ke sab kaam ho ge ki nahin? phir bhi bache rahe ve hi teen! tum log jhat vishvas chhoD baithte ho. main kahta na tha ki thakurji ki bhuja baDi lambi hai.
***
ve panDit bhi the aur chikitsak bhi. ek din saat rupe unke paas aaye aur saton unhonne kharch kar diye. maan bahut naraz hui ki kal tyohar hai, savere hi savere puja ke liye ek rupya chahiye, kahan se ayega ? vahi petent javab sab thakurji denge! javab se maan ko santosh na hua—dekhungi, din nikalte hi thakurji kaise dete hain?
baat ye thi ki pitaji savere bahut jaldi bhojan karke ghar se nikalte the, par kal bhojan ho sakta tha puja ke baad aur puja ki kunji thi ek rupya. pitaji bhi ye jante the, par bole—khair dekh lena, thakurji ki bhuja baDi lambi hai.
taDak mein chaar baje ek rogi ka bulava aaya aur do rupe lekar ve laute. aate hi bole— ye lo ek rupya puja ka aur ek uupar ke kharch ka. yon hi haay haay macha dete ho tum log!
apne thakurji mein unka akhanD vishvas tha aur vaqii unki bhuja baDi lambi thi. mainne unhen kabhi bhay se vihval, nirasha se astavyast aur krodh se kshubdh nahin dekha!
***
manav ke prati nishkam mamta unki apni cheez thi. jo ghasvala unki gaay ke liye ghaas lata, use chaay pilai jati aur yajmanon ke yahan se thrai gai suhali mithai avashya di jati. agar wo buDha hota, to use zara si afim ki goli bhi ve de dete. ye sab unhen apni shital pati par baithakar kiya jata aur iske liye ve apna hi gilas kaam mein late. iske baad na bartan mein aag Dali jati, na ghar mein ganga jal chhiDka jata. shahr ke panDit kaha karte—rama bhissar ka to bhabhek bhirast ho gaya hai!
ek buDhe ghasvalene kaha—panDitji, hamein ek rajai de do. tab bhadveki bhayankar garmi paD rahi thi. ashcharya se ve bole—are, ajkal razai kya karega? baat ye thi ki buDhe ne pichhli sardiyan mushkil se karti theen, agli sardiyon ke liye ye abhi se chintit tha. pitaji ne sardiyon mein use ek razai dene ka ashvasan de, vida kiya.
divali par jab unhonne apne liye razai nikali, to us buDhe ke liye bhi ek razai theek karakar rakh dee; par wo buDha na aaya. mainne dekha ki ve bechain the aur baar baar sabse us buDhe ko puchhte the! hamein unki bechaini par hansi aati thi aur kabhi kabhi jhunjhlahat bhi use sau baar garaj hogi to ayega, nahin to aap kyon pareshan hain! ve kahte—are bhai, wo bechara malum hota hai, ghar bhool gaya hai. nahin to wo zarur ata!
ek din ve ghasmanDi ja pahunche aur do ghante tak vahan khaDe rahe, par wo buDha unhen na mila. tab dusre ghasvalon se unhonne unke gaanv puchhe.
ant mein us buDhe ke gaanv ka ek dusra ghasvala unhen mil gaya. uske haath unhonne buDhe ko khabar bhijvai. khabar le jane ke liye bhi use do aane diye. dusre din bukhar mein hilahilata wo buDha aaya. sachmuch wo ghar bhool gaya tha. pitaji ne use apne hathon razai uDai, chaay pilai aur dava di. shaam ko jab main bahar se aaya, to bahut khush hokar bole—le bhai, aaj hamara wo kaam ho gaya.
kya kaam ji ?
wo buDha aaya tha, razai le gaya. ve aise khush the ki jaise aaj unka khoya hua laDka pa gaya ho!
***
ek din ek tarun ghasvala aaya. wo bhi ek razai chahta tha, par razai ghar mein thi nahin. uski kahani is prakar thi—ghar mein ye aur uski maan hai. pichhle saal unke paas ek razai ka ruaD tha, use maan bete oDh liya karte the. wo toot gaya hai. thanD khakar maan bimar ho gai hai. behad tez bukhar hai. use ikli chhoDkar majburi gen wo ghaas bechne aaya hai.
ve chinta mein paD ge, par kahin gunjayash na thi. soch kar bole—achchha bhai, tu shaam ko aana. hamare paas to koi kapDa hai nahin, par dekho, thakurji ki bhuja baDi lambi hai. wo chala gaya. tisre pahar tak koi prbandh nahin hua. achanak kuch sujha. uthkar kahin ge aur laute, to ek purani razai unki baghal mein thi—kisi se mangakar laye the! mere atmabhiman ko baDi thes lagi. main naraz hua, to laaD mein bole—beta! unke yahan ye faltu paDi thi, iske kaam aa jayegi; ismen beizzti ki baat kya hai? mujhe naram karte hue, bole—bas ek maan hai iske. wo sheet mein mar jati, to iski duniya andhi ho jati. aur ye kah kar jaise qila jeet liya unhonne—ab donon aram se pair pasarkar soenge. razai ke saath maan ke liye davai bhi use mili aur pine ko chaay ka gilas bhi.
