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धारावाहिक उपन्यास : जंकामंका गैंग : आधुनिक हिंदी साहित्य का प्राइवेट इतिहास

गताध्याय से आगे...

सात 

भावुकता दुर्गण नहीं है, मनुष्य होने की उच्च अवस्था है। भावुक व्यक्तियों ने ही सच्चा प्रेम किया है। समाज में करुणा का प्रसार किया है। मनुष्यता की रक्षा की है। देश के लिए प्राण न्यौछावर किए हैं। समाजसेवा की है। आज़ादी के लिए संघर्ष किया है। भावुक कवि ने ही पूर्वांचल में जापानी बुख़ार से असमय काल के गाल में समा जाने वाले कोई पचास हज़ार बच्चों के लिए लंबी कविता में विलाप किया है। गंज गोबरहवा के तीक्ष्णकंटक धाम मेडिकल कॉलेज में पूर्वांचल और पश्चिमी बिहार और नेपाल की तराई के दुहमुँहे बच्चों के अपनी माँओं की गोद सूनी कर जाने की पीड़ा और उन रोती-कलपती माँओं की आँखों से बहती हुई जमुआर नाले से भी भीषण आँसुओं की बाढ़ ने कुजलगढ़ स्टेट के राजकुमार डॉक्टर अरिमर्दन सिंह के हृदय को व्यथित कर दिया था। राजकुमार ने ख़ुद अख़बारों में वक्तव्य और प्रशासन को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन देकर, बचाव के लिए पैम्फ़लेट और मच्छरदानी बाँटकर, गोष्ठियाँ करके, इंसेफ़्लाइटिस के ख़िलाफ़ जनजागरूकता अभियान चलाया था। प्रदर्शन किया था। शहर के अख़बार रोज दुहमुँहे बच्चों की विदाई की ख़बरों से भरे रहते थे। अधिकांश बच्चे गाँवों से मेडिकल कॉलेज में आते थे और हँसते खेलते जा नहीं पाते थे, यह कोई और होता था, जो अपने माँ की गोद और पिता के कंधे पर चिरनिद्रा में वापस लौटता था। दरअस्ल, ये बच्चे विपन्न माँ-बाप के बच्चे थे। कुंजलगढ़ स्टेट के राजकुमार अरिमर्दन सिंह भावुक न होते तो इन विपन्न और दुखियारी माँओं के लिए विकल होते? राजकुमार अरिमर्दन दुख से मुक्ति के लिए सिद्धार्थ गौतम की तरह अपनी सोती हुई पत्नी और बेटे को छोड़कर नहीं चले गए थे। वे थे और यहीं थे। अपनी ज़मीन पर रहकर, अपने लोगों के बीच रहकर दुख से मुक्ति के लिए काम कर रहे थे। मुहिम चला रहे थे। अरिमर्दन नए ज़माने के राजकुमार थे। राजकुमार थे और राजकुमार नहीं थे। राजकुमार डॉक्टर अरिमर्दन इंसेफ़्लाइटिस के खि़लाफ़ एक युद्ध लड़ रहे थे। यह उनकी भावुकता थी। एक जुनून था। डॉक्टर अरिमर्दन अक्सर प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके सरकार को घेरते। बताते कि यह सिर्फ़ इस अंचल की समस्या नहीं है, पूरे सत्रह प्रदेश इसकी चपेट हैं। जो बच्चे अस्पताल तक पहुँच पाते हैं, उनके नंबर रिकार्ड में हैं, जो नहीं पहुँच पाते हैं, घर पर ही माँ की गोद से बिछुड़ जाते हैं, उनकी संख्या हमारे पास नहीं है, लेकिन उनका दर्द हमारे पास है। हम उनके साथ हैं। अख़बार डॉक्टर अरिमर्दन के नाम के पहले राजकुमार विशेषण की जगह इंसेफ़्लाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ़ कंपेनर लिखने लगे थे। वे प्रधानमंत्री, केंद्रीय स्वाथ्यमंत्री, मुख्यमंत्री को लिखे पत्रों का अंबार लगा रहे थे। उनके पास प्रतिनिधिमंडल ले जा रहे थे। वायरस के ख़िलाफ़ प्रभावी कार्रवाई के लिए कह रहे थे। विशेषज्ञों की टीम भेजने की बात कर रहे थे। उनका मानना था कि इस महामारी से लड़ने के लिए वैक्सीन विकसित करने के काम पर ध्यान देना ज़रूरी है। डॉक्टर अरिमर्दन के अभियान को लेकर उदय नैतिक रूप से ख़ुद को उनके साथ पाता था। उदय ने ललित कला विभाग के प्रोफ़ेसर भारतभूषण से कहा था कि इंसेफ़्लाइटिस पर लिखी गई उसकी लंबी कविता के कुछ अंश चुनकर उनके पोस्टर बनाएँ और अपने विद्याथियों से जगह-जगह लगाने के लिए कहें। कुछ तो पढ़े-लिखे लोगों का हृदय द्रवित हो, भावना का उद्रेक हो, अपनी सुविधाओं की दुनिया और ख़ासतौर से अपनी-अपनी मच्छरदानियों से बाहर निकलकर अपने अंचल के विपन्न घरों के बच्चों के बारे में सोचें। उनके बारे में न भी सोचें तो, शहर में अपने-अपने मुहल्लों में विचरण करने वाले सुअरों पर अंकुश के लिए लिखें। सूअरबाड़ों को बस्ती के बीच से बाहर करने के लिए कहें। बरसात में जलजमाव न होने देने के लिए काम करें। मच्छरों से बचाव के लिए काम करें। महामारी किसी को भी चपेट में ले सकती है। उदय की अपनी आंतरिक विवशता थी, झंकार, मैं, बीदास इस विवशता को जानते तो थे; लेकिन प्रकट नहीं कर सकते थे कि किस वजह से वह चाहकर भी डॉक्टर अरिमर्दन सिंह के अभियान का हिस्सा नहीं बन पा रहा था। उनके साथ नहीं चल पा रहा था, लेकिन वह अलग रहकर भी उनके अभियान में साथ दे रहा था। प्रोफ़ेसर भारतभूषण जैसे लोगों के पास कुलपति के आस-पास मँडराने से फ़ुर्सत नहीं थी। दूसरे जंकामंका गैंग का डर, उदय के साथ कैसे कहीं खड़े हो सकते थे। महादेवी, पंत और प्रसाद की कविताओं के पोस्टर बनाने पर न जंकामंका सर नाराज़ होते थे, न बल्ली और हौदा। असल में लालची और चालाक लोग कभी अपने पेशे और अपनी कला में जुनूनी नहीं हो सकते हैं। वे सोच-समझकर, लाभ-हानि देखकर कविता लिखते हैं, आलोचना लिखते हैं, चित्र और पोस्टर बनाते हैं। उन्हें अपने अंचल, अपनी मिट्टी से कुछ लेना-देना नहीं होता है। उनके लिए साहित्य और कला, उनकी क्षुद्र एषणाओं की पूर्ति का माध्यम है। उदय के लिए हमेशा साहित्य एक जुनूनी काम रहा है, मौज-मस्ती या नाम-इनाम पाने का ज़रिया नहीं। एक अख़बार ने अपने एक साप्ताहिक अंक में उदय की इंसेफ़्लाइटिस पर लंबी कविता को छापा तो सामाजिक कार्यकर्ता सिद्धार्थ ने उस लंबी कविता की फ़ोटो कॉपी कराकर बाँटा। इस तरह कुछ और लोगों तक कविता पहुँची। यह कविता का प्रभाव क़तई नहीं था कि केंद्र और प्रदेश की सरकारें जागीं और विशेषज्ञों की टीमें आईं, अस्पतालों को और सुविधाएँ दी गईं। टीका विकसित करने काम आगे बढ़ा, यह निसंदेह जनांदोलनों का प्रभाव था। कविता सिर्फ़ कुछ लोगों के हृदय को झंकृत कर सकती है। उनकी भावुकता और चेतना को जगा सकती है, उन्हें जुनूनी बना सकती है, उनके विचार की दुनिया का विस्तार कर सकती है, उनकी चुप्पी को तोड़ सकती है, लेकिन सरकारों को जगाने का काम जनांदोलन ही करते हैं। उदय मुझसे कहता था कि कविता की सीमा है, कविता हृदय को हिलाने-डुलाने का काम करती है, सरकारों को हिलाने का, राजाओं को उनके सिंहासन से उतारने का काम जनांदोलन करते हैं। कवि कोई तोप नहीं होता है, वह भी एक कार्यकर्ता है, कविता का कार्यकर्ता। जैसे समाजिक कार्यकर्ता होते हैं, राजनीतिक कार्यकर्ता होते है। उदय कई लेखों और टिप्पणियों में साहित्यिक पुरस्कारों का ज़बरदस्त विरोध करता रहा है। पुरस्कारों के विरोध में उसने वैसे ही मुहिम चलाने का काम किया है, जैसे सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता करते हैं। उदय ने अपने लेखों में कहा है कि पुरस्कार लेखक को अपने समय के साहित्य और राजनीति का पूरा सच कहने से रोकता है। लेखक के भीतर जब पुरस्कार का चोर बैठ जाता है, तो वह साहित्य और समाज को चूहे की तरह कुतरने का काम करने लगता है। 

