[आचार्य जानकीवल्लभ जी की विद्वान् और कलाकार मनीषा ने नलिन जी को जिस तरह आत्मसात् किया है, वह सर्वथा सत्य और सुंदर के समीप है, शिव बनकर!—जग के आँके-बाँके मग पर मुँह उठाए चलते जाना सबके बूते के बाहर है। कुछ प्रभाव पपड़ी छोड़ने लगते हैं तो जैसे नासूर को नाख़ून लग जाता है। कुछ का नाल ही गड़ जाता है। नलिनजी का प्रभाव ऐसा ही था। उनके प्रकृष्ट भावों की बौछार से रुखाई भींग गई थी।]
***
कोई बीस साल पहले, पुस्तक भंडार की जयंती के अवसर पर, हम पहली बार मिले थे। उस समय उनके साथ डॉ० देवराज उपाध्याय भी थे। ऐसे मिले थे कि यह नहीं लगा था, वह नभतल पर विचरते हैं और मैं भूतल पर; वह तारे तोड़ते हैं और मैं फूल चुनता हूँ।
वह तब भी गंभीर थे, मैं तब भी चंचल था। पर उनकी गंभीरता एकाकिनी न थी, मेरी चंचलता का अंतर धूमिल न था। वह निस्तरंग सागर-से थे, मुझमें भी चंद बूँदों से प्यास बुझा लेने की व्याकुलता न थी।
हम ऐसे मिले थे जैसे... पर जब वह हमेशा के लिए बिछुड़ गए तब अपना तब मालूम हुआ। अब अपने विश्रृंखल एवं आत्म-विरोधी व्यकित्व से उनके संश्लिष्ट तथा उदात्त व्यक्तित्व की तुलना करूँ तो जीभ तिड़ी-बिड़ी होने लगे; ताव दे तो तालू से सट जाए।—उन्होंने मानवात्मा के व्यापक और गहन क्षेत्रों की अधांत यात्रा की थी। उनकी जिज्ञासा, उनकी संवेदना, उनकी क्षमता अपनी छाँह भी तो नहीं छूने देती।
व्यक्तिगत जीवन में जाने-अनजाने हम कितने क्षुद्र, अद्भुत, क्षणिक और स्थायी प्रभावों से इकहरे-दुहरे होते रहते हैं। जग के आँके-बाँके मगर पर मुँह उठाए चलते बने आन। सबके बूते के बाहर है। कुछ प्रभाव पपड़ी छोड़ने लगते हैं तो जैसे नासूर को नाख़ून लग जाता है। कुछ का नाल ही गढ़ जाता है। नलिनजी का प्रभाव ऐसा ही था। उनके प्रकृष्ट भावों की बौछार से रुखाई भीग गई थी।
तत्त्व-महत्त्व की बात सहज भाव से और अतिशय साधारणा को असाधारण ढंग से अभिव्यक्त करने की अद्भुत शक्ति थी नलिनजी में।
अनुशीलन और अनुसंधान की-सी गंभीरता के साथ बढ़ जैनेंद्र की सर्वथा अपनी शैली का पूर्वाभास प्रो० कृपानाथ मिश्र में बताते और 'देहाती दुनिया' को हिंदी का प्रथम आँचलिक उपन्यास यों उद्घोषित करते थे जैसे वह इतिहास का संशोधन न कर कोई पीढ़ी-दर-पीढ़ी कही गई बात दुहरा भर रहे हों।
वह प्रकाश-पुंज थे, प्रेरणा-स्रोत थे। हो सकते थे, न प्रकाशित। वह समझते थे नलिनजी यों ही धाक जमाए हुए है; यों ही उनका डंका पिट रहा है; यों ही उनका रंग चढ़ा हुआ है।
उनकी आधुनिकता सघन शास्त्रीयता से फूटी थी; वह बाणभट्ट पर लिखते समय भी आचार्य शिवपूजन सहाय की गद्यशैली को भूलते न थे।
उनके निष्कंप निष्कर्षों से आप असहमत हो सकते थे, उनकी निष्कंपता को चुनौती देना असंभव था।
आरंभ से ही वह मुझ पर अपनी कृपा बरसाते रहे थे। बाज़-बाज़ दफ़ा मैं भीगता न था, पानी-पानी हो जाता था।