***
ghar ke sab log pleg mein mar ge. bach gaya sirf jiju! das barah saal ka musalman balak. hamare dhobi ke saath wo pitaji se aa mila aur bas unka putr ho gaya. unke paas khata, kapDe pahanta aur raat mein ghar ja sota. bhola sa saral balak; ek din pitaji ki tarah suraj ko haath joD raha tha ki musalmanon mein halla mach gaya. taar dekar uska bahnoi bulaya gaya. mushkil se pitaji ne use bahan ke yahan jane ke liye taiyar kiya.
ne kapDe pahnakar use steshan chhoDne ge. jabtak gaDi dikhti rahi, khaDe dekhte rahe aur iske baad bhi maniarDar—se use kabhi kabhi rupe bhejna jari raha.
***
barf bala gali mein aata, to paas paDos ke bachche unhen ya gherte! ek din chaudah bachchon ko unhonne barf dilaya aur barf vale ko paise dene ke baad ek paisa uupar ki taak mein rakh diya. main bhi vahin unke paas khaDa tha. puchha—yah paisa vahan kyon rakh diya apne?
baat talne ko bale—yon hi rakh diya hai, phir utha lunga? par mujhe santosh na hua, to khule—yah paisa bhangan ki laDki ka hai. jab ayegi, uthakar de dunga, barph khalegi. akhir usmen bhi to jaan hai beta!
***
unke liye apne bachche, paas paDos ke bachche aur bhangan ke bachche mein koi bhed na tha. bachche asal mein unki jaan the. jab ve khana khate, to idhar udhar se kai bachche aa jutte. unka bhojan ek hangama hi hota. ek kahta main daal se lunga, dusra aalu se. tisre ka naak punchhate, chauthe ko pani dete. ek is baat par ainthta ki mein godi mein baithunga, dusra rooth jata ki use god mein kyon liya? sabko sanbhalate aur is sanbhal mein pura ras lete. unka bhojan sachmuch ek drishya hota!
unki chaay goshthi bhi isi tarah kafi dilchasp hoti. ek aur goshthi ke bhi ve sanyojak hote. wo sirf sardiyon mein jamti. ve beech mein zamin par, apne aasan par ukhun baithte aur donon taraf palangon par baithte baal gopal. ve ganna chhilte aur pori bachchon ko dete rahte. pahle pichhe ka hangama yahan bhi mach jata, par ve use sanbhalate aur ganna goshthi jari rahti.
is goshthi mein us samay maza aa jata, jab achanak hum mein se koi tarun aa pahunchta. ve ek pori uski or bhi baDhate. idhar se haath baDhane mein zara bhi Dhaal hui ki ve kahte—oho, ab to aap bahut hi baDe ho ge hain. aur tabhi ve apne ko teen akshron mein unDel sa dete— le bete! aur pori hamein chusni paDti—hanste hanste!
***
ve thake thakaye, pasine se tar bahar se lautte—phal, sabzi, mithai aur jane kya kya liye. bachche dauD paDte—baba aaye, bacha aaye. koi kharbuza mangta, koi mithai, koi kamar par chaDhta, koi pairon ko lipat jata. ve pareshan ho jate, par kabhi na chillate. laaD mein hi kahte—are, tala to khol lene diya karo. aate hi dund macha dete ho. jo kuch hai tumhare hi liye to hai.
ek din bachchon ka ye akrman arambh hua hi tha ki mein aa gaya. mainne unhen Danta, to mujhpar hi ek Daant paDi—are tujhe to ye kuch nahin kahte. tu kyon har vaqt inke pichhe paDa rahta hai! aur jaldi jaldi tala kholkar sabko kamre mein le ghuse aur mithai, phal bantne lage.
***
ajib ajib saval bachche unse puchhte aur ve is Dhang par unka javab dete ki bachchon ko anand bhi milta aur gyaan bhi. ek din chhoti si gayatri ne puchha—baba, tumhare baal saphed kyon hain?
bole—beti, jab main chhoy tha, apna sir nahin bulaya karta tha. mail bhar jane se baal safed ho ge hain.
uttar ki pratikriya kitni aspasht thi baba, main to roz amma se apna sir dhula leti hoon.
pratikriya par kitni baDhiya paulish unhonne ki—tabhi to tere baal kale hain beti!
***
pitaji, aap buDhape mein bhi itne svasth hain, iska rahasya kya hai? ek din mainne pulla, to bole—tin mukhya karan hai iske.
1—mai sada niymit rupse brahm bela mein jagata hoon aur nahane, khane, ghumne aadi mein bhi niymit rahta hoon.
2—main sada adami rahta hoon, bhagvan kabhi nahin banta. tumhein 100) mil ge, to khush aur kho ge, to gum. main manata hoon, sab kaam thakur ji ki ichchha se ho raha hai. aaya bhi unka, gaya bhi unka. sukh bhi unka, dukh bhi unka.
3—main hamesha bachchon mein khelta hoon. ye mujhe naya jivan aur furti dete hain. hansakar bole—mere baal mitron mein aur buDhape mein yuddh ho raha hai.
wo mujhe jitna thakata hai, ye utni ho shakti mujhe de dete hain. kisi din to buDhapa jitega hi, par khair, abhi to bechara pit raha hai!