पुरस्कार और यश की इच्छा लेखक की भावुकता और नैतिकता का नाश करती है। नाश तो लेखक के साहस और ईमान का भी करती है। इस व्याधि से पीड़ित लेखक न राजनीति का पूरा सच कह पाता है, न साहित्य का। पुरस्कार की एषणा उसके जीवन और साहित्य का उद्देश्य बदल देती है। उसे चलता-पुर्ज़ा आदमी बना देती है। वह शुरू से ही साहित्य के तिकडम में लग जाता है। कह सकते हैं कि लेखक साहित्य में पैदा होते ही, दिल्ली भागता है। एक पैर अपने शहर में रखता है, तो दूसरा दिल्ली में। यह प्रवृत्ति लेखक को आदमी नहीं रहने देती है, शुतुरमुर्ग़ बना देती है, वह उड़ना तो ख़ूब चाहता है, पर उड़ नहीं पाता है। उसे उड़कर नहीं, दिल्ली की ट्रेन में बैठकर दिल्ली जाना पडता है। यह तब की बात है, जब दिल्ली साहित्य की राजधानी हो चुकी थी और मशहूर सिंह देश भर में ट्रेन से ही तूफ़ानी दौरा करके साहित्य के प्रतीकात्मक प्रधानमंत्री निर्वाचित हो चुके थे। उन्होंने बाक़ायदा अपना मंत्रिमंडल भी बना लिया था। उदय के ज़िले के पंडित बिसनाथ मिसिर भी मशहूर सिंह के मंत्रिमंडल में शामिल होने के नाते चाहते थे कि जब वह आएँ, तो रेलवे स्टेशन पर उन्हें लेने और छोडने के लिए जैसे स्वयंप्रसिद्ध आलोचक कमलकांत त्रिपाठी आते हैं, उसी तरह उदय शंकर शुक्ल भी आया करें। एक बार उदय शंकर शुक्ल, कमलकांत त्रिपाठी के साथ रेलवे स्टेशन पर गए भी, लेकिन यह दुर्घटना पहली और आख़िरी बार हुई। उन्होंने देखा, जीआरपी के थाने में पंडित बिसनाथ मिसिर बैठे हुए थे और थाने का इंस्पेक्टर अपने गुरु की सेवा में लगा हुआ था। पंडित जी हो-हो करके हँसे जा रहे थे, रसगुल्ला खाए जा रहे थे कि तभी कमलकांत त्रिपाठी, उदय शंकर शुक्ल के साथ इंस्पेक्टर के कक्ष में पहला पैर रखते ही दौड़ पड़ा, अगल-बग़ल की कुर्सियों से लोगों से हटाकर पर्याप्त जगह बनाकर साष्टांग दण्डवत लेटकर पंडित बिसनाथ मिसिर के चरणों में अपना माथा रख दिया। कमलकांत त्रिपाठी की इस अदा को देखकर उदय बेहोश होते-होते बचे, फिर भी काटो तो ख़ून नहीं जैसी स्थिति पैदा हो गई थी। अस्ल में इस दृश्य की तो उदय ने कभी कल्पना ही नहीं की थी कि इन प्रगतिशील लेखकों की दुनिया में यह सब भी होता होगा। पंडित बिसनाथ मिसिर ने गद्गद् होकर उसे आशीर्वाद भी महान् आलोचक बनने का ही दिया, जो कि वह ख़ुद नहीं हो पाए थे। मशहूर सिंह चूँकि दौड़ में आगे रहते थे, इसलिए पंडित बिसनाथ मिसिर अपना दावा नहीं ठोक पा रहे थे। जंकामंका शास्त्री भी महान् बनने की तीव्र एषणा से पीड़ित थे। बिसनाथ मिसिर में दो दिक़्क़तें थीं, एक तो उनका कोई गैंग नहीं था, वे मशहूर सिंह के गैंग के मेंबर थे और दिल्ली में रहते थे और मशहूर सिंह के सहायक के रूप में प्रसिद्ध थे। दूसरे, खाऊ पंडित थे और बाऊ साहब के दरबार में खाने-पीने की चीज़ों की कोई कमी नहीं थी। रसरंजन और पान भरपूर मिल जाता था... और क्या चाहिए था। इसलिए वह अपने समय के उप महान् लेखक के पद से काम चला रहे थे। जंकामंका शास्त्री की बात दूसरी थी। उन्होंने अपना गैंग बना लिया था। गंज गोबरहवा से दिल्ली तक धावा बोलते थे। एक शोधछात्रा का पति प्रदेश के संस्कृति विभाग का सचिव हो गया था, सो साहित्य अकादेमी की साधारण सभा की सदस्यता के लिए नाम आसानी से चला गया था। साधारण सभा में पहुँचने के बाद सबसे पहले हिंदी परामर्श मंडल के संयोजक की कुर्सी पर दावा ठोंके हुए। जंकामंका का भाग्य तो अत्यंत प्रबल होना ही था। धुरहू प्रसाद जी असीम सर की मौजूदगी में उदय सर से कहा था कि जंकामंका सर का भाग्य भगवान् ने क़लम से नहीं, लोढ़े से लिखा था। जंकामंका सर दंद-फंद, ताम-झाम और तीन-पाँच मे इतना आगे थे कि जैसे ही उपाध्यक्ष की असामयिक मृत्यु हुई, बंदे का भाग्य दिल्ली में नंगा नाच करने लगा। फिर तो हर कुर्सी उसकी थी। हर रास्ता उसका था। साहित्य अकादेमी पर क़ब्ज़ा होते ही महान् लेखक होने का दावा भी ठोंक दिया। उनकी चाल बदल गई थी। दर्प से ऐंठी हुई देह के हर हिस्से, हर छेद, यहाँ तक कि सारे रोमछिद्रों से अहंकार टपकने लगा था। मुस्कान और कुटिल हो गई थी। भला यह सब क्यों नहीं होता। मशहूर सिंह साहित्य की दिल्ली के बादशाह हुआ करें, लेकिन साहित्य अकादेमी उनके चूतड़ के नीचे से खींचकर हँसमुख वाजपेयी के सहायक, गंज गोबरहवा के जंकामंका शास्त्री ले उड़े। हँसमुख वाजपेयी भी देखते और सोचते रह गए, यह क्या हो गया। जो बीसियों साल से पीछे था, आज आगे कैसे हो गया। जंकामंका शास्त्री ने दिल्ली के छोटे-बड़े सभी गैंगों की नींद उड़ा दी थी। गोया मशहूर सिंह के चूतड़ के नीचे से अकादेमी का तकिया नहीं, बल्कि दिल्ली को ही निकाल लिया गया हो। यह दिल्ली का सबसे बुरा समय था, दिल्ली के मठाधीश और उप मठाधीश अपना-अपना चूतड़ सँभाल रहे थे। क्या पता जंकामंका गैंग उनका चूतड़ ही न निकाल ले, फिर वे मंच की कुर्सियों पर कैसे बैठेंगे, हँसमुख वाजपेयी को तो यह चिंता भी हुई कि कमोड पर कैसे बैठेंगे। ज़ाहिर है, उनकी चिंता सबसे मौलिक थी। जंकामंका गैंग पता नहीं क्या कर बैठे! बिसनाथ मिसिर मशहूर सिंह को ताव दिलाते रह गए कि लँगड़ी मार दीजिए, ब्रेक लगा दीजिए, पानी ख़तरे के निशान के कुछ ही सेंटीमीटर नीचे है, पार करते देर नहीं लगेगी। मशहूर सिंह कहते कि पंडित जी परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। यह साल जंकामंका का आख़िरी है, इसके बाद लौटके बुद्धू को घर ही जाना है। जंकामंका सर साहित्य में कोई और काम करने के लिए पैदा ही नहीं हुए थे। साहित्य की कुर्सियों पर बैठने के लिए पैदा हुए थे। जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, ताम-झाम, तड़क-भड़क और ‘मूतो कम—हिलाओ अधिक’ विधि से अर्थात् संपूर्ण जंकामंका शक्ति से लिखने पर नहीं, पद-प्रतिष्ठा जैसी उपलब्धियों को हासिल करते रहे। यह कुर्सी, इससे बड़ी कुर्सी, वह कुर्सी। जंकामंका का जादू था कि वे पैर में जूता पहनकर नहीं, कुर्सी पहनकर चलते थे—खटाखट-खटाखट।