एक दिन की बात है। सर्दी का मौसम था। वह सम्मेलन भवन के बाह्य प्रांगण में विराज रहे थे। उनके इर्द-गिर्द कई कुर्सियाँ पड़ी थीं। लोग-बाग बैठे कहकहे लगा रहे थे। दीक्षितजी और दामोदरजी तो अवश्य ही थे। और सूरतें अजनबी थीं। ऐसे में मैं पहुँचा और उनकी एक हल्की-सी पकड़ में मैं गिरफ़्त हो गया। जहाज़घाट से सीधे चल कर आया था। थोड़ा थक भी गया था। कपड़े उतार कर हाथ-मुँह धोने की इच्छा हो रही थी। पर सहसा नलिनजी ने वह तान छेड़ दी कि मैं अपना ध्रुपद-धमार भूल गया।
नलिनजी ने और नरेश ने जब-तब निराला पर जो कुछ लिखा है, मैं समझता हूँ बिहार ही नहीं, समूचे हिंदी-संसार में उससे स्पर्धा करने के योग्य कुछ भी नहीं लिखा गया। फिर भी न जाने क्यों, नलिनजी को यह विश्वास था कि निराला के संबंध में मैं वेदाः प्रमाणम् हूँ।
बादल आते-जाते हैं; गरजने-तरजते हैं; पंछी पर फैलाए गाते चले जाते हैं, पर आकाश मौन रहता है।
काली रात में बदन पर झलमल करती पसीने की बूँदों की तरह तारे जगमग कर उड़ते हैं, उजली में साधना की सिद्धि की तरह हँसी-मुस्कान को चाँदनी छिटकती है पर आकाश मौन रहता है।
एक दिन ब्राह्म मुहूर्त में उगते डूबतों के संधि-रंध्र से एक अरुण आह्वान आता है; सूर्य का तूर्य्य निनादित होता है; आलोक की तीसरी दृष्टि खुल जाती है; मौन की ज्वाल गलने-ढलने लगती है।
और आकाश-वाणी : —
ये स्नातकोत्तर कक्षा के छात्र हैं; ये महाप्रबंध-लेखक। मैं इन्हें आपके पास भेज रहा था—मुजफ़्फ़रपुर। निराला-संबंधी कुछ शंकाएँ हैं। समुचित समाधान की अपेक्षा है।
हाँ, मैं और स्पष्ट हो लूँ, आपसे पहले त्रिलोचनजी और जयकिशोरजी को भी कष्ट दे चुका हूँ।
मेरे चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। क्या आकाश, दिन-दहाड़े, इतने विद्वानों और विद्यार्थियों के बीच, मेरी मिट्टी पलीद करना चाहता है? किंतु ऐसे कुचक्र का कोई संकेत उसकी प्रफुल्ल आकृति में नहीं, प्रसन्न प्रकृति में नहीं। फिर?
मैं सँवरूँ, सँभलुँ, खाँस-खखार कर गला साफ़ करूँ, इसके पहले ही नलिनजी बोल उठे :—
अब जैसे ये पंक्तियाँ हैं...
पंक्तियाँ 'राम की शक्ति-पूजा' की थीं। मेरी हैसियत ख़ुलासा हो गई। नलिनजी आख्याता है, व्याख्याता। वह आलोचक हैं, मैं टीकाकार। सोचा :—
I even I, am he who knoweth the roads.
Through the sky and the wind thereof is my body.
पंक्तियाँ उलट-पुलट कर कही जा रही थीं। मैंने सीधी कर दीं तो उन्होंने 'अनामिका' में वैसी ही छुपी होने की बात बताई। मैंने 'असंभव' कहा तो सांध्य-गोष्ठी के लिए आमंत्रित हो गया। रेडियो स्टेशन से ठीक समय पर उनके घर पहुँचा। छात्रों समेत नलिनजी मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। 'अनामिका' उनके हाथ में थी। बोले—शास्त्रीजी, आप ठीक कह रहे थे; किंतु...फिर भी... अर्थ...