***
ek baar mujhe patangbazi ki dhun savar hui. unhen pata chala ki main dusre muhalle mein jakar patang uData hoon. bas dusre hi din bazar se aap kai baDhiya patangen, huchka aur manjha le aaye aur jyonhi shaam ko lauta ki ve sab chizen mujhe deen.
bole—bhai, ajkal shaam ko ji nahin lagta, isliye ye laya hoon. tu chhat par shaam ko patang uDaya kar, main bhi dekha karunga. bhai sahan bahut naraz hue—aur to sab kuch paDha diya. ab ye nai shiksha aap inhen denge!
unke uttar mein unki spashtata thi. bole—patang to laDke uDayenge hi. tum unhen Datoge, to ve chori se bure laDkon ke saath uDayenge aur paison ke liye ghar ki chizen bechna sikhenge!
dusre din shaam ko apni hi chhat par hamari patang uDi. apna hukka lekar ve bhi vahin aa baithe. patang sidhi hui ki ye bole—de Dheel. are Dheel de bhai, huchka sidha chhoD de. Dheel zyada de do aur patang peta kha gai, to turant hidayat mili—sanbhal pey, are peta sanbhal. maar lambi kheench! koi patang barabari mein aai aur ve bole—de got. yon nahin, yon nahin, tirchha. de bayan got, de bayan! hamne got diya aur pench laD ge. pench laDe ki ve bole—de Dheel, are ab kya hai, de Dheel chhoD de naanv khuda ke haath! Dheel chal di, par patang kamzor thi. turant bole—mar thumki. halki, ekdam halki, nahin to jharr ho jayegi patang. dekhta nahin, hava so rahi hai. patang zara uthi, ithlai aur sar ki ki ve bole—ab de Dheel. huchka uncha kar le.
uncha karle huchka! ab unhonne patang ki or dekha. bole—ghassa theek baith raha hai—kainchi khoob chal rahi hai! tabhi dusri patang kat gai. hum apne pahle morche par qamyab rahe. ve bole— katti kaise nahin, anDe ki soont ka manjha laya tha main!
mujhe ashcharya hua ki ve pure patangshastri hain. kabhi patang uDai hai pitaji? bole—han beta, uDate hain? khel bhatak kar hi adami baDa hota hai. puchha—apne bhi apne samay par sabhi uDate hain. khel bhatak kar hi adami baDa hota hai.
***
ve soojh ke dhani the. is soojh ki teen dharayen theen. pahli ye ki aap unse kahin mazak karen, apni vakchaturi se unhen maat dena chahen, ve apni tujhse fauran aapko chhaka denge.
ek dhani yajman ki laDki ka vivah tha. lagn tha nau baje ka, par bhaDe adamiyon ke baDe prbandh; sanskar arambh hua raat mein ek baje. var paksh ke tarun panDit ne puchha—panDitji kis lagn mein karyarambh ho raha hai yah? ve uske shastrarthi nishane ko taaD ge. bole—bhaiya, ye fursat lagn hai. donon pakshon ko jab prbandh aadi se fursat mil jati hai, ye arambh hota hai. panDitji kaimpe aur log hanse! mujhse bole—pahli hi tankar mein chit ho gaya beta.
dusri dhara thi chikitsa mein. ayurved ke ve koi vishesh panDit na the, par kabhi kabhi aisa nishana lete the ki Digriyan aur choge baglen jhankte rah jate the.
ek dhani sajjanka bahalvan ganvale gehun bhar kar laya. gaDi hanke chala aa raha tha ki uski jabaDi band ho gai. na kahin dard, na behoshi, par munh band. Dauktar aaye. kani ankhon par tharmamitar thir ke, stethiskopon ne dil ki khabar lee; no taimprechar, no hartatrch! jambuD se munh phaDkar andajan kuch davayen usmen Dali gain, par kuch na hua.
vaidya log padhare. atyant gambhir mudramen naDi thami gai, ungaliyon ne baat, pitt, kaph ki sargam napi, paraspar kuch chonchen laDin, madhav nidan ke shlokon ka shuddh ashuddh uchcharan hua aur baDi savadhani ke saath kull ras bhasmen utari gain, par bilkul usi tarah jaise angrezi raaz ke chagi us zamane mein khaitrarka darra paar kar jate the.
tab hakim ji tashrif laye; apna choga kandhon par aur paan munh mein sanbhale hue. apni khandani hikmat par yonho ek aadh uDta sa ishara Dalkar, aapne nabz dekhi, dil tatola aur chehre par ghaur farmai. kuch samajh mein nahin aaya, phir bho bahut gambhirta ke saath majune dilkusha ko sharbte dinar mein milakar chatane aur uupar se ek chhatank ark podina aur ghulab milakar pilane ka mashvara de ge. chimte se munh kholkar ye bhi gale ki bhatti mein jhonk diya gaya, par phoons ki hi tarah!
tab bulaya gaya kundan sayana. usne ise saiyad ka asar batlaya aur kalo kalkatte vali, bhar le khappar naach bajna tali ka manglachran karke jane kitne mantar tantar paDhe kiye, par saiyad na utra. muft ka tamasha kaun na dekhe. logon ki bheeD ikatthi ho gai.