कमलकांत त्रिपाठी की चाँदी, सोने में बदल गई थी। जंकामंका शास्त्री उसकी पीएचडी के सुपरवाइजर भी थे और जंकामंका शास्त्री पर हाल ही में उसने किताब भी संपादित की थी। असल में कमलकांत त्रिपाठी साहित्य के चाँदी नक्षत्र में ही पैदा हुआ था। सारे ग्रह उसके अनुकूल थे। क्या मशहूर सिंह, क्या हँसमुख वाजपेयी, क्या बिसनाथ मिसिर, क्या जंकामंका सर, सब साष्टांग दंडवत् मंत्र से उसकी मुट्ठी में थे। वह अपनी मुट्ठी केवल विशेष और गुप्त कार्यों के लिए खोलता था, थोड़ी देर के लिए विभूतियों को लिखने की मेज़ पर बैठाकर खुला छोड़़ देता था। इससे दो बातें होती थीं, एक तो साहित्य की अपने समय की ये महान् विभूतियाँ ठीक से साँस ले पातीं थीं, दूसरे इसी बीच कमलकांत अपना गुप्त कार्य कर लेने के बाद, दो बार साबुन से हाथ धुलकर, फिर से विभूतियों को अपनी मुट्ठी में बंद कर लेते थे। हालाँकि यह स्वयंप्रसिद्ध आलोचक कमलकांत त्रिपाठी का शुद्ध भ्रम था। विभूतियाँ कोई भभूत तो होती नहीं हैं कि कोई भक्त पुड़िया या मुट्ठी में उन्हें बंद कर ले। जो भी हो कमलकांत के साष्टांगमंत्र ने उन्हें इन विभूतियों के नैकट्य से साहित्य में कई प्रकार के अवसर मिले। कमलकांत त्रिपाठी ने देखते-देखते हिंदी में पुस्तक-समीक्षा का भारी उद्योग खड़ा कर लिया था। हर जगह उसकी पूछ थी। मशहूर सिंह की पत्रिका ‘समालोचना’ से लेकर जंकामंका सर की पत्रिका ‘पवित्र गोबर’ तक, उसकी लिखी रिव्यू की धूम थी। हालाँकि उसे बनना था आचार्य शुक्ल और बन गया हिंदी का सबसे बड़ा पुस्तक-समीक्षक। 

जो भी हो कमलकांत त्रिपाठी जितना मिलनसार आदमी मैंने जीवन में दूसरा नहीं देखा था। क्या मनुष्य, क्या पशु-पक्षी, क्या ईंट-पत्थर, क्या वृक्ष-वनस्पतियाँ, क्या नदी-नाला, क्या साइकिल-मोटर, जो सामने पड़ जाए, सबसे सबका हाल-चाल पूछते थे। रोज़ तो नहीं, लेकिन हफ़्ते में चार-पाँच दिन पैंट की जेब में एक पुड़िया में थोड़ा-सा गुड़ लेकर निकलते थे। 

एक दिन वह रेलवे स्टेशन और पुलिस लाइन के बीच से होकर पैदल ही अपने दफ़्तर जा रहे थे कि रास्ते में पंडित तोताराम शास्त्री सड़क के किनारे पूरब तरफ़ मुँह करके बैठे हुए मिल गए। मिल क्या गए, कमलकांत त्रिपाठी देखते ही खिंचे हुए उनके पास चले गए। पहले पंडित तोतारात शास्त्री को हाथ दिखाया, फिर पूछा महाराज जी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल बनने का योग है या नहीं? पंडित तोताराम शास्त्री ने पहले अपने बग़ल में बैठाकर उसकी दोनों हथेलियो को उलट-पलटकर कर देखा, फिर कहा लेट जाओ और जब लेट गया, तो मैग्नीफ़ाइंग लेंस आँखों के पास लाकर; उसके तलवों को बहुत ग़ौर से देखा और बताया कि योग तो नहीं है, लेकिन बनाया जा सकता है। कमलकांत त्रिपाठी ने झट से उठकर धूल झाड़ते हुए पूछा, “महाराज जी कैसे?” पंडित तोताराम शास्त्री ने रेडीमेड मुस्कान छोड़ते हुए कहा, “सप्ताह में कम से कम तीन दिन सोमवार, मंगलवार, बुधवार को, अपनी श्रद्धा से दिन बढ़ा भी सकते हो, चार-पाँच दिन भी कर सकते हो, घर से निकलते समय सबसे पहले जो आदमी, घोड़ा, ईंट-पत्थर, चिरई-चिरगुन मिले उसे थोड़़ा-सा गुड़ खिलाओ।” “कब तक महाराज...” पूछा तो पंडित जी ने बताया, “बच्चा जब तक तुम आचार्य शुक्ल बन नहीं जाते।” इस तरह बच्चा कमलकांत त्रिपाठी ने तोताराम शास्त्री को बीस रुपये श्रद्धापूर्वक देकर पर्याप्त आशीर्वाद लिया और दफ़्तर की ओर पहला क़दम बढ़ाते ही, ठिठकर रुक गए, मुड़कर पंडित तोताराम शास्त्री जी से पूछा, “महाराज जी, कई दिन घर से बाहर निकलने का योग ही नहीं बना तो क्या करूँगा?” पंडित तोताराम शास्त्री हँसे और बोले, “अरे बावले, घर में जो सबसे पहले मिले उसे ही खिला देना।” फिर पूछा, “महाराज जी, घर में अकेले हुआ तो?” “बच्चा, पड़ोसी को खिला देना, इसमें कौन-सी इतनी बड़ी बात है।” इस तरह कमलकांत त्रिपाठी, कुलगुरु से मिले गुरुमंत्र को भूलकर, पंडित तोताराम शास्त्री से गुड़मंत्र लेकर प्रफुल्लवदन अपने कार्यालय पहुँचकर जिला सूचना अधिकारी की कुर्सी पर हुमुचकर बैठ गए और विभागीय फ़ाइलों को निपटाने की जगह अपने मित्र लीलाधर के नए कविता-संग्रह की रिव्यू करने लगे। कमलकांत त्रिपाठी ज़ोर-शोर से आचार्य शुक्ल बनने के काम में लगे हुए थे। यह हाल हो गया कि कहीं भी बैठकर, ज़मीन पर उकड़ू चाहे खड़े-खड़े, चाहे कमोड पर बैठे-बैठे रिव्यू लिख मारते थे। जिस दिन कोई रिव्यू नहीं लिख पाते थे, पेट में रह-रहकर मरोड़ उठती थी। असल में असीम सर ने उन्हें समझा दिया था कि रोज़ एक रिव्यू लिखोगे, तो बड़़ा आलोचक बन जाओगे। जिस दिन कमलकांत त्रिपाठी के पास कोई नई किताब रिव्यू लिखने के लिए नहीं होती, अव्वल तो ऐसा कभी होता नहीं कि किसी दिन एक-दो किताब रिव्यू के लिए न आएँ, और किसी दिन कोई नहीं आ पाई तो भी, कमलकांत त्रिपाठी जिस किताब की रिव्यू लिख चुके होते, उसकी दुबारा रिव्यू लिखने बैठ जाते थे। भला ऐसे होनहार आलोचक को कौन टक्कर दे सकता था। उनकी पीढ़ी में कोई दूसरा कमलकांत नहीं था। जंकामंका शास्त्री की पत्रिका ‘पवित्र गोबर’ का कोई अंक ऐसा नहीं होता था, जिसमें कमलकांत त्रिपाठी की चार रिव्यू एक साथ न छपती रही हो। देश भर में कोई पत्रिका ऐसी नहीं थी, जिसमें कमलकांत छपते न रहे हों। 

