तेनालीराम की कहानियाँ
मक्खीचूस सेठ
राजा कृष्णदेव राय के राज्य में एक कंजूस सेठ रहता था। उसके पास धन की कोई कमी न थी, पर एक पैसा भी जेब से निकालते समय उसे बड़ा कष्ट होता था। एक बार उसके कुछ मित्रों ने उसे हँसी-हँसी में एक कलाकार से अपना चित्र बनवाने के लिए राज़ी कर लिया, उनके सामने
महाराज की शर्त
महाराज कृष्णदेव राय कई बार अपने दरबारियों की विलक्षण परीक्षाएँ लिया करते थे। ऐसे ही उन्होंने एक दिन भरे दरबार में सभी छोटे-बड़े दरबारियों को हज़ार-हज़ार अशर्फ़ियों से भरी एक-एक थैली दी, फिर बोले : "आप सबको एक सप्ताह का समय दिया जाता है। सप्ताह भर
संदेह
यह बात उन दिनों की है जब राजा कृष्णदेव राय उन दिनों, रायचूर, बीजापुर और गुलबर्गा पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने अपने राज्यपालों से कहा कि वे सेना के लिए आदमी और धन इकट्ठा कर भेजें ताकि शत्रु का सिर पूरी तरह कुचल दिया जाए। एक पड़ोसी राजा
तेनाली की आत्मा
एक बार किसी बात से रुष्ट होकर महाराज कृष्णदेव राय ने तेनालीराम को मृत्युदंड दे दिया यह समाचार आग की तरह पूरे नगर में फैल गया। जिस दिन यह समाचार फैला, उसी दिन से तेनालीराम लोगों को दिखाई देने बंद हो गए। तभी लोगों की ऐसी धस पेड़ के नीचे की जानी निश्चित
तपस्या का सच
विजयनगर राज्य में बड़ी ज़ोरदार ठंड पड़ रही थी। राजा कृष्णदेव राय के दरबार में इस ठंड की बहुत चर्चा हुई। पुरोहित ने महाराज को। पुरोहित ने महाराज को सुझाया। 'महाराज, यदि इन दिनों यज्ञ किया जाए तो उसका फल उत्तम होगा। दूर-दूर तक उठता यज्ञ का धुआँ सारे वातावरण
परीक्षा
मुग़ल बादशाह ने अपने दरबारियों से तेनालीराम की बहुत प्रशंसा सुनी थी। एक दरबारी ने कहा, "आलमपनाह, सुनने में आया है कि तेनालीराम की हाजिर-जवाबी और अक्लमंदी बेमिसाल है।" बादशाह इस बात की सत्यता परखना चाहता था। उसने राजा कृष्णदेव राय को एक मित्रतापूर्ण
रंग-बिरंगी मिठाइयाँ
बसंत् ऋतु छाई हुई थी। राजा कृष्णदेव राय बहुत ही प्रसन्न थे। वे तेनाली राम के साथ बाग़ में टहल रहे थे। वे चाह रहे थे कि एक ऐसा उत्सव मनाया जाए जिसमें उनके राज्य के सारे लोग सम्मिलित हों। पूरा राज्य उत्सव के साथ आनंद में डूब जाए। इस विषय में वह तेनाली
संतुष्ट व्यक्ति के लिए उपहार
एक दिन तेनाली राम बड़ी प्रसन्न मुद्रा में दरबार में आया। उसने बहुत अच्छे कपड़े और गहने पहन रखे थे। उसे देखकर राजा कृष्णदेव राय बोले, “तेनाली, आज तुम बहुत प्रसन्न दिखाई दे रहे हो। क्या बात है?" "महाराज कोई खास बात नहीं है।" तेनाली राम प्यार से बोला। "नहीं
तेनाली की ईमानदारी
तेनालीराम के व्यवहार की शिकायत लेकर कुछ ब्राह्मण राजगुरु के पास पहुँचे। इनमें अधिकांश ब्राह्मण वही थे जिन्हें तेनालीराम सबक सिखा चुका था। राजगुरु तो पहले ही तेनालीराम से जला बैठा था और बदला लेने की ताक में था, क्योंकि उसकी वजह से राजगुरु को कई बार नीचा
मूर्खों का साथ हमेशा दुखदायी
विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय जहाँ कहीं भी जाते, जब भी जाते, अपने साथ हमेशा तेनालीराम को ज़रूर ले जाते थे। इस बात से अन्य दरबारियों को बड़ी चिढ़ होती थी। एक दिन तीन-चार दरबारियों ने मिलकर एकांत में महाराज से प्रार्थना की, 'महाराज, कभी अपने साथ किसी अन्य