tabhi udhar aa nikle pitaji. unhonne use dekha aur paanch minat uske sathiyon se baten keen. ve ghar se apni sunghani utha laye aur dabdi ek takDi si chutki. taD taD chheenः, ek do teen. aai paanch saat chhinken aur khul gai jabaDi! raat mein mainne kaha—aj to aapne chamatkar kar diya. bole—chamatkar kya tha usmen. gehun ikatthe karne mein do raat jaga. bas thak gaya bechare ka patta pattha. aai jo jambhai to khoon ruk gaya jachaDe ka—bas jabaDi band! chhinkonne nas nas hiladi, khoon mein harkat aai, jabaDa khul gaya. is tarah ke unke kai sansmran hain.
tisri dhara thi apne mitron aur yajmanon ke aapsi jhagDe nimtane mein. ve do virodhiyonke beech mein shakkar ki aisi Dali ban jate, jo dhire dhire ghulkar donon ko mitha kar deti. is disha mein to asal mein sachchi sadbhavana hi unki soojh thi.
pati patni ke jhagDon mein unki sahanubhuti hamesha mainne patni ki or dekhi—are bhai, stri to gaay hai, uska satana, raam raam. wo kabhi seeng bhi maar de, to kyaa? hamesha doodh aur bachhDe deti hai! ye unki dalil thi.
unki ye sahanubhuti isliye aur bhi adhik mahatvpurn hai ki maan ka svbhaav kafi kaDva tha, par sach to ye hai ki ve itne mithe the ki sansar ko koi bhi kaDvahat, un tak pahunchte na pahunchte svayan mithi ho jati thee!
***
samajik parampraon mein main ghor krantikari aur bharat ke buDhe hain ghor dakiyanus, par hum donon mein kabhi takkar nahin hui. jab mainne sarvajnik roop se apni patni ko parde se bahar la khaDa kiya, to mere qasbe par bijli so gir paDi—is charcha ke sivay logon ko aur jaise kuch kaam hi na tha. chaudhari logon ne to ise panchayat bulane ka vishay samjha. pitaji ne mujhe samjhaya to mainne keval ek baat unse kahi—pitaji, yadi main aapke yug ke vatavran mein rahunga, to mere vyaktitv ka vikas ruk jayega. aap ise soch len aur yadi apaki prasannata isi mein hai, to main idhar nahin bahunga. aadhe ghante tak chup baithe rahe aur tab achanak bole—han beta, tu apne hi raste par chal. garmiyon mein razai oDhna theek nahin hai! mein unki taraf dekhta rah gaya. shoh, ve kitne achchhe the!
apni teen varsh ki hosh ko zara sanbhalakar unhonne apne aas paas jhanka, to ve saham ge. maan baap mar chuke the aur unka palan poshan unke chacha chachi ki dekh rekh mein ho raha tha. unke bachpan ke sansmarnon ka saar hai, bachche khilana, maar khana, kuch na kahna aur sab kuch sahna. ye kitna adbhut hai ki isi damghotu vatavran mein unhonne apne snehi baba se gyarahven varsh mein pair rakhte na rakhte karm kaanD ki kamachlau shiksha pa li aur isse bhi adbhut hai ye ki is narak kunD mein palkar jo balak nikla, uske rom rom mein vyaapt mila manav ka prem, sabhi tarah ke bhed bhavon se uupar jivan ke kan kan mein chhai mamta aur iishvar vishvas. oh, aisa ki santon ko bhi iirshya ho! ye the mere svganya pitaji shri panDit ramadatt mishr.
pleg mein baDe bhai ki mrityu hui, to shahr ro paDa, par ve chaar baje shmshaan se laute, paanch baje gaay ki sani ki, saat baje use duha, 7 ॥ baje thakurji ki aarti ki aur nau baje garm doodh ke do gilas lekar maan ke paas pahunche le doodh pile aur bahu ko bhi pilade!
ve doodh misri to maan laal mirch. chillakar boli—mera to ghar jal gaya aur tumhein doodh malai soojh rahi hai!
svar mein kahin udveg nahin. bole—bina khaye kaun jiya hai bavli! main aaj kah raha hoon, tu parson khayegi. bas teen din ka aaga pichha hai. apne kamre mein laut aaye aur doodh pikar so ge. raat bhar unka gurrata sabne suna aur theek saDhe chaar baje unki madhur, tallin svar lahri sada ki bhanti kanon mein paDi—pavan mand sugandh shital, hem mandir shobhitam ; shri nikat ganga baht nirmal, badrinath vishvagbhram!
***
chhote bhaiko ek sambandhi ne bahkakar nahr mein Duba diya. ve sab kuch jante the, par pulis se kaha—nahane ghusa, pair rapat gaya, mera bhagya darogaji, shak kis par karun?
maan bahut jhallai—us sanDe ko phansi chaDhta dekhkar meri chhati mein thanDak paD jati, tumhein ye bhi achchha na laga.
vahi shaant svar ab aag ek ghar mein hai, phir do mein lag jati; isse kya fayda?