कमलकांत त्रिपाठी जब भी मिलते, उदय का हाल पूछते। उदय के बच्चों के बारे में जानने की कोशिश करते कि कौन क्या कर रहा है। मेरे बारे में भी जानना चाहते कि मैं उदय का बालसखा कब से हूँ। जब भी मिलते एक ही बात पूछते। मैंने तो एक दिन झल्लाकर कह दिया, देखो पंडिज्जी बाब-बार यही सवाल मत किया करो। अरे भाई जब कह दिया कि बचपन का दोस्त हूँ तो समझ लो, बचपन का हूँ। बोले तो पैदा होने के समय से ही उसका दोस्त हूँ। तुम्हारी तरह उसका दो दिनहा दोस्त नहीं हूँ। कमलकांत दो दिनहा कहते ही, सकते में आ गए। लगे सफ़ाई देने कि अरे भाई संटी, नाराज़ क्यों होते हों! मैंने तो ऐसे ही पूछ लिया था। उदय से मेरी दोस्ती शिक्षाकाल से है। उदय और मैं हॉस्टल में साथ ही रहते थे। मैं जमुआर हास्टल में रहता था और ठीक सामने वाले राप्ती हास्टल में उदय। तब से हमारी दोस्ती है। अच्छा, दोस्ती है, कितनी है, मैंने पूछ लिया तो अचकचाकर रह गए। जाओ पंडित कमलकांत त्रिपाठी तुम क्या जानो दोस्ती का स्वाद, तुम तो मतलब का स्वाद जानते हो। जंकामंका शास्त्री को और उनके गैंग को ख़ुश करने के लिए, तुम एक क्या, सौ उदय शंकर सुकुल का गला काट सकते हो। पान की पीक उनके मुँह पर मेरा मतलब उनके सामने थूककर चला आया। उदय को बताया, तो बोला जाने दो, संटी, लिखने-पढ़ने की दुनिया में सब मतलब के यार हैं। कौन साला किसी से दिल से दोस्ती करता है। अच्छा हुआ कि तुम लेखक नहीं हुए। झंकार ने लिखना छोड़़ दिया और बीदास रेलवे में चला गया। अच्छा छोड़ो कमलकांत को। शाम को, झंकार आ रहा है। रात का खाना साथ खाएँगे। 