मैंने यथाशक्ति वाच्य, लक्ष्य, व्यंग्य—सब अर्थ बतला दिए। वह नई-नई पंक्तियाँ निकालते गए, मैं...।
यह क्रम काफ़ी देर तक चला। मैंने कहा—नलिनजी, 'राम की शक्ति-पूजा' मेरे सामने लिखी गई थी। उस रोज़ कहीं से कुछ पैसे आ गए थे। निरालाजी बाज़ार गए और दो मोटी-मोटी कारियाँ ख़रीद लाए। तीसरे पहर नहा-धोकर लिखने बैठे और महज़ घंटे भर बाद आरंभ की समास-बहुल सारी पंक्तियाँ लिखकर हँसते हुए कमरे से बाहर निकले और बोले—'देखो, आरंभ कैसा है?
कुँअर चंद्रप्रकाश सिंह और परमानंद वाजपेयी के साथ मैं बाहर बैठा था। तब संस्कृत में ही श्वास-उच्छ्वास लेता था। मुझे पंक्तियाँ प्रौढ़ एवं पूर्ण प्रतीत हुई। मैंने प्रसन्नता प्रकट की तो बोले :—'कुछ क्लिष्ट है, सादगी की तरफ़दारी करने वाले नाक-भौं सिकोड़ेंगे।' हम तीनों ने एक स्वर से आग्रह न किया होता तो संभव है, निरालाजी कुछ पद बदल देते। 'राम की शक्ति-पूजा' के वर्त्तमान रूप का उत्तरदायी हमारा कौतुकी कुचक भी हो सकता है। निरालाजी ने अपनी परेशानी जताई कि राम ने राजीवनयन होने के कारण अपनी एक आँख चढ़ाकर कमल की कमी पूरी करनी चाही, यह कल्पना 'राम की शक्ति-पूजा' में भव्यता के साथ स्वरूप प्राप्त करेगी, पर क्या यह अंतर्गगन की अव्यक्त गिरा का आलोड़न भर होगा या इस किरण के पीछे शास्त्र की उद्वेलित ज्योति भी होगी?...आपने 'अद्भुत रामायण' देखी है?
मैंने कहा, मेरे पिता-श्री पंडित ही नहीं, राम-भक्त भी हैं। मैंने अद्भुत रामायण ही क्यों, आनंद रामायणा भी देखी है। पर मुझे यह प्रसंग कहीं नहीं मिला। हो भी तो अभी मुँदी स्मृति उन्मीलित नहीं हो रही। हाँ, शिवमहिम्नः स्तोत्रम् में अवश्य यह सुरभित सुषमा है :—
हरिस्ते साहस्र कमलवलिमाधाय पदयो
र्यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम्।
और 'कृत्तिवास' में भी इसका स्निग्ध उच्छ्वास है, कुछ ऐसा ही आभास अवचेतन मन पर बिछल रहा है।
निरालाजी को प्रत्यभिज्ञा-सी हुई। उनकी निरानंद आकृत्ति पर जैसे आनंद की धार दौड़ गई।
नलिनजी, मैं यह सब यों ही नहीं कह रहा। मैं निराला को महिम्न या कृत्तिवासी रामायण की याद दिलाऊँ, यह सब कुछ जँचता है? वह तो परंपरा और प्रतिभा के अद्भुत समन्वय हैं। सबके सामने वह यों ही मुझे गौरव देकर गर्वित होते हैं। कुछ वैसी ही बात आज आपने भी की है।
आपके भीतर ज्ञान का क्षीर सागर लहरा रहा है। आपकी प्रज्ञा मधुमती है। तट पर बैठने वाले कुछ छींटे पा जाते हैं तो अपने बबूल-बदन में पारिजात के फूल दिखलाने लगते हैं।
आपने अपने प्रिय जनों के बीच मुझे गौरव देकर अपनी विनय ही नहीं प्रकट की, बोध की वह अव्यय गंध भी प्रकाशित की है जिसके अभाव में अपनी अबोधता निराला की दुर्बोधता का दुर्दांत रूप ग्रहण कर लेती है। 'भारत-भारती' का पहलवान वेस्टलैंड का कचूमर निकालने लगता है!!
