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लोकमान्य के चरणों में

lokamanya ke charnon mein

विनोवा भावे

विनोवा भावे

लोकमान्य के चरणों में

विनोवा भावे

और अधिकविनोवा भावे

    आज का नैमित्तिक धर्म लोकमान्य का पुण्य-स्मरण है। आज तिलक की पुण्य तिथि है।

    1920 में तिलक शरीर-रूप से हमारे अंदर नही रहे। उस समय मैं बंबई गया था। चार-पाँच दिन पहले ही पहुँचा था, परंतु डॉक्टर ने कहा, 'अभी कोई डर नहीं है।' इसलिए में एक काम से साबरमती जाने को रवाना हुआ। मैं आधा रास्ता भी पार कर पाया होऊँगा कि मुझे लोकमान्य को मृत्यु का समाचार मिला। मेरे अत्यंत निकट के आत्मीय, सहयोगी और मित्र की मृत्यु का जो प्रभाव हो सकता है, वही लोकमान्य के निधन का हुआ। मुझ पर बहुत गहरा असर हुआ। उस दिन से जीवन में कुछ नयापन-सा गया। मुझे ऐसा लगा मानो कोई बहुत ही प्रेम करने वाला कुटुंबी चल बसा हो, इसमें ज़रा भी अत्युक्ति नहीं है। आज इतने बरस हो गए, आज फिर उनका स्मरण करना है। लोकमान्य के चरणों में अपनी यह तुच्छ श्रद्धांजलि अपनी गहरी श्रद्धा के कारण में चढ़ा रहा हूँ।

    तिलक के विषय में जब मैं कुछ कहने लगता हूँ तो मुँह से शब्द निकलना कठिन हो जाता है, गद्गद् हो उठता हूँ। साधु-संतों का नाम लेते ही मेरी जो स्थिति होती है, वही इस नाम से भी होती है। मैं अपने चित्त का भाव प्रकट ही नही कर सकता। उत्कट भावना को शब्दों में व्यक्त करना कठिन होता है। गीता का भी नाम लेते ही मेरी यही स्थिति हो जाती है। मानो स्फूर्ति का संचार हो जाता है। भावनाओं की प्रचंड बाढ़ जाती है। वृत्ति उमड़ने लगती है। परंतु यह बड़प्पन मेरा नही है। बड़प्पन गीता का है। यही हाल तिलक के नाम का है। मैं तुलना नहीं करता। क्योंकि तुलना में सदा दोष जाता है परंतु जिनके नाम-ही स्मरण में एसी स्फूर्ति देने की शक्ति है, उन्हीं में से तिलक भी है। मानो उनके स्मरण में ही शक्ति संचित है।

    तिलक का पहला गुण कौन-सा था? तिलक जातिगत ब्राह्मण थे। लेकिन जो ब्राह्मण नहीं है वे भी उनका स्मरण कर रहे है। तिलक महाराष्ट्र के मराठे थे। लेकिन पंजाब के पंजाबी और और बंगाल के बंगाली भी उन्हें पूज्य मानते है। हिंदुस्तान तिलक का ब्राह्मणत्व और उनका मराठापन, सब-कुछ भूल गया है। यह चमत्कार है। इसमें रहस्य है—दोहरा रहस्य है। इस चमत्कार में तिलक का गुण तो है ही, हमारे पूर्वजों की कमाई का भी गुण है। जनता का एक गुण और तिलक का एक गुण-दोनों के प्रभाव से यह चमत्कार हुआ कि ब्राह्मण और महाराष्ट्रीय तिलक सारे भारत में सभी जातियों द्वारा पूजे जाते हैं। दोनों के गुण की ओर हमें ध्यान देना चाहिए।

    तिलक का गुण यह था कि उन्होंने जो कुछ किया उसमे सारे भारतवर्ष का विचार किया। तिलक के फूल बंबई में गिरे, इसलिए वहाँ उनके स्मारक मंदिर होगे। उन्होंने मराठी में लिखा, इसलिए मराठी भाषा में उनके स्मारक होंगे। लेकिन तिलक ने जहाँ कहीं जो कुछ किया—चाहे जिस भाषा में क्यों किया हो, वह भारतवर्ष के लिए किया। उन्हें यह अभिमान नही था कि मैं ब्राह्मण हूँ, मैं महाराष्ट्र का हूँ। उनमें पृथकता की, भेद की भावना नहीं थी। वह महाराष्ट्रीय थे तो भी उन्होंने सारे भारतवर्ष का विचार किया। जिन अर्वाचीन महाराष्ट्रीय विभूतियों ने सारे भारतवर्ष का विचार किया, तिलक उनमें से एक थे। और दूसरे जो मेरी दृष्टि के सामने आए है, वह थे महर्षि न्यायमूर्ति रानाडे। तिलक ने महाराष्ट्र को अपनी जेब में रखा और सारे हिंदुस्तान के लिए लड़ते रहे। हिंदुस्तान के हित में मेरे महाराष्ट्र का भी हित है, इसीलिए पूने का हित है और पूने में रहनेवाले मेरे परिवार का हित है और परिवार के हित से मेरा भी हित है। हिंदुस्तान के हित का विचार करने से उसी में महाराष्ट्र, पूना, मेरा परिवार और मैं, सबके हित का विचार जाता है। यह तत्त्व उन्होंने जान लिया था और उसी के अनुसार उन्होंने काम किया। ऐसी विशाल उनकी व्याख्या थी। जो सच्ची सेवा करना चाहता है, उसे वह सेवा किसी मर्यादित स्थान में करनी पड़ेगी। लेकिन उस मर्यादित स्थान में रहकर जीनेवाली सेवा के पीछे जो वृत्ति रहेगी वह विशाल, व्यापक और अमर्यादित होनी चाहिए।