उदय का लिखने-पढ़ने का कमरा बड़ा था। उसी में एक सिंगल सीटर सोफ़े पर मैं धँस जाता था। सामने दीवान पर झंकार पालथी मारकर बैठ जाता था और बीदास उदय के बग़ल में थ्री सीटर सोफ़े पर। फिर तो उदय लिखने-पढ़़ने की दुनिया के सारे रंज़-ओ-गम भूल जाता था। शाम हो तो एक बैठकी में कम से कम दो चाय और इतवार का दिन हो तो कम से कम तीन चाय के बीच असंख्य ठहाके लगते थे। बच्चे चौंक-चौंककर अंदर से देखने आ जाते थे। आमतौर पर हम साहित्य की बात नहीं करते थे। घर-बार, जवार, किशोर जीवन के क़िस्से, स्कूल से निकलकर जमुआर पुल पर जाकर एक ही सिगरेट से कश लगाने और क्लास के दूसरे छात्रों का मज़ाक़ उड़ाने का काम करते थे। कभी-कभी माहौल बहुत ग़मगीन भी हो जाता था। हमारे साथ दर्जा आठ में पढ़ने वाले शंकर को सड़क के किनारे पंचर बनाते देखने का ज़िक्र करके हम बहुत दुखी हो जाते। बीदास बता रहा था कि कैसे उसकी कार शंकर की दुकान के सामने पंक्चर हो गई थी और जब वह कार से निकलकर शंकर के सामने खड़ा हुआ तो शंकर उसे देखकर भी नहीं देख रहा था और तुरत वहाँ से हट गया था। फिर कभी उसकी दुकान के सामने रुका ही नहीं। असल में बीदास रेलवे का बड़ा अफ़सर हो गया था और शंकर तो अभी भी वहीं था, जहाँ था। शंकर का बेटा भी पंक्चर बनाने के काम में उसके साथ था। उस समय बीदास का पहिया उसे ही ठीक करना था और बीदास का सिविल की तैयारी करने वाला बेटा कार में बैठा हुआ था। यह एक सामाजिक विडंबना थी, जिससे सब आहत होते थे। उदय ने कहा भी, बीदास शंकर के बच्चों के लिए, यहाँ वर्कशाप में कुछ देख सकता हो, किसी ठेकेदार से भी कह सकते हो। झंकार ने कहा, उससे शंकर की बातचीत होती है, साइकिल का पंक्चर भी वही बनाता है, लाख कहता हूँ, कभी पैसा नहीं लेता है। अस्ल में दोस्ती उसके दिल से कभी गई ही नहीं थी। सबके हाल-चाल पूछता है। सबके बच्चों के बारे में पूछता है। ख़ाली रहता है, तो चाय के साथ स्कूल की बातें करता है। उसकी आँखों को डबडबाता देख नहीं पाता हूँ। उठकर चल देता हूँ। ये हिंदी के लेखक साले क्या जाने दोस्ती क्या चीज़ है। बीदास को भी कमलकांत त्रिपाठी का कांड झंकार से मालूम हो गया था। उदय से पूछा कि तुमने उसे कुछ कहा नहीं... उदय ने बताया कि उसके घर गया था, उसकी पत्नी भी साथ ही बैठी हुई थीं, उनके सामने उसे क्या कहता। बस इतना ही कहा, ‘इंडिया टुडे’ के साहित्य संपादक से फ़ोन पर बात हुई थी, उन्होंने कहा कि तुमने मेरे नए संग्रह की रिव्यू उन्हें अब तक नहीं भेजी है। नहीं लिखना था तो पहले ही कह देते। साल भर से झूठ क्यों कहते रहे कि भेज दिया है। उदय लंबे समय से कमलकांत त्रिपाठी की चोर आँखों में प्रोफ़ेसर होने की एषणा को चमकते हुए देख रहा था। कई बार उसे समझाया भी कि हिंदी विभागों से बुरी कोई दूसरी जगह देश में नहीं है। तुम झूठ-मूठ में प्रोफ़ेसर होने के लिए मरे जा रहे हो। एक-दो प्रोफे़सर होते हैं, जिनका काम होता है, चरित्र होता है, बाक़ी हौदा, बल्ली, कीट, पतंग, साथी, हाथी होते हैं। उसने सोच रखा था कि प्रोफ़ेसर होते ही धड़ाक से आचार्य शुक्ल हो जाएगा। इसके लिए वह किसी का भी गला काट सकता था, किसी का भी पाजामा और धोती फींच सकता है, सचमुच का चूतड़ धुल सकता है, क्या जंकामंका का चूतड़, क्या बल्ली और हौदा का चूतड़। उदय को धोखा देना, जंकामंका गैंग से डरकर रिव्यू न लिखना तो मामूली बात है, मच्छर मारने जितनी मामूली बात। उदय के लिए यह ग़ैर-मामूली बात थी। कोई शिक्षाकाल का मित्र धोखा देगा, यह तो उसने कभी सोचा ही नहीं था। इस घटना ने उदय में ज़बरदस्त विस्फोट किया उसने अपने दूसरे हाथ को ख़ाली किया, एक हाथ से कविता लिखना लिखता रहा और दूसरे हाथ में आलोचना का खड्ग उठा लिया। ज़बरदस्त लेख लिखे। पत्रिकाओं में छपे और एक नए और धमाकेदार आलोचक का पर्दापण हुआ। जंकामंका शास्त्री भी उदय के इस अवतार से हैरत में थे। उनका गैंग सकते में था, कविताएँ भी पहले मारक थीं, अब तो यह आलोचना का खड्ग इसके हाथ में आ गया है। क्या तर्क करता है, कमज़ोर कविताओं और आलोचना की धज्जियाँ उड़ाता है, जो बेईमान सामने आ जाए तो काटकर रख देता है। इस तरह के धोखे और इससे पैदा अकेलेपन ने उदय को बहुत मज़बूत किया। धोखे उसे हिंदी विभाग के बाहर ही नहीं, भीतर भी ख़ूब मिले। प्रोफ़ेसर कीट, प्रोफे़सर पतंग, प्रोफे़सर हाथी, प्रोफे़सर साथी, उदय को धोखा देने के लिए ही हिंदी की दुनिया मे पैदा हुए थे। वे इसी ताक में रहते थे कि उदय को धोखा कब दें और जंकामंका गैंग उनके हाथ में तुरत अशर्फ़ी पकड़ा दे। उदय को धोखा देने वाली हिंदी की इस नंगी पीढ़ी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था, क्योंकि उसके लिए लड़ना ही जीवन था। उसे यह पता था कि स्वार्थ में नहीं, संघर्ष में किसी स्वाभिमानी लेखक की आज़माइश होती है। धोखा इंसान को फ़ौरी तौर पर नुक़सान ज़रूर पहुँचाता है, लेकिन आगे चलकर उससे फ़ायदा ही होता हैं, इंसान को आग में तपाकर खरा सोना बना देता है।

उदय अपनी डायरी के पन्ने पलटते जाता है, हर दिन एक नया दिन होता है, नया जीवन होता है, जिसका हाल-हवाल लिखता जाता था। नए पन्ने की शुरुआत तारीख़ और जगह लिखकर करता था। जैसे : 24 अगस्त 23, शाम के 6.30, बेंगलुरु।

कल यहाँ पहुँचते ही मौसम का फ़र्क़ मालूम होना तो दूर की बात है, हवाई अड्डे से अपार्टमेंट पहुँचने के रास्ते में डायरेक्ट महसूस किया। गंज गोबरहवा की उमस भरी गर्मी से दूर, एक गुलाबी ठंड ने हमारी रूह और जिस्म को छूकर हमारे कानों में हौले से ख़ुश-आमदीद कहा। हमारी नातिन ने पूछा, नानू कैसा लग रहा है, मैंने कहा बहुत अच्छा, मेरे बच्चे। रोज़ पूछती है, यहाँ कैसा लग रहा है, मैं कहता हूँ, बहुत अच्छा और उसे बेतहाशा चूमने लगता हूँ, जैसे मौसम मेरी गोद में हो और उसके गाल चूम रहा होऊँ। 

अपार्टमेंट की तीसरी बालकनी में झूले पर बैठकर सिल्वर ओक के लंबे-लंबे दरख़्तों की क़तार, हरे-हरे और झूमते हुए पाम की क़तारें, इंडियन बीच, इंडियन ब्लैकबेरी, गोल्डन शॉवर, अशोक, सीता अशोक, पलाश, हरसिंगार, कचनार और बंबू से लेकर मोरपंखी तक न जाने कितने बड़े, मँझोले और छोटे वृक्षों की पंक्तियाँ और अज्ञातकुलशील झाड़ियाँ, बाँह पकड़ लेती हैं। अपनी बाँहों में भींच लेना चाहती हैं और कहना न मानो तो आँखों में बस जाती हैं। जहाँ जाओ, अपनी हरियाली और अपने रंग के संग-संग चली जाती हैं। यह एक बड़ा शहर है और इस बड़े शहर में जिस जगह अपार्टमेंट है, उसके सामने एक जंगल जैसा है। इस हरियाली के आगे गंज गोबरहवा एक उजाड़ है। जिस शहर में जंकामंका गैंग का राज हो, वह शहर कभी बसा हुआ लग सकता है? 

गंज गोबरहवा और दक्षिण के जिस शहर में इस वक़्त हूँ, दूरी ही नहीं, मौसम और प्राकृतिक दृश्यों में भी बहुत फ़र्क़ है। यह फ़र्क़ मन के बदलाव का भी है। छोटी और उसकी बच्ची के पास रहने का मतलब ही है, अस्पताल की याद और बीमारी की दहशत को भूल जाना कि प्रोफ़ेसर उदय शंकर शुक्ल तुम्हें कुछ हुआ भी है और कुछ ही दिन पहले गंभीर स्थिति में भर्ती होने के बाद हॉस्पिटल से लौटे हो। एंजाइना के दर्द से बचकर निकले हो। यह भी भूल गया हूँ कि मुझे बीपी, शुगर, एलर्जी, थायरॉयड वग़ैरा दूसरी दिक़्क़तें भी हैं। 

दवाएँ भी सुबह-शाम नातिन आकर खिलाती है। अपार्टमेंट में एक नहीं, तीन बालकनी है, लेकिन मैं बीच की बालकनी में टँगे झूले पर सुबह-शाम और दुपहर में भी बैठकर वृक्षों की हरियाली और रंगों की छटा और आसमान में विचरण करते बादलों को निहारता रहता हूँ। भूल गया हूँ कि लिखी जा रही किताब को पूरा करना है। अस्ल में मन का लिखने के लिए मन का जीना भी ज़रूरी होता है। इस मन का जीने में कुछ प्यारे लोग ही नहीं, प्यारी प्रकृति भी शामिल होती है। न-न मन का जीने में यश-पुरस्कार जैसी मूर्खताएँ नहीं शामिल होती हैं, ये चीज़ें मन का जीना नहीं, मन का भ्रम हैं और क्यों न कहूँ कि ईश्वर की कृपा से शुरू से ही इस मूर्खतापूर्ण भ्रम से मुक्त हूँ। इसके साथ जीना कोई जीना है, साहित्यिक दासता है, दासता। 

