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बुल्ले शाह

1680 - 1757 | कसूर, पंजाब

बुल्ले शाह की संपूर्ण रचनाएँ

उद्धरण 2

मुल्ला और मशालची दोनों एक ही मत के हैं। औरों को तो ये प्रकाश देते हैं और स्वयं अंधकार में फँसे रहते हैं।

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और कोई बातें हैं ही नहीं, केवल ईश्वर ईश्वर ही एक बात है। यह रोला कुछ तो इन विद्वानों ने और कुछ इन किताबों के झमेले ने मचा रखा है।

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