मनु मंदरु तनु वेस कलंदरु घट ही तीरथि नावा।
एकु सबदु मेरै प्रानि बसतु है बाहुड़ि जनमि न आवा॥
मनु बेधिआ दइआल सेती मेरी माई।
कउण जाणै पीर पराई। हम नाही चिंत पराई॥ रहाउ।
अगम अगोचर अलख अपारा चिंता करहु हमारी।
जलि थलि महीअलि भरिपुरि लीणा घटि घटि जोति तुम्हारी॥
सिख मति सभ बुधि तुम्हारी मंदिर छावा तेरे।
तुझ बिनु अवरु न जाणा मेरे साहिबा गुण गावा नित नेरे॥
जीअ जंत सभि सरणि तुम्हारी सरव चिंत तुधु पासे।
जो तुधु भावै सोई चंगा इक नानक की अरदासे॥
मैंने शरीर से फ़कीर (कलंदर) के वंश पहने हे, और मन को (परमात्मा के रहने के लिए) मंदिर (बनाया है) और (मैं) अपने घट के तीर्थ में स्नान करता हूँ, एक हरी का नाम ही मेरे प्राणों में बसना है, (इसीलिए) मैं फिर जन्म के अंतर्गत नहीं आऊँगा।
हे मेरी माँ, (मेरा) मन दयालु (परमात्मा) से बिंध गया है। पराई पीर को कौन जान सकता है? (तात्पर्य यह हैं कि मेरे की व्याकुलता को और जान सकता है)? हम तो हरी के बिना और किसी का ख़्याल तक नहीं करते।
(हे) अगम, अगोचर, अलख और अपार (हरी) हमारी चिंता कर। (तू) जल स्थल तथा धरती औऱ आकाश के बीच में पूर्ण रूप में व्याप्त हैं, घट-घट में तेरी ही ज्योति (विराजमान) है।
(हे हरी) सारी शिक्षा, मति और बुद्धि तेरी ही (प्रदान की हुई) हैं। (सारे) घर और विश्राम के स्थान तेरे ही (दिए हुए है)। हे मेरे साहब, मैं तुझे छोड़कर अन्य किसी को नहीं जानता। (इसीलिए) नित्य तेरा गुणगान करता हूँ।
सारे जीव-जंतु तेरी शरण में पड़े हुए हैं और सभी की चिंता तुझे है। (हे हरी), जो (कुछ) तुझे रुचे, वही (मुझे) अच्छा लगे, यही एक नानक की प्रार्थना है।
- पुस्तक : गुरु नानकदेव वाणी और विचार (पृष्ठ 257)
- संपादक : रमेशचंद्र मिश्र
- रचनाकार : गुरु नानक
- प्रकाशन : संत साहित्य संस्थान
- संस्करण : 2003
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