***
ek kotha unhonne kharid unhen thoDe se rupyon mein de diya. liya. kharid kya liya, malik ne kutumb ke dusre dhani sadasya use adhik rupyon mein bhi kharidna chahte the, par unhen wo na mila.
pitaji bhojan ke liye aasan par baithe ki apne adamiyon ke saath, lathiyan liye ve aa dhamke aur marne ki dhamakiyon ke saath, galiyon ka ek daungDa sa barsa diya unhonne.
vahi udveghin svar—ao bhai, pahle bhojan kar lo phir maar lena.
galiyon ki ek aur bauchhar unpar paDi, to bole—tum bahut ho, main ikla hoon. bhaga main kahin ja nahin raha. aao pahle khana khalen! javab mein kuch hunkaren, kuch phunkaren aur galiyon ki kuch tagDi bauchharen unpar paDin. ab unhonne gale se mala nikal li, ankhen band; namः shivay, namः shivay!
das paanch minat bak jhak kar ve chale ge. maan boli—ve bakte rahe, tumne unhen javab tak nahin diya. main tumhara lihaz kar gain, nahin to sinDasi se gala pakaDkar jalti lakDi se chunti nashagyon ko!
vaqii wo aisi thi. pitaji ne mala gale mein Dali. bole—main bolta, ve aur khaDe rahte. khane ka svaad aadha to gaya hi, wo bilkul hi thanDa ho jata. la paros jaldi!
***
bahan ka vivah sir par tha aur paas mein paisa nahin. sagai ke din hi 6) udhaar mangakar kaam chalaya. sabne kaha—jab paas paisa nahin, to thahar jao agle saal shadi ho jayegi.
bole—agle saal aur is saal ka farq to ve janen, jinke ghar kahin se dhan aane ki sambhavna ho. meri laDki ki shadi to is saal bhi thakurji karenge aur agle saal bhi. unke bhanDare mein sab kuch hai, tum phikar mat karo!
usi din shaam ko achanak unhonne manse baDi thaili mangi. ye samjhi, kahin se rupe le aaye hain. chupke se teen rupe ramykar thaili maan ko lauta di. ye jal utho inhin teen rupalliyon par shadi karoge laDki kee?
bole—bavli, teri laDki ka karan ho jayega aur ye teen rupe bachche rah jayenge. tu nahin janti, thakurji ki bhuja baDi lambi hai.
samay ja raha hai, ghaDi aarhi hai, par thakurji ki lambi bhuja ka koi prmaan mil nahin raha. maan ke praan sookh rahe hain, par pitaji ke chehre par vahi hansi, vahi chaar baar roz chaay, vahi aarti aur vahi neend! maan jab jab unhen konchti hai, kah dete hain—mainne apna kaam kar diya, thakurji apna kaam karenge. thakurji ne apna kaam nahin kiya aur vivah ke 13 din rah ge. maan ka chehra pola paD gaya. achanak taar aya—pitaji ke ek yajman shiv puran ki katha sunne ko unhen bula rahe hain. yajman Dipti kalaktar the. katha par pandrah sau rupe chaDe. pitaji das din baad ghar laute, maan jhak rah gai.
dhumdham se shadi ki. laDki apni susral se lauti, to annpurna ka bhoj bhi hua. shaam ko pitaji ne phir thaili dekhi. samay ki baat usmen 6) rupe the. 6) ka rin utaar diya; aage bache teen! maan se bole—teri laDki ke sab kaam ho ge ki nahin? phir bhi bache rahe ve hi teen! tum log jhat vishvas chhoD baithte ho. main kahta na tha ki thakurji ki bhuja baDi lambi hai.
***
ve panDit bhi the aur chikitsak bhi. ek din saat rupe unke paas aaye aur saton unhonne kharch kar diye. maan bahut naraz hui ki kal tyohar hai, savere hi savere puja ke liye ek rupya chahiye, kahan se ayega ? vahi petent javab sab thakurji denge! javab se maan ko santosh na hua—dekhungi, din nikalte hi thakurji kaise dete hain?
baat ye thi ki pitaji savere bahut jaldi bhojan karke ghar se nikalte the, par kal bhojan ho sakta tha puja ke baad aur puja ki kunji thi ek rupya. pitaji bhi ye jante the, par bole—khair dekh lena, thakurji ki bhuja baDi lambi hai.
taDak mein chaar baje ek rogi ka bulava aaya aur do rupe lekar ve laute. aate hi bole— ye lo ek rupya puja ka aur ek uupar ke kharch ka. yon hi haay haay macha dete ho tum log!
apne thakurji mein unka akhanD vishvas tha aur vaqii unki bhuja baDi lambi thi. mainne unhen kabhi bhay se vihval, nirasha se astavyast aur krodh se kshubdh nahin dekha!
***
manav ke prati nishkam mamta unki apni cheez thi. jo ghasvala unki gaay ke liye ghaas lata, use chaay pilai jati aur yajmanon ke yahan se thrai gai suhali mithai avashya di jati. agar wo buDha hota, to use zara si afim ki goli bhi ve de dete. ye sab unhen apni shital pati par baithakar kiya jata aur iske liye ve apna hi gilas kaam mein late. iske baad na bartan mein aag Dali jati, na ghar mein ganga jal chhiDka jata. shahr ke panDit kaha karte—rama bhissar ka to bhabhek bhirast ho gaya hai!
ek buDhe ghasvalene kaha—panDitji, hamein ek rajai de do. tab bhadveki bhayankar garmi paD rahi thi. ashcharya se ve bole—are, ajkal razai kya karega? baat ye thi ki buDhe ne pichhli sardiyan mushkil se karti theen, agli sardiyon ke liye ye abhi se chintit tha. pitaji ne sardiyon mein use ek razai dene ka ashvasan de, vida kiya.
