विनायकराव की संपूर्ण रचनाएँ
दोहा 3
कविगण कविता करहि जो, ज्ञानवान रस लेइ।
जन्म देइ पितु पुत्र को, पुत्रि पतिहि सुख देइ॥
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कन्या सुंदर वर चहै, मानु चहै धनवान।
पिता कीर्त्तियुत स्वजन कुल, अपर लोग मिष्टान॥
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नहि सरहिये स्वर्ण गिरि, जहँ तरु तरुहि रहाहि।
धन्य मलयगिरि जहँ सकल, तरु चंदन हुई जाहि॥
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