यहाँ सब अच्छा है, लेकिन बेटी-दामाद के पास कितने दिन रहेंगे। लौटना तो उसी दड़बे में है, जहाँ छोटी-सी जगह में एक ओर जंकामंका गैंग है और दूसरी ओर खड्गहस्त मैं। रिटायर हुए छह-सात साल हुए होंगे; लेकिन साहित्य की लड़ाई से न रिटायर हुआ हूँ, न इसे बीच में छोड़ सकता हूँ। शुरू से ही हाथ में खड्ग लेकर साहित्य में नहीं आ गया था। मैं भी आम किशोरों और युवाओं की तरह बंद और ख़ाली मुट्ठी लेकर साहित्य में आया था। यह अलग बात है कि बाबू जी ने बड़े ज्योतिषाचार्य और अपने कुलगुरु पंडित वाचस्पति मिश्र का उन्हीं की बनाई मेरी कुंडली को दुबारा दिखाकर पूछा था कि बाबा यह लड़का बनेगा क्या और बाबा ने बताया भी था कि बच्चा, उदै तो विद्या की दुनिया में नाम करेगा, कवि बनेगा, तुम्हारा नाम रोशन करेगा। दुनिया इसके तेज को देखेगी और कहेगी कि पंडित शीतल प्रसाद सुकुल का बेटा हैं। बाबू जी ने जाते-जाते कुलगुरु महाराज से पूछा था कि बाबा, यह सब तो ठीक, लेकिन लड़का पैसा कितना कमाएगा? चिंता न करो बच्चा, इतना कमाएगा कि तुम्हारा और उसका बुढ़ापा ठीक से कट जाएगा और तुम्हारे पोते-पोतियों के लिए भी कुछ जोड़ जाएगा। बाबू जी यह थोड़े चाहते थे कि उनका बच्चा किसी लड़ाई-झगड़े में पड़े, वे चाहते थे कि और बच्चों की तरह सिर्फ़ अपना काम करे और अपने काम से मतलब रखे। कोई वीर अपनी माँ के पेट से चेतक पर बैठकर थोड़े पैदा होता है। कई बार परिस्थितियाँ वीर बना देती हैं। ठोकरें, चट्टान। पहली चोट के बाद पलटकर वार करने का गुर समय-गुरु सिखा देता है। मैंने यह सब ख़ुद नहीं करना चाहा था, मुझे साहित्य में क्रांति करने का कोई शौक़ नहीं था और क्रांतियाँ शौक़ से होती भी तो नहीं हैं। हिंदी की दुनिया में मुझे भी तलुवे भर की जगह चाहिए थी, जहाँ बैठ सकूँ या खड़ा हो सकूँ, साँस ले सकूँ... लेकिन जंकामंका गैंग ने सुई की नोंक के बराबर भी ज़मीन मुझे नहीं दी, तो मुझे अपने हिस्से की ज़मीन लेने और दूसरों की ज़मीन हिंदी के राक्षसों से छुड़ाकर, सही लोगों तक पहुँचाने की लड़ाई करनी पड़ी। अफ़सोस हिंदी की दुनिया में हिंदी की बेहतरी के लिए की गयी इस लड़ाई में मुझे न गुरुजनों का साथ मिला, न गुरुभाइयों और बड़े भाइयों का। मिलता भी कैसे लड़ाई तो उन्हीं के खि़लाफ़ थी। कोई भी लड़ाई आगे चलकर क्या रूप लेगी और कितना व्यापक हो जाएगी, कौन जानता है, कोई चिंगारी आग का कितना बड़ा बवंडर कहाँ तक फैलाएगी, चिंगारी को क्या मालूम?

बालकनी में बहुत अच्छी हवा चल रही है, कुछ तेज़ कह सकते हैं। डायरी के पन्ने फड़फड़ा रहे हैं। डायरी को बंद करना होगा। मैं नहीं चाहता कि मेरी डायरी का पन्ना निकलकर दूर देश या अनजान जगह खो जाए, जहाँ कोई मेरी हिंदी को नहीं जानता।

उदय से दूसरे दिन फ़ोन पर बात हुई थी। बता रहा था कि पहले से बेहतर है। यहाँ का मौसम  अच्छा है। बस, अपार्टमेंट के बग़ल की लंबी-चौड़ी ज़मीन में कंस्ट्रक्शन चल रहा है। दिन भर मशीनों का ज़बरदस्त शोर रहता है। अपार्टमेंट की खिड़कियों-दरवाज़ों को ठीक से बंद रखो तो शोर कम हो जाता है। मैंने पूछा कि बिटिया-दामाद और परी जैसी नातिन का क्या हाल है, तो कह रहा था, नातिन अपने संटी नाना को याद कर रही है। मैंने कहा था, यार बहुत दूर है, जहाज़ में बैठना बहुत महँगा होगा और कभी बैठा भी तो नहीं हूँ। ट्रेन में तीन दिन लग जाएँगे। भाई ऐसा कर मेरी ओर से नातिन से माफ़ी माँग ले। कहना कि आएगी तो घुमाने के लिए कुशीनगर, कपिलवस्तु और वहाँ से ककरहवा होते हुए लुम्बिनी ले चलूँगा। उदय ने कहा था कि संटी पैसे की बात भूल जाओ, टिकट तुम्हारी भतीजी कर देगी, बस डेट बताओ। मैंने ही मना किया, नहीं यार, गंज गोबरहवा से गोरखपुर जाना पड़ेगा, फिर वहाँ से जहाज़ पकड़ना पड़ेगा। मुझे तो पता ही नहीं कि जहाज़ में घुसते और बैठते कैसे हैं! अच्छा ये बता कि वहाँ कुछ लिख-पढ़ रहा है या नहीं। आईसीयू जाने से पहले जो काम कर रहा था, कुछ आगे बढ़ाया या नहीं? उदय ने कहा कि यार यहाँ कुछ कर नहीं पाऊँगा। सारा समय बच्चों के साथ बीत जाता है। लौटकर किताब पूरी करता हूँ। अस्ल में अच्छी किताबें अपने समय पर पूरी होती है। रोज़ लिखना नहीं हो पाता है। कभी कुछ तो कभी कुछ लगा रहता है। उदय को कहाँ पता था कि आईसीयू में जाना पड़ेगा और लौटकर आने के बाद बेटी के साथ आना पड़ेगा। बेटा, बड़ी बेटी, उसकी बेटी और बड़े दामाद, विदेश से दिसंबर या जनवरी में लौटेंगे, उसके पहले उदय गंज गोबरहवा लौट आएगा। हर वीर को अपने-अपने गंज गोबरहवा में लौटना ही पड़ता है। जब तक साँस है, तब तक लडाई है। कुछ लड़ाइयाँ कभी ख़त्म नहीं होती हैं, चलती रहती हैं। बाहर की फ़ौज को लड़कर अपनी धरती से भगा सकते है। किसी संस्कृति के भीतर के संघर्ष को आसानी से अंजाम तक नहीं पहुँचा सकते है। अपसंस्कृति को हराना उतना आसान नहीं है, जितना किसी फ़ौज को हराना। साहित्य की अपसंस्कृति और अनीति के ख़िलाफ़, अंधविश्वास, अन्याय और नाम-इनाम की क्षुद्र एषणाओं के ख़िलाफ़ लड़ाई बहुत से बहुत लंबी है। गांधी, सुभाष, भगत सिंह, आज़ाद, कोई भी आकर इसको अपने समय में ख़त्म नहीं कर सकता। हिंदी की जनता कुछ सुनने को तैयार ही नहीं। वह लिखी हुई कविता को नहीं, मिले हुए पुरस्कार को देखती है। दिल्ली से क्या बोला जा रहा है, वह देखती हैं। वह लेखकों को पढ़ती कम है, उनका साड़ी-फाड़, पाजामा-फाड़, पतलून-फाड़ नाच अधिक देखती है। उसके लिए साहित्य और लौंड़ा-नाच मे कोई फ़र्क़ नहीं रह गया है। मैं तो ख़ैर कोई लेखक-फेंकक नहीं हूँ, लेकिन उदय के संघर्ष का चश्मदीद गवाह तो हूँ। सब मेरी आँखों के सामने है। जो आज की बात है, वह भी, जो कल की बात है, वह भी।