divali par jab unhonne apne liye razai nikali, to us buDhe ke liye bhi ek razai theek karakar rakh dee; par wo buDha na aaya. mainne dekha ki ve bechain the aur baar baar sabse us buDhe ko puchhte the! hamein unki bechaini par hansi aati thi aur kabhi kabhi jhunjhlahat bhi use sau baar garaj hogi to ayega, nahin to aap kyon pareshan hain! ve kahte—are bhai, wo bechara malum hota hai, ghar bhool gaya hai. nahin to wo zarur ata!
ek din ve ghasmanDi ja pahunche aur do ghante tak vahan khaDe rahe, par wo buDha unhen na mila. tab dusre ghasvalon se unhonne unke gaanv puchhe.
ant mein us buDhe ke gaanv ka ek dusra ghasvala unhen mil gaya. uske haath unhonne buDhe ko khabar bhijvai. khabar le jane ke liye bhi use do aane diye. dusre din bukhar mein hilahilata wo buDha aaya. sachmuch wo ghar bhool gaya tha. pitaji ne use apne hathon razai uDai, chaay pilai aur dava di. shaam ko jab main bahar se aaya, to bahut khush hokar bole—le bhai, aaj hamara wo kaam ho gaya.
kya kaam ji ?
wo buDha aaya tha, razai le gaya. ve aise khush the ki jaise aaj unka khoya hua laDka pa gaya ho!
***
ek din ek tarun ghasvala aaya. wo bhi ek razai chahta tha, par razai ghar mein thi nahin. uski kahani is prakar thi—ghar mein ye aur uski maan hai. pichhle saal unke paas ek razai ka ruaD tha, use maan bete oDh liya karte the. wo toot gaya hai. thanD khakar maan bimar ho gai hai. behad tez bukhar hai. use ikli chhoDkar majburi gen wo ghaas bechne aaya hai.
ve chinta mein paD ge, par kahin gunjayash na thi. soch kar bole—achchha bhai, tu shaam ko aana. hamare paas to koi kapDa hai nahin, par dekho, thakurji ki bhuja baDi lambi hai. wo chala gaya. tisre pahar tak koi prbandh nahin hua. achanak kuch sujha. uthkar kahin ge aur laute, to ek purani razai unki baghal mein thi—kisi se mangakar laye the! mere atmabhiman ko baDi thes lagi. main naraz hua, to laaD mein bole—beta! unke yahan ye faltu paDi thi, iske kaam aa jayegi; ismen beizzti ki baat kya hai? mujhe naram karte hue, bole—bas ek maan hai iske. wo sheet mein mar jati, to iski duniya andhi ho jati. aur ye kah kar jaise qila jeet liya unhonne—ab donon aram se pair pasarkar soenge. razai ke saath maan ke liye davai bhi use mili aur pine ko chaay ka gilas bhi.
***
ghar ke sab log pleg mein mar ge. bach gaya sirf jiju! das barah saal ka musalman balak. hamare dhobi ke saath wo pitaji se aa mila aur bas unka putr ho gaya. unke paas khata, kapDe pahanta aur raat mein ghar ja sota. bhola sa saral balak; ek din pitaji ki tarah suraj ko haath joD raha tha ki musalmanon mein halla mach gaya. taar dekar uska bahnoi bulaya gaya. mushkil se pitaji ne use bahan ke yahan jane ke liye taiyar kiya.
ne kapDe pahnakar use steshan chhoDne ge. jabtak gaDi dikhti rahi, khaDe dekhte rahe aur iske baad bhi maniarDar—se use kabhi kabhi rupe bhejna jari raha.
***
barf bala gali mein aata, to paas paDos ke bachche unhen ya gherte! ek din chaudah bachchon ko unhonne barf dilaya aur barf vale ko paise dene ke baad ek paisa uupar ki taak mein rakh diya. main bhi vahin unke paas khaDa tha. puchha—yah paisa vahan kyon rakh diya apne?
baat talne ko bale—yon hi rakh diya hai, phir utha lunga? par mujhe santosh na hua, to khule—yah paisa bhangan ki laDki ka hai. jab ayegi, uthakar de dunga, barph khalegi. akhir usmen bhi to jaan hai beta!
***
unke liye apne bachche, paas paDos ke bachche aur bhangan ke bachche mein koi bhed na tha. bachche asal mein unki jaan the. jab ve khana khate, to idhar udhar se kai bachche aa jutte. unka bhojan ek hangama hi hota. ek kahta main daal se lunga, dusra aalu se. tisre ka naak punchhate, chauthe ko pani dete. ek is baat par ainthta ki mein godi mein baithunga, dusra rooth jata ki use god mein kyon liya? sabko sanbhalate aur is sanbhal mein pura ras lete. unka bhojan sachmuch ek drishya hota!
unki chaay goshthi bhi isi tarah kafi dilchasp hoti. ek aur goshthi ke bhi ve sanyojak hote. wo sirf sardiyon mein jamti. ve beech mein zamin par, apne aasan par ukhun baithte aur donon taraf palangon par baithte baal gopal. ve ganna chhilte aur pori bachchon ko dete rahte. pahle pichhe ka hangama yahan bhi mach jata, par ve use sanbhalate aur ganna goshthi jari rahti.
is goshthi mein us samay maza aa jata, jab achanak hum mein se koi tarun aa pahunchta. ve ek pori uski or bhi baDhate. idhar se haath baDhane mein zara bhi Dhaal hui ki ve kahte—oho, ab to aap bahut hi baDe ho ge hain. aur tabhi ve apne ko teen akshron mein unDel sa dete— le bete! aur pori hamein chusni paDti—hanste hanste!