    परमात्मा के यहाँ 'कितनी सेवा' यह पूछ नहीं है। 'कैमी सेवा' यह पूछ है। तिलक अत्यंत बुद्धिमान्, विद्वान् नाना शास्त्रों के पंडित थे, इसलिए उनकी सेवा अनेकांगी और बहुत बड़ी है। परंतु तिलक ने जितनी क़ीमती सेवा की उतनी ही क़ीमती सेवा एक देहाती सेवक भी कर सकता है। तिलक की सेवा विपुल और बहु-अंगी थी तो भी उसके मूल्य और एक तुच्छ सेवक की सेवा का मूल्य बराबर हो सकता है। एक गाड़ीभर ज्वार रास्ते से जा रही हो, लेकिन उसकी क़ीमत में अपनी छोटी-सी जेब में रख सकता हूँ। दस हज़ार का नोट अपनी जेब में रख सकता हूँ। उस पर सरकारी मुहर भर लगी हो। आपकी सेवा पर व्यापकता की मुहर लगी होनी चाहिए। अगर कोई सेवा तो बहुत करे पर व्यापक-दृष्टि और वृत्ति से करे तो उसकी क़ीमत व्यापक-दृष्टि से की हुई छोटी-सी सेवा की अपेक्षा कम ही मानी जाएगी। व्यापक-वृत्ति से की हुई अल्प सेवा अनमोल हो जाती है, यह उसकी ख़ूबी है। आप और में सब कोई सेवा कर सकें, इसीलिए परमात्मा की यह योजना है। चाहे जहाँ, चाहे जो कुछ भी कीजिए, पर संकुचित दृष्टि से कीजिए। उसमें व्यापकता भर दीजिए। यह व्यापकता आज के कार्यकर्ताओं में कम पाई जाती है। कुशल कार्यकर्ता आज संकुचित दृष्टि से काम करते हुए दीख पड़ते है।

    तिलक की दृष्टि व्यापक थी, इसलिए उनके चारित्र्य में मिठास और आनंद है हिंदुस्तान के ही नहीं बल्कि संसार के किसी भी समाज का वास्तविक हित का विरोध करते हुए चाहे जहाँ सेवा कीजिए। चाहे वह एक गाँव की ही सेवा क्यों हो, वह अनमोल है। परंतु यदि बुद्धि व्यापक हो तो अपनी दृष्टि व्यापक बनाइए। फिर देखिए आप के कर्मों में कैसी स्फूर्ति का संचार होता है। कैसी बिजली का संचार होता है। तिलक में यही व्यापकता थी। 'मैं भारतीय हूँ' यह शुरू से यही उनकी वृत्ति रही। बंगाल में आंदोलन शुरू हुआ। उन्होंने दौड़कर उसकी मदद की। बंगाल का साथ देने के लिए महाराष्ट्र को खड़ा किया। स्वदेशी का डका बजवाया। जब बंगाल लड़ाई के मैदान में खड़ा है, तो हमें भी जाना चाहिए। जो बंगाल का दुःख है, वह महाराष्ट्र का भी दुख है। ऐसी व्यापकता, सर्वराष्ट्रीयता तिलक में थी। इसीलिए पूने के निवासी होकर भी वे हिंदुस्तान के प्राण बन गए। सारे देश के प्रिय बने, तिलक सारे भारतवर्ष के लिए पूजनीय हुए, इसका एक कारण यह था कि उनकी दृष्टि सर्वराष्ट्रीय थी, व्यापक थी।

    लेकिन इसका एक दूसरा भी कारण था। वह था जनता की विशेषता। जनता का यह गुण कार्यकर्ताओं में भी है, क्योंकि वे भी तो जनता के ही है। लेकिन उनको ख़ुद इस बात का पता नही है। तिलक के गुण के साथ जनता के गुण का स्मरण भी करना चाहिए, क्योंकि तिलक अपने आपको जनता के चरणों की धूल समझते थे। जनता के दोष, जनता की दुर्बलता, जनता की त्रुटियाँ, सब-कुछ वे अपनी ही समझते थे। वे जनता से एकरूप हो गए थे, इसलिए जनता के गुणों का स्मरण तिलक के गुणों का स्मरण ही है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : संस्मरण और आत्मकथाएँ (पृष्ठ 59)
    • रचनाकार : विनोवा भावे

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