मैं कुछ और कहूँ इसके पूर्व ही नलिनजी ने हँसते-हँसते कॉफी का प्याला मेरी ओर बढ़ा दिया।
[ acharya jankivallabhni ki vidvan aur kalakar manisha ne nalini ko jis tarah atmsat kyia hai, wo sarvatha satya aur sundar ke samip hai, shiv bankar!—jag ke anke banke mag par munh uthaye chalte jana sabke bute ke bahar hai. kuch prabhav papDi chhoDne lagte hain to jaise nasur ko nakhun lag jata hai. kuch ka naal hi gaD jata hai. nalinji ka prabhav aisa hi tha. unke prkrisht bhavon ki bauchhar sa rukhai bheeng gai thi. ]
***
koi bees saal pahle, pustak bhanDar ki jayanti ke avsar par, hum pahli baar mile the. us samay unke saath Dau० devraj upadhyay bhi the. aise mile the ki ye nahin laga tha, wo nabhtal par vicharte hain aur main bhutal par; wo tare toDte hain aur main phool chunta hoon.
wo tab bhi gambhir the, main tab bhi chanchal tha. par unki gambhirta ekakini na thi, meri chambalta ka antar dhumil na tha. wo nistrang sagar se the, mujhmen bhi chand bundon se pyaas bujha lene ki vyakulta na thi.
hum aise mile the jaise. . . par jab wo hamesha ke liye bichhuD ge tab apna. tab malum hua. ab apne vishrrinkhal evan aatm virodhi vychitv se unke sanshlisht tatha udaatt vyaktitv ki tulna karun to jeebh tiDi biDi hone lage; taav de to talu se sat jaye. —unhonne manvatma ke vyapak aur gahan kshetron ki adhant yatra ki thi. unki jigyasa, unki sanvedna, unki kshamata apni chhaanh bhi to nahin chhune deti.
vyaktigat jivan mein jane anjane hum kitne kshudr, adbhut, chanik aur sthayi prbhavon se ikahre duhre hote rahte hain. jag ke anke banke mag par munh uthaye chalte bane aan. sabke bute ke bahar hai. kuch prabhav papDi chhoDne lagte hain to jaise nasur ko nakhun lag jata hai. kuch ka naal ho gaDh jata hai. nalinji ka prabhav aisa hi tha. unke prkrisht bhavon ki bauchhar se rukhai bheeg gai thi.
tattv mahattv ki baat sahj bhaav se aur atishay sadharna ko asadharan Dhang se abhivyakt karne ki adbhut shakti thi nalinji mein.
anushilan aur anusandhan ki si gambhirta ke saath baDh jainendr ki sarvatha apni shaili ka purvabhas pro० kripanath mishr mein batate aur dehati duniya ko hindi ka pratham anchalik upanyas yon udghoshit karte the jaise wo itihas ka sanshodhan na kar koi piDhi dar piDhi kahi gai baat duhra bhar rahe hon.
wo parkash punj the, prerna srot the. ho sakte the, na prakashit. wo samajhte the nalinji yon hi dhaak jamaye hue hai; yon hi unka Danka pit raha hai; yon hi unka rang chaDha hua hai.
unki adhunikta saghan shastriyta se phuti thee; wo vanbhatt par likhte samay bhi acharya shivpujan sahay ki gadyashaili ko bhulte na the.
unke nishkamp nishkarsho se aap asahmat ho sakte the, unki nishkampta ko chunauti dena asambhav tha.
arambh se hi wo mujh par apni kripa barsate rahe the. baaj baaj ifa main bhigta na tha, pani pani ho jata tha.
ek din ki baat hai. sardi ka mausam tha. wo sammelan bhavan ke bahya prangan mein viraj rahe the. unke ird gird kai kursiyon paDi theen. log baag baithe kaDakDe laga rahe the. dikshitji aur damodarji to avashya hi the. aur surten ajnabi theen. aise mein main pahuncha aur unki ek halki si pakar mein main giraft ho gaya. ahajghat se sidhe chal kar aaya tha. yodda thak bhi gaya tha. kapDe utaar kar haath munh dhone ki ichchha ho rahi thi. par sahsa nalinji ne wo taan chheD di ki main apna dhrupad dhamar bhool gaya.