***
ve thake thakaye, pasine se tar bahar se lautte—phal, sabzi, mithai aur jane kya kya liye. bachche dauD paDte—baba aaye, bacha aaye. koi kharbuza mangta, koi mithai, koi kamar par chaDhta, koi pairon ko lipat jata. ve pareshan ho jate, par kabhi na chillate. laaD mein hi kahte—are, tala to khol lene diya karo. aate hi dund macha dete ho. jo kuch hai tumhare hi liye to hai.
ek din bachchon ka ye akrman arambh hua hi tha ki mein aa gaya. mainne unhen Danta, to mujhpar hi ek Daant paDi—are tujhe to ye kuch nahin kahte. tu kyon har vaqt inke pichhe paDa rahta hai! aur jaldi jaldi tala kholkar sabko kamre mein le ghuse aur mithai, phal bantne lage.
***
ajib ajib saval bachche unse puchhte aur ve is Dhang par unka javab dete ki bachchon ko anand bhi milta aur gyaan bhi. ek din chhoti si gayatri ne puchha—baba, tumhare baal saphed kyon hain?
bole—beti, jab main chhoy tha, apna sir nahin bulaya karta tha. mail bhar jane se baal safed ho ge hain.
uttar ki pratikriya kitni aspasht thi baba, main to roz amma se apna sir dhula leti hoon.
pratikriya par kitni baDhiya paulish unhonne ki—tabhi to tere baal kale hain beti!
***
pitaji, aap buDhape mein bhi itne svasth hain, iska rahasya kya hai? ek din mainne pulla, to bole—tin mukhya karan hai iske.
1—mai sada niymit rupse brahm bela mein jagata hoon aur nahane, khane, ghumne aadi mein bhi niymit rahta hoon.
2—main sada adami rahta hoon, bhagvan kabhi nahin banta. tumhein 100) mil ge, to khush aur kho ge, to gum. main manata hoon, sab kaam thakur ji ki ichchha se ho raha hai. aaya bhi unka, gaya bhi unka. sukh bhi unka, dukh bhi unka.
3—main hamesha bachchon mein khelta hoon. ye mujhe naya jivan aur furti dete hain. hansakar bole—mere baal mitron mein aur buDhape mein yuddh ho raha hai.
wo mujhe jitna thakata hai, ye utni ho shakti mujhe de dete hain. kisi din to buDhapa jitega hi, par khair, abhi to bechara pit raha hai!
***
ek baar mujhe patangbazi ki dhun savar hui. unhen pata chala ki main dusre muhalle mein jakar patang uData hoon. bas dusre hi din bazar se aap kai baDhiya patangen, huchka aur manjha le aaye aur jyonhi shaam ko lauta ki ve sab chizen mujhe deen.
bole—bhai, ajkal shaam ko ji nahin lagta, isliye ye laya hoon. tu chhat par shaam ko patang uDaya kar, main bhi dekha karunga. bhai sahan bahut naraz hue—aur to sab kuch paDha diya. ab ye nai shiksha aap inhen denge!
unke uttar mein unki spashtata thi. bole—patang to laDke uDayenge hi. tum unhen Datoge, to ve chori se bure laDkon ke saath uDayenge aur paison ke liye ghar ki chizen bechna sikhenge!
dusre din shaam ko apni hi chhat par hamari patang uDi. apna hukka lekar ve bhi vahin aa baithe. patang sidhi hui ki ye bole—de Dheel. are Dheel de bhai, huchka sidha chhoD de. Dheel zyada de do aur patang peta kha gai, to turant hidayat mili—sanbhal pey, are peta sanbhal. maar lambi kheench! koi patang barabari mein aai aur ve bole—de got. yon nahin, yon nahin, tirchha. de bayan got, de bayan! hamne got diya aur pench laD ge. pench laDe ki ve bole—de Dheel, are ab kya hai, de Dheel chhoD de naanv khuda ke haath! Dheel chal di, par patang kamzor thi. turant bole—mar thumki. halki, ekdam halki, nahin to jharr ho jayegi patang. dekhta nahin, hava so rahi hai. patang zara uthi, ithlai aur sar ki ki ve bole—ab de Dheel. huchka uncha kar le.
uncha karle huchka! ab unhonne patang ki or dekha. bole—ghassa theek baith raha hai—kainchi khoob chal rahi hai! tabhi dusri patang kat gai. hum apne pahle morche par qamyab rahe. ve bole— katti kaise nahin, anDe ki soont ka manjha laya tha main!
mujhe ashcharya hua ki ve pure patangshastri hain. kabhi patang uDai hai pitaji? bole—han beta, uDate hain? khel bhatak kar hi adami baDa hota hai. puchha—apne bhi apne samay par sabhi uDate hain. khel bhatak kar hi adami baDa hota hai.
