(एक)
बात बहुत पुरानी सन् 1894 ई. की है। पूरे तैंतालिस वर्ष बीत गए। आज भी उन पुरोहित जी का वीर-भेष आँखों के सामने आ खड़ा होता है जब मंडला प्रवास की बातें याद आ जाती हैं।
उन दिनों पंडित मुन्नालाल पुरोहित के पिता पंडित बालमुकुंद पुरोहित मंडला के तहसीलदार थे। वे ज़िले के डिप्टी-कमिश्नर के दाहिने हाथ थे, क्योंकि डिप्टी कमिश्नर सैयद आले मुहम्मद जैसे सच्चे और बे-लौस ज़िलाधीश थे, वैसे ही पंडित बालमुकुंद पुरोहित बे-लाग हाक़िम थे। नीर-क्षीर-बिलगावने के न्याय में कचहरी का काम करने के बाद तहसील के लोगों में भी अपने प्रजा-पालन और ग़रीबपरवरी के गुण में पक्के होने के कारण वे बड़े लोकप्रिय हो गए थे।
वे हिंदी के बड़े प्रेमी थे। मुझसे बहुत वर्ष पहले का उनसे पत्र-व्यवहार था। वहाँ के प्रधान रईस और तालुक़ेदार बाबू जगन्नाथप्रसाद चौधरी के हिंदी-प्रेम के कारण पुरोहित जी की अनुकंपा से मुझे वहीं आना पड़ा था। चौधरी साहब मुझसे उन दिनों बँगला पढ़ते थे। उन्हीं दिनों मैंने वहाँ हिंदी में चार पुस्तकें लिखी थी—भानमती, माधवी कंकणा, नए बाबू और वसंतविकाश-काव्य। ये चारों पुस्तकें चौधरी साहब ने प्रकाशित करवा दी थीं। ये बातें प्रसन्नवश कहनी पड़ीं। अब मूल बात सुनाता हूँ।
घटना सच्ची है और सच्ची घटना उपन्यास से भी कितनी आकर्षक और मनोरंजनकारिणी होती है, इसका पाठक ही अनुमान करेंगे।
पंडित मुन्नालाल पुरोहित चार भाइयों में सबसे बड़े थे। और भाईयों के यथास्थान लग जाने पर भी वे ऐसे स्वतंत्र मिज़ाज के थे कि उन्होंने कभी कोई वैतनिक कार्य करके बंधन में दिन बिताना पसंद ही नहीं किया। पिता जी के बहुत समझाने पर भी उन्होंने कोई सरकारी या ग़ैर-सरकारी नौकरी नहीं की। निशाने के वे इतने पक्के थे कि मैंने उनका 'बंदूक़बहादुर पुरोहित जी नाम रख दिया था।
उन दिनों पार्लियामेंट के प्रसिद्ध मेंबर फ़ौलर साहब शेर का शिकार करने मंडला आए थे। शिकार में उनकी सहायता करने के लिए, जबलपुर के कमिश्नर का प्राइवेट आदेश-पत्र पंडित बालमुकुंद पुरोहित जी के नाम आया था। उसी के अनुसार उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र पंडित मुन्नालाल को फ़ौलर साहब के साथ कर दिया।
डिंडोरी के भयावने जंगल में मुन्नालाल जी फ़ौलर साहब को शिकार खेलाने ले गए। शेर के शिकार में शिकारी लोग ऊँचे मचान से शेर का शिकार किया करते हैं। मौक़ा देखकर भैंसा बाँध देते हैं, और यहीं स्थान देखकर कुछ दूरी पर अपना इतना ऊँचा मचान बनाते हैं कि शेर कुलाँच मारकर उन तक पहुँच न सके। शेर आकर उस भैंसे को मारता और ताज़ा रक्तपान करके उसकी लोथ वहीं छोड़कर चला जाता है तब 24 घंटे के बाद उसका मांस खाने के लिए यह वहाँ फिर आता है। शेर के भैंसा मारकर चला जाने को शिकारी लोग ‘गारा करना’ कहते हैं। जब गारे की ख़बर आती है तब शिकारी अपने सब सामान से लैस होकर मचान पर पहुँच जाते हैं।
ऐसे मौक़े की तलाश करके फ़ौलर साहब के लिए भैंसा बाँधने की तैयारी हो रही थी। मुन्नालाल जी फ़ौलर साहब के साथ जंगल में ख़ेमा डाले पड़े थे कि किसी दूत ने आकर उनको ख़बर दी कि एक जलाशय के पास चार शेर आराम कर रहे हैं।