नई दिल्ली टाइम्स के संपादक पंडित विद्याभूषण शुक्ल गंज गोबरहवा के प्रेस क्लब में असीम सर के कविता-संग्रह का लोकार्पण कर रहे थे। असीम सर जँचते ख़ूब थे। उनकी धज की सुंदरता का वर्णन क्या करूँ, ख़ासतौर से उनका मुखमंडल और उनकी वाणी के आगे जंकामंका सर पानी भरते हुए लगते थे। मंच के सामने पहली पंक्ति में मेरे एक ओर उदय बैठा था, दूसरी ओर धुरहू प्रसाद। धुरहू ने मेरे कान में कहा, संटी भाई साहब, असीम गुरु को दो लोगों ने बर्बाद कर दिया नहीं तो आज नंबर एक कवि असीम सर होते। असीम सर अपनी कविता सुना रहे थे, लगता था कि सभा में उपस्थित श्रोताओं को नहीं, छत पर दिख रही किसी छाया को सुना रहे थे, प्रिये मेरे पास/ अपना कोई घर नहीं था/ बड़ा घर नहीं था/ सोचा दिल को/ थोड़ा और बड़ा कर लूँ/ थोड़ा और/ और उसमें बना लूँ/ एक ऐसा घर/ जिसमें एक अदद/ प्रेम करने वाली/ दुनिया की सबसे सुंदर स्त्री हो/ उसके लिए दुनिया भर की चीज़ें हों/ ढेर सारे नौकर-चाकर हों/ फूल-पत्तियाँ हो/ चाँद-तारे हों/ सब हो मेरे पास/ जो आज मेरे पास नहीं है/ मेरे पास जो है उसमें मैं नहीं हूँ/ मैं तो अभी भी वहीं/ गुलमोहर से पीठ टिकाकर बैठा हूँ/ और बैठे-बैठे ग़रीबों का बादाम खाते हुए बना रहा हूँ/ कविता में घर, धुरहू प्रसाद कान में बोले, संटी जी, जिन दो लोगों ने असीम सर को बर्बाद किया, उसमें जोधा बाई साँवलिया, पहले तो पहले नंबर पर थीं, लेकिन उनके जाने के बाद जंकामंका सर ने असीम सर को अपने गैंग में भर्ती करके अपने वश में कर लिया। आज तक मुक्त नहीं हुए। असीम सर का अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं रह गया, गैंग के लोगों ने झूठी तारीफ़ कर-करके असीम सर का बड़ा नुक़सान किया है। धुरहू प्रसाद, माइक के सामने पद्मश्री पंडित विद्याभूषण शुक्ल के आते ही चुप हो गए। विद्याभूषण जी ने बोलना शुरू किया, आज की हिंदी कविता में बनुआ कवियों की भरमार हैं, कोई इनका नक़लची है, कोई उनका नक़लची, लेकिन अपनी कविता लिखने में जिन कवियों का विश्वास आज भी बना हुआ है, उनमें असीम की कविताएँ, कविता के प्रति भरोसा और उम्मीद पैदा करती हैं। असीम अपने पाठकों के कवि हैं, क्योंकि वह सहजता के कवि हैं। सभागार खचाखच भरा हुआ था। पंडित विद्याभूषण जी के बोलने के बाद जलपान का प्रबंध था। जलपान के दौरान सब विद्याभूषण जी से मिल लेना चाहते थे। मैं भी उदय के साथ उनके पास चला गया। पंडित जी ने उदय से बहुत प्यार से पूछा, “कैसे हो उदय...” उदय के जी ठीक हूँ, कहने के बाद मुझसे बोले कि अरे संटी सुकुल, कैसे हो, मेरे, जी ठीक है, कहते ही बोले, संटी तुम भी कुछ लिखा-विखा करो। तुम लोग शाम को आओ।

शाम को मिले तो पंडित विद्याभूषण जी तरंग में थे। देखते ही बोले, उदय अपनी कविताएँ साप्ताहिक अंक के लिए भेज दो। बहुत अच्छा लिखते हो। फिर पंडित जी मुझे लेखक बनाने के एजेंडे पर आ गए। मैं घबड़ाया, कहीं ऐसा न हो कि पंडित जी मुझे आज ही और अभी लेखक बना दें। वास्तव में लेखक इसलिए बनना चाहता था कि असल लेखक बनूँगा, तो जीवन में दुख और अपमान के अलावा कुछ और नहीं मिलेगा, हरामी लेखक बनूँगा तो अशर्फ़ियों से आज भले खेलूँ, हर जगह रोशनी में नहाऊँ-जगमगाऊँ, लेकिन हिंदी के साथ दग़ा करूँगा, पुरखों के साथ छल करूँगा, अपने वक़्त के साथ, अपने साथ धोखा करूँगा। लेखक नहीं बनूँगा, लेकन पंडित जी सोटा लेकर बैठे हुए थे कि बनना ही बनना है। पंडित जी बोले संटी, तुम एक काम करो। जो सब कर रहे हैं वह मत करो। कुछ नया लिखो, जो देखा-सुना है, उसे लिखो। जस का तस लिखो। अपने समय के साहित्य का इतिहास लिखो। साहित्य का इतिहास लिखने के लिए ज़रूरी है कि लिखने वाला तटस्थ हो, वस्तुनिष्ठ हो, स्वार्थ और भय से मुक्त हो। यह सब तुममें है। उदय के दोस्त हो, उदय जितने बहादुर भी हो। आज का इतिहास लिखने के लिए ज़रूरी नहीं कि लिखने वाला आचार्य शुक्ल जैसा आलोचक हो, बस कविता और आलोचना का थोड़ा-बहुत जानकार हो, तो भी चलेगा। बस ईमानदार हो। तुममें यह गुण है संटी, तुम अपने समय के साहित्य का इतिहास लिख सकते हो। मैंने पंडी जी से कहा, लेकिन पंडी जी, इतिहास तो बीत गए का होता है, वर्तमान का कहाँ! पंडिज्जी हँसे, बोले अरे भोले पंडित संटी सुकुल, आज जो देख रहे हो, सब बीत रहा है और हिंदी की दुनिया में जिसे चलता-फिरता देख रहे हो, ये सब जीवित कहाँ हैं, इनकी आत्माएँ यश और पुरस्कार के विष से मरी हुई हैं। तुम मान लो कि ये सब मुर्दे हैं और आज के लेखकों की दुनिया मुर्दों की दुनिया है। लिखो, आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास भाग दो। पिछले पचास साल का इतिहास लिखो। मैं अपने अख़बार में धारावाहिक रूप में हर रविवार को छापूँगा। तुम लिखो। अरे हाँ, तुम अपने इतिहास का नाम ‘आधुनिक हिंदी साहित्य का प्राइवेट इतिहास’ भी कर सकते हो। लेखक हो या लेखिका, सबको आगे से भी देखो और पीछे से भी देखो। लेखक का जो प्राइवेट है, उसमें घुसो और जग को बताओ कि लेखक का कुछ भी प्राइवेट नहीं होता है। लेखन एक सामाजिक कर्म है। आसाराम और राम रहीम वग़ैरा का जैसे कुछ भी प्राइवेट नहीं है, सब सबको मालूम है, उसी  तरह दुनिया के सामने हिंदी के लेखकों का जो कुछ ढका-छिपा है, सब उघाड़कर रख दो। जो-जो और जहाँ-जहाँ तक देख रहे हो, उसे लिपिबद्ध कर दो। लौटते समय उदय ने भी कहा, तुम यह काम कर सकते हो संटी। झंकार ने सुना तो उसने भी फ़ोन पर कहा, तुम यह काम कर सकते हो संटी। इस तरह पहला प्राइवेट इतिहास लिखने का काम मेरे हिस्से में आया। मैंने भी ख़ुद को समझाया, लिख लो संटी सुकुल, अपनी पहली और आख़िरी किताब—‘आधुनिक हिंदी साहित्य का प्राइवेट इतिहास’। 