***
ve soojh ke dhani the. is soojh ki teen dharayen theen. pahli ye ki aap unse kahin mazak karen, apni vakchaturi se unhen maat dena chahen, ve apni tujhse fauran aapko chhaka denge.
ek dhani yajman ki laDki ka vivah tha. lagn tha nau baje ka, par bhaDe adamiyon ke baDe prbandh; sanskar arambh hua raat mein ek baje. var paksh ke tarun panDit ne puchha—panDitji kis lagn mein karyarambh ho raha hai yah? ve uske shastrarthi nishane ko taaD ge. bole—bhaiya, ye fursat lagn hai. donon pakshon ko jab prbandh aadi se fursat mil jati hai, ye arambh hota hai. panDitji kaimpe aur log hanse! mujhse bole—pahli hi tankar mein chit ho gaya beta.
dusri dhara thi chikitsa mein. ayurved ke ve koi vishesh panDit na the, par kabhi kabhi aisa nishana lete the ki Digriyan aur choge baglen jhankte rah jate the.
ek dhani sajjanka bahalvan ganvale gehun bhar kar laya. gaDi hanke chala aa raha tha ki uski jabaDi band ho gai. na kahin dard, na behoshi, par munh band. Dauktar aaye. kani ankhon par tharmamitar thir ke, stethiskopon ne dil ki khabar lee; no taimprechar, no hartatrch! jambuD se munh phaDkar andajan kuch davayen usmen Dali gain, par kuch na hua.
vaidya log padhare. atyant gambhir mudramen naDi thami gai, ungaliyon ne baat, pitt, kaph ki sargam napi, paraspar kuch chonchen laDin, madhav nidan ke shlokon ka shuddh ashuddh uchcharan hua aur baDi savadhani ke saath kull ras bhasmen utari gain, par bilkul usi tarah jaise angrezi raaz ke chagi us zamane mein khaitrarka darra paar kar jate the.
tab hakim ji tashrif laye; apna choga kandhon par aur paan munh mein sanbhale hue. apni khandani hikmat par yonho ek aadh uDta sa ishara Dalkar, aapne nabz dekhi, dil tatola aur chehre par ghaur farmai. kuch samajh mein nahin aaya, phir bho bahut gambhirta ke saath majune dilkusha ko sharbte dinar mein milakar chatane aur uupar se ek chhatank ark podina aur ghulab milakar pilane ka mashvara de ge. chimte se munh kholkar ye bhi gale ki bhatti mein jhonk diya gaya, par phoons ki hi tarah!
tab bulaya gaya kundan sayana. usne ise saiyad ka asar batlaya aur kalo kalkatte vali, bhar le khappar naach bajna tali ka manglachran karke jane kitne mantar tantar paDhe kiye, par saiyad na utra. muft ka tamasha kaun na dekhe. logon ki bheeD ikatthi ho gai.
tabhi udhar aa nikle pitaji. unhonne use dekha aur paanch minat uske sathiyon se baten keen. ve ghar se apni sunghani utha laye aur dabdi ek takDi si chutki. taD taD chheenः, ek do teen. aai paanch saat chhinken aur khul gai jabaDi! raat mein mainne kaha—aj to aapne chamatkar kar diya. bole—chamatkar kya tha usmen. gehun ikatthe karne mein do raat jaga. bas thak gaya bechare ka patta pattha. aai jo jambhai to khoon ruk gaya jachaDe ka—bas jabaDi band! chhinkonne nas nas hiladi, khoon mein harkat aai, jabaDa khul gaya. is tarah ke unke kai sansmran hain.
tisri dhara thi apne mitron aur yajmanon ke aapsi jhagDe nimtane mein. ve do virodhiyonke beech mein shakkar ki aisi Dali ban jate, jo dhire dhire ghulkar donon ko mitha kar deti. is disha mein to asal mein sachchi sadbhavana hi unki soojh thi.
pati patni ke jhagDon mein unki sahanubhuti hamesha mainne patni ki or dekhi—are bhai, stri to gaay hai, uska satana, raam raam. wo kabhi seeng bhi maar de, to kyaa? hamesha doodh aur bachhDe deti hai! ye unki dalil thi.
unki ye sahanubhuti isliye aur bhi adhik mahatvpurn hai ki maan ka svbhaav kafi kaDva tha, par sach to ye hai ki ve itne mithe the ki sansar ko koi bhi kaDvahat, un tak pahunchte na pahunchte svayan mithi ho jati thee!
***
samajik parampraon mein main ghor krantikari aur bharat ke buDhe hain ghor dakiyanus, par hum donon mein kabhi takkar nahin hui. jab mainne sarvajnik roop se apni patni ko parde se bahar la khaDa kiya, to mere qasbe par bijli so gir paDi—is charcha ke sivay logon ko aur jaise kuch kaam hi na tha. chaudhari logon ne to ise panchayat bulane ka vishay samjha. pitaji ne mujhe samjhaya to mainne keval ek baat unse kahi—pitaji, yadi main aapke yug ke vatavran mein rahunga, to mere vyaktitv ka vikas ruk jayega. aap ise soch len aur yadi apaki prasannata isi mein hai, to main idhar nahin bahunga. aadhe ghante tak chup baithe rahe aur tab achanak bole—han beta, tu apne hi raste par chal. garmiyon mein razai oDhna theek nahin hai! mein unki taraf dekhta rah gaya. shoh, ve kitne achchhe the!
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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