nalinji ne aur naresh ne jab tab nirala par jo kuch likha hai, main samajhta hoon bihar hi nahin, samuche hindi sansar mein usse spardha karne ke yogya kuch bho nahin likha gaya. phir bhi na jane kyon, nalinji ko ye vishvas tha ki nirala ke sambandh mein main vedaः prmanam hai.
badal aate jate hain; garajne tarajte hain; panchhi par phailaye gate chale jate hain, par akash maun rahta hai.
kali raat mein badan par jhalmal karti pasine ki bundon ki tarah tare jagmag kar uDte hain, ujli mein sadhana ki siddhi ki tarah hansi muskan ko chandni chhitakti hai par akash maun rahta hai.
ek din braahm muhurt mein ugte Dubton ke sandhi randh se ek arun ahvan aata hai; surya ka turya ninadit hota hai; aalok ki tisri drishti khul jati hai; maun ki jvaal galne Dhalne lagti hai.
aur akash vano ha —
ye snatakottar kaksha ke chhaatr hain; ye mahaprbandh lekhak. main inhen aapke paas bhej raha tha—mujaffarpur. nirala sambandhi kuch shankayen hain. samuchit samadhan ko apeksha hai.
haan, main aur aspasht ho lu, aapse pahle trilochanji aur jayakishorji ko bhi kasht de chuka hoon.
mere chehre par havaiyan uDne lagin. kya akash, din dahaDe, itne vidvanon aur vidyarthiyon ke baanch, meri mitti palid karna chahta hai? kintu aise kuchakr ka koi sanket uski prfull akriti mein nahin, prasann prkriti mein nahin. phir?
main sanvarun, sanbhalun, khaans khakhar kar gala saaf karun, iske pahle hi nalinji bol utheh —ab jaise ye panktiyan hain. . .
panktiyan raam ki shakti puja ki theen. meri haisiyat khulasa ho gai. nalinji akhyata hai, vyakhyata. wo alochak hain, main tikakar. socha ha —
i even i, am he who knoweth the roads.
through the sky and the wind thereof is my body.
panktiyan ulat pulat kar kahi ja rahi theen. mainne sidhi kar deen to unhonne anamika mein vaisi hi chhupi hone ki baat batai. mainne asambhav kaha to sandhya goshthi ke liye amantrit ho gaya. reDiyo steshan se theek samay par unke ghar pahuncha. chhatron samet nalinji meri prtiksha kar rahe the. anamika unke haath mein thi. bole—shastriji, aap theek kah rahe the; kintu. . . phir bhi. . . arth. . .
mainne yathashakti vachya, lakshya, vyang gya—sab arth batala diye. wo nai nai panktiyan nikalte ge, main. . . .
ye kram kafi der tak chala. mainne kaha—nalinji, raam ki shakti puja mere samne likhi gai thi. us roz kahin se kuch paise aa ge the. niralaji bazar ge aur do moti moti kariyan kharid laye. tisre pahar nha dhokar likhne baithe aur mahz ghante bhar baad arambh ki samas bahul sari panktiyan likhkar hanste hue kamre se bahar nikle aur bole—dekho, arambh kaisa hai?
kunar chandraprkash sinh aur parmanand vajapeyi ke saath main bahar baitha tha. tab sanskrit mein hi shvaas uchchhvaas leta tha. mujhe panktiyan praud evan poorn pratit hui. mainne prasannata prakat ko to boleh —kuchh klisht hai, sadgi ki tarafdari karnevale naak bhaun sikoDenge. im tinon ne ek svar se agrah na kiya hota to sambhav hai, niralaji kuch pad badal dete. raam ki shakti puja ke vattman roop ka uttardayi hamara kautuki kuchak bhi ho sakta hai. niralaji ne apni pareshani jatai ki raam ne rajivanyan hone ke karan apni ek ankh chaDhakar kamal ki kami puri karni chahi, ye kalpana raam ki shakti puja mein bhabyta ke saath svarup praapt karegi, par kya ye antarggan ki avyakt gira ka aloDan bhar hoga ya is kirna ke pichhe shaastr ki uddh lit jyoti bhi hogi?. . . aapne adbhut ramayan dekhi hai?