मुन्नालाल जी अपने सामान के साथ तुरंत चल पड़े। फ़ौलर साहब को समझाकर कैंप में ही छोड़ गए। उनको उत्साह तो बहुत था। वे लंदन से इसी शौक़ के कारण मंडला आए थे। लेकिन जहाँ मचान से शिकार करना नहीं था, वहाँ का ख़तरा जब उन्होंने सुना तब उनकी सलाह मान ली।
मुन्नालाल जी जलाशय के पास पहुँच गए। यहाँ से एक फ़र्लांग पर एक ऊँचा टीला था। उस पर चड़कर उन्होंने देख लिया कि चारों शेर विश्राम कर रहे हैं। एक जोड़ा मियाँ-बीबी का था और दो उनके बच्चे थे। बच्चों से कोई यह न समझ ले कि वे बच्चे बिल्ली के बच्चे थे। वे बच्चे शेर के बच्चे थे और आदमी के लिए वे भी खूँख़ार शेर ही थे। मुन्नालाल जी ने मौक़ा देखकर उसी टीले पर अपना आसन लगाया। पास के किसी ऊँचे पेड़ पर मचान आदि बाँधने का मौक़ा व समय दोनों न थे। उन्होंने झट मँगनी पट ब्याह की बात सोची और दोनों बग़ल में भरी हुई राइफ़लें रखकर तीसरी छतियाली और शेर के सिर का निशाना लगाकर फैर किया। शेर राम वहीं ढेर हो गए और शेरनी चट उठकर दाहिने होती हुई भागने लगी और दोनों बच्चे दूर फैर करने वाले की ओर झपटे।
मुन्नालाल जी ने दूसरा फैर शेरनी पर किया। वह तड़-फड़ा कर जलाशय के ऊँचे भीटे पर जा गिरी तब तीसरी और चौथी और दोनों बच्चों पर करके उन्हें भी बीच राह में ही ख़त्म कर दिया।
इस तरह चार फैरों में चारों शेर मारे गए। जब यह ख़बर फ़ौलर साहब के कैंप में और मंडला में तहसीलदार साहब के घर पहुँची तब फ़ौलर साहब तो दौड़े हुए जलाशय को भागे, लेकिन मंडला में मुन्नालाल की माता जी ने बहुत ही हाय-तोबा मचाया। वे इतनी मचल गईं कि उनकी प्रबोध देने और पिताजी की डाँट का समाधान करने के लिए सब काम छोड़कर मुन्नालाल जी को मंडला जाना ही पड़ा।
माता जी का प्रबोध करने के लिए मुन्नालाल जी पहले महल में गए। उन्होंने हाथ जोड़कर माता जी से निवेदन किया—सब हाल विस्तार-सहित बतलाया। लेकिन माताजी ने एक न सुनी। उनका यही कहना था कि बंदूक़-कारतूस सब नर्मदा में प्रवाह करके घर बैठो। नौकरी करने को मैं नहीं कहती, न घर-गृहस्थी का भार चलाने के लिए तुम्हें कोई काम का बोझ देती हूँ। कहना यही है कि जिस काम में इतना जान-जोखों है वह सब छोड़कर चुपचाप घर बैठो। बेटा, जब तक मैं जीती रहूँ तब तक यह शिकार का काम त्याग दो।
बहुत अच्छा कहकर मुन्नालाल जी पिता के पास गए। यह सबको मालूम था कि मुन्नालाल जी नौकरी-चाकरी नहीं करते, लेकिन साल में चालीस-पचास शेर मारकर कम से कम ढाई-तीन हज़ार रुपया सरकार से इनाम प्राप्त कर लेते हैं। उनके लिए यह सौदा बहुत सुगम था। वह भी अब माता जी की आशा से छूटना चाहता है। यह उनके लिए बड़े संकट का सामना था।
यही सब विचारते हुए वे पिता के सामने पहुँचे। लेकिन यहाँ तो उनको अपने मान्य और नमस्य पिता तथा फ़र्स्ट कलास के अनुभवी मेजिस्ट्रेट के सामने बा-ज़ाब्ता जवाबदेही करनी थी। पिता ने कड़ककर पूछा—क्यों मन्नू! तुमने जब शेर को मार डाला तब शेरनी को क्यों मारने लगे। जो वे दो शेर तुम्हारी जान लेने को तुम पर झपटे थे उनका तुमने क्यों ख़याल नहीं किया। शेरनी को मार डालने को तुमने बंदूक़ छोड़ी, लेकिन कुशल हुआ कि यह मर गई। और उसके बाद तुमने बच्चों को मारा। ऐसी नादानी तुमने क्यों की? तुम क्या अपनी देह से इतने आज़ाद हो कि दो शेरों को सौंपते वक़्त तुमने इतना भी नहीं सोचा कि तुम पर माता, पिता, स्त्री और बच्ची (खुक्की) का भी कुछ हक़ है?
