1916 - 2011 | गया, बिहार
हिंदी, संस्कृत के कवि-लेखक-आलोचक। छायावाद के अंतिम स्तंभ के रूप में समादृत।
एक अजब-सा नाम साँप की आँख की तरह अपनी ओर खींचने वाला, मैंने जब पहले-पहल सुना, मेरे कोई काम न था। 'हरी घास पर क्षण भर' औचक ही जब उसे देखा तो 'इत्यलम्' की 'परछाई-सी चोर की' ने बुरी तरह चौंका दिया, मेरी कोई आँख थी क्या उसे सही-सही देखने-परखने के क़ाबिल? परंपरा
[आचार्य जानकीवल्लभ जी की विद्वान् और कलाकार मनीषा ने नलिन जी को जिस तरह आत्मसात् किया है, वह सर्वथा सत्य और सुंदर के समीप है, शिव बनकर!—"जग के आँके-बाँके मग पर मुँह उठाए चलते जाना सबके बूते के बाहर है। कुछ प्रभाव पपड़ी छोड़ने लगते हैं तो जैसे नासूर को
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