mainne kaha, mere pita shri panDit hi nahin, raam bhakt bhi hain. mainne adbhut ramayan hi kyon, anand ramayna bhi dekhi hai. par mujhe ye prsang kahin nahin mila. ho bhi to abhi mundi smriti unmilit nahin ho rahi. haan, shivamhimnः stotram mein avashya ye surbhit sushama haih —
hariste sahasr kamalavalimadhay padyo
rydekone tasmin nijamudahrannetrakamlam.
aur krittivas mein bhi iska snigdh uchchhvaas hai, kuch aisa hi abhas avchetan man par bichhal raha hai.
niralaji ko pratybhigya si hui. unki niranand akritti par jaise anand ki dhaar dauD gai.
nalinji, main ye sab yon hi nahin kah raha. main nirala ko mahimn ya krittivasi ramayan ki yaad dilaun, ye sab kuch janchata hai? wo to parampara aur pratibha ke adbhut samanvay hain. sabke samne wo yon hi mujhe gaurav dekar garvit hote hain. kuch vaisi hi baat aaj aapne bhi ki hai.
aapke bhitar gyaan ka ksheer sagar lahra raha hai. apaki pragya madhumti hai. tat par baithnevale kuch chhinte pa jate hain to apne babul badan mein parijat ke phool dikhlane lagte hain.
aapne apne priy janon ke beech mujhe gaurav dekar apni vinay hi nahin prakat ki, bodh ki wo avyay gandh bhi prakashit ki hai jiske abhav mein apni abodhata nirala ki durbodhta ka durdant roop grhan kar leti hai. bharat bharti ka pahlavan vestlainD ka kachumar nikalne lagta hai!!
main kuch aur kahun iske poorv hi nalinji ne hanste hanste kauphi ka pyala meri or baDha diya.
[ acharya jankivallabhni ki vidvan aur kalakar manisha ne nalini ko jis tarah atmsat kyia hai, wo sarvatha satya aur sundar ke samip hai, shiv bankar!—jag ke anke banke mag par munh uthaye chalte jana sabke bute ke bahar hai. kuch prabhav papDi chhoDne lagte hain to jaise nasur ko nakhun lag jata hai. kuch ka naal hi gaD jata hai. nalinji ka prabhav aisa hi tha. unke prkrisht bhavon ki bauchhar sa rukhai bheeng gai thi. ]
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unke nishkamp nishkarsho se aap asahmat ho sakte the, unki nishkampta ko chunauti dena asambhav tha.
arambh se hi wo mujh par apni kripa barsate rahe the. baaj baaj ifa main bhigta na tha, pani pani ho jata tha.
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nalinji ne aur naresh ne jab tab nirala par jo kuch likha hai, main samajhta hoon bihar hi nahin, samuche hindi sansar mein usse spardha karne ke yogya kuch bho nahin likha gaya. phir bhi na jane kyon, nalinji ko ye vishvas tha ki nirala ke sambandh mein main vedaः prmanam hai.
badal aate jate hain; garajne tarajte hain; panchhi par phailaye gate chale jate hain, par akash maun rahta hai.
kali raat mein badan par jhalmal karti pasine ki bundon ki tarah tare jagmag kar uDte hain, ujli mein sadhana ki siddhi ki tarah hansi muskan ko chandni chhitakti hai par akash maun rahta hai.
ek din braahm muhurt mein ugte Dubton ke sandhi randh se ek arun ahvan aata hai; surya ka turya ninadit hota hai; aalok ki tisri drishti khul jati hai; maun ki jvaal galne Dhalne lagti hai.
aur akash vano ha —
ye snatakottar kaksha ke chhaatr hain; ye mahaprbandh lekhak. main inhen aapke paas bhej raha tha—mujaffarpur. nirala sambandhi kuch shankayen hain. samuchit samadhan ko apeksha hai.
haan, main aur aspasht ho lu, aapse pahle trilochanji aur jayakishorji ko bhi kasht de chuka hoon.
mere chehre par havaiyan uDne lagin. kya akash, din dahaDe, itne vidvanon aur vidyarthiyon ke baanch, meri mitti palid karna chahta hai? kintu aise kuchakr ka koi sanket uski prfull akriti mein nahin, prasann prkriti mein nahin. phir?
main sanvarun, sanbhalun, khaans khakhar kar gala saaf karun, iske pahle hi nalinji bol utheh —ab jaise ye panktiyan hain. . .