रास्ते में सोचता रहा। पुरखे लेखकों और आज के लेखकों में कितना फ़र्क़ आ गया है। कुंभनदास के समय में सीकरी एक थी, बादशाह की सीकरी थी—संतन को कहा सीकरी सो काम/आवत जात पनहिया टूटी बिसर गयो हरिनाम। यहाँ आज दिल्ली में दस सीकरी तो है ही। हर शहर में एक सीकरी है। साहित्य में जगह-जगह बादशाह हैं। मशहूर सिंह दिल्ली की प्रमुख सीकरी का बादशाह है, तो गंज गोबरहवा का बादशाह जंकामंका शास्त्री है। आज साहित्य की सीकरी, राजनीति की सीकरी से अधिक क्रूर हो गई है। आज राजनीति के बरअक्स साहित्यनीति की एक काली दुनिया हमारे सामने है। राजनीति के भीतर का संघर्ष अकेले का संघर्ष नहीं है, वहाँ सत्तापक्ष है, तो विपक्ष भी है, संसद में सिर्फ़ एक आवाज़ नहीं है, अलग आवाज़ भी सुनाई देती है, लेकिन साहित्य के भीतर सिर्फ़ एक आवाज़ है, एक रंग है, एक धारा है, ऐसी काली मुख्यधारा है, जो पहले ऐसी नहीं थी, पहले भक्ति की धारा थी, स्वाधीनता-संघर्ष की धारा थी, आज पुरस्कार की धारा है, यही आज के साहित्य की मुख्यधारा है, एक हुजूम है इस धारा मे, स्त्रीलेखक-पुरुषलेखक सब एक साथ नंग-धड़ंग बह रहे है। कोई साहित्य की इस काली धारा के ख़िलाफ़ नहीं है, जो है, उलटी दिशा मे चलने का साहस जिसके पास है, हज़ार थपेड़े खा रहा है। इस धारा से पार पाना चाह रहा है। इसके लिए भारी क़ीमत चुका रहा है। अकेला है। अकेले धारा को रोकने की ज़िद कर रहा है, उसकी यह ज़िद उसके लिए भारी है। 

मैदान में लड़ाई ज़बरदस्त है। उदय के जीवन में जो भी है, ज़बरदस्त है। कोई चीज़ ज़बरदस्त नहीं है, तो उसका दुश्मन। ये साले आगे से कम लड़ते हैं, पीछे से अधिक। उदय ने जीवन में पीछे से कोई काम कभी किया ही नहीं, पीछे से लड़ाई करने का सवाल ही नहीं पैदा होता हैं। वीर आगे से लड़ते हैं, पीछे से कायर। मुहावरे में बोलूँ तो बंदूक़ दूसरे के कंधे पर रखकर लड़ते हैं। जैसे इन दिनों बल्ली वाइस चांसलर के कंधे पर बंदूक़ रखकर दनादन उदय के ख़िलाफ़ चिट्ठियाँ लिखवा रहा है। उदय ने सोच रखा है, कुछ भी हो जाए, छोड़ूँगा नहीं। शाम को घर लौटता है, तो चुपचाप अपने स्टडी-रूम में बल्ब बुझाकर दीवान पर लेट जाता है। श्रीमती जी चाय लेकर आती हैं, तो दो घूँट पीकर, फिर लेट जाता है। बच्चे आकर पूछते हैं, लाइट चला दूँ, कहता है नहीं, सिर में दर्द है, आराम करने दो। छोटी पूछती है, सिर में तेल रख दूँ, उसकी नन्हीं हथेली को चूमकर कहता है, नहीं बेटा, अभी ठीक हो जाएगा, जाओ, पढ़ाई करो। श्रीमती जी और बच्चे स्टडी से बाहर चले आते हैं, दुख फिर भीतर घना हो जाता है। तरह-तरह की चिंताएँ होती है। बड़ी चिंता तो यही कि मुझे कुछ हो गया तो बच्चों का क्या होगा। नौकरी चली गई तो परिवार को कैसे चलाऊँगा। जो होगा देखेंगे। कुछ तो कर ही लूँगा। उन दिनों के बारे में सोचता हूँ, तो काँप जाता हूँ, कैसे मेरा दोस्त अकेले हिंदी के इतने सारे दुश्मनों से लड़ रहा था। कौन लेखक था, जो उसके साथ था? कोई उसके साथ नहीं था। वह था अकेला और उसका जज़्बा उसके साथ था, उसका ग़ुस्सा उसके साथ था। झंकार उसके साथ था। मैं उसके साथ था। बीदास उसके साथ था। रह-रहकर मेरे भीतर लेखक होकर उदय का साथ देने की तीव्र इच्छा होती, लेकिन क्या सिर्फ़ चाह भर लेने से लेखक हुआ जा सकता है। लेखक होने के लिए साधना करनी पड़ती है। उन्नत भाषा की ज़रूरत पड़ती है। एक-एक शब्द के इस्तेमाल के लिए उच्चतर विवेक चाहिए। बहुत पढ़ना होता है। बहुत सीखना होता है। मैंने तो ज़िंदगी की किताब और उदय की डायरियों और कुछ कविताओं के अलावा कोई किताब पढ़ी ही नहीं। कैसे करूँ उदय की मदद! कैसे करूँ मित्र की मदद! अलेखकों की तरह झूठमूठ का लेखक की टोपी पहनकर घूमूँ। चूतियापे की चीज़ें लिखकर लेखक बना फिरूँ। नहीं-नहीं मुझसे यह नहीं हो पाएगा, न साहित्य को धोखा दे सकता हूँ, न मित्र को। कमलकांत त्रिपाठी तो उसका शिक्षाकाल का मित्र था। यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में उसके साथ था, लेकिन हाय कितने छुरे घोंपें हरामज़ादे ने मेरे मित्र की पीठ में। कितना ख़ून बहा था। कितना दर्द हुआ था। ओह आज कोई लेखक उसके साथ नहीं है, तो मैं अपनी आत्मा के सहचर उदय को अकेला कैसे छोड़ सकता हूँ, उसके लिए मैं नहीं लिखूँगा तो और कौन लिखेगा, हिंदी के महाभारत की कथा! मुझे लिखना ही होगा। हिंदी का पहला प्राइवेट इतिहास। हे माता सरस्वती, मुझे इतनी प्रतिभा दीजिए, ऐसी भाषा दीजिए, मेरे बाज़ुओं में इतनी शक्ति दीजिए कि आपके इस लांछित बेटे के साथ होने वाले हर अन्याय और छल को उघाड़कर रख सकूँ। उसके जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई में उसका साथ दे सकूँ। चाहे बाद में मुझे दी गई प्रतिभा को वापस ले लीजिएगा। ये शीश, ये भुजाएँ, जो कहिएगा सब आपको अर्पित कर दूँगा माँ, हे माता सरस्वती!

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जारी...

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