मुन्नालाल जी ने नम्र होकर पिता के सामने सिर झुकाया पर चरणरज माथे पर धर कर निर्भीक भाव से बोले—नहीं दद्दा, मेरी समझ में यह बात अभी तक नहीं आई है कि मैंने नादानी क्या की थी? शेर को जब मैंने मार डाला तब देखा कि शेरनी हाथ से निकलकर भागी जा रही है, इसलिए यही समझकर कि निकल जाने पर फिर वह नहीं मिलेगी। उस पर फ़ैर की और वे दो बच्चे से मेरे ऊपर आ रहे थे, मेरे हाथ से जाते नहीं थे। उनका मुक़ाबला तो मुझसे था ही। मैंने सोचा कि उसको मारकर इन्हें भी गिरा लूँगा।
पिता को और क्रोध हो आया। ये बोले—अरे! तुम तो मूर्ख की ही बातें कर रहे हो मन्नू। उनसे तो तुम्हारी जान जाती ही थी। एक ही झपट्टे में ये तुम्हें ले डालते। तब तुम्हारा शिकार और तुम्हारी ज़िंदगी सब खेल ख़त्म था)।
“नहीं दद्दा! खेल ख़त्म की तो बात ही नहीं थी नि सेकंड की तो खेती थी। इतने में चारों ख़त्म हो गए। अपनी जान का ख़तरा तो तब था जब निशाने में चूक होने का सवाल होता। पंद्रह बरस से तो कभी गोली चूकी नहीं। मैं नीम के पत्ते पर भी तो कभी छुर्रा नहीं छोड़ता। ख़ाली गोली का इस्तेमाल इसी भरोसे तो करता आता हूँ।
पिता जी बेटे की बात जब समझ गए तब बोले—शाबाश बेटा! जाओ। भगवान् तुम्हें सदा सफल करें। फ़ौलर साहब को ख़ुश रखना। वे लंदन में तुम्हारे इस निशाने का बखान करेंगे।
मुन्नालाल जी ने प्रणाम किया और माता जी की बेकली की बात कहकर विनती की उन्हें बड़ी अधीरता है। मैं फिर आकर समझाऊँगा। इस मौक़े पर मुझे फ़ौलर साहब को कैंप में छोड़कर यहाँ इन बातों में उलझने का अवसर नहीं है। क्षमा चाहता हूँ।
जाओ बेटा! मैं सब समझा दूँगा। जब मैं अधीर हो रहा था तब उनका इतना अधीर होना तो स्वाभाविक ही है। मैं सब बतला दूँगा, फिर तुम आकर पूरा समाधान कर देना।
पिताजी से अभयदान पाकर जब मुन्नालाल कैंप में पहुँचे, गारा हो चुका था। इस बार साथ में कथरी बाबू भी लग गए थे। इनका नाम था रजनीकांत चटर्जी। मंडला में लोग इनके नाम को बिगाड़कर कथरी काट कथरी बाबू हँसी में कहा करते थे। इनको मुन्नालाल जी की संगत से शेर का शिकार देखने का शौक़ चर्राया था।
मुन्नालाल जी ने फ़ौलर साहब के सामने पहुँचकर सब बातें आदि से अंत तक कहीं। साहब सब सुन-समझकर ख़ूब हँसे।
उसी दम मचान पर चलने की तैयारी हुई। सब सरंजाम कसा-कसाया था ही। फ़ौलर साहब, मुन्नालाल जी और कथरी बाबू तीनों अपनी अपनी बंदूकें सँभाले हुए मचान पर जा विराजे। सब लोग साँस तक रोके हुए गारे पर शेर की अबाई ताकने लगे।
ठीक समय पर अँगड़ाना-जम्हाता हुआ शेर जब सिंहठवनि से आ पहुँचा, कथरी बाबू बंदूक़ छोड़कर वहीं मचान पर उतान हो गए और नीचे हदर-हदर पानी गिरने लगा।
मुन्नालाल जी ने इशारा किया। फ़ौलर साहब ने आधे मिनट तक निशाना भिड़ाकर जब घोड़ा दबाया तब शेर वहीं से तड़पकर मचान की ओर उछला, लेकिन आधे ही रास्ते में गिरकर ढेर हो गया।
कथरी बाबू की बेहोशी में ही यह सब हो गया। जब सब लोग मचान से उतरे तब फ़ौलर साहब तो फीता निकालकर शेर की दुम से कपारंतक लंबाई फिर चौड़ाई, सीना, कंधा, हाथ, पाँव नापने और नाख़ून ताकने लगे, लेकिन कथरी बाबू उसे बूटों की ठोकर देकर कहने लगे एही शाला आमाके वेहुम कोरेछिलो।
- पुस्तक : सचित्र मासिक पत्रिका भाग-39, खंड 2 (पृष्ठ 455)
- रचनाकार : गोपालराम गहमरी
- प्रकाशन : इंडियन प्रेस
- संस्करण : 1938
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.