बैरीसाल की संपूर्ण रचनाएँ
दोहा 27
लई सुधा सब छीनि विधि, तुव मुख रचिवे काज।
सो अब याही सोच सखि, छीन होत दुजराज॥
- फ़ेवरेट
-
शेयर
अलि अब हम कीजै कहा, कासों कहैं हवाल।
उत धनु करषत मदन इत, करषत मनहिं गोपाल॥
- फ़ेवरेट
-
शेयर
यह सोभा त्रबलीन की, ऐसी परत निहारि।
कटि नापत विधि की मनौ, गड़ी आँगुरी चारि॥
- फ़ेवरेट
-
शेयर
लसति रोमावलि कुचन बिच, नीले पट की छाँह।
जनु सरिता जुग चंद्र बिच, निश अंधियारी माँह॥
- फ़ेवरेट
-
शेयर
विधु सम तुव मुख लखि भई, पहिचानन की संग।
विधि याही ते जनु कियो, सखि मयंक में पंग॥
- फ़ेवरेट
-
शेयर