panktiyan raam ki shakti puja ki theen. meri haisiyat khulasa ho gai. nalinji akhyata hai, vyakhyata. wo alochak hain, main tikakar. socha ha —
i even i, am he who knoweth the roads.
through the sky and the wind thereof is my body.
panktiyan ulat pulat kar kahi ja rahi theen. mainne sidhi kar deen to unhonne anamika mein vaisi hi chhupi hone ki baat batai. mainne asambhav kaha to sandhya goshthi ke liye amantrit ho gaya. reDiyo steshan se theek samay par unke ghar pahuncha. chhatron samet nalinji meri prtiksha kar rahe the. anamika unke haath mein thi. bole—shastriji, aap theek kah rahe the; kintu. . . phir bhi. . . arth. . .
mainne yathashakti vachya, lakshya, vyang gya—sab arth batala diye. wo nai nai panktiyan nikalte ge, main. . . .
ye kram kafi der tak chala. mainne kaha—nalinji, raam ki shakti puja mere samne likhi gai thi. us roz kahin se kuch paise aa ge the. niralaji bazar ge aur do moti moti kariyan kharid laye. tisre pahar nha dhokar likhne baithe aur mahz ghante bhar baad arambh ki samas bahul sari panktiyan likhkar hanste hue kamre se bahar nikle aur bole—dekho, arambh kaisa hai?
kunar chandraprkash sinh aur parmanand vajapeyi ke saath main bahar baitha tha. tab sanskrit mein hi shvaas uchchhvaas leta tha. mujhe panktiyan praud evan poorn pratit hui. mainne prasannata prakat ko to boleh —kuchh klisht hai, sadgi ki tarafdari karnevale naak bhaun sikoDenge. im tinon ne ek svar se agrah na kiya hota to sambhav hai, niralaji kuch pad badal dete. raam ki shakti puja ke vattman roop ka uttardayi hamara kautuki kuchak bhi ho sakta hai. niralaji ne apni pareshani jatai ki raam ne rajivanyan hone ke karan apni ek ankh chaDhakar kamal ki kami puri karni chahi, ye kalpana raam ki shakti puja mein bhabyta ke saath svarup praapt karegi, par kya ye antarggan ki avyakt gira ka aloDan bhar hoga ya is kirna ke pichhe shaastr ki uddh lit jyoti bhi hogi?. . . aapne adbhut ramayan dekhi hai?
mainne kaha, mere pita shri panDit hi nahin, raam bhakt bhi hain. mainne adbhut ramayan hi kyon, anand ramayna bhi dekhi hai. par mujhe ye prsang kahin nahin mila. ho bhi to abhi mundi smriti unmilit nahin ho rahi. haan, shivamhimnः stotram mein avashya ye surbhit sushama haih —
hariste sahasr kamalavalimadhay padyo
rydekone tasmin nijamudahrannetrakamlam.
aur krittivas mein bhi iska snigdh uchchhvaas hai, kuch aisa hi abhas avchetan man par bichhal raha hai.
niralaji ko pratybhigya si hui. unki niranand akritti par jaise anand ki dhaar dauD gai.
nalinji, main ye sab yon hi nahin kah raha. main nirala ko mahimn ya krittivasi ramayan ki yaad dilaun, ye sab kuch janchata hai? wo to parampara aur pratibha ke adbhut samanvay hain. sabke samne wo yon hi mujhe gaurav dekar garvit hote hain. kuch vaisi hi baat aaj aapne bhi ki hai.
aapke bhitar gyaan ka ksheer sagar lahra raha hai. apaki pragya madhumti hai. tat par baithnevale kuch chhinte pa jate hain to apne babul badan mein parijat ke phool dikhlane lagte hain.
aapne apne priy janon ke beech mujhe gaurav dekar apni vinay hi nahin prakat ki, bodh ki wo avyay gandh bhi prakashit ki hai jiske abhav mein apni abodhata nirala ki durbodhta ka durdant roop grhan kar leti hai. bharat bharti ka pahlavan vestlainD ka kachumar nikalne lagta hai!!
main kuch aur kahun iske poorv hi nalinji ne hanste hanste kauphi ka pyala meri or baDha diya.
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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